लेख / अनंत – रेणु और रिपोर्ताज

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      उपन्यास के तरह ही रिपोर्ताज भी यूरोपीय साहित्य की देन है। उपन्यास का उदभव रेनेशां काल में हुआ है, वहीं रिपोर्ताज का द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान। ‘पुरानी कहानी नया पाठ’ नामक रिपोर्ताज के साथ रेणु ने ‘धर्मयुग के संपादक को एक टिप्पणी भेजी थी:- ‘गत महायुद्ध ने चिकित्साशास्त्र के चीर-फाड़ विभाग को पेनसिलिन दिया और साहित्य के कथा-विभाग को रिपोर्ताज !’ पेनसिलिन एंटीबायोटिक ने मानव शरीर को स्वस्थ किया तो रिपोर्ताज ने मानव-मन को। इस प्रकार मानव समूह को द्वितीय विश्वयुद्ध के वक्त नवजीवन मिला। रिपोर्ताज ने मानवीय संवेदना की धरातल तैयार कर मनुष्य को राष्ट्रीयता से जोड़ा, वहीं पेनसिलिन एंटीबायोटिक ने शरीर को सुरक्षा-कवच प्रदान कर स्वस्थ समाज का निर्माण किया। सूचनात्मक स्वरूप में युद्ध की खबरें पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो रही थीं जिससे जनमानस संतुष्ट नहीं था। दरअसल तटस्थता की पत्रकारिता में महज सूचनएं होती हैं । संवेदनाओं और उत्साह तथा जनपक्षधरता का आभाव होता है जबकि उड़नशील मन युद्ध से जुड़ी घटनाओं के बारे में पल-पल की खबरें जानने को व्याकुल था। जनता की आँखे युद्ध को जीवंत देखना चाहती थी, उसके कान घटना का सजीव चित्रण सुनने के लिये लालायित थे। जन आकांक्षा को ध्यान में रखकर लेखकगण युद्ध की घटनाओं का जीवंत चित्रण कलात्मक ढ़ंग से करने लगे। अभिव्यक्ति की इस नूतन विधा को रिपोर्ताज कहा गया।

रिपोर्ताज की रचन प्रक्रिया और प्रस्तुतीकरण लेखकों के लिए चुनौती भरा कार्य था। जैसा कि ‘हिन्दी साहित्य कोश में डाक्टर धीरेन्द्र वर्मा कहते हैं:- ‘‘आँखों देखी और कानों सुनी घटनाओं पर रिपोर्ताज लिखा जा सकता है लेकिन कल्पना के आधार पर नहीं ।’अर्थात लेखक को घटना के करीब जाना ही होगा। लेखकों ने जान को जोखिम में डालकर युद्ध को करीब से देखा, फिर संवाद का संप्रेषण रिपोर्ताज शैली में किया। लेखकों के तथ्य से सत्य की ओर बढ़ते कदम का व्यापक प्रभाव पड़ा। इस प्रकार साहित्य में नव्यतम विधा की नींव पड़ी। जोजेफ फ्रीमैन के शब्दों में ‘‘यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि पिछले दिनों यूरोप और अमेरिका में समाज की नींव हिला देने वाला जो साहित्य लिखा गया, उनमें अधिकाशतः रिपोर्ताज हैं।“ इसलिये संपूर्ण विश्व रिपोर्ताज और पेनिसिलिन को द्वितीय विश्वयुद्ध का वरदान मानता है। पेनसिलिन एंटीबायोटिक है तो रिपोर्ताज टानिक। पेनसिलिन शरीर के जख्म को अतिशीघ्र भर कर, मनुष्य को कष्ट से मुक्ति दिलाता है। रिपोर्ताज जटिल जैविक यंत्र रूपी मानव शरीर के लिये ब्रेन टॉनिक का काम करता है। मनुष्य की संवेदना को जागृत कर चेतनशील बनाता है तथा उसे कर्तव्यों एवं दायित्वों के प्रति सजग करता है।

 रिपोर्ताज अर्थात लाईव रिपोर्टिंग, यानी शब्दों की चित्रावली अर्थात घटनाओं की विडियोग्राफी। रेणु के रिपार्ताजों की यही खासियत है। रेणु संवेदनाओं के धरातल पर शब्दों का शिल्पगत प्रयोग कर शब्द चित्रावली तैयार करते हैं। शब्द-चित्रावलियों का संयोजन और परिवेश की आवाजों को भी समाहित करते हैं। कलात्मक ढ़ंग से कथात्मक शैली में प्रस्तुतीकरण करते हैं जिससे घटना जीवंत हो उठती है, जो कि विडियोग्राफी के करीब होता है। शायद यही वजह है कि रेणु का रिपोर्ताज विजुअल मीडिया का स्वाद देता है। ब्रेकिंग न्यूज, लाईव रिपोर्टिंग, वक थ्रू आदि विजुअल मीडिया के टर्म हैं। इन तत्वों का अन्वेषण रेणु के रिपोर्ताजों में किया जा सकता है। वैसे रिपोर्ताज का उत्पति-काल द्वितीय विश्वयुद्ध को माना जाता है। 1917 से 1920 तक हुए रूस की क्रांति पर अमेरिकी पत्रकार द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘‘ दस दिन जब दुनिया हिल उठी” भी लाईव रिपोर्टिंग का उत्कृष्ट उदाहरण है। 1938 में शिवदान सिंह चैहान ने ‘लक्षमीपुरा’ नामक रिपोर्ताज लिखा था, ‘रूपाभ’ पत्रिका में पहला रिपोर्ताज लिखने वाले शिवदान सिंह चैहान इस संबंध में अपनी राय कुछ इस प्रकार व्यक्त करते हैं:- ‘‘आधुनिक जीवन की इस नई द्रुतगामी वास्तविकता में हस्तक्षेप करने के लिए मनुष्य को नई साहित्यिक रूप-विधा को जन्म देना पड़ा। रिपोर्ताज उसमें से सबसे प्रभावशाली रूपविधा है।‘ इस रूपविधा से मिलती-जुलती शक्ल में सन 1897 में चंडी प्रसाद सिंह ने ‘‘युवराज की यात्रा’ नामक रचना को रचा था। इस रचना में प्रिंस ऑफ़ वेल्स की भारत यात्रा का विस्तृत और व्योरेवार विवरण पढ़ने को मिलता है।

            रेणु को रिपोर्ताज लिखने की प्रेरणा भी यूरोप के साहित्यकारों से मिली। इस संदर्भ में रेणु स्वयं ‘सरहद के उस पार’ नामक रिपोर्ताज में लिखते हैं कि ‘‘ मुझे नेपाल के जंगलों में ही राजनीति और साहित्य की शिक्षा मिली है। नेपाल की काठ की कोठरी में ही मैने समाजवाद की प्रारंभिक पुस्तकों से लेकर महान ग्रंथ ‘कैपिटल तक को पढ़कर समझने की धृष्टता की है। पहाड़ की कंदराओं में बैठकर बंसहा कागज की बही पर ‘रशियन रिवोल्युशन को नेपाली भाषा में अनुवाद करते हुये उस पागल नौजवान की चमकती हुई आँखों को मैने अपनी जिंदगी में मषाल के रूप में ग्रहण किया है।’ रेणु की प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा, नेपाल के कोईराला परिवार में हुई। कोईराला निवास जनसंघर्ष का केन्द्र था। इस संघर्ष को भारत के अलावा रूस और वर्मा सहित कई अन्य देशों के समाजवादियों का समर्थन प्राप्त था। वहाँ देश –विदेश की विभिन्न भाषाओं में प्रकाशित होने वाली पत्र-पत्रिकाए एवं समाजवादी साहित्य उपलब्ध था। कई विदेशी साहित्य का नेपाली भाषा में अनुवाद भी किया गया था। नेपाली भाषा के ज्ञाता रेणु ने यहीं यूरोपीय साहित्य का गहन अध्ययन किया था।

            हिन्दी साहित्य में शिवदान सिंह चैहान द्वारा शुरू की गई इस विधा को रेणु ने नया मुकाम दिया। इस परंपरा को आगे बढ़ाने का श्रेय रांगेय राघव, प्रकाश चन्द्र गुप्त, अश्क, रामनारायण उपाध्याय ,भदन्त आनंद कौसल्यायन, शिवसागर मिश्र, डा0 धर्मवीर भारती, कन्हैया लाल मिश्र प्रभाकर, शमसेर बहादुर सिंह, श्रीकांत वर्मा, कमलेश्वर, डा0 भगवतश रण उपाध्याय, निर्मल वर्मा, विवेकी राय, कैलाश नारद, जगदीश चतुर्वेदी आदि लेखकों को जाता है। वहीं रेणु को रिपोर्ताज लेखन में विशेष दर्जा प्राप्त है। दरअसल रेणु के पास घटनाओं के अवलोकन करने का अपना नजरिया है। रिपोर्टिंग की अपनी एक अलग शैली है। यथार्थ की घटनाओं के साथ कल्पना का समन्वय कर सुरमय शब्दों का प्रयोग करते हैं जिससे इनके रिपोर्ताज में भावावेश पैदा होता है। जब पाठक पढ़ता है तो उसके मानस पटल पर घटना का चलचित्र दृष्टिगोचर होता है। रेणु का मानवीय दृष्टिकोण चेतना को जागृत करता है और दिल में उत्साह का भाव भर देता है। नाटकीय व व्यंग्यात्मक अंदाज प्रस्तुत विवरण को रोचक बनाता है। रोचकता ही रेणु के रिपोर्ताज में रोमांच पैदा करती है। यही रोमांच पाठक को कभी अध्ययन कक्ष में, तो कभी घटनास्थल का सैर कराता है। दरअसल पाठक सिर्फ पाठक नहीं रह जाता, वह कभी श्रोता, तो कभी दर्शक बन जाता है। पाठक का कभी श्रोता तो कभी दर्शक बनना ही, रेणु के रिपोर्ताज की सफलता का चरमोत्कर्ष है। रेणु के रिपोर्ताज में विद्यमान सजीवता के तत्व पर रघुवीर सहाय ‘ऋणजल-धनजल’ की भूमिका में लिखते हैं ‘‘वह जैसा सोचते थे वैसा बोलते थे और जैसा बोलते थे वैसा लिखते थे-और फिर जब उसको पढ़ो तो लगता था कि रेणु बोल रहे हैं।“ दरअसल रिपार्ताज लेखन के लिये रिपोर्टिंग का अलग स्टाईल ही होता है। जैसा कि दि रेण्डम हाउस डिक्षनरी ऑफ़  लैंग्वेज में इसकी परिभाषा दी हुई है: –

 (1) दि एक्ट ऑर  टेकनिक आफ रिपोर्टिंग्स न्यूज

 (2) रिपोर्टेड न्यूज क्लेक्टिवली: ऐन ऐन्थोलाजी ऑफ़ पोएट्री, फिकशन एंड रिपोर्टस

(3) ए रिटेन एकाउन्ट ऑफ़ ऐन एक्ट, इवेन्ट, हिस्ट्री इटीसी, बेस्ड ऑन डाइरेक्ट ओब्जर्वेशन  ऑन थ्रू रिसर्च एंड डाक्यूमेंटेशन    

रिपोर्ताज फ्रांसीसी शब्द है जिसे हिन्दी में सूचनिका और अंग्रेजी में रिपोर्ट कहा जाता है। रिपोर्ट और रिपोर्ताज के प्रस्तुतीकरण की शैली में अंतर होता है। ‘‘हिन्दी साहित्य कोश के अनुसार ‘‘ घटित घटना को यथा तथ्य रखना ही ‘‘रिपोर्ट” कहलाता है। उसमें साहित्यिकता नहीं होती। रिपोर्ट के कलात्मक और साहित्यक रूप को रिपोर्ताज कहते हैं ।“ रिपोर्ट शाश्वत नहीं बल्कि नश्वर होता है। दूसरे शब्दों में प्रत्यक्ष घटना से प्राप्त अनुभूति को संवदेनाओं के धरातल पर तथ्यों को सत्यता की कसौटी पर कसकर खींचा गया रेखाचित्र ही रिपोर्ताज है। यूरोपीय साहित्य में कलात्मक और साहित्यिक रिपोर्ट के लिये रिपोर्ताज शब्द का प्रयोग किया गया है। आक्सफोर्ड डिक्सनरी के अनुसार यह ‘‘(स्टाइल ऑफ़) रिपोर्टिंग इवेंटस फॉर  द प्रेस’ है। दरअसल यह घटना के प्रस्तुतीकरण की नई तकनीक है, जिससे पाठक सूचना प्राप्त कर अपना ज्ञानवर्द्धन और मनोरंजन करता है। ‘‘ हिन्दी साहित्य का इतिहास’ में डा0 लक्षमीसागर वार्ष्णेय ने रिपोर्ताज को परिभाषित करते हुए कहा है कि ‘‘ किसी घटना, युद्ध ,भूचाल आदि के मनोरंजक विवरण का नाम रिपोर्ताज है। उसमें लेखक का निजी दृष्टिकोण ही प्रधान रहता है और उसमें व्यंग्य का पुट भी रहता है।‘ रिपोर्ताज में लेखक का मौलिक दृष्टिकोण, लेखन की कलात्मक शैली ही घटना से पाठक की संवेदना को जोड़ता है, जिसका प्रतिबिंब पाठक के मानस-पटल पर बनता है। दरअसल पत्रकारिता पर साहित्यिक लेप चढ़ाने से रिपोर्ताज शाष्वत रूप धारण करता है। लेखक के साहित्यिक दृष्टिकोण पर प्रकाश  डालते हुए बाबू गुलाब राय लिखते हैं:- ‘‘ रिपोर्ट की भाति घटनाओं का वर्णन तो होता है, किन्तु उसमें लेखक के हृदय का निजी उत्साह रहता है जो वस्तुगत सत्य पर बिना किसी प्रकार का आवरण डाले उसको प्रभावमय बना देता है। समीक्षकों की नजर में लेखक का उत्साह ही उसकी पक्षधरता है। रिपोर्ट लिखते वक्त लेखक तटस्थ होता है और रिपोर्ताज लिखते वक्त लेखक की पक्षधरता स्पष्ट रूप से दिखायी पड़ती है। पक्षधरता लेखक की नजरिया को स्पष्ट करता है। लेखक किसी खास व्यक्ति का पक्षधर नहीं होता वरन उसकी लेखनी में विचारों का प्रवाह प्रबल रूप से प्रवाहित होता है। लेखनी में प्रवाहित विचारधारा को लेखक की निजी पक्षधरता कहते हैं। पक्षधरता में लेखक का निजी स्वार्थ भी नहीं होता। उसकी पक्षधरता जनता के पक्ष में होती है जो जनता को जागृत करती है। यही पत्रकारिता का मूल मंत्र है – जन-जागरण कर जनतंत्र को सफल बनाना। क्योंकि जागृत जनता जागृत राष्ट्र की पहचान होती है और जागृत राष्ट्र ही जनतंत्र की अंतिम सफलता है। लेखक की लेखनी में निहित जननीति के तत्व शासन व सत्ता के पक्ष में या विपक्ष में हो सकता है। लेखक का उद्देश्य शासन या सत्ता का विरोध करने के बजाए उसे कर्तव्यों एवं दायित्वों के प्रति उत्तरदायी बनाना होता है।

             यह तभी संभव है जब लेखक घटना को मूक दर्शक होकर देखने के बजाए मुक्ति योद्धा की तरह उसका हिस्सा बने। रेणु ऐसे ही क्रांतिवीर कलमकार थे, उनके हाथ में कलम और कांधे पर बंदूक थी। बाद के दिनों में वह लाइसेंसी रिवाल्वर भी रखा करते थे। उनकी लेखनी से लोग सम्मोहित होते थे और बंदूक देखकर अचंभित। रेणु की लेखनी जनजागरण करती थी तो उनका आंदोलनकारी रूप जागृत नागरिकों को उत्साही बनाता था, जिससे प्रेरित होकर लोग आंदोलन का हिस्सा बनते थे। दरअसल रिपोर्ताज का काम जनता को सामाजिक और राजनैतिक सरोकारों से जोड़ना भी है। ‘सरहद के उस पार’, ‘हिल रहा हिमालय’, ‘(नेपाली क्रांतिकथा)’, ‘घोड़े की टाप पर लोहे की रामधुन,’ ‘विराट नगर की खूनी दास्तान,’ ‘डी0एस0पी0 साहब की बड़ी-बड़ी मुछे,’ ‘नई सुबह की आशा,’ ‘ओ लाल आफताब,‘ जैसे रिपार्ताजों की रचना रेणु ने आंदोलन का हिस्सा बनकर किया है। रेणु ने अधिकांश रिपोर्ताज पटना से प्रकाशित होने वाले पत्र ‘जनता’ के लिये लिखा है। समाजवादी आंदोलन के साथ ही इस पत्र का प्रकाशन 1946 में शुरू हुआ था। रामवृक्ष बेनीपुरी इसके संपादक थे और फणीश्वरनाथ रेणु महत्वपूर्ण रिपोर्ताज लेखक। रेणु ‘जनता’ के लिए नेपाल और कोशी अंचल के इलाके पर रिपोर्ताज लिखा करते थे। रेणु की लेखनी की धार ने ही नेपाल में हुई क्रांति की धरातल तैयार की थी। बेनीपुरी भी समाजवादी थे, उन्होने भी नेपाल पर काफी लिखा है। बेनीपुरी और रेणु की जोड़ी ने ‘जनता’ अखबार को नया तेवर प्रदान किया। नेपाल की जनता पर इस अखबार ने इतना प्रभाव डाला कि वहाँ की व्यवस्था ने इसपर प्रतिबंध लगा दिया था। ‘जनता’ अखबार रखने की सजा थी मौत अर्थात फांसी। रेणु के रिपोर्ताजों में दिखने वाली पक्षधरता नेपाल की जनता के पक्ष में थी। ‘हडिडयों का पुल,’ ‘भूमि दर्शन की भूमिका,’ ‘डायन कोशी,’ ‘जै गंगा सहित कई रिपोर्ताजों के जरिये वह जनता के पक्ष में खुलकर खड़े होते दिखते हैं जिससे उनका सामाजिक-राजनैतिक दृष्टिकोण भी सामने आता है। इस संदर्भ में डा0 विश्वंभरनाथ उपाध्याय का कहना है कि परिपेक्षय के प्रति प्रतिबद्धता के बिना रिपोर्ताज में लेखक का उत्साह व्यक्त नहीं हो सकता। दूसरे शब्दों में यह कह सकते हैं कि लेखक में उत्साह का संचार तभी होगा जब लेखक को जनता से सच्चा प्रेम होगा। लेखक आम आदमी की दर्द-पीड़ा से रू ब रू होगा। 1975 में रेणु लिखते है ‘‘ दस वर्ष की उम्र से मैं पिछले साल तक स्काउट बॉय ,स्वयंसेवक ,राजनीतिक कार्यकर्ता अथवा रिलीफ वर्कर की हैसियत से बाढ़ पीड़ित क्षेत्रों में काम करता रहा हूँ। ’’ रेणु के अंदर समाज सेवा की भावना थी, जनता की पीड़ा से पीड़ित होने की कला थी। रिपोर्ताज के संबंध में कई लेखको के विचार और रेणु के खुद के नजरिये से स्पष्ट होता है कि रिपोर्ताज साहित्य कला की उपविधा है, जो कि कथा-विभाग के अंतर्गत आता है। रिपोर्ताज की बनावट, लेखन शैली, कलात्मक अंदाज में नाटकीय ढंग से प्रस्तुतीकरण के साथ-साथ घटित घटनाओं के चित्रों को उकेरने वाले शब्दों की संवेदना और व्यंग्य का पुट यह सत्यापित करते हैं कि यह विधा कथा, कहानी, कविता, गीत, नाटक ,व्यंग्य आदि का मिश्रण है। रिपोर्ट में महज तथ्य सामने आता और रिपोर्ताज में जीता-जागता सत्य सामने आता है। तथ्य और सत्य का फर्क ही रिपोर्ट और रिपोर्ताज के अंतर को परिभाषित करता है। तथ्यों को शब्दों के माध्यम से जीवंत सत्य के रूप में प्रस्तुतीकरण सिर्फ साहित्यकार या पत्रकार नहीं कर सकता है। यह विधा न तो पूर्णतः साहित्य है और न ही पूर्णतः पत्रकारिता। रिपोर्ताज लेखक न तो सिर्फ साहित्यकार होता है और न सिर्फ पत्रकार। साहित्यकार साहित्य और पत्रकार महज रिपोर्ट या खबर लिखता है। आखिर रिपोर्ताज कौन लिख सकता है ? दरअसल रिपोर्ताज लेखक कलाकार होता है। ऐसा कलाकार जो सिर्फ नाटय मंच पर अभिनय करना ही नहीं जानता, सिर्फ कैनवास पर कुची के द्वारा चित्र का चित्रण करना ही नहीं जानता है। चित्रकारी और अभिनय का गुण उसके कलम में दिखता है। यह तभी संभव है जब लेखक घटना का हिस्सा बने या फिर घटना का ब्योरा प्राप्त करते वक्त वातावरण में घुलना जानता हो, आम आदमी की भीड़ में शामिल होकर उसकी भाषा बोलना जानता हो। अतः रिपोर्ताज लेखक न तो सिर्फ पत्रकार होता है, न तो सिर्फ साहित्यकार होता है और न ही कोरी कल्पनाओं में जीने वाला कलाकार होता है। वह कलमकार होता है, जिसे दूसरे शब्दों में कलम का कलाकार भी कह सकते हैं। रेणु सही मायने में हिन्दी जगत के अद्वितीय कलमकार हैं। वे कलम के ऐसे जादूगर हैं, जिनकी लेखनी में उनके कई रूपों का साक्षात दर्शन होता हैं। सफल गीतकार ,सफल कवि ,कालजयी कृति ‘मैला आंचल’के उपन्यासकार, कहानीकार , नाटककार , के साथ-साथ भारतीय पत्रकारिता को नया आयाम प्रदान करने वाले सफल पत्रकार सह रिपोर्ताज लेखक भी हैं।

 रेणु का रिपोर्ताज समय विशेष में घटित होने वाली घटनाओं एवं उनकी जीवन-यात्रा का प्रमाणिक दस्तावेज है। समाज में घटित हो रही घटनाओं पर वे वाच डॉग की तरह पैनी नजर भी रखते हैं और आम जनजीवन की कड़वी सच्चाइयों को करीब से महसूस करते हैं। कोमल हृदय वाले कलाकार की तरह जीवन के सुख-दुःख को भोगते भी हैं और समाज के सजग प्रहरी के रूप में जन-संघर्ष भी करते हैं। वह जितने बड़े अध्येता रहे हैं उतने बड़े घुमक्कड़ भी। घुमक्कड़ प्रवृति के होने के बावजूद उन्हें यात्रा भीरू कहा जाता है। अत्यंत सुदूर ग्रामीण इलाके में जन्मे रेणु स्वतंत्रता आंदोलन, समाजवादी आंदोलन, नेपाल क्रांति के वक्त गांवो का दौरा किया था। वह देहाती यात्री थे। गांव-गिरांव , खेत-खलिहान आदि को देखकर उनका दिल पुलकित होता था। वही शहरी दुनिया की भागमभाग की जिंदगी उन्हें रास नहीं आती थी। भीड़ से भरे इलाके में सड़क पार करना भी उनके लिए मुश्किल होता था। इसलिये वह नगर महानगर की यात्रा से परहेज करते थे। वह देहाती यात्री थे और शहरी यात्रा भीरू। रिपोर्ताज लेखक के लिये फक्कड़ और घुमक्कड़ का होना आवश्यक है। बात चाहे अमेरिका के जॉन रीड की हो या फिर रूस के एलिया एहरेनबुर्ग, फ्रांस के आंद्रे मेलरोज, इंगलैड के क्रिस्टोफर इयरवुड जैसे लेखक घुमक्कड़ रहे हैं।

ग्रामीण जीवन शैली उनकी पहचान थी, और इसी की बदौलत वह गांव के अंतिम आदमी के दिल की गहराइयों में झांक पाते थे। उसकी दर्द पीड़ा को समझ पाते थे। उनमें जनता की पीड़ा में स्व का विलय कर एकात्म हो जाने की अदभुत कला थी। दरअसल वह कलाकार की तरह रियल लाईफ से जो अनुभव प्राप्त करते, उसे वह कागज के पन्नों पर कुषल कलमकार की भांति सजीवता प्रदान करते थे। रेणु के शब्द और कर्म में भी कोई फर्क नहीं था। वह सामाजिक सच्चाइयों में रचे-बसे थे। पार्कर 51 कलम से रेणु ने सामाजिक-राजनैतिक आंदोलन, युद्ध, बाढ, अकाल, सुखाड़, ग्रामीण संस्कृति, फिल्म, अध्यात्म आदि विषयों पर केन्दित रिपोर्ताज लिखा है। इनका रिपोर्ताज महज रिपोर्टिंग नहीं वरन समय, काल, और परिस्थति के अनुसार समाज के बदलते सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, साहित्यिक व सांस्कृतिक मूल्यों का दस्तावेज है जिसमें देशज रेणु का देहाती दुनिया से लेकर माया नगरी मुम्बई में प्राप्त की गई अनुभूतियों का वर्णन है। इनके रिपोर्ताजों में देश –दुनियां के समाज में घटित हो रही घटनाओं की झलक मिलती है।

      रेणु ने द्वितीय विश्व युद्ध के अंतिम चरण से रिपोर्ताज-लेखन शुरू किया जो आठवें दशक के अंत तक अनवरत ढ़ंग से चलता रहा। इनके कई रिपोर्ताज अभी तक अनुपलब्ध हैं। प्राप्त रिपोर्ताज के आधार पर ‘विदापत नाच’ को पहला रिपोर्ताज माना जा सकता है। ‘विदापत नाच’ का प्रकाशन 1 दिसंबर 1945 को कलकता से प्रकाशित होने वाली साप्ताहिक ‘विश्वामित्र’ में हुआ था। वैसे रेणु ने अपने लेखकीय जीवन के संबंध में लिखा हैं कि ‘‘ और लिखने की बात ? हाई स्कूल में बाढ़ पर लेख लिखकर प्रथम पुरस्कार पाने से लेकर- ‘धर्मयुग’ में कथादशक के अंतगर्त बाढ़ की पुरानी कहानी के नये पाठ के साथ प्रस्तुत कर चुका हूँ ।“

सन 1945 में ‘विदापद नाच’से शुरू हुयी परंपरा 1975 के पटना जल प्रलय के बाद थम गया। लगभग तीस वर्षो के लेखन काल में रेणु ने साहित्य की विभिन्न विधाओं के सांचों में रिपोर्ताज को ढा़ला, जिसने राष्ट्रीय व मानवीय सत्य से जुड़कर शाश्वत साहित्य का रूप धारण किया। रेणु-रचित रिपोर्ताजों का विषय वैविध और व्यापक है। भारत और नेपाल की समय के साथ बदलती सामाजिक स्थितियां और बदलते राजनैतिक मुकाम, जनता की जनसमस्या व जनआंदोलन, साहित्य, संस्कृति और फिल्म आदि विषयों पर रेणु ने रिपोर्ताज लिखा है। बदलती विषय-वस्तु के साथ लेखन-शैली में भी बदलाव देखने को मिलता है जिससे लेखक की मनोदशा, आस्था और लगाव से परिचित होने का मौका मिलता हैं। भारत यायावर रेणु के रिपोर्ताजों के संबंध में लिखते हैं कि ‘ रेणु का महत्व इसलिए भी है कि वह अपनी ही बनाई सीमा को बार-बार दूसरी रचना में तोड़ते हैं ।‘ रेणु आंचलिकता के जन्मदाता हैं और देशज अस्मिता के पहले कलमकार। इनके रिपोर्ताजों में धूल के साथ फूल , कीचड़ में कमल के साथ लोकसंस्कृति , लोकरंग, सामाजिक व मनोवैज्ञानिक चेतना का प्रवाह देखने को मिलता है। रेणु वर्तमान परिस्थति से अवगत कराते हुये पुरानी स्मृति को भी याद दिलाते है और भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं से परिचित कराते है।

रेणु ने रिपोर्ताज-लेखन की शुरूआत समाज के अंतिम पायदान पर खड़े दलित वर्ग के लोकनृत्य व संस्कृति को केन्द्र में रखकर किया है। दरअसल रेणु ग्रामीण चितेरे हैं, उनके जीवन में कई रंग घुले हैं। उन्हीं रंगों में एक है ग्रामीण संस्कृति से प्यार और हाशिये पर खड़े समाज के प्रति सहानुभूति। सबल्टर्न संस्कृति के प्रति प्रेम का परिचायक है ‘विदापत नाच’। ग्रामीण व देशज संस्कृति के प्रति असीम आस्था रखने वाले शिल्पीकार रेणु ने इस नृत्य को ‘मैला आँचल’और ‘रसप्रिया’कहानी में भी प्रमुखता से चित्रण किया हैं। ‘रसप्रिया’ कहानी का नायक पॅंचकौड़ी मिरदंगिया भी बिदापत-नाच में मृदंग बजानेवाला एक पात्र है। उतर बिहार के भिखारी ठाकुर के बिदेशिया नाच की तरह ही विदापत नाच मिथिला के दलितों की लोक संस्कृति का अभिन्न अंग है। मुसहरों, धाँगड़ों, दुसाधों यानी दलित वर्ग के विवाह, मुंडन संस्कार आदि शुभ आयोजनों पर विदापत नाच की धूम रहती है। दलित लोक कलाकारों का कला-कौशल और उस समाज की पीड़ा को पूरी आस्था और आत्मविश्वास के साथ हिन्दी-साहित्य के पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करते हैं। सच कहें तो रेणु उस सत्ता के खिलाफ चुनौती के रूप में इस कला को पेश करते हैं जो कला को अभिजात्य वर्ग तक सीमित रखना चाहते है। ‘‘विदापत नाच” रिपोर्ताज के प्रकाशन के बाद जगदीश चन्द्र माथुर ने इसका प्रसारण आल इंडिया रेडियो से भी किया था। दलित विमर्श के इस युग में रेणु के ‘विदापत नाच’ की प्रासंगिकता बढ़ी है। इस रचना के प्रारंभ में नृत्य कला के आचार्य श्री उदयशंकर जी प्रार्थना से करते हुये, रेणु लिखते हैं – “ वे इसे मेरी अनाधिकार चेष्टा कदापि न समझें। मेरा तो अनुमान है कि उन्होंने इस ‘नाच’ का नाम भी न सुना होगा। ओरियंटल और क्लासिक नृत्य से दिलचस्पी रखने वाले पाठक पाठिकाओं का समय व्यर्थ ही बर्बाद न हो इसलिए मैं पहले ही अर्ज कर देता हूँ कि यह महज विदापत-नाच है। “ रेणु दलितों की संस्कृति से दूरी बनाये रखने वालों पर करारा व्यंग्य करते हैं। क्योंकि इस नाच को भद्र समाज के लोग देखने में अपना हेंठी समझते हैं। इस लोकनृत्य का दृश्य दर दृश्य के चित्र उभारते हैं , बिकटा के नाच से उत्पन्न नाटकीयता और दर्शकों के फैलने वाली उल्लास का ऐसा चित्रण करते है, मानो कि विदापत नाच का मजा दलित बस्ती के मजलिस में बैठकर ले रहे हैं। रेणु सिर्फ नाच के दृश्य का चित्र ही नहीं उभारते अपितु दलित वर्ग की समस्त खामियां  रूप-कुरूप, गंध-दुर्गंध का भी चित्रण करते हैं। मृदंग और मंजीर के साथ सात-आठ कलाकारों द्वारा किये जाने वाले नृत्य के माध्यम से समाज की तमाम विसंगतियों का चित्रण करते हैं। विदापत नाच मंडली से जुड़े कलाकारों की पीड़ा का चित्रण अत्यंत ही मार्मिक ढंग से करते हैं। विदापत नाच की पदावली दलित समाज की सामाजिक-आर्थिक स्थिति की सच्चाई है। बिकटा समाज के सभ्रांत तबके पर करारा प्रहार करता है व्यंग्यात्मक अंदाज में, जिससे उस समाज के अंदर जीवटता का जन्म होता है। जो कि उसे लड़़ने के लिए प्रेरित करता है। इस लोक कला के जरिये रेणु हाशिये पर खड़े समाज की त्रासदी को उभारते हैं। यह त्रासदी भारत की बड़ी आबादी की जिन्दगानी है। बिकटा के द्वारा यह कहना -“ मुझे पीटकर बेकार समय बर्बाद किया जा रहा है। जमींदार के जूते खाते-खाते मेरी पीठ की चमड़ी मोटी हो गयी है।“ इस वाक्य के माध्यम से रेणु दलितों पर हो रहे सामंती जुल्म की पूरी दास्तान सुना देते हैं जिससे भारत के दलितों के स्थिति की सच्ची तस्वीर सामने आती है।

         नेपाल को केन्द्र में रखकर रेणु ने तीन रिपोर्ताज लिखे हैं। (1) सरहद के उस पार (2) विराट नगर की खूनी दास्तान (3) हिल रहा हिमालय (नेपाली क्रांति कथा)। ये रिपोर्ताज नेपाल में हुए आंदोलन का प्रामाणिक दस्तावेज है, जो कि आज इतिहास बन चुका है। ‘सरहद के उस पार’ का प्रकाशन 2 मार्च 1947 को पटना से प्रकाशित पत्र ‘जनता’ में हुआ था। विराटनगर के मिल-मजदूरों पर राणाशाही के सहयोग से पूंजीपतियों द्वारा ढाये जा रहे जुल्म का चित्रण करते हुये रेणु ने सरहद पार की सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक स्थिति का विवरण प्रस्तुत किया हैं। इसके प्रकाशन के बाद विराटनगर के मिल-मजदूरों का जुझारू आंदोलन शुरू हुआ। विराटनगर में पूँजीपतियों और राणाशाही के बीच सांठ-गांठ पर प्रहार करते हुए रेणु लिखते हैं ‘‘ यह उन्हीं सांपों की (चमड़िया, सिहानियां की) वादियाँ हैं, जिसमें वे आराम से लेटे नेपाल सरकार द्वारा दूध-लावा पाकर जहरीले सांपो की आबादी बढ़ा रहे हैं।‘ मजदूरों के साथ पशुवत् व्यवहार करने में जुटे मिल-मालिक ने मजदूरों को हक मागने तक का अधिकार नहीं दिया था। यूनियन बनाने से लेकर हड़ताल करने पर भी पाबंदी थी। लेकिन जहालत के गर्त में खींचने वाली सुविधाओं यथा मदिरालय, वेश्यालय, और जुए के अडडे का अंबार था। मजदूरों के बीच भूमिगत होकर मजदूरों को संगठित करने में जुटे रेणु महसूस करते हैं कि – ‘‘ बहुत जल्द ही इन पूंजीपतियों के घर में नेपाल राज्य बंधक पड़ जाएगा।‘ नेपाली समुदाय के अंदर सोयी वीरता जगाने में जुटे रेणु का अटूट विश्वास है कि जनता जागेगी और जनक्रांति का आगाज करेगी। रिपोर्ताज के प्रकाशन के साथ ही रेणु के क्रांतिकारियों ने साकार रूप धारण किया। इस रिपोर्ताज के प्रकाशन के महज दो दिन बाद विराटनगर के मजदूरों का ऐतिहासिक आंदोलन प्रारंभ हुआ। दरअसल इस रिपोर्ताज की रचना प्रक्रिया के पीछे छुपा था रेणु का संघर्ष। इस आंदोलन को कुचलने के लिये राणाशाही ने खूनी रास्ता अख्तियार किया था। राणाशाही की गोलियों से कई लोगों की मौत हुई, कई घायल हुये, इसी आन्दोलन में रेणु को गोली भी लगी थी। आंदोलनरत रेणु ने ‘विराटनगर की खूनी दास्तान’ नामक एक रिपोर्ताज उसी समय लिखा, जो स्वतंत्र पुस्तिका के रूप में प्रकाशित हुआ। लेकिन यह अभी तक अनुपलब्ध है। मजदूरों के आन्दोलन का नेतृत्व समाजवादी कर रहे थे। रेणु के प्रयास से कोइराला परिवार भी इस आंदोलन में शरीक हो गये। कोइराला परिवार का सहयोग मिलते ही यह आन्दोलन संपूर्ण नेपाल में फैल गया। राणाशाही के खिलाफ पहली बार नेपाली जनता सड़कों पर उतरी थी, हांलाकि इसे अंततः दबा दिया गया। इस आन्दोलन में रेणु भी गिरफ्तार हुए थे। जेल में इनके साथ काफी सख्ती बरता गया, जेल में भोगे हुये कष्ट को केन्द्र में रखकर ‘डी0एस0पी0 साहब की बड़ी-बड़ी मूंछे ’ नामक रिपोर्ताज लिखा जिसे पुस्तिकाकार रूप में प्रकाशित करवाया था, यह भी अनुपलब्ध है। सारांशतः रेणु के संघर्ष और उनके रिपोर्ताज ने नेपाली क्रांति की पृष्ठभूमि तैयार करने में अहम भूमिका निभायी।

            1950 में पुनः राणाशाही के खिलाफ दूसरा सशस्त्र संग्राम शुरू हुआ, जिसे नेपाली क्रांति भी कहा जाता है। अंततः राणाशाही ध्वस्त हुई। 1951 में नेपाल में पहली बार प्रजातंत्र की स्थापना हुई। नेपाल में हिस्सा लेने वाले पूर्णिया के दशरथ शाह कहते हैं ‘‘ नेपाली क्रांति में रेणु पीठ पर वायरलेस कंधे पर बंदूक लेकर राणाशाही के खिलाफ लड़े थे। वह इस क्रांति की दिशा तय करने वालों में थे।’दरअसल आंदोलन की पृष्ठभूमि तैयार करने में रेणु की अहम भूमिका थी। इस आंदोलन केन्द्र में रखकर रेणु ने ‘जनता’में  ‘हिल रहा हिमालय’ नामक धारावाहिक रिपोर्ताज लिखा था। दुर्भाग्य से यह रिपोर्ताज उपलब्ध नहीं है। नेपाली क्रांति के बीस वर्षों के बाद रेणु ने संस्मरण के आधार पर पुनः लिखा। ‘दिनमान 1971 के अंकों में किस्तवार प्रकाशित रेणु की रचनाएं युद्ध रिपोर्टिंग का अदभुत नमूना है। दरअसल में यह नेपाली जनता के लिए जागरण गीत है, जिसे गाते हुये आम जनता ने लोकशाही की स्थापना हेतु लगभग डेढ़-दो माह तक राणाशाही के खिलाफ सशत्र संघर्ष किया था। यह संघर्ष शोषण से मुक्ति का और राणाशाही के राक्षसी कुकृत्य पर मानवीयता के विजय का प्रतीक है। रेणु ने पात्रों के माध्यम से घटना का संपूर्ण विवरण प्रस्तुत किया है। युद्धक्षेत्र भारत नेपाल सीमा से लेकर काठमांडू तक फैला है। विराटनगर स्थित कोइराला निवास, मालखाना, जेल से लेकर वीरगंज , धनकुटटा और कोषी के कुशहाघाट से पटना तक में हो रही घटनाओं का लेखाजोखा है। युद्धभूमि में रायफल से लेकर मषीनगण की तरतराहट और बम गोलों के धमाकों के बीच राणाशाही सैनिकों से लोहा लेते सैनिकों की वीरगाथा का विवरण कथा को रोचक बनाती है। शंकरजंग, हिरण्यजंग, सरीखे नौजवानों का युद्ध के मैदान में कूदना  और बीच-बीच में कोइराला की जीवनी का चित्रण प्रेरणा प्रदान करते हैं। इस युद्ध में संघर्ष , हर्ष, विषाद , अवसाद व उल्लास के क्षण को रेणु जीते हुये प्रतीत होते हैं। यह युद्ध पाश विकता पर मानवीयता की जीत का भी प्रतीक है। वृद्ध, अपाहिज व मरीजों की हत्या जलती हुई लाशों के बीच रोते बिलखते चीखते चिल्लाते बच्चों को चुप्प कराते बी0 पी0 कोईराला का यह दृश्य पाशविकता पर मानवीयता का प्रतीक है।

देश प्रेम की भावना से प्रेरित युद्ध और खेल विषय पर भी रेणु ने रिपोर्ताज की रचना की है। भारत-पाकिस्तान के बीच छिड़ी जंग पर ‘‘युद्ध की डायरी” और पाक-बंग्लादेश के मुक्ति संग्राम पर ‘‘श्रुत-अश्रुतपूर्व ’’ तथा 1955 में हुए भारत-ऑस्ट्रेलिया के बीच जारी क्रिकेट मैच के दरम्यान दर्शकों की मनःस्थिति का चित्रण ‘‘जीत का स्वाद” नामक रिपोर्ताज में है। ‘जीत का स्वाद’ और ‘श्रुत-अश्रुतपूर्व’ में रेणु की मनोभूमि में समानता दिखती है। ‘जीत का स्वाद’ में ऑस्ट्रेलियन टीम पर भारत की पहली जीत के बाद की मनःस्थिति का चित्रण किया है। रचना की धुरी में रेणु ने एक परिवार को रखकर किया है। 1965 में भारत -पाकिस्तान युद्ध के वक्त रेणु गांव में होते है। रेणु का गांव में होने का मतलब था ठेठ किसान के जीवन को जीना। ठीक प्रेमचन्द के होरी की तरह , उन्हें चिंता है पानी और बॅूंदा-बाँदी की तथा पटसन के भाव की भी चिंता है। खेती गृहस्थी की चिंताओं के बीच जिज्ञासा है देश की सीमा पर चल रहे युद्ध के बारे में जानने की। दरअसल रेणु ग्रामीण हलके की मानसिकता, उसकी चिंताएं व मनोदशा के साथ-साथ ग्रामीणों के दिल में बसे देश प्रेम के जज्बों का अत्यंत ही मार्मिकता के साथ चित्रण करते हैं। यह युद्ध के परिवेश को ग्रामीण नजरिये से देखने का प्रयास है। बरसा की पहली फुहार से लेखक झूम उठता है, वहीं मछुआरे को पांच किलो मछली पकड़ने में मिली सफलता के बाद उसके मन में लड़ाई में फतह होने का अटूट विश्वास पैदा होता है। ‘श्रुत अश्रूत पूर्व ’ में रेणु ने बंगलादेश के मुक्तिसंग्राम का वर्णन कल्पना के आधार पर किया है। यथार्थता पर सवाल भी उठाये जा सकते हैं लेकिन मुक्ति संघर्ष के भावनात्मक पक्ष को कल्पना के आधार पर सार्थक स्वरूप लेखक ने दिया है। पाकिस्तान द्वारा ढ़ाका-बेतार केन्द्र पर अधिकार जमाने से लेकर मार्शल लॉ की घोषणा होने के बाद रेणु रेडियो टयून करते हैं, फिर उनके मानस पटल पर घटित हो रहे धर्म युद्ध का का चलचित्र चलने लगता है। रेडियो की म्यां म्यां कों-कों-कोंए की ध्वनियों के बीच बंगाली गीत के साथ वह इस रिपोर्ताज की रचना करते हैं।

 बाढ़ बार-बार बिहार को बर्बाद करती रही है, यदा-कदा आम जन-जीवन सुखाड़ से भी त्रस्त रहा है। बाढ़ और सुखाड़ के बीच अकाल के कारण भूख से मौत का भी गवाह भी बना है- यह बिहार। रेणु ने बाढ़ पर चार रिपोर्ताज की रचना की है – डायन कोशी , जै गंगा, पुरानी कहानी-नया पाठ और पटना-जलप्रलय। पटना जल प्रलय को छोड़कर अन्य तीन रिपोर्ताज के केन्द्र में कोशी इलाके की त्रासदी है। ‘डायन कोशी’, ‘जै गंगा’, ‘पुरानी कहानी नया पाठ’में लेखक बाढ़ की विभीषिका झेलने वालों के बीच सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में जाते हैं। बाढ़ पीड़ितों की सहायता करते हैं और उसकी पीड़ा को अत्यंत ही नजदीक से महसूस करते हैं और अपने अहसासों को रिपोर्ताज के जरिये शाश्वत साहित्य का रूप देते हैं। वहीं 1975 में पटना जल प्रलय के दौर में रेणु स्वयं बाढ़ से घिर जाते हैं। उन्होंने बाढ़ में घिरे मनुष्य की मनोव्यथा का मार्मिक व कलात्मक चित्रण किया हैं। पटना से प्रकाशित जनता में 1946 में प्रकाशित  ‘डायन कोशी ’ ‘मैला आंचल’के पहले की रचनाओं में सबसे चर्चित रचना है। इसका अनुवाद उर्दू में भी हुआ था। 1950 में केसरी कुमार ने ‘प्रतिनिधि कहानियाँ’ के संकलन में शामिल किया था। ‘मैला आंचल’ के प्रकाशन के बाद रेणु साहित्य के आकाश में ध्रुवतारा की तरह चमके तो उनसे ईर्ष्या करने वालों की भी संख्या बढ़ी। साहित्य-जगत में व्याप्त कुत्सित मानसिकता का शिकार रेणु को भी होना पड़ा। जब इसी कहानी का पुनः प्रकाशन हुआ तो ‘डायन कोसी’ को शामिल नहीं किया गया। 26 जनवरी 1948 को ‘जनता’ में प्रकाशित ‘डायन कोसी’ आज भी अनुपलब्ध है। डायन कोसी का संक्षिप्त विवरण इलाहाबाद रेडियो से 1952 में प्रसारित हुआ था। भारत यायावर ‘‘ रेणु के कथा रिपोर्ताज” नामक लेख में लिखते हैं:- ‘‘ केसरी कुमार ने इस कहानी को संकलित करने के पहले रिपोर्ताज विधा एवं ‘डायन कोशी’पर अपने विचार रखे हैं। चूँकि रेणु की किसी रचना पर केसरी कुमार के द्वारा पहली बार विचार किया गया एवं वह इतना सटीक एवं सारगर्भित है कि उसे यहाँ उद्धृत करना समीचीन है।“ केसरी कुमार लिखते हैं:- ‘‘ इधर कथा-क्षेत्र में जो नये-नये विकास हुए उनमें रिपोर्ताज का विकास भी शामिल है। दूसरे महायुद्ध की देन है यह। यह भी कहा जाता है कि पत्रकारिता के नूतन विकास ने भी रिपोर्ताज की उद्भावना में सहायता की है। ‘रिपोर्ताज’शब्द ‘रिपोर्ट’से ही बना है, जो इस बात का परिचायक है कि अखबारों की रिपोर्ट-शैली से इसका कुछ संबंध है। दरअसल, द्वितीय महायुद्ध की घटनाओं का तकाजा था कहानी से एक ऐसी भिन्न पद्धति का, जो रिपोर्ट और कहानी को समन्वित करे। इसी तकाजे को रिपोर्ताज ने पूरा किया।“

‘डायन कोसी’रिपोर्ताज में कोसी नदी के रौद्र रूप का अत्यंत ही जीवंत चित्रण है। धरती पर फैले कोसों दूर तक पानी से होने होने वाली त्रासदी का लाईव शब्द-चित्रावली प्रस्तुत करते हुए जीवनदायिनी कोसी को डायन कोसी की संज्ञा दी गयी है। ‘डायन’अर्थात वैसी माँ जो अपने बच्चे को खा जाती है। कोसी को डायन के पीछे छुपा है रेणु का मनुष्य के प्रति मानवीय दृष्टिकोण। दरअसल हिमालय की उपरी चोटी पर बर्फ के पिघलने और घनघोर बारिश होने के बाद कोसी की निर्मल धारा गॅंदले पानी की गेरूआ रंग धारण कर लेता है। इस पानी को पीते ही जानवर भी मुंह और थोथना फुला लेते हैं। मूक पशुओं की नजरों में भी खौफ का मंजर दिखने लगता है। जिस कोशी मइया की असीम अनुकंपा से कोख भरती है, इन्हीं के प्रकोप से कोख उजड़ने का खतरा भी बढ़ जाता है। 1947 में प्रकाशित ‘जै गंगा’रिपोर्ताज में भी रेणु ने गंगा नदी से कटिहार के इलाके में होने वाली त्रासदी का चित्रण किया है। ‘धर्मयुग’ के 8 नवंबर 1964 में प्रकाशित ‘नया कहानी पुराना पाठ’शीर्षक से ही स्पष्ट है कि लेखक पुराने किस्से को नये ढ़ंग से पाठक के समक्ष प्रस्तुत कर रहा है। बाढ़ का आना लेखक के लिये कोई नई बात नहीं है, दरअसल कोसी अंचल के निवासी रहे लेखक के लिये बाढ़ का आना पुरानी कहानी है। इसमें बाढ़ से होने वाली त्रासदी पर राजनेताओं की राजनीति, और सेठ-साहुकार की कमाउ मानसिकता से लेखक पत्रकार अफसर डाक्टर नर्स आदि की मृत होती मानवता का चित्रण पढ़ने को मिलता है। लेखक ने बाढ़ की विभीषिका के बीच मिटी में मिल रहे मानवीय मूल्यों का भी चित्रण किया है जो कि बाढ़ की स्थिति को अत्यंत ही त्रासद बनाती है। सच तो यह है बाढ़ आम जनता के लिए दुख दर्द लेकर आती है, तो नेताओं, सरकारी नौकरों और सेठ साहुकारों के लिये खुशियों का सौगात लेकर आती है। बाढ़ आने से जनसेवक जी की बांछे खिल गई हैं। वह बाढ़ आने की सूचना पाते ही , अपने स्टेटमेनट को महत्वपूर्ण बनाने के लिये बाढग्रस्त गांवों की संख्या 50 से बढ़ाकर 150 कर देते हैं। रेणु लिखते हैं ‘‘ और झूठ क्यों भगवान ने चाहा तो कल तक दो सौ गांव जलमग्न हो सकते हैं।“ बाढ़ जनसेवक जी की राजनैतिक हरियाली और सेठ-साहूकारो के शुभ-लाभ का संदेश लेकर आया है। बाढ़ की बहती गंगा में हर कोई हाथ धोने को आतुर है। रेणु द्वारा उभारा गया बाढ़ का दृश्य आज भी सच है। वह बाढ की त्रासदी झेलने वाली जनता की जीवटता और अदम्य साहस से भी परिचय कराते हैं। बाढ़ की पीड़ा से मुक्ति भी नहीं मिलती और आम जनजीवन पर्व त्योहार का उल्लास मनाने में जुट जाती है। दरअसल रेणु जीवन के चितेरे हैं, वे जीवन को सलीके से जीना जानते हैं। उनके आसपास के जन-जीवन में राग-द्वेष, रोना-गाना, कीचड़-कमल, फूल-कांटे , खुशी-गम सब कुछ है। 

1975 में जब पटना में आयी बाढ़ पर रिपोर्ताज लिखा ‘पटना जल प्रलय’जिसका प्रकाशन दिनमान साप्ताहिक के 21 सितंबर 1975 से लेकर 20 अक्टूबर 1975 तक में पांच  किस्तों में हुआ । (1)  कुते की आवाज (2) जो बोले सो निहाल (3) पंछी की लाश (4) कलाकारों की रिलीफ पार्टी (5) मानुश बने रहो। वैसे लेखक का जन्म समतल इलाके में हुआ है। उसके आसपास का इलाका महानंदा , पनार , कोसी और गंगा नदी में बाढ आने की वजह से बाढ़ की विभीषिका को झेलता रहा है। इस वजह लेखक ने बाढ़ की विभीषिका का दंश झेलने वाले लोगों के दर्द को अत्यंत ही नजदीक से देखा है। बाढ़ पीड़ितों की सहायता पहुँचाने के लिये रिलीफ वर्कर के रूप में भी कार्य किया है। 1975 में लेखक के साथ एक अजीब सी पस्थिति पैदा हुई ,वह स्वयं बाढ़ से घिर जाता है। वह अपने रिपोर्ताज में बाढ़ का चित्रण अत्यंत ही कलात्मक तरीके से करते हैं। शहर में पानी घुसने की सूचना पल-पल देते हैं। समय की बढ़ती सूईयों के साथ बाढ की चाल का किया गया़ चित्रण लाईव रिपोर्टिग का उत्कृष्ट उदाहरण है। आँखों के सामने आते बाढ़ को देखना, पानी से घिरे घर में जीवन का अनुभव लेखक के लिये अनोखा था। दरअसल रेणु 1967 व 1974 में राजधानी पटना में आई बाढ़ में राजेन्द्र नगर स्थित आवास पर घिर जाते हैं। वे गांव और शहर के बाढ़ में अंतर महसूस करते हैं। यह फर्क गॅवई और शहरी समाज की मानसिकता का है। बाढ़ के वक्त भी एक दूसरे के प्रति सहानुभूति नहीं दिखती। बाबू लोगों की दुर्दशा पर निम्न वर्ग के लोग मस्त हैं। वहीं मध्य वर्ग हिप्पोक्रेसी की भावना से ग्रसित है। मध्य वर्ग की भाषा से रेणु परिचित कराते हुये लिखते हैं – ‘‘ हमारा एरिया पाश है, सिर्फ फरही और भूंजा क्यों ? या फिर आई एम नाइदर विलेजर, नॉर ए लेबरर, ऑर ए बेगर, ’’ इस मनोवृत्ति के बीच गरीबों के बीच आवश्यक सामानों का वितरण करने वाले सिक्खों का सहायता जत्था भी है। बाढ़ के पानी में नाव पर सवार होकर पिकनिक मनाते लोग, अलशेशियन कुते की लाश, बच्चों का हिलोल, आदि शहरी दृश्य है। इन शहरी दृष्यों के बीच कांपती बिल्ली, आश्रय ढ़ूढ़ते कुते का भी चित्रण करते हैं। यही है रेणु की संवेदनशीलता जो उनके मानवीय दृष्टिकोण को प्रदर्शित करती है।

अकाल से उत्पन्न भूख और उससे मौत के मुख में समाने वाले भूखे-नंगे गरीबों की पीड़ा तथा शासन व्यवस्था की अकर्मणयता व सेठ साहुकारों की कमाउ मानसिकता को लेकर ‘हड्डियों का पुल’और ‘भूमि दर्शन की भूमिका’नामक रिपोर्ताज लिखे गए हैं। रिपोर्ताजों के माध्यम से रेणु ने भारत के ग्रामीण अंचल में बसे गरीब दलित आबादी की पीड़ा को दर्शाया है। ये भूख से रोती बिलखती और मौत के मुंह में समाती जीवंत तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। बिहार में अकाल का मुख्य कारण अतिवृष्टि और अनावृष्टि है। अतिवृष्टि अर्थात बाढ़ (धनजल) और अनावृष्टि अर्थात सूखा (ऋणजल) के कारण बिहार भूखमरी का शिकार होता रहा है। 1950 में रेणु लिखित ‘हडिडयों का पुल’धनजल का प्रतीक है तो 1966 में लिखा गया ‘ भूमि दर्शन की भूमिका’ऋणजल का। ‘हडिडयों का पुल’उतर बिहार के पूर्णिया-सहरसा के जन-जीवन की त्रासदी है तो ‘भूमिदर्शन की भूमिका’ दक्षिण बिहार की भूमि के वाशिन्दों की व्यथा कथा। ‘हडिडयों का पुल’ और ‘भूमि दर्शन की भूमिका’ में महज 16 वर्ष का अंतर है। आजाद भारत में इस समयांतराल के दरम्यान रेणु की आस्था और उनके मूडस में काफी बदलाव दिखता है। ‘हडिडयों का पुल’लिखते वक्त रेणु की लेखनी में जनआंदोलन और राजनैतिक चेतना के प्रति आस्था और विश्वास दिखता है। सामाजिक-राजनैतिक स्थितियों में बदलाव और किसान मजदूर का राज स्थापित होने की आषा प्रस्फुटित होती दिखती हैं। वह राजनैतिक व्यवस्था के प्रति आशावान दिखते हैं। वह महसूस करते हैं कि अभी आजादी के महज तीन साल ही तो बीते हैं। बदलते वक्त के साथ देश  की राजनीति नया मुकाम तय करेगी और आजाद देश की जनता के जीवन में खुश हाली आयेगी। वक्त के तेवर के साथ बिगड़ती व्यवस्था से उनकी आस्था टूटने लगी थी। 1954 में प्रकाशित ‘मैला आंचल’ उनके मोहभंग की ही उपज है। ‘मैला आंचल’में तो रेणु सिर्फ यही सवाल उठाते हैं कि – ‘‘कब होइहें राम के राज हो रामा, कब होइहें राम के राज।“ ‘हडिडयों का पुल’का आशावादी लेखक 1954 में ‘मैला आंचल’ से माध्यम राम-राज की परिकल्पना पर सवाल उठाता है। वहीं 1966 में पडे़ अकाल के वक्त गरीब-दलित को भूखे नंगे और मौत के मुंह में समाते लोगों को देख उनका विश्वास टूट जाता है। आस्थाहीनता की ओर बढ़ रहे रेणु को लगता है कि गरीबी और जहालत से यहाँ की जनता को निजात दिलाना असंभव है। उन्हें महसूस होता है कि शब्द अर्थ से दूर जा रहे हैं, भूखे-नंगों की अमानवीय स्थिति वे रेणु स्वयं को ‘बोतल प्रसाद’कहकर अपना ही मजाक उड़ाते हैं। ऐसा होना लाजिमी भी है, क्योंकि उन्होने स्वतंत्रता आंदोलन, नेपाल क्रांति से लेकर किसान और समाजवादी आंदोलन में हिस्सा लिया था। 25 नवम्बर, 1949 को वह पूर्णिया से पैदल मार्च करते हुए किसानों का जत्था साथ लाए थे। इस किसान यात्रा पर ‘नए सवेरे की आशा’ नामक रिपोर्ताज लिखा था। दरअसल स्वाधीनता के साथ ही देशवासियों के दिल में किसान-मजदूरों का राज कायम होने का सपना जागा था, पर वह सपना बीतते समय के साथ टूट रहा था। रेणु ने ज्ञान के रूप में स्वयं को चित्रित किया है। ज्ञान को पैदल मार्च के दरम्यान जनता के उत्साह को देखकर उसके अंदर अटूट श्रद्धा और विश्वास पैदा होता है। ज्ञान का चेहरा खिल उठता है उसे लगता है कि ‘‘हिन्दोस्तान लाल हो रहा है।“ उसके अंदर नई सुबह में उम्मीदों का उगता हुआ सूरज दिखलाई पड़ता है।

रेणु के इन रिपोर्ताजों में समाज का जनजीवन, आम आदमी के मानवीय संवेदना और देश की सामाजिक राजनैतिक वातावरण खुद ब खुद सामने आने लगते हैं। ‘ऋणजल-धनजल’की भूमिका में रघुवीर सहाय लिखते हैं ‘उनके लेखन में अपूर्व वर्णनशक्ति और वह सिवाय पर्यवेक्षेण-शक्ति के और कहां से आ सकती है। वह चारों ओर जो देखते हैं उसके ब्योरे उनके लिये रमणीय होते हैं पर लिखने के लिये स्मृति में रखने योग्य ब्योरों का चुनाव करते वक्त वे निर्ममता से बहुत से ब्योरों को रद करते जाते होगें , यह उनके अद्वितीय चयन से ही प्रकट है यह दुर्लभ गुण उन तमाम हिन्दी लेखकों से उॅचे स्थान पर ला बिठाता है। जो ब्योरों को घटिया लोगों का रोजगार और उपदेष को अथवा दार्शनिकता को श्रेष्ठ साहित्यिक कर्म मानते हैं। रेणु का देखना एक ही साथ अंदर और बाहर दोनों ओर होता है। यही उनके ब्योरे को अर्थ दे जाता है।’

रघुवीर सहाय की उक्ति को सत्यापित करता है ‘समय की शिला पर सिलाव’का खाजा नामक रिपोर्ताज। इस रिपोर्ताज में रेणु के कथाकार यात्री का रूप उभरता है। पटना से नालंदा राजगृह के भ्रमण पर निकले रेणु रास्ते में मिलने वाले चर्चित स्थानों की ऐतिहासिकता से परिचय कराते हुए बुद्ध युग का साक्षात दर्षन करवाते हैं। कई परतों में निर्मित सिलाव के खाजे की कलात्मकता की तुलना नालंदा के खंडहरों की निर्माण-कला से करते हैं। राजगृह , राजगीर का कुंड, मर्दकुक्षि पर्वत, नालंदा भग्नावशेष का साक्षात दर्शन कराते हुये रेणु बौद्ध दर्शन को आधुनिक परिवेश से भी जोड़ते हैं। रेणु ने बंबई की यात्रा के दरम्यान तीन रिपोर्ताज की रचना की। (1) एक फिल्मी यात्रा (2) तीसरी कसम की सेट पर तीन दिन (3) स्मृति की एक रील। एक फिल्मी यात्रा का लेखन रेणु ने पांच किस्तों में किया था। जिसका प्रकाषन बंबई से प्रकाषित होने वाली साप्ताहिक ‘उर्वशी’में हुआ था। 6 दिसंबर 1963 के अंक में प्रकाशित रचना ही उपलब्ध हो सका है। ‘तीसरी कसम के सेट पर तीन दिन’का प्रकाशन धर्मयुग के 26 अप्रैल 1964 को हुआ था। वहीं ‘स्मृति की एक रील’ का प्रकाशन धर्मयुग 11 सितंबर 1964 को हुआ। इन रिपोर्ताजों के जरिये रेणु फिल्म निर्माण की प्रक्रिया, टेकनीक, कैमरा ऐंगल, निर्देशक का आई क्यू , कलाकारों का सजीव एक्टिंग और शूटिंग स्थल पर उन्मुक्त हॅसी व वातावरण में गूंज रही टेक-रीटेक की अवाजें ‘तीसरी कसम’ की चल रही शूटिंग का दर्शन कराती है। संकेत 1955 में प्रकाशित ‘एकलव्य के नोट्स’ में गाँव का समाजशास्त्रीय अध्ययन का नमूना है। इस रिपोर्ताज में गांव के बदलते परिवेश का चित्रण किया है। गांव में फैलता जातिवाद और दलवाद के बीच लहूलुहान होते खून के रिशतों का चित्रण है। जहां सवर्णो का सामंती तेवर है तो दलित के अंदर जागृत हो रही चेतना का भी जिक्र है। इसी प्रकार ‘‘रस के बस में चार रात” रेणु द्वारा रचित आध्यात्मिक रिपोर्ताज है। इससे रेणु की आस्था और अनास्था का पता चलता है। इसकी पुष्टि रेणु की इस उक्ति से होती है कि ‘‘ माँ मुझे सुखा सन्यासी मत बनाना रस के वश में रखना।“ दरअसल रेणु की आस्था रामकृष्ण परमहंस के साथ थी। 

 रेणु हिन्दी के आरंभिक दौर के रिपोर्ताज लेखक हैं। उपन्यास के तरह ही साहित्य की इस नूतन विधा में भी उन्होंने अपना विशेष स्थान बनाया है। रेणु के रिपोर्ताज का अध्ययन से स्पष्ट है कि वह कथ्य, शिल्प और भाषा के स्तर पर नवीन प्रयोग करते हैं। युद्ध , बाढ़ , अकाल , भुखमरी आदि विषयों पर लिखे गए रिपोर्ताज मानवीय मूल्यों एवं उसके संबंधों की गहरी पड़ताल का नमूना है। रेणु ने साहित्य की नई विधा के तौर पर रिपोर्ताज को बखूबी इस्तेमाल में लाया और एक विधा के रूप में उसे स्थापित किया। साहित्य, समाज और राजनीति के विभिन्न पहलुओं यथा फिल्म, ग्रामीण संस्कृति, अध्यात्म, आदि विषयों पर लिखे गए उनके रिपोर्ताज नये मानक गढ़ते हैं।

परिचय – लेखक फणीश्वरनाथ रेणु डाॅट काॅम के संस्थापक, संपादक और माॅडरेटर हैं।