कहानी

0
86

                             नैना जोगिन
                                                     फणीश्वरनाथ रेणु

रतनी ने मुझे देखा तो घुटने से ऊपर खोंसी हुई साड़ी को ‘कोंचा’ की जल्दी से नीचे गिरा लिया। सदा साइरेन की तरह गूँजनेवाली उसकी आवाज कंठनली में ही अटक गई। साड़ी की कोंचा नीचे गिराने की हड़बड़ी में उसका ‘आँचर’ भी उड़ गया।

उस सँकरी पगडंडी पर, जिसके दोनों और झरबेरी के काँटेदार बाड़े लगे हों, अपनी ‘भलमनसाहत’ दिखलाने के लिए गरदन झुका कर, आँख मूँद लेने के अलावा बस एक ही उपाय था। मैंने वही किया। अर्थात पलट गया। मेरे पीछे-पीछे रतनी ने अपने उघड़े हुए ‘तन-बदन’ को ढँक लिया और उसके कंठ में लटकी हुई एक उग्र-अश्लील गाली पटाके की तरह फूट पड़ी।

मैं लौट कर अपने दरवाजे पर आ गया और बैठ कर रतनी की गालियाँ सुनने लगा।

नहीं, वह मुझे गाली नहीं दे रही थी। जिसकी बकरियों ने उसके ‘पाट’ का सत्यानाश किया है, उन बकरीवालियों को गालियाँ दे रही है वह। सारा गाँव, गाँव के बूढ़े-बच्चे-जवान, औरत-मर्द उसकी गालियाँ सुन रहे हैं। लेकिन… लेकिन क्यों, शायद सच ही, उनके सुनने और मेरे सुनने में फर्क है। मैं ‘सचेतन रुपेण’ अर्थात जिस तरह रेडियो से प्रसारित महत्वपूर्ण वार्ताएँ सुनता हूँ, इन गालियों को सुन रहा हूँ। कान में उँगली डालने के ठीक विपरीत… एक-एक गाली को कान में डाल रहा हूँ। उसकी एक-एक गाली नंगी, अश्लील तसवीर बनाती है – ‘ब्लू फिल्मों’ के दृश्य।

…उदाहरण? उदाहरण दे कर ‘थाना-पुलिस-अदालत-फौजदारी’ को न्योतना नहीं चाहता।

रमेसर की माँ ने टोका शायद!

गाँव-भर की बकरीवालियों को सार्वजनिक गालियाँ दागने के बाद रतनी ने रमेसर की माँ के ‘प्रजास्थान’ को लक्ष्य करके एक महास्थूल गाली दी। रमेसर की माँ ने टोका – ‘पहले खेत में चल कर देखो। एक भी पत्ती जो कहीं चरी हो…।’

रतनी अब तक इसी टोक की प्रतीक्षा में थी, शायद। अब उसकी बोली लयबद्ध हो गई। वह प्रत्येक शब्द पर विशेष बल दे कर, हाथ और उँगलियों से भाव बतला कर कहने लगी कि ‘वह पाट के खेत में जा कर क्या देखेगी, अपना…?’ (भले घर की लड़की होती तो कहती ‘अपना सिर’, किंतु रतनी सिर के बदले में अपने अन्य हिस्से का नाम लेती है!)

इसके बाद बहुत देर तक रतनी की बातें सुनता रहा। …लेकिन उन्हें लिख नहीं सकता। वारंट का डर है।

किंतु, रतनी के बारे में अब कुछ नहीं लिखा गया तो जीवन में कभी नहीं लिखा जाएगा। क्योंकि रतनी की गालियों में मर्माहत और अपमानित करने के अलावा उत्तेजित करने की तीव्र शक्ति है – यह मैं हलफ ले कर कह सकता हूँ।

रतनी का नाम ‘नैना जोगिन’ मैने ही दिया था, एक दिन। तब वह सात-आठ साल की रही होगी। …नैना जोगिन? देहात में झाड़-फूँक करनेवाले ओझा-गुणियों के हर ‘मंतर’ के अंतिम आखर में बंधन लगाते हुए कहा जाता है – दुहाए इस्सर महादेव गौरा पारबती, नैना जोगिन… इत्यादि। लगता है, कोई नैना जोगिन नाम की भैरवी ने इन मंत्रों को सिद्ध किया था।

…सात साल की उम्र में ही रतनी ने गाँव के एक धनी, प्रतिष्ठित वृद्ध को ‘फिलचक्कर’ में डाल दिया था। उसकी बेवा माँ, वृद्ध की हवेली की नौकरानी थी। पंचायत में सात साल की रतनी ने अपना बयान जिस बुलंदी और विस्तार से दिया था, कोई जन्मजात नैना जोगिन ही दे सकती थी! अब तो उसकी जामुन की तरह कजराई आँखें भी उसके नाम को सार्थक करती हैं, किंतु सात साल की उम्र में ही इलाके में कहर मचानेवाली लड़की से आँख मिलाने की ताकत गाँव के किसी बहके हुए नौजवान में भी नहीं हुई कभी। उसको देखते ही आँखों के सामने पंचायत, थाना, पुलिस, फौजदारी, अदालत, जेल नाचने लगते।

…रतनी की माँ सरकारी वकील को भी कानून सिखा आई है। …बहस कर आई है सेशन-कोर्ट में!

सो, पिछले ग्यारह वर्षों में रतनी की माँ ने मुँह के जोर से ही पंद्रह एकड़ जमीन ‘अरजा’ है। पिछवाड़े में लीची के पेड़ हैं, दरवाजे पर नीबू। सूद पर रुपए लगाती है। ‘दस पैसा’ हाथ में है और घर में अनाज भी। इसलिए अब गाँव की जमींदारिन भी है वही। गाँव के पुराने जमींदार और मालिक जब किसी रैयत पर नाराज होते तो इसी तरह गुस्सा उतारते थे। यानी उसकी बकरी, गाय वगैरह को परती जमीन पर से ही हाँक कर दरवाजे पर ले आते थे और गालियाँ देते, मार-पीट करते और अँगूठे का निशान ले कर ही खुश होते थे।

रमेसर की माँ कल हाट जाते समय लीची की टोकरी नहीं ले गई ढो कर, इसलिए रतनी और रतनी की माँ ने आज इस झगड़े का ‘सिरजन’ किया है – जान-बूझ कर।

रमेसर का बाप मेरा हलवाहा है। रमेसर हमारे भैंसों का रखवाला यानी ‘भैंसवार’ है। रमेसर की माँ हमारे घर बर्तन-बासन माँजती है, धान कूटती है। इसलिए रतना अब अपनी गालियों का मुख धीरे-धीरे हमारी ओर करने लगी – ‘तू किसका डर दिखलाती है? सहर से आए भतार का? रोज मांस-मछली और ‘ब्राँडिल’ पी कर तेरे (प्रजास्थान में) तेल बढ़ गया है! एँ…?’

मुझे अचानक रमेसर की माँ की गंदी – हल्दी-प्याज-लहसन पसीना-मैल की सम्मिलित गंध-भरी साड़ी की महक लगी। लगा, अब रतनी मुझे बेपर्द करेगी। नंगा करेगी। खुद अपने को उसने पिछले एक घंटे में साठ बार नंगा किया है अर्थात जब-जब उसने गाली का रुख हमारी ओर किया, हर बार यह कहना ना भूली कि रमेसर की माँ जिसका डर दिखलाती है वह ‘मुनसा'(व्यक्ति!) रतनी का ‘अथि’ भी नहीं उखाड़ सकता! …ऐसे-ऐसे ‘मद्दकी मुनसा’ को वह अपने ‘अथि’ में दाहिने-बाएँ बाँध रखेगी। …बगुला-पंखी धोती-कुरता और घड़ी-छड़ी-जूतावाले शहरी छैलचिकनियाँ लोग ऊपर से लकदक और भीतर फोक होते हैं। …सफाचट मोंछ मुँडाए मुछमुँडा लोगों की सूरत देख कर भूलनेवाली बेटी नहीं रतनी! …रतनी की माँ को इसका गुमान है कि बड़े-बड़े वकील-मुख्तार के बेटों को देख कर भी उसकी बेटी की ‘अथि’ अर्थात जीभ नहीं पनियायी कभी। डकार भी नहीं किया।

रतनी अपने आँगन से निकल आई थी। रमेसर की माँ ने कोई जवाब दिया होगा शायद। अब रतनी और रतनी की माँ दोनों मिल कर नाचने लगीं। उसका घर दरवाजे से दस रस्सी दूर है, लेकिन सामने है। मैं रतनी और रतनी की माँ का नाच देखने को बाध्य था। रतनी की काव्य-प्रतिभा ने मुझे अचंभे में डाल दिया। उसकी टटकी और तुरत रची हुई पंक्तियों में वह सब कुछ था जो कविता में होता है – बिंब, प्रतीक, व्यंग तथा गंध! बतौर बानगी – अटना का साहब और पटना की मेम, रात खाए मुरगी और सुबह करे नेम, तेरा झुमका और नथिया और साबुन महकौवा – तू पान में जरदा खाए नखलौवा…!

रतनी और रतनी की माँ की यह काव्य-नाटिका समाप्त हुई तो मैंने दरवाजे पर बैठे – गाँव के दो-तीन नौजवानों की ओर देखा। मेरा चेहरा तमतमाया हुआ था, किंतु वे निर्विकार और निर्मल मुद्रा में थे। परिवार तथा ‘पट्टीदार’ के ‘मर्द पुरुषों’ की ओर देखा, वे पान चबा रहे थे, हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे। लगता था, इन लोगों ने रतनी की गालियाँ सुनी ही नहीं। मैंने जब भोजन के समय बात चलाई तो परिवार के एक व्यक्ति ने (जिन्हें शहर के नाम से ही जड़ैया बुखार धर दबाता है) हँस कर कहा, ‘शहर से आने के बाद आप कुछ दिन तक ऐसी असभ्यता ही करेगें, यह हमें मालूम है। इन छोटे लोगों की गाली पर इस तरह ध्यान कोई भलामानुस नहीं देता। इस तरह गालियों के अर्थ को प्याज के छिलके की तरह उतार-उतार कर समझने का क्या मतलब? शहर में क्या औरतें गाली नहीं देतीं?’

अजब इंसाफ है – गाली सुन कर समझना अन्याय है! असभ्यता है! मन में मैल है मेरे?

अश्लील और घिनौने मुकदमे के कारण रतनी की बदनामी बचपन से ही फैलती गई। जवान हुई तो बदनामियाँ भी जवान हुईं। फलत: गाँव के हिसाब से ‘पक’ जाने पर भी कोई दूल्हा नहीं मिला। मिलता भी तो ‘घर-जमाई’ हो कर नहीं रहना चाहता था। दो साल हुए, निमोंछिया जवान न जाने किस गाँव से आया साँझ में और रात में भात खाने के लिए घर के अंदर गया तो रतनी की माँ एक हाथ में सिंदूर की पुड़िया और दूसरे में फरसा लेकर खड़ी थी – ‘छदोड़ी की सीथ में सिंदूर डालो, नहीं तो अभी हल्ला करती हूँ, घर में चोर घुसा है।’…तो सींकिया नौजवान जो हर सुबह को शीशम की कोमल पत्तियाँ तोड़ कर ले जाता है, वही है रतनी का रतन-धन!

पूछताछ करने पर पता चला कि हाल ही में एक रात को रतनी ने इसको लात से मारा, घर से निकाल कर चिल्लाने लगी, ‘पूछे कोई इससे कि इतना दूध, मलाई, दही, मांस-मछली, कबूतर तिस पर ‘धात-पुष्टई’ दवा, तो अलान-ढेकान खा कर भी जिस ‘मर्द’ को आधी रात को हँफनी शुरु हो, उसका क्या कहा जाए? लोग ‘दोख’ देते हैं मेरे कोख को, कि रतनी बाँझ है। निमकहराम और किसको कहते हैं?’

मैं अब इसे मानसिक विकार मानने लगा हूँ। अब तक ‘सामाजिक’ समझ रहा था कि छोटी जात की औरत गाँव की मालकिन हुई है…।

नहीं, सामाजिक भी है। मेरे पट्टीदार के एक भाई ने कहा, ‘कोई उसका क्या बिगाड़ सकता है। गाँव के सभी किस्म के चोर अर्थात लती-पती और सिन्नाजोर दिन डूबते ही उसके आँगन में जमा हो जाते हैं। इलाके का मशहूर डकैत परमेसरा रतनी की बात पर उठता-बैठता है। मुखिया और सरपंच रतनी की माँ के खिलाफ चूँ भी नहीं कर सकते। …रतनी की माँ से कोई ‘रार’ मोल नहीं लेना चाहता इसीलिए, दिन-भर गाँव के हर टोले में दोनों घूम-घूम कर झगड़ा करती फिरती है। …रतनी अकेली खस्सी (बकरे) को जिबह कर देती है, रतनी की माँ चोरी का माल खरीदती है – थाली-लोटा-गिलास…।’

सुबह को मालूम हुआ, शहर से आया हुआ मेरा प्रेस्टिज प्रेशर कुकर गायब है। दोपहर के बाद धोती गुम! रात में रमेसर की माँ फिसफिसा कर आँगन में कह रही थी – ‘रतनी बोलती थी कि ‘सिध’ करके छोड़ेगी इस बार! …उस दिन इस तरह पीठ दिखाना अच्छा नहीं हुआ शायद!’

और यह सब इसलिए कि मैंने रतनी के तथाकथित ‘पुरुष’ को बुला कर उसका पता-ठिकाना पूछा था, और उसको समझाया था कि गाँव में अब एक नई बात चल पड़ी है। उसने बीवी की मार सह ली – नतीजा यह हुआ है कि कई औरतों ने अपने घरवालों को पीटा इस गाँव में…।

रतनी ने चिल्ला-चिल्ला कर सारे गाँव के लोगों को सूचना देने के लहजे से सुनाया था, ‘सुन लो हो लोगों! अब इस गाँव में फिर एक सेशन मोकदमा उठेगा सो जान लो। ई शहर का कानून यहाँ छाँटने आया है! कोई अपने घरवाले को लात मारे या ‘चुम्मा’ ले, दूसरा कोई बोलनेवाला कौन? देहात से ले कर शहर तक तो ‘छुछुआते’ फिरता है, काहे न कोई ‘मौगी’ मुँह में चुम्मा लेती है?’

मैं रोज हारता, रतनी रोज जीतती। मुझे स्वजनों ने सतर्क किया – साँझ होने के पहले ही मैदान से घर लौट आया करुँ। किसी ने शहर लौट जाने की सलाह दी। मुझे लगता, रोज ताल ठोक कर एक नंगी औरत-पहलवान मुझे चुनौती देती है। थप्पड़-घूँसे चलाती है। भागूँगा तो गाँव की सीमा के बाहर तक पीछे-पीछे फटा कनस्तर पीटती और बकरे की तरह ‘बो बो बो बो’ करती जाएगी, गाँव-भर के लोग तालियाँ बजा कर हँसेंगे।

मुझे हथियार डाल देना चाहिए। एक औरत, सो भी ऐसी औरत से टकराना बुद्धिमानी नहीं। एक सप्ताह तक चोरी-चपाटी करवाने के बाद एक नया उत्पात शुरु किया। रात-भर हमारे दरवाजे और आँगन में हड्डियों की ‘बरखा’ होती। …नंगी औरत ताल ठोक कर ललकार रही है – मर्द का बेटा है तो मैदान में आ…!

मैदान में मुझे उतरना ही पड़ा। रात में नींद खुली। दरवाजे के सामने जो नया बाग हम लोगों ने लगाया है, उसमें भैंस का बच्चा घुस गया है, शायद! मैं धीरे-धीरे बाड़े के पास गया। पट्ट…!

अमलतास के कोमल पौधे को तोड़ कर, गुलमोहर की ओर बढ़ते हुए हाथ को मैंने ‘खप्प’ से पकड़ा। कलम-घिसाई के बावजूद पंजे की पकड़ में अब तक खम बचा हुआ था! …’क्यों?’ मैंने बहुत धीरे से पूछा।

‘छोड़िए!’ जवाब भी उसी अंदाज में मिला।

‘क्यों तोड़ा है? क्या मिला? क्यों?’

‘तोड़ा तो क्या कर लीजिएगा?’

‘मैं लोगों को पुकारता हूँ।’

‘खुद फँस जाइएगा। …हाथ छोड़िए।’

‘फँसा के देखो। मैं नहीं डरता हूँ।’

‘क्या चाहते है आप?’

‘मैं जानना चाहता हूँ कि तुम… तुम इस तरह मेरे पीछे क्यों पड़ी हो? इस पौधे को क्यों तोड़ा है?’

‘वह तो पौधा ही है। जी तो आप को ही तोड़ देने को करता है। …हाथ छोड़िए!’

मैंने देखा उसकी कनपटी पर एक साँप का फण – फण नहीं, भाला! बरछे की फली! मैंने हाथ छोड़ दिया। वह भागी नहीं, खड़ी रही। मुझे चुप और अवाक देख कर बोली, ‘चिल्लाऊँ?’

‘कोढ़ी डरावे थूक से!’

रतनी हँसी। तारों की रोशनी में उसकी हँसी झिलमिलाई।

‘जाइए, थोड़ा ‘ब्राँडिल’ और चढ़ाइए!’

‘तुम – तुम नैना जोगिन…!’

‘हाँ, नैना जोगिन ही हूँ। तब? माधो बाबू… अब रतनी करीब सट आई, ‘मेरा क्या कसूर है जो बारह साल से बनवास दिये हुए हैं आप लोग! उस बूढ़े को करनी का फल चखाया तो क्या बेजा किया? मैं उस समय उसकी पोती की उम्र की थी। …सो, आप लोगों ने खासकर आप दोनों भाइयो ने हम लोगों को ‘रंडी’ से बदतर कर दिया। …आखिर आपके जन्म के दिन रतनी की माँ ही सौर-घर में थी – पाँच साल तक आप रतनी की माँ की गोद और आँचर में रहे, और आप की आँख में जरा भी पानी नहीं। …मै जवान हुई, आप लोगों ने आँख उठा कर कभी देखा नहीं कि आखिर गाँव-घर की एक लड़की ऐसी जवान हो गई और शादी क्यों नहीं होती? …अब इस बार आए हैं तो कभी आपके मन में यह नहीं हुआ कि रतनी की शादी हुए ढाई साल हो रहे हैं और रतनी को कोई बच्चा क्यों न हुआ? अटना-पटना-दिल्ली-दरभंगा में आपके इतने डागडर-डागडरनी जान-पहचान के हैं – आखिर, रतनी के माँ का दूध साल-भर तक पिया है आपने। रतनी की माँ को बहुत दिन तक आपने माँ कहा था, लोगों को याद है। …दूध का भी एक संबंध होता है।’

मैंने कहा, ‘रतनी! रमेसर जग रहा है।…मैं कुछ नहीं समझता। तुम जाओ। कोई देख लेगा।’

‘देख कर क्या कर लेगा?’

रतनी ने बेलाग-बेलौस एक अश्लील बात अँधेरे में, आग की तरह उगल दी – ‘देख कर आपका ‘अथि’ और मेरा ‘अथि’ उखाड़ लेगा? …बोलिए, मैं पापिन हूँ? मैं अछूत हूँ? रंडी हूँ? जो भी हूँ, आपकी हवेली में पली हूँ… तकदीर का फेर… माधो बाबू… रतनी नाम भी आपके ही बाबू जी का दिया है। आपने उसको बिगाड़ कर नैना जोगिन दिया! किस कसूर पर? आप लोगों का क्या बिगाड़ा था रतनी की माँ ने जो इस तरह बोल-चाल, उठ-बैठ एकदम बंद!’

मैंने धीरे से कहा, ‘ऐसे गाँव में अब कोई भला आदमी कैसे रह सकता है?’

लगा, नागिन को ठेस लगी, फुफकार उठी – ‘भला-आदमी? भला आदमी? भला आदमी को ‘पूछ-सिंग’ होता है?’

‘नहीं होता है। इसीलिए…।’

पूछ-सिंग… जानवर… औरत-मर्द… नंगे… बेपर्द… अंधकार… प्रकाश… गुर्राहट… आँखों की चमक… बड़े-बड़े नाखून… बिल्ली… शिवा… गॄद्धासया… योनिस्या भगिनी… भोगिनी… महांकुश… स्वरूप… छिन्नमस्ता अट्टहास…!

अट्टहास सुन कर चौंका – रतनी कहाँ है? वह तो साक्षात नील सरस्वती थी!

इस बार गाँव में, गाँव के आसपास, यह खबर बहुत तेजी से फैली की नैना जोगिन का ‘जोग’ माधो बाबू पर खूब ठिकाने से लगा है! …रमेसर की माँ को एक दिन खोई हुई चीजें टोकरी में मिलीं – घर में ही। रतनी ने माधो बाबू को ‘भेड़ा’ बनाया है तो माधो बाबू ने रतनी का ‘विषदंत’ उखाड़ दिया है। बोले तो एक भी गाली – गंदी या अच्छी?

रतनी और उसके नामर्द मर्द को मैं अपने साथ शहर लेता आया हूँ। डॉक्टर को अचरज होता है कि मैं रतनी के लिए इतना चिंतित क्यों हूँ! उन्हें कैसे समझाऊँ कि यदि रतनी को कोई बच्चा नहीं हुआ तो वह… वह मेरे बाग के हर पौधे तोड़ देगी, गाँव के सभी पेड़-पौधे को तोड़ देगी, गाँव के सभी लोगों को तोड़ेगी, गाँव में हड्डियाँ बरसावेगी, नंगी नाचेगी, अश्लील गालियाँ देती हुई सभी को ललकारेगी! वह साँवली-सलोनी लंबी स्वरुप पूर्ण यौवना नैना जोगिन! जाँच-पड़ताल के समय जब रतनी की लंबाई नापी जाती है, वजन लिया जाता है, पेट टटोला जाता है… तो… मेडिकल कॉलेज की लेडी स्टूडेंट्‌स से ले कर डॉक्टर तक हैरत से मुँह बाए रहते हैं!… औरत, ऐसी?

पाँच दिन हुए हैं, पड़ोस के मलहोत्रा साहब की नौकरानी को दो दिन वह फ्लैट के नीचे उठा कर फेंकने की धमकी दे चुकी है। …शहर की सड़ी हुई गरमी को रोज पाँच अश्लील गालियाँ देती है!

उसका घरवाला गाँव लौटने को कुनमुनाता है तो वह घुड़क देती है… ‘हाँ, जब आ गई हूँ तो यहाँ हो चाहे लहेरिया सराय, चाहे कलकत्ता… जहाँ से हो, कोख तो भरके ही लौटूँगी, गाँव तुमको जाना हो तो माधो बाबू टिकस कटा कर गाड़ी में बैठा देंगे। मैं किस मुँह से लौटूँगी खाली…?’

कोई जादू जानती है सचमुच रतनी!

कोई शब्द उसके मुँह में अश्लील नहीं लगता!

साभार – रेणु रचनावली , राजकमल प्रकाशन , दिल्ली।