अनंत / एक हिन्दी सेवक का सड़क पर संघर्ष

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भारत सरकार और माँरिशस सरकार कि द्विपक्षीय संस्था विश्व हिन्दी सचिवालय द्वारा आयोजित अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी निबंध प्रतियोगिता -2015  में  द्वितीय पुरस्कार से पुस्कृत निबन्ध , एक ऐसे लेखक की संघर्ष  गाथा है जो सच्चे मायने में श्रमिक संस्कृति के  नायक हैं । राजधानी पटना के चिकनी सडको के फुटपाथ से लेकर बिहार के सुदूरवर्ती ग्रामीण इलाकों के  पगडंडियों के किनारे बसे गावों तक स्वलिखित व स्व प्रकाशित पुस्तकों का प्रचार -प्रसार करने में जुटे हैं , फिर भी बिहार का साहित्यिक समाज इन्हें लेखक मानता ही नहीं। सभ्य व सामन्ती साहित्यिक बिरादरी से लड़ रहे इस लेखक के संघर्ष अपने शहर ने भले  नहीं पहचाना हो लेकिन विश्व हिन्दी सचिवालय जैसी संस्था ने इनके जीवटता सलाम किया है । प्रस्तुत है ” अनंत प्रसाद सिन्हा  उर्फ़ अनंत” द्वारा लिखित  इस लेखक के जीवन का संघर्षमय सफरनामा – मॉडरेटर    

               एक हिन्दी सेवक का सड़क पर संघर्ष

भूमिका:- डा0 लालजी प्रसाद सिंह मेहनतकश, किसान-मजदूर, और गरीबों की आवाज बन चुके हैं। राजधानी पटना में सब्जी बेचने वाला हो या सुदूर गांव में श्रम कर रहा किसान, यही मेहनतकश तबका इनका मुख्य पाठक है। श्रम की संस्कृति पर निर्भर समाज के बीच इनकी विशिष्ट पहचान है। सभ्य व कुलीन संस्कारों से सुगर्वित साहित्यिक बिरादरी इन्हें लेखक नहीं मानता है। कुछ साहित्यकार तो इन्हें सड़क छाप लेखक कहते है, जबकि डा0 लालजी प्रसाद सिंह स्वयं को अछूत लेखक मानते हैं।
जीवन का 58 वां बसंत देख रहा यह लेखक पिछले 37 सालों से हिन्दी की अनवरत सेवा कर रहा है। पिछले 22 सालों से लालजी साहित्य प्रकाशन का संचालन कर रहे हैं।1 वे अपनी पुस्तकों के प्रकाशक हैं। शहर से लेकर गांव तक में जाकर पुस्तक-प्रदर्शनी का आयोजन कर पुस्तकें स्वयं बेचते हैं। पुस्तक प्रदर्शनी के दौरान पेंटिंग प्रतियोगिता का आयोजन करते हैं। इसके जरिये बच्चों के अंदर छुपे कलात्मक गुणों को विकसित करने हेतु उन्हें पुरस्कृत भी करते हैं।2 कारपोरेट विकास के दौर में कंक्रीट के जंगल के रूप में परिणत हो रहे परिवेश में हरियाली का रंग भरने के मकसद से, अब पर्यावरण सह पुस्तक-प्रदर्शनी का आयोजन करते हैं। पुस्तक खरीदने वाले पाठकों को निःशुल्क ही अत्यंत बेशकीमती पौधे बतौर उपहार देते हैं।3 पुस्तक लोकार्पण का तरीका भी इनका अत्यंत ही आकर्षक और अनूठा होता है। लोकार्पण समारोह को जन-उत्सव की तरह मनाते हैं। बाजे-गाजे, के साथ मार्च निकालते हैं। छात्र-छात्राओं, शिक्षकों, बुद्धिजीवियों एवं अन्य नागरिकों का कारवां इनके लोकार्पण मार्च में भाग लेता है। इस दरम्यान वे पाठको के बीच निःशुल्क किताबें भी वितरित करते हैं।4 अब तक इनकी 41 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है।5

जन्म परिचय:-

इनका जन्म 13 जनवरी 1958 को बिहार प्रांत के बक्सर जिला अंतर्गत सुदूरवर्ती ग्राम सोनवर्षा में हुआ था। साधारण जोतवाले किसान मोती चन्द सिंह के घर में पैदा हुए लालजी प्रसाद का बचपन माता-पिता के संग गुजरा। पांच भाइयों में वह सबसे बड़े हैं। शिक्षा से पहला परिचय परिवारिक पर्यावरण में हुआ। इनके पिता शिक्षा के प्रति काफी जागरूक थे। होश संभालते ही इनका दाखिला गांव में अवस्थित विद्यालय में करा दिया।

विद्यार्थी जीवन में लेखन व प्रकाशन:-

पहली कक्षा से मैट्रिक तक की शिक्षा सोनवर्षा ग्राम स्थित स्कूल में प्राप्त की। वे बताते हैं, “जब मैं दसवीं कक्षा का छात्र था, किताबों में लेखकों की प्रकाशित तस्वीरें देख-देखकर दिल में लेखक बनने लालसा उत्पन्न हुई थी। 1974 ईस्वी में मैट्रिक पास किया और बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया। स्नातक की पढ़ाई करते हुए कवितायें लिखनी शुरू की। कवितायें लिखकर पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन के लिए भेजता था, कवितायें लौटा दी जाती थीं। इसके बावजूद मैं निराश नहीं हुआ और मैनें लेखन-कार्य जारी रखा। 1978 ईस्वी में पिताजी से पैसा लेकर ‘शांति और क्रांति’ नामक अपने प्रथम काव्य संग्रह का प्रकाशन स्वयं करवाया।5 महज दो रुपये मूल्य की इस पुस्तक की बिक्री नहीं हो पाई, अंततः मित्रों के बीच फ्री में बाँट दिया। सन् 1980 में राजनीति विज्ञान के साथ स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त कर बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी से पैतृक गांव सोनवर्षा लौट गया।“ बाद के दिनों में मगध विश्वविद्यालय बोध गया से पी0एच0डी0 की उपाधि प्राप्त किया।

जनवादी आन्दोलन की ओर झुकाव :-

गांव लौटे तो गांव-गिराव, जिला-जेवार का माहौल बिलकुल बदला हुआ था। पूरा इलाका नक्सल आंदोलन की गिरफ्त में आकर नक्सलवाद का गढ़ बन चुका था। संपूर्ण भोजपुर अंचल में सामंती जुल्म के खिलाफ आवाज बुलंद हो रही थी। नरसंहारों का दौर शुरू हो चुका था। सामंतों को हाशिये का समाज खुली चुनौती दे रहा था। सामाजिक-आर्थिक विषमता का सवाल हर संवेदनशील व्यक्ति को उद्वेलित कर रहा था। जीवन और जमीन के सवालों से टकराते हुए लालजी प्रसाद  सिंह 1981 में “ कुर्सी खाली करअ” नामक जनवादी काव्य संग्रह लेकर सामने आए।6 जनता के लिए लिखी गई इस पुस्तक को जनता के बीच बांट दिया। जनवादी सवालों को लेकर इनकी सक्रियता बढ़ने लगी थी। इसी वर्ष इनकी शादी प्रदेश की राजधानी पटना की पढ़ी-लिखी नवयुवती रीता सिंह के साथ हुई। शादी के बाद परिजनों ने प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी हेतु पटना भेज दिया।

पटना में साहित्यिक संघर्ष :-

आए थे प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी करने, लेकिन रम गए कविता, कहानी लेखन में। हर वक्त अपना प्रिटिंग प्रेस स्थापित करने की योजना बनाते रहते थे, यह सपना पूरा न हो सका। पॉकेट खर्च के लिए घर से 250 रु0 माहवार मिलता था। ससुराल का अपना मकान था। पॉकेट खर्च के पैसे से ही घर के छत पर बागवानी किया करते। इसी जद्दोजहद के बीच 1983 के अप्रैल माह में पहला कहानी संग्रह “कसक” नाम से प्रकाशित हुआ।7 पुस्तक की कीमत दस रु0 मात्र रखी गई थी। बकौल डा0 लालजी “कसक” कहानी संग्रह के प्रकाशन के लिए इनकी पत्नी रीता सिंह गहना बेचकर राशि उपलब्ध कराई थी। इसी वर्ष राजधानी पटना के मैनपुरा मुहल्ला में महंत हनुमान शरण वित्त रहित कालेज की स्थापना हुई। लालजी प्रसाद इस कालेज में राजनीति विज्ञान विभाग के अध्यक्ष नियुक्त हुए। शिक्षक बनते ही श्री प्रसाद बिहार इंटर शिक्षाकर्मी महासंघ से भी जुड़ गए। बकौल लालजी प्रसाद सिंह, महासंघ के अध्यक्ष मधु सिंह ने बिहार के कोने-कोने में कहानी संग्रह “कसक” की प्रतियां भिजवा तो दी, लेकिन कीमत की वसूली नहीं हो सकी।
पुस्तक प्रचार-प्रसार का तौर तरीका:-

(क) पुस्तक खरीदो नगद इनाम पाओ:-

लालजी प्रसाद सिंह कहते हैं कि “कालेज से पारिश्रमिक नहीं मिलता था। वे कालेज के शिक्षको के सहयोग से कागज खरीदकर स्वयं कॉपी निर्माण करवाते और ठेला लगाकर चौक -चैराहे पर बेचा करते थे। कॉपी के कवर पृष्ठ पर कालेज का नाम प्रिंट होता था। कालेज के प्रचार के साथ-साथ शिक्षको को थोड़ी बहुत आमदनी भी हो जाती थी। अचानक एक दिन यह बात ख्याल में आया कि जब सड़क पर कॉपी बिक सकती है, तो पुस्तक क्यों नहीं ? इसके बाद से लालजी प्रसाद पटना के चौक -चैराहे पर कॉपी के साथ-साथ किताबें भी बेचने लगे। पुस्तकों की बिक्री बढ़ाने के लिए पुस्तक खरीदो नकद इनाम पाओ योजना की शुरुआत की। महज 10 रु0 की पुस्तक खरीदने पर दो रु0 से लेकर पचास रु0 तक का नगद इनाम देने की योजना बनाई। किताब में दो रु से लेकर पचास रु तक के किसी एक नोट को रखकर पारदर्शी प्लास्टिक से पैक कर देते थे। उस वक्त तक कॉपी की कमाई से कालेज के लिए ठेला, माईक, हार्न आदि की खरीददारी कर ली गई थी। जिस स्थान पर सस्ते दाम पर कॉपी-किताब उपलब्ध कराने की उद्घोषणा करते वहां जनता की भीड़ लग जाती। पाठक इनाम के पाने के उद्देश्य से किताबें खरीदते थे। इससे इनकी पुस्तकों की बिक्री बढ़ने लगी। इनका उद्देश्य था नो प्रोफिट नो लॉस पर पाठकों तक पुस्तक को पहुंचाना। सबसे ज्यादा पुस्तकों की बिक्री पटना के प्रसिद्ध हार्डिंग पार्क में होती थी। दरअसल जी0पीओ0 के पास स्थित हार्डिंग-पार्क राजकीय बस स्टैंड था। वहां से बिहार के हर कोने में जाने वाली बसें खुलती थी। यात्रियों के लिए किताब खरीदने पर नगद इनाम की योजना कौतुहल का विषय होता था। जहां एक ओर पुस्तकों की बिक्री बढ़ने लगी, वहीं दुसरी ओर सभ्य साहित्यिक समाज इनकी आलोचना में जुट गया। तमाम आलोचनाओं से बेपरवाह डा0 लालजी प्रसाद सिंह अपनी राह चलते रहे। इसी बीच 1989 में बिमल नारायण आर्य इनके कालेज में प्रिंसिपल के पद पर नियुक्त हुए। श्री आर्य ने हिन्दी साहित्य के प्रति इनका समर्पण देख कंधे से कंधा मिलाकर चलने लगे। बकौल लालजी प्रसाद सिंह, पटना की सड़कों पर वे लगभग 10 सालों तक शिक्षा, साहित्य और हिन्दी का प्रचार-प्रसार करते रहे। लेकिन अखबार वालों ने तवज्जो नहीं दिया।

(ख) पुस्तक मेला में शिरकत :-
कालेज के प्राचार्य का संबल प्राप्त होते ही सेंटर फॉर रीडरशिप डेवलपमेंट द्वारा आयोजित पटना पुस्तक मेला में उन्होंने पहली बार 1996 में स्टाल लगाया।8 इस मेले में मात्र दस कहानी संग्रह लेकर दिनभर स्टाल पर बैठते थे। आइ0एस0बी0एन0 के तत्कालीन अधिकारी संजय मल्लिक की नजर इन पर पड़ी। हिन्दी साहित्य के प्रति इनके जज्बे को देख मल्लिक ने इन्हें रजिस्ट्रेशन फार्म भरने को दिया। लालजी प्रसाद ने आइ0एस0बी0एन0 का फार्म भरकर दे दिया और दिल्ली लौटते ही उन्होंने 100 पुस्तकों का आइ0एस0बी0एन0 नंबर निर्गत कर दिया। इस प्रकार डाक्टर लालजी प्रसाद सिंह का लालजी साहित्य प्रकाशन को मान्यता मिली।

हिन्दी की हरितक्रांति यात्रा की शुरुआत:-
बिहार बॅंटवारे के बाद बिहार में पेड़ों की संख्या काफी कम होने का मसला चर्चे में था। इन्हें लगा कि हिन्दी के साथ पर्यावरण का संरक्षण भी आवश्यक है। योजनाबद्ध तरीके से सबसे पहले अपनी बागवानी को विकसित किया। पुस्तक-प्रदर्शनी में पुस्तक खरीदने वाले पाठकों के बीच एक किताब पर एक पौधा निःशुल्क वितरित करने का फैसला किया। अब जहां भी प्रदर्शनी लगाते है वहां पाठकों को एलोवेरा, सिन्दूर, लौंग, तुलसी, अडेनियम, शमी प्लांट, मनीप्लांट, रबर प्लांट, फुटबॉल, करोटन, सुदर्शन, लेमनग्रास, रजनीगंधा, मेंहदी, लीली, ओड़हुल, अशोक, बेल, जामुन, इलाहाबादी अमरूद, आम, सहित कई अन्य प्रकार के औषधीय पौधों को वितरित करते है।9 इस कार्य के लिए इन्हें बागवानी पर काफी मेहनत करना पड़ता है। बागवानी अब सिर्फ घर की छत तक ही सीमित नहीं है, महंत हनुमान शरण कालेज के प्रांगन में भी बागवानी करते है। कालेज के प्राचार्य बिमल नारायण आर्य लालजी प्रसाद के इस प्रयास पर कहते हैं कि – “पौधे जहां एक ओर पर्यावरण को शुद्ध करते हैं, वहीं इनका साहित्य मेंटल थेरापी का काम करता है।“
गांव एवं कस्बों में पुस्तक प्रदर्शनी :-
इन्होंने पुस्तक-प्रदर्शनी का दायरा काफी बढ़़ा लिया है। पटना से लेकर बिहार के कस्बाई इलाकों एवं सुदूरवर्ती गांवों तक में प्रदर्शनी लगाते हैं। पटना से सटे दानापुर, पुनपुन से लेकर आरा, बक्सर के सुदूरवर्ती गांव सोनवर्षा, महादेवगंज सहित अन्य जगहों पर पुस्तक प्रदर्शनी का आयोजन कर चुके हैं। गांव एवं छोटे शहरों में जब भी प्रदर्शनी लगाते हैं तो 800 से 900 तक की संख्या में पुस्तको की बिक्री होती है।10 गांवों में पुस्तक प्रदर्शनी के लिए बजाब्ते तैयारी करते हैं। इसकी तैयारी में उन्हें 15-20 दिन लगते हैं। जिस इलाके में पुस्तक प्रदर्शनी लगानी होती है, वहां बुद्धिजीवियों, शिक्षकों एवं अन्य नागरिकों से संपर्क स्थापित करते हैं। जब वे लोग समझ जाते हैं कि लेखक उनके बीच आ रहा है तो वे अपने स्तर पर एक सप्ताह पहले से ही प्रचारित करते हैं कि उनकें यहां एक लेखक आने वाला है, जिसकी किताबें अल्प मूल्य पर सुलभ कराई जाएगी। इस प्रकार आम नागरिको की गोलबंदी होती है और निर्धारित तारीख को पुस्तकों की प्रदर्शनी लगाई जाती है। इस अवसर पर स्कूली बच्चों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए पेंटिंग प्रतियोगिता एवं क्विज का भी आयोजन किया जाता है। बाल कलाकारों की हौसला-अफजाई के लिए बच्चों को पुरस्कृत भी करते हैं।11 डा0 लालजी कहते हैं -, “अब तो इस मुहिम से स्थानीय मुखिया, सरपंच और जिला परिषद सदस्य को भी जोडने लगा हूँ। ग्रामीण राजनीति से जुड़े नेता इस मुहिम में काफी सहयोग करते हैं। उनके सहयोग से बहुत बड़ी जन गोलबंदी होती है। जब पुस्तक प्रकाशित करता हूँ तो सहयोग करने वालों के प्रति आभार भी व्यक्त करता हूँ।“
अनोखा-आकर्षक लोकार्पण मार्च:-
पुस्तक लोकार्पण समारोह मनाने का तरीका भी, इनका अत्यत ही नायाब है। अन्य प्रकाशकों व लेखकों की तरह बंद कमरे में कुछ लोगों के इक्ट्ठा कर, शुष्क भाषणबाजी और बड़ा लेखक होने का प्रमाण-पत्र लेने का काम नहीं करते हैं। लोकार्पण समारोह को जन उत्सव की तरह मनाते हैं। 24 अप्रैल 2012 को “प्लास्टिक का भालू” नामक पुस्तक के लोकार्पण समारोह का आयोजन दानापुर में बैलगाड़ी पर किया। लोकार्पण के बाद बैलगाड़ी, टमटम पर सवार होकर छात्र-छात्राएं, किसान, मजदूर, प्रोफेसर, हर वर्ग के पुस्तक प्रेमी एवं पाठक हाथ में तिरंगा झंडा लहराते हुए, बाजे-गाजे के साथ पटना के कारगिल चैक तक आये।12 उल्लेखनीय है कि दानापुर से पटना की दूरी लगभग 13 किलोमीटर है। इस अनोखे मार्च को देख लोग मंत्रमुग्ध थे। बकौल डा0 लालजी, रास्ते में इस काफिले पर नजर कुछ रूसी पर्यटकों की पड़ी। रुसी पर्यटक यह नजारा देख काफी अचंभित हुए। पर्यटक भी कुछ दूरी तक साथ हो चले और साथ में अपनी तस्वीर खिंचवाई। 25 जुलाई 2014 को “उड़ान भरो औरत” का लोकार्पण राजधानी पटना के कारगिल चैराहे पर किया गया। लोकार्पण समारोह में मौजूद छात्र-छात्राओं, शिक्षकों एवं अन्य लेखक-प्रेमियों ने कैंडल मार्च निकाला। इस मार्च में शामिल लोग शंख, डमरू, घड़ी-घंट, झाल, करताल, ढ़ोल बजाते हुए जे0पी0 गोलम्बर तक गए।13 श्री प्रसाद ने अपनी इकतालीसवीं पुस्तक “रंगीन राजनीति” का लोकार्पण देश की राजधानी दिल्ली में धरना- प्रदर्शन, भूख हड़ताल, आदि के लिए प्रसिद्ध जंतर-मंतर पर 8 मई 2015 को किया।14 इनके साहित्यिक कार्यक्रम में महंत हनुमान शरण कालेज और कॉलेज के प्राचार्य द्वारा संचालित शिवम क्लासेज एवं साईं शिवम पब्लिक स्कूल के छात्र बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं।
डा0 लालजी प्रसाद सिंह की कृतियां:-
कहानी संग्रह:- (1) कसक (2) बेदर्द पुरवैया (3) हमदर्दी का कफन (4) तृष्णा (5) सुकून (6) मां (7) चिनगारी (8) मनौती (9) बसेरा (10) अलाव (11) वह आदमी ही था (12) गरीब देवता (13) हनुमान की मस्जिद (14) पापा मैं घर पर ही पढू लूंगी (15) भरोसे का खून (16) मैं हारूंगी नहीं (17) अगले जाड़े में (18) रसूल मियां की दुर्गा जी (19) हिन्दी के तालिबान (20) मेरे मौला (21) मेरी मशहूर कहानियां (22) प्रिय कहानियां।
कविता संग्रह:- (1) क्रांति और शांति (2) कुर्सी खाली करअ (3) आग किसने लगाई है ? (4) एक युग बीता जाता है एक दिन में (5) क्या खोया क्या पाया (6) सुन रहे हो ब्रह्मा (7) हिन्दू कबूतर मुस्लिम कबूतर
उपन्यास:- (1) राकस (2) वो रातरानी (3) प्यासी तितली (4) भंवर में जिन्दगानी (5) जिन्दा लाशों का शहर
यात्रा संस्मरण:- (1) झलक राजदरी की (2) अपना अपना वृन्दावन
बाल साहित्य:- (1) प्लास्टिक का भालू (2) प्यारा टॉमी (3) शुभी की दीवाली
इनके साहित्य पर आलोचकीय टिप्पणियां:-
डा0 लालजी द्वारा लिखित एवं स्वयं प्रकाशित पुस्तकों पर पटना से लेकर दिल्ली तक के आलोचकों की नजर अभी तक नहीं पड़ी है। वैसे कुछ युवा आलोचकों ने इनके साहित्य को पढ़ा और बखूबी समझा भी है। युवा आलोचक राजीव मणि का मत है कि “‘इस पुस्तक में प्रकाशित कहानी “मर्सी किलिंग” को बार-बार पढ़ने का मन करता है। इस कहानी की सुंदर शुरुआत, सजीव सामाजिक तानाबाना, और गिरते सामाजिक-पारिवारिक मूल्यों के बीच जिंदा इंसानियत ने कहानी को जीवंत बना दिया है।“15 महिला पत्रकार सीटू तिवारी ने लिखा है कि “‘लालजी साहित्य मेहनतकश लोगों के मुद्दों, इनसानी जज्बात, अंधविश्वास के खिलाफ सामाजिक समस्याओं को लगातार उठा रहा है।16 युवा आलोचक अरुण नारायण ने लिखा है कि – “‘उन्होंने कहानियों, कविताओं एवं उपन्यासों में निम्न मध्यवर्गीय लोगों के जिन रूपों की शिनाखत की है, उससे वहां की जनता को कहीं न कहीं यह लगता है कि लेखक उनके आसपास की बात कर रहा है।“ अरुण नारायण ने डा0 लालजी के हिन्दी भाषा और साहित्य के प्रति समर्पण पर लिखा है कि – “एक ऐसे समय में, जब विचार और व्यवहार का फर्क धुंधला सा हो गया है, समाज के अन्य क्षेत्रों की तरह ही साहित्य में स्थितियां लगातार प्रतिकूल होती जा रही है। ऐसे में लालजी प्रसाद की यह समर्पणशीलता और दुस्साहसिकता ही कही जाएगी, जो उन्हें आम लोगों के बीच अधिक लोकप्रिय बनाती है।17

उपसंहार:- यह समाज अब डिजिटल इंडिया की होड़ में शामिल है। ग्लोबल गांव का हिस्सा बन चुके भारत में बहस तेज है कि गांव का भाषाई देवता हिन्दी होगा या अंग्रेजी ? दहशत इस बात को लेकर भी है कि नये जमाने में प्रिंट माध्यम से पुस्तकों का प्रकाशन कहीं बंदी के कगार पर न पहुँच जाए। नई पीढ़ी अंग्रेजीयत का शिकार होकर हिन्दी की जगह कहीं हिंगलिश भाषा में ही जीने लगे। ऐसे वातावरण में डा0 लालजी प्रसाद सिंह का हिन्दी साहित्य लेखन और प्रचार-प्रसार का तौर तरीका यह ढ़ांढस बंधाता है कि यह ग्लोबल युग में भी पुस्तकों अस्तित्व बचा रहेगा। हिन्दी का दायरा बढ़ता ही जाएगा। श्री प्रसाद भले ही छोटे प्रकाशक है, लेकिन एक-एक पुस्तक का तीन-तीन हजार की संख्या में पेपर बैक पुस्तक का प्रकाशन करवाते हैं।18 मंहगाई से उत्पन्न तनाव और भागदौड़ के बीच हर व्यक्ति अपनी मानसिक संतुष्टि के लिए पढ़ना चाहता है। लेकिन महंगी किताबें पाठकों का हाथ बांध देती हैं। डा0 लालजी प्रसाद सिंह समाज के इस कमजोर नब्ज को पहचान चुके हैं। सस्ते दामों पर पाठकों के लिए अपनी पुस्तकें उपलब्ध कराते हैं, जिससे हिन्दी का अलख लगातार जल रहा है। ऐसे हिन्दी का अलख जगाने वालों की समाज को जरूरत है।
संदर्भ सूची
1 प्रथम प्रवक्ता, पाक्षिक पत्रिका, अंक 1 मार्च 2008, पृ0सं0- 69,क्रानिकल निकल प्रेस, नई दिल्ली।
2 हिन्दुस्तान, दैनिक, पटना संस्करण, 12 मई 2012 एवं चौथी दुनियां, साप्ताहिक पत्रिका, 05 अक्टूबर- 11 अक्टूबर 2015।
3 हिन्दुस्तान, दैनिक, पटना संस्करण, पृष्ठ संख्या – 4, अंक 25 अप्रैल 2012 एवं दैनिक जागरण, दैनिक, पृष्ठ संख्या – 11, अंक , 25 अप्रैल 2012 ।
4 चौथी दुनियां, साप्ताहिक, अंक – 27 अप्रैल से 03 मार्च, नई दिल्ली।
5 शांति और क्रांति (कविता संग्रह), लेखक – डा0 लालजी प्रसाद सिंह।
6 कुर्सी खाली करअ (कविता संग्रह), लेखक – डा0 लालजी प्रसाद सिंह।
7 कसक (कहानी संग्रह), लेखक – डा0 लालजी प्रसाद सिंह
8 सरस सलिल , पाक्षिक पत्रिका , अंक फरवरी प्रथम 2008, पृ0सं0- 22, दिल्ली प्रेस।
9 हिन्दुस्तान, दैनिक, पटना संस्करण, 12 मई 2012 एवं चौथी दुनियां, साप्ताहिक पत्रिका, 05 अक्टूबर- 11 अक्टूबर 2015।
10 प्रथम प्रवक्ता, पाक्षिक पत्रिका, अंक 1 मार्च 2008, क्रानिकल प्रेस, पृ0सं0 -69, नई दिल्ली।

११ प्रथम प्रवक्ता, पाक्षिक पत्रिका, अंक 1 मार्च 2008, पृ0सं0- 69, क्रानिकल प्रेस, नई दिल्ली।
१२ आज हिन्दी दैनिक, पटना संस्करण, 25 अप्रैल 2012, दैनिक जागरण, 25 अप्रैल 2012, पृष्ठ संख्या 11, हिन्दुस्तान दैनिक, 25 अप्रैल, 2012, पृ0 संख्या-4।
13 दैनिक भास्कर दैनिक, डी0बी0 स्टार, 26 जुलाई 2014, पृ0 सं0 -2।
14 चैथी दुनियां , साप्ताहिक , 25 मई से 31 मई 2015, नई दिल्ली, आज दैनिक पटना संस्करण, 9 मई 2015, पृ0 सं0 -4, हिन्दुस्तान दैनिक, पटना संस्करण, 9 मई 2015, पृ0 सं0- 6।
15 समाज का दर्पण है ‘ प्रिय कहानियां’, राजीव मणि, चैथी दुनियां साप्ताहिक, 13 जनवरी से 19 जनवरी, 2014।
16 सरस सलिल , पाक्षिक पत्रिका , अंक फरवरी प्रथम 2008, पृ0सं0- 22, दिल्ली प्रेस।
17 प्रथम प्रवक्ता, पाक्षिक पत्रिका, अंक 1 मार्च 2008, पृ0सं0- 69 , क्राॅनिकल प्रेस, नई दिल्ली।
18 प्रथम प्रवक्ता, पाक्षिक पत्रिका, अंक 1 मार्च 2008, क्राॅनिकल प्रेस, पृ0सं0 -69, नई दिल्ली

लेखक परिचय – लेखक फणीश्वरनाथ रेणु डॉट कॉम के  संपादक और मॉडरेटर हैं 

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