लेख / नर – नारी समानता के अग्रदूत अंबेडकर

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                              अनन्त

अंबेडकर दलितों के मुक्तिदाता हैं और नर-नारी समानता के अग्रदूत। स्त्री के ज्वलंत सवालों के लिए धर्म व जाति को जिम्मेदार मानते हैं। राजनीति और संविधान के जरिये भारतीय समाज में नर और नारियों के बीच व्याप्त असमानता दूर करने का सार्थक प्रयास किया है। जाति-धर्म व लिंग निरपेक्ष संविधान में वह सामाजिक न्याय की पकिल्पना किया हैं। हिन्दू कोड बिल का निर्माण कर संवैधानिक स्तर से महिला हितों की रक्षा किया है। संविधान सम्मत सामाजिक न्याय के सूत्र और हिन्दू कोड बिल में ही ‘‘ महिला-सशक्तिकरण ’’ की विशद् व्याख्या विद्यमान है। संविधान शिल्पी के प्रयासों का प्रतिफल है कि भारतीय समाज में महिलाओं को सुनहरा अवसर प्राप्त हुआ है , फिर भी समाज में व्याप्त रूढ़ियां और पूंजीवाद आधारित उपभोक्तावादी संस्कृति महिला सशक्तिकरण के मार्ग में रूकावट पैदा कर रही है। दरअसल यह समाज सदियों से मनुवादी ग्रंथि से ग्रस्त रहा है। आजादी के बाद सत्ता पर काबिज होने वालों की सामंती मानसिकता से पूर्व परिचित अंबेडकर आजाद भारत में ‘‘ महिलाओं की सामाजिक गुलामी ’’ खत्म करने के लिये स्टेटसमैन की भूमिका निभाते रहे। आजादी , पूर्व छत्रपति शाहू जी महाराज द्वारा कोल्हापुर राज में महिलाओं के हित में बनाये गये विशेष विधानों को आजाद भारत के संविधान में स्थान दिया। अंबेडकर रचित ‘‘ हिन्दु कोड बिल ’’ कोल्हापुर के राज-विधान से प्रेरित दिखता है। इसलिये अंबेडकर को ‘‘ शाहू संहिता ’’ का संरक्षक के रूप में याद किया जाना चाहिए।
भारतीय समाज में महिलाओं के हितों की रक्षा के लिए समाज सुधार का कार्य 19 वीं शताब्दी में शुरू हुआ। इस सदी में कई नायक पैदा हुए लेकिन , अंबेडकर सबसे ज्यादा प्रभावित महात्मा फूले और छत्रपति शाहू जी महाराज से दिखते हैं। यह दिगर बात है भारत में सबसे पहले अंग्रेजों एवं ईसाई मिशनरियों द्वारा स्त्रियों को शिक्षित करने के उद्देश्य से 1810 में बंगाल और 1824 में महाराष्ट्र के अंदर स्कूल खोला गया। बंगाल के गुरुमोहन विद्यालंकार द्वारा 1819 में बंगला भाषा में स्त्री शिक्षा से संबंधित पहली पुस्तक लिखी गई। दरअसल सशक्तिकरण का मूलमंत्र है – शिक्षा। इस वजह से देश के विभिन्न हिस्सों में स्थानीय समाज सुधारक स्त्री शिक्षा पर जोर दे रहे थे। लिंग-विभेद और छुआछूत जैसी कुरीतियां शूद्र व महिला शिक्षा के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा थी। 1848 में महात्मा फूले ने शूद्र व अछूत वर्ग के लड़के-लड़कियों के लिए स्कूल खोला। ब्राह्मणों ने इसका तीखा विरोध किया। महात्मा फूले की विरासत को आगे बढ़ाने के लिए कोल्हापुर नरेश अप्पा साहब धाड़के ने विशेष राजकोश बनाया। इनकी मृत्यु के बाद छत्रपति शाहू जी महाराज कोल्हापुर के नरेश बने। शाहू जी ने अपने पिता के अधूरे कार्यों को आगे बढ़ाया। प्राथमिक शिक्षा , उच्च शिक्षा व व्यवसायिक शिक्षा पर भी विशेष बल दिया। परिणामस्वरूप 1887 में आनंदी बाई जोशी विदेश से मेडिकल की डिग्री प्राप्त कर पहली भारतीय महिला डाक्टर बनीं। कहने का आशय है कि समाज में व्याप्त कुरीतियों के खिलाफ सामाजिक समानता के लिए संघर्ष जारी था। ऐसे ही महौल में अंबेडकर का जन्म 1891 ईस्वी में हुआ था। इनके गांव का नाम अंबावेड था इस वजह से इनके नाम के आगे अंबेडकर जुड़ गया। चूँकि अंबेडकर अछूत जाति में जन्मे थे। सामाजिक दासता का दंश नित-दिन झेलते थे। दलितों की स्थिति पशुओं से भी बदतर थी। तालाबों में पशुओं को पानी पीने की छूट थी , लेकिन दलितों को नहीं। मंदिर में भी प्रवेश वर्जित था। असमानता की चक्की में पिस रहे अंबेडकर शिक्षा को कर्म माना और कर्म से शूद्रों का तकदीर बदलने का फैसला किया। उनकी मेधा से प्रभावित बड़ौदा और कोल्हापुर नरेश ने वजीफा दिया जिससे वह विदेश पढ़ने गए।
नारी शिक्षा और उनकी सामाजिक हैसियत को लेकर वह चिंतित रहा करते थे। इसका प्रमाण 1913 में पिता के मित्र को लिखे पत्र का मजमून है कि :- ‘‘ लड़के के साथ-साथ लड़कियों की शिक्षा पर भी जोर देना आवश्यक है। ’’ देश-विदेश में भ्रमण करने के बाद वह इस निष्कर्ष पर पहुँचे थे कि ‘‘ लड़का शिक्षित होगा तो सिर्फ एक व्यक्ति शिक्षित होगा , जब लड़की शिक्षित होगी तो पूरा परिवार शिक्षित होगा।’ उच्च शिक्षा ग्रहण करने के दरम्यान अंबेडकर ने ‘‘ भारत में जातियां , उनकी व्यवस्था की उत्पत्ति एवं विकास ’’ नामक शोध आलेख प्रस्तुत किया। उन्होंने भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति पर प्रकाश डालते हुए कहा था कि सती प्रथा के तहत हिन्दू महिलाओं के साथ क्रूरता पूर्वक व्यवहार किया जाता है। जबरन जीने का अधिकार छीन लिया जाता है। सगोत्र विवाह के लिए दबाव डाला जाता है। वहीं इस्लाम धर्म आधारित मुस्लिम समुदाय में पर्दा प्रथा के जरिये महिलाओं के मानसिक और नैतिक जरूरतों का दमन किया जाता है। शोधार्थी के रूप में अंबेडकर हिन्दु व इस्लाम धर्म के साथ-साथ अन्य धर्मो का भी गहण अध्ययन किया था। शायद यही वजह है कि वह धर्म व जाति की कैद से स्त्रियों की मुक्ति के हिमायती बने रहे। डाक्टर अंबेडकर ने बौद्ध धर्म को महिलाओं का हितैषी बताया। इस धर्म में स्त्री-पुरूष को समान अधिकार प्राप्त है। यही वजह है कि हिन्दू धर्म में जन्में अंबेदकर ने हिन्दू धर्म को छोड़ बौद्ध धर्म को अपनाया।
यह सच भी है कि हिन्दू धर्मशास्त्रों में महिलाओं का स्थान और नियम-कानून महिलाओं के हक में नहीं हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नारी को धन , विद्या और शक्ति की देवी हैं। मनु संहिता के तीसरे अध्याय के छप्पनवें श्लोक में जहां लिखा है:- ‘‘जहाँ नारी की पूजा होती है वहां देवता रमण करते हैं।’ वहीं दूसरी ओर पांचवे अध्याय के 155 वें श्लोक में लिखा है:- ‘‘स्त्री का न तो अलग यज्ञ होता है न व्रत होता है , न उपवास। ऋग्वेद में पुत्री के जन्म को दुःख का खान और पुत्र को आकाश का ज्योति माना गया है। ऋग्वेद में ही नारी को मनोरंजनकारी भोग्या रूप का वर्णन है तथा नियोग प्रथा को पवित्र कर्म माना गया है। अथर्ववेद में कहा गया है कि दुनियां की सब महिलाएं शूद्र है। हिन्दु धर्म शास्त्रों में नारी की स्थिति को लेकर काफी विराधाभास है। इस्लाम में भी महिलाओं की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। कुरानशरीफ के आयत ( 1-4-11 ) में संपति से संदर्भित मामले में स्पष्ट लिखा है कि ‘‘ एक मर्द के हिस्सा बराबर है दो औरत।’ धार्मिक आस्था और महिलाओं को कमजोर बनाकर रखने का ही परिणाम था कि 8 मार्च 1535 को चित्तौड़गढ़ की रानी कर्णवती सहित अन्य नारियों को जौहर की चिता में प्राणों की आहुति देना पड़ा। काश ! यह समाज महिलाओं को दुश्मनों के सीने को चीरते हुए वीरतापूर्वक शहीद होने की शिक्षा दिया होता। दरअसल यह समाज महिलाओं की प्रगतिशीलता को बर्दाश्त करने का आदि नहीं रहा है। मध्यकाल की नायिका मीराबाई ने जब महल से बाहर कदम निकाली तो उसे जहर देकर मार डाला गया। मैत्रेयी और गार्गी जब साध्वी बनीं तो साधुओं ने सवाल उठाया कि नारी साधु कैसे बन सकती है ? इतिहास में मौजूद विरोधाभासों के कारण ही 1936 में लिखे आलेख के माध्यम से अंबेदकर सवाल उठाया कि चातुर्य वर्ण व्यवस्था में महिलाओं को किस वर्ण में रखा जाएगा ? क्योकि इस समाज को स्त्री-पुरूष समानता से परहेज है। अंबेदकर धर्म को महिलाओं की प्रगति में सबसे बड़ा बाधक मानते थे। यहां अहम सवाल यह भी है कि हिन्दू समाज ने सीता , लक्षमी , कुंती , पार्वती , सरस्वती जैसी मिथक नायिकाओं को जगत जननी माँ का दर्जा प्रदान किया है। इन लोगों की शिक्षा-दीक्षा किस गुरूकुल में हुआ था और गुरू कौन थे ? जबकि मिथक के नायको को शिक्षा देने वाले गुरूओं का महिमागान शस्त्रों में है। इससे स्पष्ट है कि देवी-देवताओं के यहां भी महिलाओं को दोयम दर्जा प्राप्त था।
दरअसल यह समाज बदलते वक्त के साथ अपनी सुविधा के अनुसार महिलाओं को इस्तेमाल करता रहा है। मुगलकालीन शासन इसका जीवंत उदाहरण है। इस युग में हिन्दू समाज में परदा प्रथा की शुरूआत हुई। डोला प्रथा को भी स्वीकारा गया। सत्ता सुख प्राप्त करने के लिए कुछ राजाओं ने आक्रमणकारियों के यहां बेटी और बहन का ब्याह भी किया। गरीबों को दीन ए इलाही नामक धर्म भी स्वीकारना पड़ा। वैसे तो इतिहासकार इस काल को वीरकाल की संज्ञा देते है। वीरकाल में ही नारियों की पतन पराकाष्ठा पर पहुँच गई। 800 वर्षो तक के शासन काल में नारी महज दासी और भोग्या बन कर रह गई। 18वीं शताब्दी में अंग्रेजों ने मुगल शासकों को परास्त कर अपना साम्राज्य कायम किया। अंग्रेजों के शासन काल में समाज सुधार का कार्यक्रम शुरू हुआ। जिसका परिणाम यह निकला कि 1857 के गदर में रानी लक्षमीबाई , झलकारी बाई , ऊदा देवी , रानी आवंती बाई , जैसी महिलाएं वीरांगनाएं सामने आई। महिला हितों की रक्षा के लिये सबसे पहला कानून लाने का श्रेय भी अंग्रेजों को जाता है। 1860 में अंग्रेजों ने भारत में कानून व्यवस्था को सुचारू ढ़ंग से चलाने के लिए आई0 पी0 सी0 की धाराओं का निर्माण किया। जिसमें महिलाओं का शील भंग एवं बलात्कार के खिलाफ कारवाई करने हेतु धारा 354 और 376 का निर्माण किया। दरअसल इसके पहले बलात्कारियों को धार्मिक कानून के आधार पर जाति-गोत्र , कुल-खानदान देखकर सजा सुनाने की प्रथा थी।
दरअसल भारतीय समाज में जंगल का कानून था। यह कानून बहुजन आबादी के हित में नहीं था। इसके लिए बहुजन आबादी को जागृत करना आवश्यक था। 20 जुलाई 1920 को ‘‘ मूकनायक ’’ नामक पत्र का प्रकाशन कोल्हापुर नरेश के सहयोग से किया। इस पत्र के माध्यम से दलितों एवं महिलाओं के मुद्दों को उठाया। 1924 में बहिष्कृत हितकारिणी सभा नामक संस्था को स्थापित किया। अछूतोद्धार के साथ-साथ नारी चेतना का कार्यक्रम चलाने लगे। बेणु बाई मटरकर , रंगूबाई शुभरकर और रमाबाई आदि महिलाएं अंबेडकर के आन्दोलन से जुड़ीं। आन्दोलन से जुड़ी महिलाओं को अपनी पीड़ा व्यक्त करने हेतु मंच दिया। सन 1927 में अंबेडकर को सरकार ने मुम्बई विधानमंडल के सदस्य नियुक्त किया। मार्च 1927 को चावदार तालाब मार्च का आयोजन किया। इसमें काफी संख्या में दलित महिलाओं ने भाग लिया। महिला आंदोलन को नई दिशा देने के महिला मंडल की स्थापना की गई। इस संस्था की अध्यक्ष अंबेदकर की पत्नी रमाबाई बनीं। 28 जुलाई 1928 को अंबेदकर ने मुम्बई विधान परिषद में कारखाना तथा अन्य संस्थानों में कार्यरत महिलाओं को प्रसूति अवकाश की सुविधा वेतन सहित प्रदान करने से संबंधित प्रस्ताव पारित करने की वकालत किया।
1931 में , लंदन में गोलमेज सम्मेलन के अंतर्गत ( स्त्री-पुरूष ) को पृथक मतदान देने के अधिकार दिलाने हेतु आवाज बुलंद किया। 1932 में पूना पैक्ट के अंतर्गत अछूत ( स्त्री-पुरूष ) को संसद , विधानसभा एवं सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिलाने के लिए संघर्ष किया। 16 जून 1936 को मुम्बई के दामोदर हाल में महिलाओं को संबोधित करते हुये कहा कि:- ‘‘ नारी समाज की गहना है , सभी को उसे सम्मान देना चाहिए।“ इस सम्मेलन में अधिकांश वेश्याएं एवं जोगिनी थी। 20 जुलाई 1920 को नागपुर में महिला सम्मेलन को संबोधित करते हुये सशक्तिकरण पर प्रकाश डालते हुये कहा कि:- सशक्तिकरण का अर्थ है अपनी क्षमताओं को बनाना और उसे विकसित कर समाज की मुख्यधारा का एक अहम हिस्सा बनना।“
अंबेडकर सामाजिक बदलाव के कार्यक्रम में ही जुटे थे। महात्मा गांधी से विचार-विमर्श कर पंडित नेहरू ने संविधान प्रारूप समिती का अध्यक्ष नियुक्त किया। इस प्रकार अंबेदकर को समाज बदलने लायक विधान बनाने का सुनहरा मौका मिला। स्त्रियों और शूद्रों की मुक्ति और सशक्तिकरण का सवाल उनकी प्राथमिकता में था। महिला सशतिकरण के संदर्भ में अंबेडकर का स्पष्ट दृष्टिकोण संविधान के अनुच्छेद 14 , 15 और 16 में झलकता है। लिंग समानता की प्रमुखता उन्होने मौलिक अधिकार , मौलिक दायित्वों के तहत निर्देशित सिद्धांतों के आधार पर किया है। बाबा साहेब के सिद्धांतो से स्पष्ट होता है कि देश में सामाजिक न्याय की बुनियाद रखने के लिए समाज में व्याप्त लैंगिक असमानता को दूर करना चाहते थे। धारा 14 के तहत महिलाओं को संपति का भी अधिकार दिया। महिलाओं को शिक्षा का अधिकार दिया। उनकी मान्यता थी कि ‘‘ शिक्षा शेरनी की दूध है शिक्षा के बिना जीवन व्यर्थ है। कुछ सोचने-समझने एवं चितन करने की ताकत शिक्षा से ही संभव है।“ शिक्षित महिलाओं को योग्यता के अनुसार नौकरी करने का भी अधिकार दिया। महिलाओं का कार्य क्षेत्र घरेलु कार्य तक ही सीमित था। महिलाओं को नौकरी करने का अधिकार प्रदान कर उसके आर्थिक सशक्तिकरण मार्ग प्रशस्त किया। बताते चले कि रवीन्द्र नाथ टैगोर की नतिनी सरला देवी घोषाल ने 1895 में बालिका विद्यालय में नौकरी करने का फैसला किया तो परिजनों ने इसका काफी विरोध किया था। उमा चक्रवर्ती लिखती हैं कि नौकरी करने से संबंधित सवाल जब सरला देवी से पूछा गया तो उनका कहना था कि:- ‘‘ वह अपने घर रूपी जेल की कैद से मुक्त होकर पुरूषों की भांति अपने जीवन-यापन के लिए आत्मनिर्भरता का अधिकार पाना चाहती थी।“
अंबेडकर ने महिलाओं को मतदान करने का अधिकार प्रदान कर उनकी राजनैतिक अधिकारों का सिर्फ रक्षा ही नहीं किया अपितु संपूर्ण विश्व के समक्ष एक मिशाल भी पेश किया। क्योंकि प्रथम विश्वयुद्ध के पहले रूस को छोड़कर तमाम देशों में महिलाओं और अर्द्धविक्षिप्तों को मताधिकार से वंचित रखा गया था। इसके लिए अमेरिका , इंग्लैंड , आस्ट्रिया समेत कई देशों की महिलाओं को काफी संघर्ष करने के बाद मतदान में भाग लेने का अधिकार प्राप्त हुआ था। इस मुद्दे पर भारत के नेताओं में भी काफी मतभेद था। देश के अंदर इस मसले पर लंबे समय से बहस जारी था। संविधान निर्माण के वक्त डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद सरीखे विद्वान यह अधिकार 1935 के एक्ट के अनुसार देने के हिमायती थे। 1935 के एक्ट के अनुसार यह अधिकार शिक्षित और 2 रुपया सालाना चैकीदारी टैक्स देने वाले नागरिकों को ही प्राप्त होता। अगर ऐसा हो गया होता तो इसका खमियाजा महिलाओं को कितना भुगतना पड़ता , इसका अंदाजा सिर्फ इस बात से लगाया जा सकता है कि 1951 में देश की साक्षरता दर 24.95 थी। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 45 में यह उल्लेख किया गया था कि राज्य 14 वर्ष के प्रत्येक बच्चों को संविधान लागू होने की 10 वर्षों की अवधि के भीतर अनिवार्य शिक्षा देने का प्रयास करेगा। इसके बावजूद 1971 में महिला साक्षरता दर 18.69 हो पाई थी। और रही बात 2 रुपया सालाना चैकीदारी टैक्स देने का तो महिलाएं किस श्रोत से अदा करती ? महिलाओं के प्रति हिंसा को रोकने के लिए धारा 313 के तहत हिंसात्मक और जबरन गर्भपात को अपराध की श्रेणी में रखा। हिन्दू धर्म में रीति-रिवाजों के नाम पर देवदासी बनाकर महिलाओं का यौन शोषण करने की परंपरा लम्बे अरसे से चली आ रही थी। इस प्रथा को खत्म करने के लिए धारा 17 का निर्माण किया।
खासतौर पर हिन्दू महिलाओं के हक में अंबेदकर रचित हिन्दू कोड बिल है। इसाई और मुस्लिम समुदाय की तरह हिन्दु समाज के लिए कोई पर्सनल लॉ नहीं था। भारतीय हिन्दू समाज में विवाह , उतराधिकार , दत्तक, निर्भरता या गुजारा भत्ता आदि का नियम-कानून एक समान नहीं था। इसाई तथा पारसियों में एक समय में एक स्त्री से शादी का प्रावधान था। वहीं मुस्लिम समुदाय में चार शादियों को मान्यता प्राप्त है। लेकिन हिन्दू समाज में कोई पुरूष 100 शादियां कर ले कोई बंदिश नहीं था। विधवा को मृत पति के संपति पर हक नहीं था। सवर्ण समाज में विधवा विवाह की परंपरा नहीं थी। अनुलोम विवाह , सम्बन्धम विवाह जैसी नारी शोषक परंपरा का दबदबा था। सदियों से महिलाओं के साथ हो रही अमानुषिक व्यवहार को समूल नष्ट करने के लिए 11 अप्रैल 1947 को लोकसभा में हिन्दू कोड बिल पेश किया। इस बिल के अंततर्गत हिन्दू विवाह अधिनियम , विशेष विवाह अधिनियम , गोद लेना ( दत्तक ग्रहण ) अधिनियम , हिन्दू उतराधिकार अधिनियम , निर्बल तथा साधनहीन पारिवारिक सदस्यों का भरण पोषण , अप्राप्तव्य संरक्षण संबंधी अधिनियम , उतराधिकारी अधिनियम , हिन्दू विधवा को पुनर्विवाह अधिनियम आदि कानून बनाये।
इससे शादी-विवाह में उॅच-नीच व जातीय भेद-भाव को खत्म कर दिया गया। एक पत्नी के रहते दूसरी शादी पर रोक लगा दिया गया और दंड का प्रावधान किया गया। पत्नी को तलाक देने के बाद दूसरी शादी करने की इजाजत दी गई। पति-पत्नी को तालाक देने का समान अधिकार दिया गया। तलाक के लिए आठ शर्तो को रखा गया। पति की मृत्यु के पश्चात् उसके संतान के बराबर अधिकार दिया गया। पिता के मृत्यु के पश्चात पुत्री को भी भाईयों के बराबर जायदाद का वारिस बनाया। हिन्दू परिवार में जन्मे बच्चा-बच्ची को गोद लेने का प्रावधान किया गया। गोद लेने वाले की संपति में भी अधिकार का प्रावधान किया। बतातें चले कि छत्रपति शाहू जी महाराज कोल्हापुर राज में 1917 में विधवा पुर्नविवाह , 1918 में अंतर्जातीय विवाह , 1919 में विवाह विच्छेद , 1920 में देवदासी प्रथा से संबंधित कानून पारित चुके थे। लेकिन अंबेडकर ने जैसे ही हिन्दू कोड बिल को संसद में पेश किया। संसद के अंदर और बाहर विद्रोह मच गया। सनातनी धर्मावलम्बी से लेकर आर्य समाजी तक अंबेडकर के विरोधी हो गए। संसद के अंदर भी काफी विरोध हुआ। अंबेडकर हिन्दू कोड बिल पारित करवाने को लेकर काफी चिंतित थे। वहीं सदन में इस बिल को सदस्यों का समर्थन नहीं मिल पा रहा था। वह अक्सर कहा करते थे कि:- ‘‘मुझे भारतीय संविधान के निर्माण से अधिक दिलचस्पी और खुशी हिन्दू कोड बिल पास कराने में है।“ सच तो यह है कि हिन्दू कोड बिल के जैसा महिला हितों की रक्षा करने वाला विधान बनाना भारतीय कानून के इतिहास की महत्वपूर्ण घटना है। धर्म भ्रष्ट होने की दुहाई देने वाले विद्वानों की विशेष बैठक अंबेडकर ने बुलाई। विद्वानों को तर्क की कसौटी पर कसते समझाया कि हिन्दु कोड बिल पास हो जाने से धर्म नष्ट नहीं होने वाला है। कानून शास्त्र के नजरिये से रामायण का विश्लेषण करते हुए कहा कि ‘‘ अगर राम और सीता का मामला मेरे कोर्ट में होता तो मैं राम को आजीवन कारावास की सजा देता।“ संसद में हिन्दु कोड पर बोलते हुए अंबेदकर ने कहा कि ‘‘ भारतीय स्त्रियों के अवनति के कारण बुद्ध नहीं मनु है।“ काफी वाद विवाद के बाद चार अनुच्छेद पास हुआ। अंततः राजेन्द्र प्रसाद ने इस्तीफे की धमकी दे दी। पंडित नेहरू इस बिल के पक्ष में थे। सत्ता बचाने के लिए हिन्दू कोड बिल को ठंढ़े बस्ते में डालना उचित समझा। अंततः अंबेदकर ने 27 सितंबर को हिन्दू कोड बिल सहित कई अन्य मुद्दों को लेकर कानून मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। नये संसद में विधी मंत्री एच0 पी0 पटास्कर ने हिन्दु संहिता 137 समृति तथा प्रिवी कौंसिल द्वारा प्राप्त रीति-रिवाजों के स्थान पर नया कानून को अत्यंत ही आसानी पारित कर। यह भी सवाल है कि हिन्दू कोड बिल पर अंबेडकर का विरोध और पाटस्कर समर्थन क्यो ?
बहरहाल कानून मंत्री के रूप में अंबेडकर की शहादत पर ही भारतीय नारियां सशक्त हुई हैं । 29 दिसंबर 1946 को भारतीय संविधान सभा की पहली बैठक हुई थी। 203 सदस्यों की बैठक में महिलाओं की संख्या महज 8 थी। 1957 के लोकसभा चुनाव में महिला उम्मीदवारों का जीत प्रतिशत 60 प्रतिशत था। लोकसभा के चुनावी राजनीति के इतिहास में महिलाओं की यह सर्वाधिक शानदार जीत है। वहीं आजाद भारत की राजनीति में इंदिरा गाँधी , प्रतिभा देवी सिंह पाटिल , सोनिया गांधी , श्रीमती मीरा कुमार , मायावती , ममता बनर्जी , जय ललिता , राबड़ी देवी , सहित दर्जन भर से अधिक महिलाओं ने अपनी पहचान बनाई है। फिर भी विधान सभा और लोकसभा में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण का मसला वर्षों से खटाई में पड़ा है। अरूधती राय , सुनीता विलियम , महाश्वेता देवी , मेधा पाटेकर , असंतुता लकड़ा सहित कई अन्य महिलाएं विभिन्न क्षेत्रों में अपनी विशिष्टता के कारण चर्चित हैं। राजनीति , शिक्षा , खेल , साहित्य , समाज सेवा के अलावे फिल्म और गलैमर के क्षेत्र में भी शोहरत बटोर रही हैं। सत्ता , शोहरत और बौद्धिक जगत से इतर बिहार के वैशाली जिला की किसान चाची और पटना जिला के नौबतपुर की लालमुनी देवी की गिनती देश के गिने-चुने महिला किसानों में हो रही है। गाँव कस्बे में बसने वाली महिलाएं राजनैतिक सत्ता से लेकर पुरूष सत्ता को चुनौती दे रही है और अपने संघर्षों के माध्यम से नित-नई महिला सशक्किरण की दास्तान लिख रहीं हैं।
आजादी के ७1  वर्ष बाद भी सामाजिक रूढ़ियों , पुरूषवादी सामंती ढ़ाचा और बाजारीकरण के दबाव में महिलाएं सशक्तिकरण के लिए संघर्ष कर रही है। भारतीय समाज में जाति और धर्म का ढ़ाचा अभी भी मजबूत है। सामंतवाद के बाद पूंजीवाद के आगमन के बाद पितृ सतात्मक समाज महिलाओं के समक्ष नित-नई चुनौतियों को पेश कर रहा है। दहेज दानव जनित भ्रूण हत्या से बेटियों की संख्या में लगातार कमी आ रही है। बेटियों की संख्या में हो रही कमी पर नामचीन लेखिका तस्लीमा नसरीन ने टिप्पणी ने किया है कि ‘ भारत एक दिन पुरूषों का देश बनकर रह जाएगा।“ स्त्री-पुरूष समानता के सवाल पर समाज की मानसिकता में अमूल-चूल बदलाव आना आवश्यक है। जिसकी प्रक्रिया काफी धीमी है। दुष्परिणामस्वरूप लड़कियों की शिक्षा , स्वास्थ्य और रहन-सहन में साकारात्मक बदलाव नहीं दिख रहा है। दहेज हत्या , डायन हत्या , छेड़खानी , बलात्कार जैसी घटनाएं लगातार घटित हो रही हैं। पूंजीवाद आधारित विकास की होड़ में शामिल भारतीय समाज में महिलाओं को वस्तु के रूप में पड़ोसने परंपरा चल पड़ी है। स्वतंत्रता के नाम पर चली स्वच्छंदता की आंधी में महिला सशक्तिकरण का सवाल बौद्धिक विकास से दूर उपभोक्तावाद की संस्कृति से जुड़ता हुआ दिख रहा है ।

 

परिचय:- लेखक फणीश्वरनाथ रेणु डॉट कॉम के संपादक और मोडरेटर हैं ।

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