कविता

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सुंदरियो ! 

                                                    फणीश्वर नाथ रेणु

सुंदरियो-यो-यो 
हो-हो 
अपनी-अपनी छातियों पर 
दुद्धी फूल के झुके डाल लो ! 
नाच रोको नहीं। 
बाहर से आए हुए 
इस परदेशी का जी साफ नहीं। 
इसकी आँखों में कोई 
आँखें न डालना। 
यह ‘पचाई’ नहीं 
बोतल का दारू पीता है। 
सुंदरियो जी खोलकर 
हँसकर मत मोतियों 
की वर्षा करना 
काम-पीड़ित इस भले आदमी को 
विष-भरी हँसी से जलाओ। 
यों, आदमी यह अच्छा है 
नाच देखना 
सीखना चाहता है।

 

साभार – रेणु रचनावली , राजकमल प्रकाशन , दिल्ली।