मगही कहानी / “बेदेहानी लरजर”

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मगही क्षेत्र में जन्में अश्विनी कुमार पंकज आदिवासी अस्मिता विमर्श के सशक्त स्तंभ है। आदिवासी भाषा साहित्य संस्कृति के क्षेत्र में इनका कार्य उल्लेखनीय है। झारखंडी हासा – भासा की लड़ाई से जुड़े अश्विनी ने विस्थापन की समस्या पर केन्द्रित माटी -माटी अरकाटी नामक उपन्यास की रचना कर हिन्दी साहित्य जगत की पंगत में अपना स्थान सुरक्षित किया है। मगही भाषा में लिखित खांटी किकटिया उपन्यास भी चर्चे में है। आप सभी सुधी पाठक इनकी मगही कहानी “बेदेहानी लरजर” को डा0 स्नेह सुधा की विशेष टिप्पणी के साथ पढें। – संपादक 

लेखक ने नालंदा के श्रवण विहार से एक छोटी सी बच्ची को जोड़ा है. क़िस्सा गोह की शैली में मगही में लिखी यह कहानी रोचक बन पड़ी है. परिवेश और विषयवस्तु ग्रामीण है. ऐसे में बोली को कहानी का माध्यम बनाना सटीक बन पड़ा है. ओदंतपुरी (वर्तमान बिहार) के महाविहार जहाँ पठन-पाठन का काम होता था, का उल्लेख कहानी में मिलता है. चुमकी को पढ़ने की बहुत इच्छा थी. 7-8 वर्ष की उम्र में पिता के साथ वह नालंदा में नाम लिखवाने गयी थी. लेखक ने कहानी में दिखाया है कि छोटी जात ख़ासतौर पर लड़की को पढ़ाने के लिए कोई तैयार नहीं होता. चुमकी के पिता बलबरन और उसके परिवार ने ज़िद्द ठान ली थी कि चुमकी को पढ़ाना है. गाँव में उनकी बात कोई नहीं समझ पा रहा, बड़ी जात वाले चिढ़ा रहे हैं’ लेकिन बलबरन और उसका परिवार दृढ़ है. रिश्तेदारों के कहने का भी उन पर कोई असर नहीं होता है. सबका मानना है कि लड़की को पढ़ाने की बात सोचना, वह भी कारीगर जात का, बहुत बड़ी मूर्खता है. पाखंडी लोग एस बात को सुनते ही नोंच खाएँगे, श्रमण भी तैयार नहीं होंगे. चुमकी और उसके पिता की ज़िद्द और संघर्ष की तथा श्रमणों के विनाश की कहानी है “बेदेहानी लरजर” । – -डॉ. स्नेह सुधा 

                                              बेदेहानी लरजर
अश्विनी कुमार पंकज
ढेर दिन पहिले के खिस्सा हे। ढेर पहिले के … प कोय राजा-रानी के नयं। ऊ पुरखा बेरा के खिस्सा, जखनीं लखमनिया राजा के राज हल कीकट में। नालदह (नालंदा) के श्रमण महाविहार लेल मग्गह सउंसे संसार में जान्नल जा हल। गिरिक, ओदंतपुरी आउ राजगिर जखनी दुनियाभर के मधेस (अदमी) आब्बऽ हलन। से पुरखा घरी के खिस्सा। ओह घरी के एगो छौंड़ी के सराप के खिस्सा। जेक्कर सराप से सात सै साल के मोट-मोट भीत अइसन भुरभुरा के गिरलक आउ जर के गरदा-गरदा हो गेल कि फिन कहियो ठाड़ा न होलइ। हलांकि ई बीच एक से एक राजा आउ समराट अयलन आउ गेलन। श्रमण, बरहमण, भिक्खू-ऋषि, मुनी-गुनी, कबि-गायक, भाट-चारण … सब्ब अकास-पताल तक के खिस्सा सुनयलन, गयलन आउ लिख-लिख के हिमाल के खोह-गुफा में सरिया-सरिया के चल गेलन, बकी ई खिस्सा के केकरो भिरु आसते से भी नयं फुसकलन। काहे? काहे कि असोक समराट के तीन गो शेर अखनियो तक सब्ब दिसा में नजर रखले खिस्सा सुनवे ओला के फाड़ खायला खबरदार बइठल हथ। बकी हम्मरा बूझाइत हे कि ई खिस्सा जरूर कहे चहियइ। से सुनवइत ही। जे होतइ से देखल जतइ।
बारवीं सदी के कोय आखिरी दिन के हे।
संझौती बेरा हलइ। बकिर सुरुज अखनी तक पूरापूरी नयं लूक्कल हल। इहे लुकलुकाइल बेरा में एगो 15-16 बरीस के किशोर छौंड़ी चुमकी अपन छोट भाई ननुआ संघ पहाड़ी से उतरइत हलइ। पहाड़ी तो छोट हलइ प ऊंच जगह पर होवे से ओकर ऊपरे से तलहटी में बसल नजीक आउ दूर-दूर के सब्ब गांव-इलाका नीम्मन से देखाइ दे हल। ई दून्नो भाई-बहिन जनावर चरवे गेल हलथी जे अब बेरा डूबे से पहिले गांव घूरे लेल झपझप नीचे उतरइत हलन। बां-बां में-में करइत 20-25 गो गोरू-बकरी हांकले। गोरुवन के गला में बन्हल घंटी से टंग-टुंग टुनुर-टुनुर के अवाज अइसन सुनायी दे हलइ जइसे कोय बड़ इनरा इया पोखरा में लुसुर-लुसुर असाढ़ के बरखा-बूनी गिरे से अवाज आब्बऽ हइ।
चुमकी के गांव पहाड़ी से उतरते हइ। जेकर से पूरब में पंचाने नदी के आर पर चमरडीहा आउ नदी के ऊ पट्टी गिरिक बसल हे। गिरिक से एकदम पछिम में राजगीर आउ सोझे उत्तराहे चल गेला पे नालदह। नालदह से उत्तर-पूरब में ओदंतपुरी। गिरिक, राजगीर, नालदह आउ ओदंतपुरी के चुमकी का, हेने के सब मानुख बेस से जानऽ हथिन। काहे कि ई सब जगह पे बड़का-बड़का पक्का दूरा-दलान, मकान, दर-दोकान, जैन मठ, बौद्ध विहार आउ बर-बजार बनल हे। ई सब्ब जगह पे श्रमण बिचार माने ओला मानुस लोग के ही जादा रहवास हे। वइसे, मठ आउर विहार तो ई पूरा इलाका में जहां-तहां बनल हे बकिर नालदह आउ ओदंतपुरी में बड़का-बड़का दू ठो खास रकम के महाविहार हे जेकर में दुनियाभर के मधेस पढ़े लेल आवऽ हथन।
पूछब कि चुमकी ई सब बात कइसे जान्नऽ हे तो ई लेल अपने के आझ से आठ साल पीछे घूर के देखे पड़त। जब चुमकी अपन बाप संघ नालदह गेल हल, पढ़े लेल नांव लिखवे।
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चुमकी के उमिर तब एहे कोय 7-8 साल होइत होतइ। सांवर रंग के देह-काठी आउ सुन्नर नाक-ठोर ओली चुमकी रेंगा बेरा से ही लूर-अकल में गांव के दोसर छौंड़ा-छौंड़ी से बेसे तेज हल। नानी-माय, गोतिया-हित आउ गांवभर के बूढ़-पुरनिया से सुनल बात-खिस्सा आउ गीत ओकरा हिरामन सुगा नियर आद हलक। मने कि चुमकी के खोंइचा में ऊ सब चीज-बतुस भरल हल जेकरा जुटवे-जोगवे में ई उमिर के छौंड़ा-छौंड़ी के धेयान नयं रहऽ हे। आउ बिदमान लोग तो जाने-गुने में जिनगी बिलाय तक लगल रहऽ हथ।
बेटी के अइसन अजगुत परतिभा के देख के ओकर बाप बलबरन सोचलथिन की एकरा पढ़वे चाही। एहे खेयाल से ऊ गांव-गोतिया के मातबर लोग से राय-बिचार करलन। त सब्ब एहे कहलथिन कि ‘बात तो बेसे कहइ थऽ बकिर हमनीं के जमात में पढ़वे ल कोय लुरगर मधेस तो हइये नथ। के पढ़इतवऽ छौंड़ी के?’ सबसे बूढ़-गंउवों के राय हलइ, ‘अब हमनीं छोट जात मानल जा ही हो। पढ़ाइ-लिखाइ हमनीं लेल कहां?’
बात ठीके हलइ। बीस-तीस पुरखा खूंट (पीढ़ी) पहिले तक न तो कोय पढ़इ-लिखइ के जानऽ हल, न जात-पात आउ धरम के। मानुख-मानुख के बीच कइसनो रकम के कोय बंटवारा न हल। बूढ़-पुरनिया बतवऽ हथ कि गुप्त राज के बेरा से ई सब्ब चाल-कुचाल सुरू होल। ओकर से पीछे गोतर-जात, धरम के कोय सुगबुगी समाज में न हल। बिम्बिसार राजा के जबाना में भी जीवक संघ से जुड़ल मधेस आउ मक्खलि, महाबीर-बुद्ध जइसन ब्रती-श्रमण लोग भी अपन बात-बिचार के खाली बोली-भाखा में ही बांचइत हलथिन। लिख-उख के नयं। पढ़ाइ-लिखाइ के तितिम्मा तो राजा अशोक के बेरा में शुरू होलइ। तभियो खाली राजकाज में लग्गल लोग, तनी-मनी बिदमान ब्रती आउ श्रमण सब्ब ही पढ़नय-लिखनय में दिलचस्पी रखऽ हलथिन। बकिर जब गुप्त राजा के बेरा में श्रमण लोग के पढ़वे ओला बौद्ध महाविहार नालदह में बनलइ, ‘छंदस’ गावे ओला पाषंडी (सनातनी) लोग आ गेलथिन आउ उनखर बोलबाला मग्गह में बढ़ गेल, सोन आउ गंगा के दून्नो पट्टी, तब से बड़ जात-छोट जात में मानुख लोग बंटा गेलथिन। एकरा बाद से ही छोट जात के सउंसे लोग के पढ़े-लिखे के एकदम्मे मनाही हो गेल। एहो बात नयं भूले के चाही कि छौंड़ी आउ जनाना लोग के पढ़वे के सुबिधा न तो बिम्बिसार के राज में हल आउ न अखनी के राजा लखमनिया (लक्ष्मण सेन, 1179-1206 ई.) के राज में ही हे।
बकिर बलबरन के घरभर के एक्के जिद, ‘चुमकी पढ़तइ।’
काहे कि बलबरन के माउग रत्ति भी बेटी के पढ़वे के पक्ष में हलइ। मने कि दिन के भुकुरवा हो इया कि गदहबेला चुमकी के घर में बस एक्के रेघ सुनाई दे हल-पढ़ाइ।
ई सब्ब जान-जून के आसपास के बड़का जात ओला सब्ब खूब मजा लेवऽ हलथिन। बलबरन के देख अपन-अपन हंसी पेट भीतरे ही अजगर जइसन सरिया के मुड़िया गंभीर बना ले हलथिन उ सब्ब। फिनो एकदम्मे हित नीयर गते से मिठगर हो कहऽ हलथिन, ‘एहो बलबरना, बेटी के नालदह ले जो रे। अइसन सुग्घड़ छौंड़ी पूरा इलाका में कोय नयं हइ। चुंदीधारी पाषंड लोग तो छौंड़ी के नयं पढ़े देथुन। बलुक का जनि मुंडित-लिलार ओला नालदह के श्रमण महाविहार में एक्कर पढ़े के भाग बद्दल हो।’

बड़गामा से नालदह के महाविहार, पहर से भी कम दूरी पर हलइ। जहां बलबरन के दूर के एगो गोतिया रहऽ हलथिन चनरपा। ‘शर’ (तीर) बनवे आउर ओकरे बिछौना प ही नीनाए ओला आठवीं सदी के पुरखा सिद्ध श्रमण कबि ‘सरहपा’ से चनरपा के कोय रिश्ता हल कि नयं, ई तो अखनी के कोय मातबरो गुनी-बिदमान मानुख बिस्वास से नयं बोल सकऽ हथ। बकिर चनरपा रिश्ता में बलबरन के फूफा लगऽ हलथिन। लोहा के बड़ नामी-गिरामी कारीगर। सउंसे इलाका से उनकर भिरु एत्ता काम आवऽ हलइ कि उनखर लोहरभांथि के अग्गिन कहियो नयं सेरा हल। चनरपा के बनवल खुरपी आउ करनी एकदम्मे बेजोड़। राजा लखमनिया के बेरा में साइते कोय दोसर लोहार हल जे उनखा जइसन खुरपी आउ करनी बना दे। से चइत के महीना में बहुत सोच-बिचार करला बाद, छौंड़ी के लेले बलबरन एगो लहलह दुपहरिया दिन पहुंच गेलन फूफा के दलान पर-बड़गामा।
बड़गामा कहे लेल गांव हलइ। हलइ कोय नगले (नगर) जइसन। चुमकी हयरान। मइया गे! एत्ता बड़का गाम आउ एत्ता बड़ घर-दूरा … अंगना-ओसार। कच्चा माटी के नयं। पकवल माटी के। लाल-लाल। भीत-अंगना सब्ब चीक्कन-चुक्कन। का जनी कउन चीज से लीप्पल-पोतल कि भीत से रगड़ैलौ प देहिया में कोय रेख-दाग नयं लग्गऽ हलइ। जइसन कि ओक्कर घर के भीत से रगड़ैला प हो जा हलइ। भीत कहों से उबड़ो-खाबड़ नयं हलइ। घर के पीछे आम, कटहल आउ ताड़ के खूब मनी गाछ। ओक्कर आगू छोट सन पोखरा। पोखरा में कमल।
आउ गांव भी कइसन? रकम-रकम के दूरा-मकान, दोकान-दौरी। रस्ता प जेतना मानुख ओतना से तनिए कम गदहगाड़ी आउ बैलगाड़ी। मानुख सब्ब भी रंग-रंग के। कुचकुच करिया त सांवर भी। उज्जर त पीयर आउ गोहुम जइसन रंग ओला भी। मुंड़ल मुड़ी ओला ब्रती, श्रमण आउ बौद्व मरद जनाना … त देह-गतर प राख मलले बड़का-बड़का चुंदी ओला मधेस … ई सब्ब चुमकी पहिल बेर बड़गामा में ही देखइत हलइ।
रात में खा-पी के चनरपा के पूरा परिवार बइठलक। बलबरन अप्पन आवे के मतलब एके सांस में कह देलन। सुन के सब के काठ मार गेलइ। ई कउची ? छौंड़ी के पढ़वे लेल आल हथिन बरबलन। मति-गति त नयं मराल हइ इनकर। भला अइसनो हुज्जत के बात कोय सोच्चऽ हे का। उहो कारीगर जात हो के। अइसनहीं नयं कहल गेल हे ई बात कि जखनी मरे के बेरा होव्वऽ हे त गीदड़वा नगले दन्ने भाग्गऽ हे।
चनरपा समझवलन बलबरन के, ‘बेकार अयलऽ हे बाबू। छोट जात के पढ़े के नेम-रीत नयं हइ। हिआं के पाषंडी लोग सुनतथुन तो धर के नोच लेथुन तोहनी के। ऊपर से छौंड़ी के लेके आयल हऽ। नयं मालूम हव्वऽ का कि छौंड़ी-जनाना के पढ़वे लेल श्रमण आउ पाषंडी दून्नो सब्ब तेयार नयं हथुन। दून्नो बेटी-बापुत ई बात के केकरो से कहबो नयं करिहऽ। भल इहे में हवऽ कि दू-चार दिन घूम्मऽ-फिर्रऽ आउ गांव घुर जा।’
बकिर बलबरन न मानलथिन फूफा के बात। टेकुआ जइसन अड़ले रहलन।
हार मान के दोसरका दिन भुकुरवा बेरा में ही चनरपा दून्नो बाप-बेटी के लेले नालदह के राह पकड़लन। महाविहार के दूरा पहुंचते-पहुंचते बाप-बेटी दून्नो हकबक। बाप रे! मइया गे! एत्ता बड़, ऊंच, लमहर आउ बिसाल दूरा। खूब भीड़भाड़। एन्ने-ओन्ने, जन्ने देखऽ श्रमण मानुख के मुड़िए-मूड़ी। बकी गांव नीयर निठाह चुप्पा सांति। तनिको हल्ला-गदाल गरदा-गुवार नयं।
दूरा प ठाड़ श्रमण के चनरपा झट से अंजलि कम्म (हाथ जोड़ना) कइलखिन। उनखा देखादेखी बलबरन बापुत-बेटी भी ओइसहीं कयलन। श्रमण के चनरपा अप्पन नांव-गांव बतलखिन, बलबरन आउ छौंड़ियो के परिचय देलथिन।
उनखर नांव सुनते श्रमण बड़ आदर से कहलकइ, ‘अपने के भला के नयं जान्नऽ हे मग्गह में। बड़ खुसी होल कि अपने से आझ भेंट होलइ।’
‘हमनीं अपने भिरु एगो बिससे काज लेल अयले ही।’ गते से थूक घोंट के श्रमण से कहलथिन चनरपा।
‘कहऽ न?’ श्रमण के चेहरा प मदद के भाव हलइ।
चनरपा के भीतरे जे हिच-खिच हलइ से श्रमण के मीठगर बोली आउ भाव से दूर हो गेलइ हल। से बेगर कउनो भय के ऊ आवे के कारण कह सुनयलन। पूरा बात सुनला प श्रमण गौर से छौंड़ी चुमकी के देखलकइ। फिनो पहले नीयर ही सांत आउ मीठगर भाव से कहलक, ‘जनाना लोग के पढ़वे के नेत-नियम नयं हे। बकी जनाना भिक्षु संघ में ई छौंड़ी के रखल जा सक्कऽ हइ।’
ओकर बात सुन के बलबरन के ‘ना’ में मुड़ी डोलवे से पहिले ही चुमकी कहलइ, ‘हम्म अप्पन लमहर केस नयं कटवब। मुड़ी छोलवावे लेल नयं आय ही हम्म हिआं।’
चनरपा झटे श्रमण से निवेदन करलखिन, ‘भन्ते ! छौंड़ी पढ़े के इच्छा रखऽ हइ। भिक्षुणी बने के नयं।’ फिनो बलबरन के देखते पूछलखिन, ‘का हो बलबरन, एहे बात न?’
बलबरन के मुड़ी झट से हंकारी में डोललइ।
ढेर मान-मन्नउल के बाद श्रमण भिक्षु चुमकी के लूर जांचे लेल तेयार होलइ। ई सरत प कि सही जबाब मिललो प नांव लिखवे के आसा ओहनी सब्ब के एको ठोप नयं रखे के होतइ। बलबरन का करतथिन हल। इहे सोच के मान गेलन कि छौंडी के सही-सही जबाब देला से साइत श्रमण मान जाय। उनखर हां कहते भिक्षु श्रमण देह प पड़ल उत्तरासंघ (चद्दर) के ठीक से लपेट के छौंड़ी से सवाल सुरू करलकइ।
– ‘अछा मंइवां, अइसन कउन मछरी जेक्कर मोछ?’
– ‘मांगुर।’
– ‘उ के हइ जे आब्बऽ हइ चमकइत आगू से बकी जा हइ भुकभुकाइत पीछू से ?’
– ‘सुरुज।’
– ‘जनाना के मन साड़ी में, मरद के ताड़ी में आउ लइकन के …?’
– ‘भात-माड़ी में।’
– ‘जे काटे से कटे नयं, मारे से रोवे नयं?’
– ‘परछाहीं।’
– ‘ऊ पखेरू के नांव सुनावा, जे दिन में सुते रात में जागा?’
– ‘बनबागुर, आउ का।’
-‘एगो गीत सुनाव?’
– बाबू हम्मर कत्थी के? धनिया समत्थी के।
मइया लवंग के, बाबू जी हथी चन्नन के।
दादा-दादी डूम्बर के, टोला-परोसी खजुअत के।
– ‘बेस। अब आखिरी सवाल। ई गत ऊ गत। कउन सबसे बेस गत?’’
– ‘तथागत। आउ के।’

जइसे ही चुमकी ई जबाब देलकइ भिक्षु श्रमण लपक के ओकरा अपन अंकवार में भर लेलथिन। ओक्कर लिलार चूम के चनरपा से कहलकइ, ‘बड़ भगसाली हऽ जे अइसन लूरगर, सूथर-सुभगवर छौंड़ी परिवार के अंगना में आल हव्वऽ। हम्मर बस में रहतलवऽ त तनिको देर न करिते हलिवऽ महाविहार में नांव लिखवे से। बकिर नियम के हांथे मजबूर ही। खाली जनाना भिक्षु संघ में ही एकरा रहे के मोका मिल सकऽ हइ। कहऽ त ई लेल कर्मदान भिक्षु (विश्वविद्यालय नियंत्रक) से बात-बिचार करिवऽ। बकी आउ कोय दोसर उपाय न हवऽ। नयं जान्नऽ हऽ त जान लऽ। हिआं दू रकम के पढ़ाइ होव्वऽ हे- एक, ओइसन लोग लेल जे पढ़ला बाद बौद्ध भिक्षु बन के संघ में जा हथन। आउ दूसर ऊ, जे पढ़ाइ पूरा होल बाद सांसारिक जीवन में जा हथ। ई दून्नो रकम के पढ़ाई छौंड़ी-जनाना लेल बरजित हइ। तोर कोय मदद नयं करे सकबवऽ हम्म। हम्मरा माफ करऽ।’
बलबरन आउ चुमकी दून्नो बापुत-बेटी के आंख के आगू अन्हार छा गेलइ। छौंड़ी के त ढर-ढर लोर चुवे लगलइ। रेघा के जोर से रोव्वे के मन त बलबरनो के होइथ हल, प कहल गेल हे कि, से अप्पन रोवाइ के ऊ बाहर नयं आव्वे देलन। चनरपा भी मसुआ गेल हलथी। हलांकि उनखा पहिले से ही ई जबाब मालूम हलइ। फिन भी एकदम्म से लहकल अगिन के धाह त लगबे करऽ हे।
ओहनी सब्ब के छूछे घुरे के अलावा कोय उपाय नयं हलइ।
तब से चुमकी आउ ओकर माय-बाप, भाई-परिवार, हित-गोतिया सब नालदह के नांव सुनते अइसन खिसिया जा हथिन जइसे लाल कपड़ा देख के सांड़ उफड़े लग्गऽ हे।
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पहाड़ी से उतरइत ननुआ के अचके उत्तराही दिशा में धुंआं लउकलक। ऐर सन धुंआ। तेजी से जे असमान में पसरइत हलइ।
‘ए दिदिया, देख त होने …’ हयरान ननुआ भकुआयल-भकुआयल चुमकी से कहलक।
अपन मस्ती में रसे-रस नीचू उतरइत भाई के बेगर देखले ही चुमकी पूछलकइ, ‘कन्ने रे बाबू…?’
‘होन्ने दिदिया… उत्तराही दिशा में।’
चुमकी ठहर के उत्तर दिशा में ताकलकइ आउ ओक्कर मुंह गुदा निकालल नरियर के खोल नीयर खुल्ला आउ एकदम्म से गोल हो गेलइ, ‘मइया गे! एत्ता धुंआ?’
‘कहीं आग लग गेलइ हइ न…?’ असंका से फिनो पूछलइ ननुआ।
‘का जनी रे…बड़गामा आउ नालदह दन्ने बुझाइत हइ। साइत होनही कहीं…’
दून्नो के आंख टकटक जखनी तक धुंआ दिखते रहलइ, पहाड़ी से उतरते-उतरते भी होनही अटकले रहलइ। जब धुंआं ओहनी के देखे के पहुंच से छपित हो गेलइ त दून्नो भाई-बहिन जनावर हांकते लपकल-धपकल गांव में घुसलथिन। सब जनावर के गोहाल में घुसा के आउ ओकर दूरा में लकड़ी के आड़ भिड़ा के, अंगना में आ के हाथ-गोड़ धोयलन। फिनो माय से पूरा खिस्सा कह सुनलकइ दून्नो झन। बपइ घरे न हलथिन। भांथिघर से जब ऊ घुरलखिन त रत्ती उनखा ई बात बतलकइ। रात हो गेल हलइ से कहीं आउ जा के पूछपाछ के बेरा न हल। से लेदरा प ओंघड़ा के बलबरन माउग से एतने कहलखिन, ‘बिहान होवे दे, मालूम करबइ। कउची के धुंआ देखलकइ हे मंइवां।’

सात-आठ दिन बाद फाटल बदरी नीयर जब तनी-मनी धुंआ असमान में धुंधुर-धुंधुर रह गेल हलइ त चुमकी आउ ओक्कर माय-बाप के भी दोसर झन जइसन बात सुने के मिललइ…‘नालदह के श्रमण महाविहार जर के राख। ओक्करे धुंआ हलइ। कुछो नयं बचलइ। न श्रमण मधेस, न पोथी-गरंथ। घोड़ा प तरवार लेले एक कोड़ी (20) से भी कम मानुख पुरुब दिशा से अइलखिन आउ सब्ब नास-जरा के, लेहुआ के चल गेलथिन। देखे में हेन्ने के मधेस नयं बुझा हलथी। कउची तऽऽऽ … हां, तुरुक जात। तुरुक जात हलथिन ऊ सब्ब। बखतिइयार नांव हलइ का तो ओहनी के घोड़सवार अगुआन-सरदार के। एहो सुन्ने में आवइत हइ कि राजा लखमनिया के महल-अटारी आउ राजपाट भी बखतिइयार तुरुक कब्जा ले लेले हइ। लखमनिया राजा के सुरुज अस्त हो गेल। इहो बात सुन्ने में आवइत हे कि आसपास के बड़ जात ओला गांव में एगो पाषंडी घूम-घूम के हल्ला-गदाल करइत हलइ कि ई तुरुक लोग न श्रमण हथिन, न बरहमन। मुसलमान हथिन। मलेच्छ जात। इनखर नेग-रीत पुरुब में नयं, पछिम दने मुड़ कर के दैव के गोड़ लग्गेऽ के हइ। एहनिन से बंचे लेल ‘जग’ करल जतइ। ऊ जग में जे गांव ओला भाग न लेतन से मारल जयतन। श्रमण ब्रत-मत धरे आउर माने ओला मानुख मग्गह के बचवे में जरिको समरथ न हथ। ससतर आउ सासतर ओला बेदपाठी छंदस समाज भिरु ही ई मलेच्छ मुसलमान के भगवे के एक से एक उपाय आउ हिमत हे। काहे कि ओहनी के मंतर में ही एतना बल हे कि एक-एक मानुस के दू हाथ के जगह दस-दस बीस-बीस हाथ उग जतइ।’
अइसने लंदर-फंदर रकम-रकम के आउ कय ठो बात।

ई अगलग्गी बाद तेसरका सनिचर के दोपहरिया में, जब रउदा तनी सन मसमसायल नीयर हलइ, सुरुजदेव भी लर-पर हलथिन, ओहे पहाड़ी प दून्नो भाई-बहिन एगो सखुआ गाछ के नीचू बइठल हलन। नालदह दने आंख गड़वले ननुआ चुमकी से पूछलक, ‘आयं गे दिदिया, हमनियो जग में चलबइ न?’
‘नयं रे! पाषंडी सब्ब के ई नवां कुचाल हइ। जइसे केंचुल छोड़ला प सांप पहिले से आउ सुन्नर दिखऽ लग्गे हे, बुझाइत हे ओइसने ई पाषंडी सब्ब जात-पात के बाद अब केंचुल छोड़इत हथ। कोय बड़का बर-बखेड़ा करे लेल।’
‘सउंसे हाला हइ कि मुसलमान सब्ब…का त हमनी के मार देथिन। जानबे करइत हें न दिदिया, नालदह के कइसे जरा देलथिन हे तुरुक लोग।’
‘भल करलखिन रे बाबू! भल करलखिन…जे जरा देलथिन।’
‘अइसन काहे बोलइत हें…अयं?’
‘काहे नयं बोलबइ …’ कह के भर छाती चैन के सांस खिंचलइ चुमकी। ‘हम्म त ओहे दिन सराप देले हलियइ … जे दिन हम्मरा हुआं से छूछे घूर पड़ल हल, बेगर नांव लिखवले। लग्ग गेलइ हम्मर सराप। जर-नसा गेलइ हम्मनी के दुरदुराय ओला नालदह।’
‘मने … तोरे सराप से …?’
‘आउ नयं त का। हम्मर आउ हमनिए जइसन के सराप से। तूहीं कह तो अइसन श्रमण महाविहार के रहे से हमनी के आझ तक कउची मिलल? न पढ़ाइ न इजत। कुछो नयं। अइसन विहार रहे इया जर-बिला जाय। हम्मर ठेंगा से!’
ननुआ दीदी के गोद में मुड़ी रख के असमान ताके लगलक। ओकर आंख आउ असमान के बीच में गदबदाल सखुआ गाछ के सुग्गापंछी रंग के पत्ता हहराइत हल। जेकर बीच से पूरा तो नयं प झिकिर-मिकिर तनी-मनी असमान देखाइ दे जा हलइ।
चुमकी के हाथ भाई के झंखुरा में मइया नीयर हउले-हउले सरसराय लगलइ। फिन ओक्कर मुंह से एगो गीत सले-सले झरे लगलइ। जे ऊ रेंगा बेरा माय से सुनले हल।
उहे गीत अखनी हवा में घोरा के पहाड़ी से नीचू घाटी में रसे-रस चुअइत हलइ-
‘झलर-मलर के पतवा, बाबू खाय दूध-भतवा, बिलइया चाटे पतवा।
चाटते-चाटते गेले पिछुअरवा, कुकुरा धरकइ भर अकबरवा,
छोड़-छोड़ कुकुरवा, अब न अयबो तोर पिछुअरवा।’