अस्मिता विमर्श

0
47

देशज अस्मिता के पहले रचनाकार हैं रेणु

आज रेणु का जन्मदिन है. झारखंड से उनका गहरा रिश्ता था. इस गहरे रिश्ते की रचनात्मक स्वीकारोक्ति है उनकी दो बहुपठित-प्रशंसित रचनाएं – “तीसरी कसम” और “मैला आंचल”. बहुत कम लोग जानते हैं कि उनकी दूसरी पत्नी लतिका हजारीबाग की थीं. यह भी और कम लोग ही स्वीकार करेंगे कि यह अद्भुत कथा-शिल्पी आज अगर अमर है तो उसकी अमरता को स्रोत अथवा अमृत लतिका जी ही रही हैं. यानी कि झारखंड. बहरहाल, लतिका जी पर फिर कभी. यहां हम याद करेंगे देशज रेणु और रेणु के देशज लेखन पर जिसे हिंदी साहित्य में रेखांकित नहीं किया गया. किसी आलोचक, अध्येता अथवा साहित्यकार ने ‘मैला आंचल’ को देशज जन की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति नहीं माना. न ही देश में झारखंड जैसे विभिन्न अस्मिताओं के आंदोलनों का समर्थन करते हुए साहित्य में स्थान दिया.

रेणु हमारे समय के सबसे संवेदनशील कथाकार हैं. इसलिए नहीं कि उन्होंने ग्रामीण जीवन का आधुनिक महाकाव्य ‘मैला आंचल’ देशज जबान में लिखा बल्कि इसलिए कि वे स्वयं भी देशज थे. देशज विचारों और संघर्ष की सबसे उम्दा सांस्कृतिक अभिव्यक्ति. जिसे आचंलिक कहकर हिंदी साहित्य और उसके मठाधीशों ने उन्हें नकारने की पूरी कोशिश की. यह अलग बात है कि देशज अस्मिता ने उन्हें लोकप्रिय बनाया और वे प्रथमतः लोक में प्रतिष्ठित हुए. बाद में आलोचकों ने. हालांकि उनके समकालीन रामविलास शर्मा से लेकर आज के नामवर सिंह ने कभी उनके रचनाकर्म पर नहीं लिखा. बावजूद इसके रेणु का लेखन कभी भी आलोचकों का मोहताज नहीं रहा. उनके जोड़ का रचनाकार जिसकी लेखनी देशज अस्मिता और उसकी चिंताओं में गहरी धंसी हो और कोई दूसरा नहीं हुआ.

रेणु के जीवन और रचनाकर्म पर अध्येताओं ने देशज अस्मिता के संदर्भ में अध्ययन नहीं किया है. इसलिए यह बात अनउद्घाटित ही रह गई कि ‘मैला आंचल’ देशज अस्मिताओं के उभार को प्रमुखता से रचनेवाला भारत का पहला उपन्यास है. 1954 में जब मैला आंचल छपा था, उस समय तत्कालीन बिहार में कई चरणों में चलनेवाले ऐतिहासिक झारखंड अलग राज्य आंदोलन का पहला चरण पूरे उफान पर था. जयपाल सिंह मुंडा, इग्नेस बेक आदि के नेतृत्व में झारखंड पार्टी का आंदोलन सबसे सुनहरे दौर में था. इसका असर 1952 में दिखा जब चुनाव हुए. चुनाव में झारखंड पार्टी ने सभी 32 सीट जीतकर कांग्रेस को और समूचे देश को यह संदेश बखूबी दे दिया था कि अलग झारखंड आज नहीं तो कल एक हकीकत होगा. तो 1950 का दशक झारखंड के नगाड़ों की गूंज से धमक रहा था और उसी दौर में रामविलास शर्मा के ‘हिंदी-हिंदुस्तान’ के नारे के समानांतर राहुल सांस्कृत्यायन देशज भाषाओं की वकालत कर रहे थे. सांकृत्यायन भोजपुरी और ठेठ गंवई भाषा में रचनाएं कर देशज अस्मिता और उनके भाषाओं को प्रतिष्ठित कर रहे थे. जबकि अधिकांश रामविलास शर्मा के साथ थे और जनपदीय भाषाओं को ‘राष्ट्रभाषा’ के विस्तार में बाधा मान रहे थे. हलांकि प्रथमद्रष्टया रामविलास जी भी आपको देशज भाषाओं के खिलाफ नहीं प्रतीत होंगे लेकिन जब आप उनके पूरे लेखन-आग्रह पर सूक्ष्म दृष्टि डालेंगे तो पाएंगे कि वे कैसे हिंदी के पक्ष में सभी जनभाषाओं के बलिदान के लिए माहौल बना रहे थे. हिंदी के उस ‘राष्ट्रीय’ उबाल के बीच परिनिष्ठित हिंदी में यदि रेणु ने ‘मैला आंचल’ नहीं लिखा तो उसकी वजहें थीं जिस पर हिंदी साहित्य में चुप्पी है. एक ऐसी भाषा (अब अंगरेजी) जो मानक मानी जा रही हो और जिसमें सम्मान, पुरस्कार पद-प्रतिष्ठादि के सारे अवसर हों, उसे ठुकरा कर देशज जबान को स्वीकार करना तब भी और आज भी एक आत्मघाती लेखकीय फैसला माना जाता है. पर रेणु ने साहस किया क्योंकि वे अस्मिताओं के पक्ष में थे, समाजवादी आंदोलनकारी थे और झारखंड आंदोलन से प्रभावित थे. उनके और झारखंड के बीच गहरे अनुराग की दूसरी मजबूत कड़ी स्वयं लतिका थीं. यह अभी भी स्वीकार नहीं किया जाएगा जब झारखंड एक हकीकत है कि ‘मैला आंचल’ की रचना झारखंड आंदोलन की देन है. तर्क बहुत सारे हैं जिनके लिए यहां स्थान नहीं है परंतु हमारी यह स्पष्ट मान्यता है कि ‘मैला आंचल’ भारतीय राज्यसत्ता द्वारा उत्पीड़ित अस्मिताओं की प्रथम प्रतिनिधि रचना है. जिसमें देशज अस्मिता अपने परिवेश, पर्यावरण, संस्कृति और देशज जन के साथ समूची की समूची अभिव्यक्त हुई है.

लेखक का परिचय – लेखक आदिवासी भाषा साहित्य और संस्कृति के संबंध में गहरी समझ रखते हैं . राधाकृष्ण प्रकाशन से प्रकाशित माटी माटी अरकाटी उपन्यास काफी चर्चित रही है .