कुमार मुकुल की कविताओं में जीवन की अनुभूति

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‘कुमार मुकुल’ बातचीत में बड़े ही मधुर और शांत प्रवृति के व्यक्ति हैं। गंभीर और सौम्य दिखने वाले कवि ‘मुकुल’ के शब्द वक्त के नुकीले सवालों से टकराते है। देशकाल के सवालों से टकराने की प्रेरणा इन्हें संभवतः अपनी माटी और पानी से ही मिली है। दरअसल मुकुल की जन्मभूमि नक्सलबाड़ी की जमीन भोजपुर है। भोजपुर के संघर्षमय संस्कार का स्वर इनकी कविता में मुखरित होती है। वैसे नक्सल आंदोलन से इनका जुड़ाव कभी नहीं रहा, पढ़ाई-लिखाई भी भोजपुर से दूर सहरसा में हुआ। गाँव जाने पर नक्सल आंदोलन के दौर का किस्सा -पचीसा सुनने को मिलता था। कालेज के जमाने में ही इन्हे कल्याण मुखर्जी और राजेंद्र सिंह यादव द्वारा लिखित पुस्तक ‘भोजपुर – नक्सलिज्म इन द प्लेन्स ऑफ बिहार’ से इनका परिचय हुआ था। संभवतः इस पुस्तक ने जनवादी चेतना से इन्हें लैस किया हो। प्रलेस, जलेस और जसम के लेखकों से संबंध अवश्य रहा लेकिन किसी खास सांचे में ढलने का प्रयास नहीं किया। फिलवक्त जसम से जुड़े है| भोजपुर रहनिहार मुकुल की शिक्षा-दीक्षा मिथिलांचल के सहरसा में हुई है। अर्थात मिथिलांचल के संस्कार में ही पले-बढ़े हैं। मिथिलांचल के मिठास का गहरा प्रभाव इनके स्वभाव पर है। दूसरे शब्दों में कहें तो मुकुल व्यक्तित्व और कृतित्व भोजपुर कोसी और मिथिलांचल संस्कृतियों का मिश्रण है | सुधि पाठक ‘कुमार मुकुल’ की कविताए पढ़े डा.रंजना कंठ की विशेष टिप्पणी के साथ – संपादक

                               अनुभव की गुल्लक

हिन्दी -साहित्य जगत में ” कुमार मुकुल” एक ऐसे हस्ताक्षर हैं,जो किसी परिचय के मोहताज़ नहीं।उनकी कविताओं में उनके शब्दों के माध्यम से हमें सामान्य लोगों के जीवन के प्रति नज़रिए की झलक मिलती है।कुमार मुकुल की लेखनी सटीक है और वह समाज के विभिन्न पहलुओं की दशाओं को दर्शाती हैं।
उनकी कविताएं उनके अनुभव की गुल्लक हैं,जो उनके जीवन से जुड़ी हैं और हमारे दिलो-दिमाग पर गहरी छाप छोड़ जाती है।उनकी कविताओं को पढ़ते हुए हम अपनी जिन्दगी के किसी बीते हुए लम्हे में जरूर पहुंच जाते हैं और उन्हें याद करने लगते हैं,जो उनकी लेखनी की सार्थकता है।वर्तमान राजनीति की जीवन्त तस्वीर है उनकी “हरे माहौल को चूना” और आम आदमी की ‘आवश्यक आवश्यकता(रोटी,कपड़ा और मकान) की त्रासदी उनके “देशद्रोह” में दिखती है।आज की युवा-पीढ़ी किन मानसिक संघर्षों से दो-चार होती है उसका जिक्र कुमार मुकुल ने “जो जीवन ही परे हट जाए” में बखूबी किया है।संघर्ष और इतने झंझावतों के बीच भी कुमार मुकुल के हृदय में प्रेम का सागर हिलोरें मार रहा है यह उनकी “उस दिन के लिए” और “मनोविनोदिनी-4” हमें बता देती है। – डा.रंजना कंठ  ( व्याख्याता, शिक्षा विभाग , रांची विमेंस कालेज , रांची | फणीश्वरनाथ रेणु डॉट कॉम के संपादकीय टीम से भी जुडी हैं )

1. हरे माहौल को चूना

मीटिंग थी कोई
पुरानी पार्टी नए नए नेता
सफेदी की नई उड़ान सी
कुर्ता पायजामा जूता लस्सी पनीर …
हे हे हो हो ही ही हू हू
बीच में एक ‘प्रेस्टिचयुट’ ने शिगुफा छोड़ा – आपलोग नेता हैं
हां नहीं – वर्कर हैं सब
ग्रासरूट
दिनभर बिज़नेस करते हैं
बाकी समय में पार्टी का काम
फिर ठहाका लगा समवेत
इस तरह सबने मिलकर
हरे हो रहे माहौल को चूना लगाया।

2. देशद्रोह                                            

वे कहेंगे दुश्मलन
फिर कहेंगे – दुश्मानों पर
शेर की तरह टूट पडो

दिमाग पर जोर मत डालो
शेरों का दुश्मतन नहीं होता कोई
शिकार होता है उनका
भोजन होता है

वे कहेंगे देश
फिर कहेंगे – देश के बारे में सोचो
देश रहेगा तो
रोटी कपडा मकान भी होगा
इसलिए पहले देश

देखो
हम गाडी छकडे महल चौमहले के
मालिक हैं
पर देश को सबसे उपर रखते हैं

एक तुम हो कि
जो नहीं है
जैसे – रोटी कपडा मकान
उसके बाद रखते हो देश को

और यह
देश द्रोह है।

जो जीवन ही परे हट जाए
एक सभा में मुलाकात के बाद
चैट पर बताती है एक लड़की
कि आत्महत्या करनेवाले
बहुत खीचते हैं उसे
यह क्या बात हुई …
यूँ मेरे प्रिय लोगों की लिस्ट में भी
आत्महंता हैं कई
वान गॉग, मरीना, मायकोवस्की
और मायकोवस्की की आत्महत्या के पहले
आधीरात को लिखी कविता तो खीचती है
तारों भरी रात की मानिंद
पर आत्मरहनन मेरे वश का नहीं
सोचकर ही घबराता हूँ कि
रेल की पटरी पर मेरा कटा सर पड़ा होगा
और पास ही होगा नुचा चुंथा धड़
पर मेरे एक मित्र ने भी
हाल ही कर ली आत्महत्या
नींद की गोलियां खाकर
ठीक ही तो था
मेरी ही तरह हँसमुख
हाहाहा
क्याह मैं अब भी हँसमुख हूँ
नींद की गोलियां तो मैंने भी खाई थीं
पता नहीं बच गई कैसे
क्या … पागल हो क्या …
बहुत परेशान थी सर
प्यार किया था फिर पता चला
उसके विवाह के अलावे संबंध हैं कई
उधर घरवाले
रोज एक लड़का ढूंढ ला रहे थे
तो … क्यार हुआ
जीवन का मुकाबला करना सीखो
पर मुकाबले से
जीवन ही परे हट जाये
तो … तो सर।

3 . उस दिन के लिए 

उम्र हो रही
पता है मुझे
पर तुझे जिस दिन लगेगा

कि मेरी उम्र हो रही
उस दिन के लिए
मैं रुका थोड़े रहूंगा।

4. मनोविनोदिनी 

कितनी तरह से
और कैसी कैसी
कविताएं
करती रहती है वह
जिसका
उसे गुमान तक नहीं
और लिख लिख कर
पूछती है
कि कविता हुई या नहीं
एक कविता
जो उसकी मृदु मंद
स्वरलहरियों के पीछे
खलबलाती रहती है
एक जो उसकी
अनंत जिज्ञासाओं में
डूबती उतराती रहती है
एक जिसे वह
भावनाओं पर
ज्ञान की शिलाएँ जमा
सम्भव करती है
एक कविता जो
हंसी के चिन्हों की
निरंतरता से बनती है।