अनन्त/ दैनिक जागरण का ‘बिहार संवादी’ आयोजन छोड़ गया कई सवाल

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काफी प्रतिरोध के बीच शुरू हुआ दैनिक जागरण का ‘बिहार संवादी’ कार्यक्रम नोक-झोंक और हल्ला-हंगामा के साथ समाप्त हुआ। जागरण का संवादी आयोजन भले ही समाप्त हो गया हो लेकिन पटना का साहित्यिक महकमा शांत बैठने वाला नहीं है। संवादी कार्यक्रम के पक्ष और विपक्ष में अभी नये सिरे से गरमा गरम बहस जारी रहेगा। संभव है कुछ साहित्यकार इसे शीत युद्ध का रूप देने का प्रयास करें। सोशल मीडिया में और जसम के आहवान पर बहिष्कार करने वाले साहित्यकार अंतर्मन कुढ़न में दिख रहे हैं। इन साहित्यकारों का गुस्सा हिन्दुत्ववादी हिन्दी का ध्वजवाहक बना जागरण के प्रति कम और ‘बिहार संवादी’ का विरोध करने वालों के प्रति ज्यादा है। विरोध अभियान को खुला समर्थन देने वाले लेखक जसम के खिलाफ भले ही मुखर होकर कुछ नहीं बोले लेकिन बातों ही बातों में अपनी खिन्नता जाहिर कर बैठते हैं। बहरहाल जसम का कठुआ दुष्कर्म कांड पर दैनिक जागरण की स्त्रीविरोधी और सत्तापक्षी वृति से प्रेरित पत्रकारिता का मुखर विरोध और हिन्दी भाषा के सवाल पर मौन रहना भी उनके भाषाई दृष्टिकोण का आइना है। उधर बिहार की आंचलिक भाषा मैथिली को बोली की श्रेणी में रखने का विरोध कर रहे भाषाई अस्मिता के रणबांकुरों की हुड़दंगई ने मिथिला की सभ्य संस्कृति के दामन को ही दागदार बना दिया है।

यहां उल्लेखनीय है कि  मीडिया समूह दैनिक जागरण का ‘बिहार संवादी’ नामक लिटरेचर फेस्टिवल का आयोजन 21-22 अप्रैल को होना तय था। इसकी जानकारी पटना के साहित्यिक बिरादरी को काफी पहले से थी। आयोजक ने महीना दो महीना पहले ही प्रतिष्ठित साहित्यकारों और कथित लेखकों से कार्यक्रम में शिरकत करने से संबंधित प्रस्ताव पर सहमति प्राप्त कर ली थी। हिन्दी को लेकर दैनिक जागरण की वैचारिक दृष्टि क्या है ? इससे वाकिफ कई लेखक भले ही न हों प्रतिष्ठित साहित्यकार तो हैं ही। फिर भी तमाम प्रगतिशील साहित्यकारों ने आयोजन में शिरकत करने की अनुमति दे रखी थी। कार्यक्रम की तिथि नजदीक आते ही अचानक छोटी-छोटी बच्चियों के साथ बलात्कार की घटनाएँ सामने आने लगीं। कठुआ और उन्नाव की घटना ने तो मानवता को ही शर्मसार कर दिया। फिर बेशर्म हिन्दुवादी राष्ट्रवादी सेनानियों को शर्म नहीं आई। उतर पड़े तिरंगा लेकर सड़को पर। लगने लगा कि सचमुच देश बदला है- डिजिटल भारत में तिरंगा का इस्तेमाल बलत्कृत पीड़िता के खिलाफ होगा। कठुआ से लेकर उन्नाव तक की घटनाओं पर भाजपा सरकार और खासतौर से मोदी की चुप्पी से भी देशवासी खफा थे। फिर भी दैनिक जागरण संवादी कार्यक्रम को लेकर कोई विवाद उत्पन्न होने की संभावना नहीं थी। साहित्यिक उत्सव शुरू होने के सप्ताह भर पहले से ही ‘बिहार संवादी’ कार्यक्रम का निमंत्रण पत्र बांटा जा रहा था। निमंत्रण पत्र का मुख्य सलोगन था – ‘हिन्दी हैं हम’ और स्थानीय भाषा पर केन्द्रित कार्यक्रम के सत्र का टैग लाइन था  – ‘ बिन बोली भाषा सून ?’ आमंत्रित लेखकों की सूची में एक भी दलित और मुस्लिम समुदाय के साहित्यकार, पत्रकार और लेखक का नाम शामिल नहीं था, हालांकि नामित साहित्यकारों द्वारा कार्यक्रम में शिरकत नहीं करने की स्थिति में शहंशाह आलम को बुलाया गया। इसे जागरण संवादी कार्यक्रम के आयजकों की मज़बूरी ही कहा जायेगा।  आमंत्रण पत्र मुस्लिम मुक्त हिंदी संवादी का जीता -जगता सबूत था फिर भी  संवेदनशील, बुद्धिजीवी और खुद को प्रगतिशील व क्रांतिवीर कलमकार कहने तथा कहलाने वाले साहित्यकार प्रतिनिधित्व के सवाल पर मौनी बाबा बने रहे। और ‘बिहार संवादी’ कार्यक्रम की तैयारी भी अपनी रफतार से आगे बढ रही थी। खासतौर से पटना के कथित लेखकों के बीच मंच लूट लेने की भी तैयारी चल रही थी। इसी बीच दैनिक जागरण ने कठुआ दुष्कर्म मामले में बलात्कार के आरोपियों को पाक-साफ और बलात्कार नहीं होने से संबंधित खबर प्रकाशित कर ही दी। जजमेंटल हेडिग के साथ प्रकाशित यह खबर ‘कठरार वृति पत्रकारिता’ का प्रतीक बन गया। दैनिक जागरण की पत्रकारिता पर चहुँ ओर सवाल खड़े होने लगे। अखबार पर लोगों का गुस्सा भड़कने लगा। फेसबुक से लेकर टयूटर तक पर दैनिक जागरण की ‘कठरार वृति पत्रकारिता’ की भर्त्सना की जाने लगी।

यह मामला जहां एक डगमग हो चुकी पत्रकारिता के खंभे को गतलखाने में फेंक रहा था तो दूसरी ओर हाशिये के समाज को न्याय से वंचित रखने के लिए षडयंत्र भी रच रहा था। लोग अपने-अपने तरीके से दैनिक जागरण का विरोध कर रहे थे। इसी बीच जन संस्कृति मंच के पटना जिला के संयोजक राजेश कमल ने कठुआ मामले पर संज्ञान लेते हुये ‘बिहार संवादी’ कार्यक्रम का विरोध और उसमें शिरकत नहीं करने से संबंधित अपील जारी की। जसम के आहवान के साथ ही साहित्यिक बिरादरी में हड़कंप मंच गया। अरूण कमल, आलोकधन्वा, ध्रुव गुप्त, प्रेम कुमार मणि, संजय कुमार, निवेदिता सरीखे साहित्यकारों ने ‘बिहार संवादी’ कार्यक्रम में नहीं जाने का एलान कर दिया। वही कुछ लोगों ने कार्यक्रम में शिरकत करते हुये जागरण द्वारा सजाये गये बिहार संवादी के मंच से कठुआ मामले पर विरोध जताने का फैसला लिया। असली मार्क्सवादी और क्रांतिकारी कौन ? यह सवाल भी साहित्यिक फिजां में तैरने लगा।

‘जसम’ के विरोध से इतर मिथिला स्टूडेंट यूनियन ने ‘बिन बोली भाषा सून? अर्थात आंचलिक भाषा को बोली साबित करने के मामले को लेकर बिहार संवादी के विरोध में आ गया। यहां बता देना आवश्यक है कि बिहार की आंचलिक भाषाओं का इतिहास हिन्दी से बहुत पुराना है। मगही का अस्तित्व तो मगध की स्थापना से पहले से है। मगध की स्थापना के पहले इस क्षेत्र को ‘किकट’ कहा जाता था। मगही की प्राचीनता का जिक्र अश्विनीकुमार पंकज ने अपने उपन्यास ‘खाँटी  किकटिया’ में किया है। ‘मागधी सा मूल भाषा’ का सूत्र साहित्य में प्रसिद्ध है और इसे माईभाषा कहा जाता है। मैथिली के कवि विद्यापति आदिकाल में पैदा हुये थे। इसी प्रकार अन्य स्थानीय भाषाओं का भी इतिहास काफी प्राचीन है। हिन्दी का जन्म तो हाल साल के दशकों और शतकों में हुआ है। ‘बिहार संवाद’ के माध्यम से दैनिक जागरण ने भाषाई लठैती करने का प्रयास तो किया ही है। फिर भी साहित्यकारों का ध्यान सिर्फ कठुआ पर अटका रहा। खैर मैथिली के सम्मान में साहित्यकार तारानंद वियोगी और विभूति आनंद ने बिहार संवादी के आयोजन से दूरी बनाने की घोषणा कर बिहार की लाज बचा ली। वहीं वोटिंग के जरिये मैथिली भाषा में साहित्य अकादमी प्राप्त लेखिका उषा किरण खान ने बिहार संवादी के मंच से जागरण की भाषा-नीति की आलोचना का  आश्वासन मैथिली भाषियों को दिया, पर अंततः गयी नहीं.

बिहार संवादी का विरोध तो बड़े ही धूमधाम  से हुआ। लेकिन ‘हिन्दी हैं हम’ में छिपी भाषाई सांप्रदायिकता का सवाल विरोध का विषय नहीं बन पाया ? अब सवाल यह उठता है कि भाषाई सांप्रदायिकता जसम के लिये मुद्दा नहीं है? जसम ने इस सवाल को अपने एजेडे में क्यों नहीं शामिल किया? क्या जनवादी जसम भी हिन्दी को लेकर वही सोच रखती जो आरएसएस की है ? वैसे माकर्सवादी, प्रगतिशील और जनवादी साहित्यकार भाषाई साप्रदायिकता का उदाहरण पहले भी पेश कर चुके हैं। उर्दू का विरोध करते हुये बाबा नागार्जुन ने कहा था – ‘अगर उर्दू का विरोध करना जनसंघी होना है तो मै एक सौ बार जनसंघी होना स्वीकार करूंगा।’’ जहां तक हिन्दी भाषा का सवाल है तो यह भाषा घोर मर्दवादी और ब्रहमणवादी है। आपको भरोसा नहीं होता तो कुछ शब्दों पर गौर कर लें। ज्यादा पृष्ठों के लिए पुस्तक तो कम शब्द के लिए पुस्तिका शब्द का उपयोग किया जाता है। अंग्रेजी में एडिटर स्त्री हो या पुरूष स्त्री लिखा जाता है। लेकिन हिन्दी पुरूष के लिये संपादक तो स्त्री के लिये संपादिका का भी चलन है-हालांकि अब संपादक भी लिखा जाने लगा है। कहने का आशय है कि जो मर्दवादी और ब्राह्मणवादी होगा वह सांप्रदायिक भी होगा। क्योंकि यह मानसिकता श्रेष्ठताबोध से प्रेरित है। इस हिन्दी को जनवादी बनाने का प्रयास अमर कथाकार रेणु ने किया। रेणु ने न तो गांव की भाषा को लिखी है और ना ही खड़ी बोली हिन्दी का प्रयोग किया है। रेणु की हिन्दी खड़ी बोली हिन्दी से भिन्न है। जो देशज दुनिया में बसे समाज की हिन्दी है। रेणु की हिन्दी मगही, मैथिली, भोजपुरी, अंगिका, नेपाली, अंग्रेजी, बंगला आदि से निर्मित हुई है। रेणु की हिन्दी बहुभाषिकता का प्रतीक है। बहुभाषिक और बहुसांस्कृतिक भारत के लिये रेणु की हिन्दी को आगे बढ़ाने की जरूरत है। रेणु के यहां स्थानीय भाषायें अपने स्वतंत्र अस्तित्व के साथ हिन्दी को समृद्ध करती है। रेणु की परंपरा को अन्य कथाकारों ने भी आगे बढ़ाया है और उसे जनभाषा का स्वरूप प्रदान किया है। लेकिन हिन्दी के अमिताभ बच्चन बाबा नामवर सिंह ने हाल-साल के वर्षो में रेणु की हिन्दी पर क्या टिप्पणी की है यह भी आप पढ ले – ‘‘ रेणु जैसे आंचलिक कथाकारों ने हिन्दी भाषा पर नाकारात्मक प्रभाव डाला है।’’ दरअसल नामवर उसी हिन्दी को बढावा देने के पक्षधर है जहां श्रमिको की बोलियों और भाषाओं का कोई स्थान न हो-जिसमें संघी आसानी से सेंध लगाने में सफल हुए हैं, ‘शुद्ध हिन्दू राष्ट्र की भाषा विशुद्ध हिन्दी होगी। ऐसे राष्ट्र में ‘पाटल’ कहने वाले को सजा दी जायेगी और गुलाब कहने वाले को मौत की सजा। बहरहाल रेणु की हिन्दी के संबंध में नलिन विलोचन शर्मा 1954 में ही हिन्दी भाषा को समृद्ध करने का खिताब दे चुके हैं। इसलिये रेणु को नामवर सिंह से प्रमाण पत्र लेने की जरूरत नहीं है। खैर दैनिक जागरण ने हिन्दी को लेकर जो दृष्टि पत्र का नमूना पेश किया है, वह बेहद खतरनाक है। मंटो, राही मासूम राजा जैसे मुस्लिम समुदाय के लेखक पैदा हुये है। बिहार संवाद से जुड़े भाषाई मर्मज्ञ इन्हें हिन्दी का कथाकार मानेगें ? यह सवाल उठना भी लाजिमी है कि प्रेमचंद हिन्दी के मूल लेखक हैं कैसे ? प्रेमचंद की शुरूआती बहुत सारी रचनायें तो पहले उर्दू में प्रकाशित हुई है। बदलते वक्त के साथ हिन्दी को और प्रगतिशील बनाने की जरूरत हे तो दैनिक जागरण ने संवादी कार्यक्रम के माध्यम से हिन्दी को संकीर्ण दायरे में समेटने का पहला प्रयास किया है। फिर भी जसम को यह बात क्यों नहीं समझ में आई।


और अंत में जसम से एक सवाल: पिछले दिनों की ही तो बात है, आरक्षण विरोधियों के बंद के पक्ष में प्रभात खबर ने कलम तोड़ रिपोर्टिंग की थी। प्रभात खबर के संपादक को भी आरक्षण समर्थकों ने उस रिपोर्टिंग का विरोध करते हुये कई पत्र लिखे थे। इस मुहिम से भी जसम ने खुद को अलग रखा था। क्या ‘जसम’ कामरेड विनोद मिश्र के इस वक्तव्य के साथ आज भी खड़ा है कि – ‘‘जिस प्रकार बाबर की गलतियों की सजा उनके वंशजों को नहीं दी जा सकती। उसी प्रकार मनु की गलतियों की सजा उनके वंशजों को नहीं दी जा सकती’’ इतिहास के पात्र बाबर की गलतियों को प्रचारित तो संघ करता है। ‘जसम’ को या तो विनोद मिश्र की भर्त्सना करनी चाहिये या फिर बाबर की गलतियों की व्याख्या  करनी चाहिये ? क्या आरक्षण विरोधी मुहिम हवा देने की पत्रकारिता को श्रेष्ठ पत्रकारिता की श्रेणी में नहीं रखा जायेगा। बरमेसर मुखिया हत्या कांड पर बिहार के तमाम अखबारों ने वर्चस्ववादी रिपोर्टिग की थी। क्या वह कम कठरार वृति से प्रेरित पत्रकारिता का नमूना था ? आजादी के बाद बिहार में हुये पहले नरसंहार की खबर को यहां के अखबारों ने प्रकाशित किया ही नहीं था। कर्पूरी ठाकुर ने नरसंहार पीड़ित गांव रूपसपुर चंदवा से लौटकर प्रेस को बयान दिया तो अखबारों ने अंदर के पन्नों पर प्रकाशित कर मामले को इतिश्री कर दिया था। गरीब दलित पीड़ित लड़की के साथ हुये बालात्कार की खबरोंको  पटना के अखबार प्रमुखता के साथ नहीं प्रकाशित करते हैं। यह भी जगजाहिर है। पत्रकारिता को शर्मसार करने वाली घटनाओं से भरा-पुरा रहा है बिहार की पत्रकारिता का इतिहास और वर्तमान। जहां तक गलत खबर प्रकाशित करने का सवाल है तो इसमे माले द्वारा प्रकाशित अखबार लोकयुद्ध भी पीछे रहा है क्या ? इसका उदाहरण है एकरासी कांड। इसी वर्ष होली के वक्त की घटना है। सिविल सोसाइटी को लोकयुद्ध में प्रकाशित खबर को पढ़कर एकरासी गांव का दौरा करना चाहिये। तब चलेगा कि लोकयुद्ध बदलते वक्त के साथ कैसे ‘फेक युद्ध’ का पर्याय बन गया है। कुछ वर्ष पहले ‘हिन्दुस्तान’ के तत्कालीन संपादक गिरीश मिश्र ने ‘ अलाउद्दीन का राक्षसी कुकृत्य’ नामक शीर्षक से खबर प्रकाशित की । जिस घटना को अंजाम देने का आरोप लगाया उस वक्त अलाउद्दीन घटनास्थल से लगभग 6-7 किलोमीटर की दूरी पर कुरथौल पुल पर था। पत्रकारिता का इतिहास और वर्तमान गलत और झूठी खबरें प्रकाशित  करने के लिए  कुख्यात रहा है। कभी भी जसम ने ऐसी कारवाई नहीं की थी।

यह मान भी लें  कि कठुआ का ममला तात्कालिक था। इस पर मुखर विरोध जरूरी था। तो सवाल यह उठता है कि जसम ने जागरण विरोधी प्रतिरोध को विस्तृत स्वरूप क्यों नहीं किया ? जसम के पटना जिला संयोजक राजेश कमल वकत की कमी को मुख्य कारण मानते हैं। राजेश कमल की बातों में जितना दम है उतनी ही राजनीति भी। वक्त की कमी तो थी ही लेकिन कुछ लेखकों पत्रकारों नाटककारों की बैठक बुलाई जा सकती थी। प्रतिरोध का रूप-स्वरूप तैयार भी किया जा सकता था। अगर ऐसा करते तो श्रेय जसम और राजेश कमल को नहीं मिलता। संभव है बिहार संवादी कार्यक्रम के विरोध मुख्य बिन्दु भाषाई साप्रदायिकता होता और कठुआ का मामला उससे जुड़ा होता। विरोध का तौर-तरीका अराजक नहीं बल्कि रचनात्मक होता। जैसा कि पिछले दिनों जयपुर में जे0 एल0 एफ0 के विरोध में पी0 एल0 एफ का आयोजन किया गया। समयाभाव में कोई समानान्तर आयोजन नहीं होता। लेकिन विरोध का स्वरूप साकारात्मक और दीर्घकालिक प्रभाव डालने वाला अवश्यहोता। साकारत्मक विरोध से सनसनी भले ही कम फैलता लेकिन भाषाई सांप्रदायकिता के खिलाफ एक विमर्श का जन्म होता है। ऐसी बात नहीं है कि जसम से जुड़े लोगों को इतनी समझ नहीं है। वक्त कमी और अचानक फैसला लेने का जो तर्क दिया जा रहा है। वह बेहद बेतुका है। संवादी कार्यक्रम में नहीं जाने की घोषणा करने वालों को फेसबुक पर ट्रोल करने में कौन लोग जुटे थे। वही लोग थे जो जसम के स्टैंड के साथ खडे थे। फेसबुकिया विरोध के लिये इनके समर्थकों के पास वक्त कैसे था ? तभी तो कुछ लोगों ने सवाल उठाया कि फेसबुक पोस्ट से ही सिर्फ क्रांति हो जायेगी ? भाषा को लेकर धरणा पर बैठे मिथिला स्टूडेंट यूनियन के छात्रों के साथ कंधा से कंधा मिलाकर चलने का भी प्रयास जसम ने नहीं किया? जब मुगलिया फरमान जारी किया था तो सड़क पर झंडा बैनर के साथ थोड़ा चिचिलाती धूप खड़ा होकर पसीना बहाते। जसम अगर सड़क पर कठुआ मामले को लेकर ही भाषाई अस्मिता को लेकर संघर्ष कर रहे छात्रों के साथ खड़ा रहता तो विरोध का स्वरूप रचनात्मक होता। छात्र मगही के हो या भोजपुरी के या मैथिली के। छात्रों का जोश और जुनून सांतवें आसमान पर होता ही है। आखिर गुस्साये छात्र कार्यक्रम के दूसरे दिन अराजक हो ही गये। कार्यक्रम स्थल पर पहूॅचकर हुड़दंग किया और कई लोगो को कालिख पोत डाली। अब इन छात्रों को कौन समझाये कि भाषा की लड़ाई उदंडता से नहीं लड़ी जा सकती।

कठुआ की रिपोर्टिंग को लेकर जसम इतना क्यों संवेदनशील हुआ और इसके राज्य सचिव सुधीर सुमन पूरे
परिदृश्य से बाहर रहे। बताते चलें कि कुछ ही महीने पहले दैनिक जागरण बनाम माले विवाद सामने आया था। माले के राज्य कार्यालय सचिव कुमार परवेज ने दैनिक जागरण पर गलत प्रेस बयान प्रकाशित करने आरोप लगाया था। कुमार परवेज ने प्रकाशित खबर का खंडन प्रकाशित करने का आग्रह भी किया था।  खबर का खंडन छापना तो दूर रिलिज लिखने वाले रिपोर्टर से स्पष्टीकरण भी नहीं पूछा था। इस पृष्ठभूमि में आयोजन के बहिष्कार पर भी सवाल उठने लाजिमी भी है क्योंकि संवादी कार्यक्रम का विरोध अराजक तरीके से हुआ है।

 

लेखक फणीश्वर नाथ रेणु डॉटकाम के संपादक मॉडरेटर हैं।