कविता – वर्षा श्रीवास्तव की पांच कविताएं

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मध्य प्रदेश सरकार के महिला एवं बाल विकास विभाग में कार्यरत वर्षा श्रीवास्तव धार्मिक आडंबर, बाल मजदूरी, घरेलू हिंसा , भारतीय समाज में स्त्री की स्थिति जैसे ज्वलंत विषयों पर लेखन करती हैं । मध्यप्रदेश के मुरैना में जन्मी और पली बढ़ी कवियत्री की रचनाएं राष्ट्रीय स्तर की पत्र – पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित हो रही हैं। कविता लेखन और काव्य पाठ के जरिये साहित्य के क्षेत्र में जमीन तालाश रही युवा कवयित्री की कविताएं पढ़े –मधुलिका बेन पटेल की विशेष टिप्पणी के साथ। – संपादक 

वर्षा श्रीवास्तव की कविता ‘स्वप्न के राक्षस’ आज के युग में बच्चियों पर मंडराते संकट को मार्मिक शब्दों में अभिव्यक्त करती है | तथाकथित सभ्यता के युग में राक्षसों के बड़े–बड़े नाख़ून नहीं होते बल्कि, वे अच्छे कपड़ों के भीतर अपनी हैवानियत छुपाये रहते हैं | बच्चियों के सपनों में अब उजले पंखों वाली परियां नहीं आती, अब उनके सपनों में जो दैत्य आता है, वह जानी-पहचान शक्ल वाला है |  ‘नवरात्रे का त्यौहार’ कविता  इस समाज की कटु सचाई को उकेरती है | एक ओर देवी माँ की पूजा की जाती है, दूसरी और नाले में नवजात बच्चियों का शव मनुष्य की सोच के वीभत्स रूप का पर्दाफाश करता है | स्त्रियों के चरित्र का आकलन करने वाले हैवान चाकुओं से गोद कर अपनी सभ्यता का प्रमाण देते हैं | रचनाकार देवी माता से प्रार्थना करती है कि वे पंडाल तक ही रहें| ‘लड़की चाँद या सूरज’ कविता भी उस  समाज को बेनकाब करती है जो बच्चियों, लड़कियों, स्त्रियों पर घात करता है | असंख्य स्वप्नों वाली लड़कियों को सीमित दायरे में बांधना चाहते हैं | उसे चाँद की उपमा तो देते हैं लेकिन उसे अपनी मुट्ठी में रखना चाहते हैं | ‘कुछ दिन तुम्हें याद करेंगे मोमबत्ती जलाकर’ कविता निर्भया की याद दिलाती है, जो अत्यंत क्रूरता की शिकार हुई थी |  लड़कियों को मात्र भोग्य वस्तु समझने वाले लोग यहीं नहीं ठहरते वे एक के बाद एक हर उस लड़की को नष्ट करना चाहते हैं, जो उनकी मर्ज़ी की गुलाम नहीं बनना चाहती है | उनकी विकृत मानसिकता इस समाज पर लगा बदनुमा दाग है, जिसे धोना आवश्यक है; अन्यथा हमारी पीढ़ी सुरक्षित नहीं रहेगी | ‘कहीं भूला तो नहीं वो अपना नाम’ कविता शहरों में, ढाबे पर या होटलों में काम कर रहे बच्चों के दर्द को बयाँ करती है | मालिक की गलियां खाते हुए वे भाग-भाग कर आर्डर लेते हैं, जूठे बर्तन उठाते हैं, ग्लास धोते हैं | कोई भी इन बच्चों को उनके नाम से नहीं पुकारता | उन्हें सब छोटू कहते हैं| उनकी अपनी पहचान कहीं खो सी गयी है | कविता की भाषा सीधी-सादी है | सरल शब्दों के बीच से दर्द उभर आया है |  –      डॉ. मधुलिका बेन पटेल

 

                                     वर्षा श्रीवास्तव की पांच कविताएं

1. स्वप्न के राक्षस

मखमली सफेद पंखों वाली,
सुंदर परियों के स्वप्न,
हमने देखे थे बचपन में,
जैसे मेरी बेटी देखती थी,
कुछ समय पहले तक,
नीली आंखों वाली गुड़िया से,
घर-घर खेलती थी,
पर आजकल मेरी नन्ही लाड़ो,
अपनी गुड़िया से खेलती नहीं,
ढेर सारे कपड़ों में लपेटकर,
जाने किस भय से,
रख देती है छिपाकर,
उसके स्वप्नों में,
परियाँ नहीं आतीं,
डरावने दैत्य आते हैं,
परी को लहूलुहान करते,
उसके पंख नोंचते,
नींद से चीखकर उठ जाती है,
मेरी गोद में दुबक जाती है,
अजीब बात है,
स्वप्नों के उस दैत्य का चेहरा,
वास्तविक दुनिया के कुछ लोगों से,
बहुत मिलता है,
बस इन दैत्यों के ,
बड़े दाँत या नाखून नहीं होते,
पर मेरी बेटी पहचान लेती है,
नन्हे हाथों से इशारा करती है,
माँ इन अंकल की शक्ल,
सपनों के राक्षस से मिलती है,
मेरी बेटी बहादुर है,
जैसे मुझे सचेत करती है,
किसी भरोसे पर ,
कोई चोट पड़ती है,
माँ पापा से कह देना,
इन्हें घर न बुलाया करें,
ये डेविल अंकल हैं,
पर मेरा अंतर्मन काँप उठता है,
स्वप्न को यथार्थ में देखकर,
परी के लहूलुहान पंख याद कर,
मैं खुद से वादा करती हूँ,
उस दैत्य के छिपे दाँत और नाखून,
सबके सामने जरूर लाऊंगी,
शायद तभी उस परी को बचा पाऊँगी,
और अपनी बेटी को ,
अपनी गुड़िया के साथ निर्भय होकर,
घर घर खेलते देख पाऊँगी।

2. नवरात्रे का त्यौहार

नवरात्रों का त्योहार आ गया,
खूब सजावट की गई है पंडालों में,
सज गए हैं बाजार,
लाल चुनरी,फूलों और श्रीफलों से,
माँ, हर बार की तरह इस बार भी,
तुम्हें लाया जाएगा ढोल नगाड़ों के साथ,
जोर जोर से जयकारे लगाते हुए,
आँखों पर पट्टी बाँधकर,
ताकि तुम देख न सको,
आस पास की गंदगी,
नाले में बह रहा है,
किसी नवजात बच्ची का शव,
तेजाब से नहलाकर,
अंधेरे कुँए में फेंक दिया गया,
भविष्य का सूरज,
पास ही के जंगल से,
एक निर्वस्त्र स्त्री देह मिली है,
सुनने में आया चरित्रहीन थी,
चाकुओं से गोद-गोदकर,
उसके शुद्धिकरण की प्रक्रियाकर,
संसार से विदा कर दिया गया,
सुनो भूलकर भी,
आंखों से पट्टी मत खोलना,
सिर्फ जगराते वाले पंडाल ही देखना,
इसके अलावा और कुछ देखोगी,
तो मूर्ति के रूप में,
आकार नहीं ले पाओगी,
पर नवरात्रों में हर बार आया करो,
छोटी बच्चियां बहुत खुश होती हैं,
झांकियों में तुम्हारा रूप रखकर।

3. लड़की चाँद या सूरज

छत पर आई है लड़की,
सुबह का सूरज देखने,
लाल लाल अरुणिमा को,
अपने भीतर समेटने,
उसकी असीमित ऊर्जा,
अपने भीतर भरने,
बाहर तो एक सूरज है,
लड़की के भीतर ,
असंख्य सूरज पलते हैं,
कभी उसके विचारों से,
कभी उसकी आंखों से झलकते हैं,
सूरज जो हर रोज,
नव उत्साह देते हैं,
ऊर्जा का संचार करते हैं,
तमिस्रा को भस्म करने,
आग रखते हैं,
इतने सूरज एक साथ देख,
लोगों की आंखें चौंधियाती हैं,
मुँह फेरकर,
लड़की के भीतर के सूरज को,
अनदेखा करते हैं
लड़की की तुलना चांद से करते हैं,
और फिर चांद में दाग ढूंढते हैं।

4. कुछ दिन तुम्हें याद करेंगे मोमबत्ती जलाकर

कभी करुणा,कभी निर्भया,
कभी सोनाली कभी दामिनी बन,
हर बार आती हो,
एक नया रूप धारण कर,
दिखाने आइना,
हमारी विकृत सोच का,
इंसान से हैवान तक का,
सफ़र तय करने में,
भूल जाते इंसानियत का हर अंश,
अब प्रेम कहाँ आराधना,
अभिशाप की शक्ल है,
चुकानी होगी कीमत तुम्हें ,
अपने इंकार की,
हम कैसे सहेंगे तुम इंकार कर दो,
हमारे प्रेम प्रस्ताव को,
फिर चाहे वह प्रेम प्रेम न होकर,
वासना में रची बसी ,
तुम्हारी देह की भूख ही क्यों न हो,
तुम्हारी हिम्मत कैसे जो स्त्री होकर,
भोग्या बनने से इंकार कर सको,
निकाल न दीं जाएंगी तुम्हारी अंतड़ियां,
लोहे की रॉड घुसेड़कर तुम्हारे शरीर में,
या तेज़ाब डालकर झुलसा दी जायेगी,
तुम्हारी देह और आत्मा दौनों,
या चाकुओं से गोद तुम्हें लहूलुहान कर,
पहुंचा दिया जायेगा इस दुनिया से दूर ही,
कुछ दिन तुम्हें याद करेंगे मोमबत्ती जलाकर,
फिर से तैयार होगी कोई करुणा या निर्भया।

5. कहीं भूला तो नहीं वो अपना नाम

किसी भी होटल या किसी ढाबे पर,
मैली कुचेली कुछ उधड़ी सी कमीज,
और हाफ पैंट पहने हुए,
झूठे चाय के गिलास धोते हुए,
या ग्राहकों से आर्डर लेते हुए,
कभी भाग-भागकर काम करते हुए,
कभी मालिक की गालियाँ खाते हुए,
सब छोटू नाम से ही पुकारते उसे,
ढाबे अलग -अलग हुलिया एक ही,
सूरत अलग-अलग नाम एक ही,
यहाँ भी छोटू, वहाँ भी छोटू,
हर जगह छोटू नाम की आवाजें,
कहीं इन सबके बीच भूला तो नहीं,
वो अपना असली नाम।

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