रेणु की भाषा में भाखन दिया अब्दुल बिस्मिल्लाह ने।

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 प्रेमदत्त पाण्डेय                            

देशज अस्मिता और रेणु का साहित्य” विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी  (11-12 अप्रैल 2016) को  रेणु गाँव- औराही हिंगना,अररिया बिहार में फणीश्वरनाथ रेणु डॉट कॉम,पटना और रमेश झा महिला महाविद्यालय ,सहरसा   के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित हुई। इस संगोष्ठी में रेणु  के संपूर्ण  व्यक्तित्व, समग्र साहित्य और प्रासंगिकता विषय पर बेलाग बातचीत हुई, वक्ताओं ने विषय संबंधित विचारो से सभा को आप्लावित किया।


सेमिनार के संयोजक और फनीश्वरनाथ रेणु डॉट कॉम के संस्थापक मोडरेटर व् संपादक अनंत  के विषय परिवर्तन के साथ ही संगोष्ठी की औपचारिक शुरुआत हुई जिसमे उन्होंने कार्यक्रम का उद्देश्य एवम् साहित्य में रेणु की जरूरत पर प्रकाश डाला। संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता विख्यात साहित्यकार प्रो. अब्दुल बिस्मिल्लाह ने की।विशिष्ट वक्ता सेवानिवृत प्रो. सियाराम तिवारी, विश्वभारती शांति निकेतन से रहे। प्रो. तिवारी ने रेणु जी से जुड़े अपने संस्मरणों को उपस्थित जनमानस से साझा करते हुए कुछ बेहद रोचक प्रसंगों का जिक्र करते समय अतीत की स्मृतिओ में खो से गए। प्रो. अब्दुल बिस्मिल्लाह ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में भाषण देनें से साफ़ इनकार करते हुए अपनी चिर-परिचित मुद्रा में रेणु जी की भाखा में ‘भाखन’ देना स्वीकार किया और रेणु जी के वैश्विक प्रभाव को उन्होंने पोलैंड और जर्मनी में हुए उनके साहित्य के अनुवाद और उनकी लोकप्रियता को बताते हुए तीसरी कसम में नौटंकी की बहरत पूरी कर अपनी बात ख़त्म की। प्रथम सत्र का संचालन प्रेमदत्त पाण्डेय ने किया और धन्यवाद ज्ञापन फणीश्वरनाथ रेणु  के ज्येष्ठ सुपुत्र श्री पदम पराग राय ‘बेणु’  ने किया ।

 भोजनोपरांत दूसरे सत्र के मुख्य वक्ता डॉ विनोद कुमार मंगलम ने कहा कि जिंदगी का फ़लसफ़ा है मैला आँचल। प्रतिभा, प्रेणास्त्रोत और परिस्थितियों को आधार बना कर रेणु साहित्य का मूल्यांकन करते हुए उन्होंने रेणु जी के तीन झूठ को रेणु साहित्य में खोजने की श्रोताओं के सामने प्रस्तावना रखी। डॉ सजन कुमार ने रेणु के अंचल पर प्रकाश डाला ।

सायं काल में विदापत नाच का आयोजन अनौपचारिक रूप से खुले आकाश के नीचे किया गया जिसमे ग्रामीण कलाकारों ने बिदापत नाच की जीवन्त प्रस्तुति दी और उपस्थित जनमानस को लोकसंस्कृति और लोक कला की जरुरत,संरक्षण और महत्त्व पर सोचने के लिए मजबूर किया। दूसरे दिन के प्रथम सत्र की अध्यक्षता दिल्ली से आये वरिष्ठ पत्रकार श्री सुुधांशु रंजन ने की। उन्होंने रिपोर्ताज और पत्रकारिता के क्षेत्र में रेणु  के योगदान को अभूतपूर्व बताते हुए वर्तमान युग के पत्रकारों के लिए ऋणजल-धनजल के अध्ययन को पत्रकारिता  के लिए अनिवार्य माना। उन्होने वर्तमान पीढ़ी के पत्रकारों को रेणु की  पत्रकारिता से सिखने के लिये प्रेरित किया। अन्य वक्ताओं में डॉ अशोक कुमार आलोक और डॉ मधुप्रभा ने भी आज की पत्रकारिता के लिए रेणु के अध्ययन पर बल दिया। इस सत्र का संचालन मनीषा झा के द्वारा किया गया। ‘वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य और रेणु का साहित्य’ विषय पर वक्ताओं ने अपनी बात रखी। डॉ सुरेंद्र सिंह ने देशज अस्मिता पर सवाल उठाते हुए वैश्विक अस्मिता की बात की और कहा की रेणु निष्कर्षो में नहीं निहितार्थ के लेखक है। इस सत्र के मुख्य वक्ता डॉ. कमलानंद झा ने अपने वक्तव्य की शुरुआत करते हुए रेणु जी के गांव और माटी को नमन किया। डॉ झा ने पूर्व के वक्ता का प्रतिवाद करते हुए देशज अस्मिता की जरूरत को जरूरी मानते हुये कहा कि देशज अस्मिता को स्थानीयता से जोड़ने की जरूरत नहीं बल्कि आज बहुत जरूरत है देशज अस्मिता की क्योंकि आज सारी इस तरह की अस्मिताएं विलीन हो रही हैं राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय अस्मिताओं में।उन्होंने कहा कि एकीकरण ,वैश्वीकरण ,उदारीकरण से हमारी पहचान को बचाने का नाम है देशज अस्मिता और रेणु का साहित्य। डॉ झा ने युवा चेतना और युवा आंदोलन को रेणु साहित्य से जोड़ते हुए वर्तमान राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य और हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय और जे एन यूं में घटित हो रही घटनाओ को भी याद  किया,  जे एन यू  का मामला सामने आते ही एक स्थानीय साहित्यकार भड़क गये। उनको शांत करते हुए डॉ झा ने कहा कि आप रेणु साहित्य को पढ़े क्योकि मैंने सारी बातें रेणु साहित्य के संदर्भ में कही है। रेणु जैसा विद्रोही जे एन यू में भी नहीं है जे एन यू को भी सीखना पड़ेगा। रेणु अपने विद्रोही स्वभाव और आंदोलनधर्मिता में जे एन यू से कई गुना आगे है।

भोजनोपरान्त आगंतुकों ने रेणु जी का घर और जिस कक्ष में मैला आचँल लिखा गया उसका अवलोकन किया। डॉ सुशील कुसुमाकर के संचालन में तीसरे सत्र की शुरुआत हुई। बतौर वक्ता आस्ट्रेलिया से आये प्रोफेसर इयान वूलफोर्ड  ने रेणु साहित्य,लोकसंस्कृति और संगीत पर अपनी बात रखी। उनके अनुसार 2004 में जयपुर यात्रा के दौरान रेणु साहित्य से परिचित होते हुए इसमें ब्याप्त लोकसंस्कृति और संगीत के वो मुरीद हो गये । उन्होंने रेणु साहित्य में व्याप्त नाटकीयता और संगीत के प्रवाह को दर्शाते हुए अपनी बात पूरी की। सत्र के मुख्य वक्ता दिल्ली विश्वविद्यालय से आये डॉ. बजरंग बिहारी तिवारी ने अपने वक्तव्य की शुरुआत करते हुए कहा कि रेणु साहित्य में प्रत्येक विमर्श के लिए पर्याप्त स्पेस है।उन्होंने एक-एक कर आदिवासी विमर्श, दलित विमर्श और स्त्री विमर्श के लिए मैला आँचल,परती परिकथा और रेणु की कहानियों से उदाहरण दिये । डॉ तिवारी ने कहा कि संथालों की कमाई जमीन किस तरह मैदानी इलाकों वाले हड़पते है इसका उदाहरण है मैला आँचल। ‘दामुल हौज’ के बहाने सबसे ज्यादा उजाड़ा गया है आदिवासियों को। उनके अनुसार हिंदी साहित्य में पहली बार दलित शब्द 1957 में परती परिकथा में आया है दलित आंदोलन उभरता है इसके 15 साल बाद। इसके साथ ही डॉ तिवारी ने चेताया भी कि कोई भी बड़ा रचनाकार किसी एक विमर्श के ढांचे में नहीं अटता इसलिए उसको विमर्शों सें अक्सर दरकिनार कर दिया जाता है। सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रो. अब्दुल बिस्मिल्लाह ने विभाजन के परिप्रेक्ष्य में रेणु की परती परिकथा पर प्रकाश डाला और हिंसा की शिकार किस तरह स्त्रियां हुई इसकी चर्चा की। उन्होंने तत्कालीन राजनितिक चरित्र पर भी चर्चा की।
समापन समारोह में पूरे कार्यक्रम को व्यवस्थित ढंग से संपन्न करने के लिए रेणु के पुत्र पदम पराग राय बेणु ने सबका आभार जताया एवम् पुनः आने की कामना की। अंत में रेणु जी की कहानी पंचलाइट पर बनी टेलीफिल्म को दिखाते हुए संगोष्ठी के अनौपचारिक समापन की घोषणा की गई। इस संगोष्ठी के दौरान विभिन्न विश्वविद्यालयों से आये शोधार्थियों ने अपना शोधपत्र प्रस्तुत किया जिनमें डॉ सुशील कुशुमाकर, डॉ अज़हर खान, मो. दानिश, प्रेमदत्त पाण्डेय(जा.मि. इस्लामिया) डॉ मनीषा,मनीषा झा, दीपक, मनोज कुमार,पारुल यादव(ह.के.वि.वि) डॉ अनिल कुमार और डॉ रेखा(हरियाणा) पवन कुमार सिंह(का.हि. वि.वि) मोहसिन खान(अलीगढ़ वि.वि) उमाकान्त (प.वि.वि) आदि रहे। और अंत में आतिथ्य प्रभारी नवनीता सिन्हा को विशेष आभार जिन्होंने इस गोष्ठी को रेणु जी जैसा स्नेह प्रदान      किया !!! 

 

 

परिचय – दो दिवसीय रेणु स्मृति उत्सव सेमिनार सह संस्कृतिक गतिविधियों का व्योरा जामिया मिल्लिया विश्वविद्यालय के  अध्येता प्रेमदत्त पाण्डेय ने की है .