कहानी – कमाउ दंगल

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‘बहेलियों के बीच’, ‘लतखोर’ सरीखे कहानी संग्रह और ‘कोयला का फुल’ नामक उपन्यास के लेखक ‘श्यामल बिहारी महतो ‘ कोयलांचल की जमीन से गहरे रूप से जुड़े हैं। बोकारो झारखंड के ग्रामीण इलाके में जन्में कथाकार ने कोइलवरी की माफियागिरी, खादान मजदूरों के शोषण  और अधिकारियों के भ्रष्टाचार को अत्यंत ही करीब से देखा समझा है। कोयलांचल के राजनीतिज्ञों और भ्रष्ट अधिकारियों के गठजोड़ के बीच पीेसते गरीब की कहानी पढ़े  – कृष्णा सोनी की विशेष टिप्पणी के साथ। – संपादक

श्यामल बिहारी महतो की कहानी ‘कमाउ दंगल’ भारतीय समाज के एक स्याह तस्वीर को पाठकों के सामने प्रस्तुत करता है| हमारे देश का नौकरशाह समाज कितना भ्रष्ट और अनैतिक है यह इस कहानी का मूल प्रतिपाद्य है| कमीशनखोरी ने पुरी व्यवस्था को सडा दिया है| इस भ्रष्ट अधिकारीयों को राजनीतिक समर्थन भी प्राप्त है| इन सब के बीच गरीब और कमजोर लोग रोज मर रहा है| इस सिस्टम में अगर कोई ईमानदारी से रहना और काम करना भी चाहे तो व्यवस्था उसे स्वीकार नहीं करती| क्योंकि व्यवस्था को चलाने वाला स्वयं भ्रष्ट और चरित्रहीन है| समृद्ध और दबंग लोग हमेशा ही गरीबों के जीवन और इज्जत दोनों डे खेलते रहे हैं जिसका चित्रण एक बार फिर से इस कहानी में किया गया है और इससे उपजे आक्रोश को फिर से रोजी-रोटी से जोड़ दिया गया है| कहानी का शिल्प और कहन कि शैली बहुत प्रभावशाली नहीं है| भाषा कहीं कहीं भावों की अभिव्यक्ति में कमजोर पर गई है|-  कृष्णा सोनी

 

 

 कहानी

                                  कमाउ दंगल

                               श्यामल बिहारी महतो

ऐसे समय में जब बलालू दंगल के सरदार दूधराज सिंह का मन क्रोद्ध से कुलबुला रहा था और गोल्डेन मार काम से सेवानिवृत्ति लेने का पक्का मन बना लिया था। तब एरिया महाप्रबंधक के रूप में डहरवाल साहब का आना सारे झंझटों से छुटकारे की तरह ही था।

पिछले दो सालों से दूधराज सिंह काफी तनाव के साथ काम कर रहा था। बडे अफसरों का दबाव उसपर साफ तौर पर देखा जा रहा था। उन अफसरों के बंगले में काम करने के लिए मलकटे और कामिनों को भेजने का दबाव वह झेल नहीं पा रहा था। फिसलती उम्र और दौड़ के कारण उत्पन सुगर-डाईबिटिज और ब्लड प्रेसर जैसे बीमारियों का मुकाबला वह दवाओं के जोर पर कर रहा था।

इसी तरह जूझते हुए वह एक दिन पहुंचा था मुटरा बाबू के शरण में। बुरी तरह हांफ रहा था। उसके चेहरे का भाव त्राहिमाम वाला था। वेलोर की डाॅक्टरी भाषा में उनसे आराम और टेंशन मुक्त रह काम करने की सलाह दी गयी थी ’’ लेकिन टेंशन था कि उसका पीछा नहीं छोड रही थी। जीवन जाने का डर उसे और डराने लगा था।

मुटरा बाबू के बारे में कहा जाता है कि वह कभी किसी गलत काम पर समझौता नहीं करते। वह दो ही बातों के साथ जीते है। गलत का साथ नहीं और सच्चाई से पीछे नहीं। कोलियरी के मजदूर ही उनकी बडी ताकत हैं। एक मामूली कर्मचारी बन बीस साल कंपनी सेवा में गुजार दिये। कभी कोई लाभ का पद न मांगा न स्वीकार किये। पर मजदूर हित में वह किसी भी हद तक जा सकते है। यह प्रबंधन को मालूम था इस कारण भी प्रबंधन इनसे बेहद डरती थी।
’’मुझे इस दंगल की दलदल से मुक्ति दिलाइए।” ’’बैठते हुए उसने कहा था -’’ मै बलालू दंगल का सरदार नहीं। जैसे कोई भडूआ हूँ -भडूआ। बहुत थक चुका सरदारी की इस भागम-भाग से।’’ वह फिर हांफने लगा था।

’’क्या सचमुच आप ऐसा कर सकेगें। हमने पहले भी ऐसा कई बार सुन चुके है ?’’ मुटरा बाबू ने पूछा था।

’’लगता है आपका भी भरोसा मैने खो लिया है।’’ रूक कर उसने कहा। फिर खांसते कुकूर की तरह वह चला गया था। पांच साल पहले खदान की कोख से जन्मा इस बलालू दंगल का बनना कोलियरी के इतिहास में एक दिलचस्प घटना थी। उन दिनों खदान में काम और दाम को लेकर दंगल सरदारों के साथ मलकटों का बडा हिल-हुजत चल रही थी। सरकारीकरण के दौरान जो मलकटे जवान थे वो या तो बूढे हो चले थे या फिर दारू ने उन्हे अंदर से खोखला कर डाला था। फिर भी वे दवा और दारू के बल पर काम पर टिके रहना चाहते थे। लेकिन सरदार उनसे पूरा पूरा काम चाहता था। नतीजा जो काम नहीं कर पाता उनका पैसा काट लिया जाता था। जिस चलते सरदार और वर्कर के बीच अक्सर विवाद बढ जाता जो कभी कभी मार-पीट का रूप भी ले लेता था। परिणाम वैसे मलकटों को दंगल से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता।

बहुत दिन नहीं बीता और पन्द्रह दंगल से करीब पैंतालिस मलकटे बेकाम बैठ गय। अब वे सब हाजरी बनाते और हाजरी घर के बाहर ही गमछा बिछाकर ताश फेटना शुरू कर देते। वहीं औरतें अपनी चिर परिचित आदत ढील-लिख कुटना चालू कर देती। भूल से कोई अधिकारी इस पर कोई बात बोल पडता तो सारे के सारे बेकाम वाले काम की बात ले उन पर ही चढ दौडते-’’ काम दो न , ….।’’ अधिकरी भाग खडे होते थ।

तभी पीओ के रूप में डहरवाल साहब का इस कोलियरी में आगमन हुआ था। इमानदार और उसूल के पक्के। साफ और सुलझे विचार के धनी। एक दिन हाजरी घर के सामने उन्ही बेकाम मलकटों से उनका सामना हुआ। खडे होकर उन्होने सभी की बातें सुनी। बोले -’’ चिन्ता की कोई बात नहीं। मै आ गया हूँ न । सब ठीक कर दूंगा।’’ इसके साथ ही उनकी जिप्सी गाडी फूर्र से आगे बढ गयी थी। अभी वे खदान के हाॅल रोड में प्रवेश किये ही थे कि संकीर्णता के साथ रोड के तीखे मोड और गढों ने डहरवाल साहब को बुरी तरह डरा दिया था। कहीं भी। कभी भी। कोई भी घटना घट सकती थी। उस दिन देर रात तक कई बातों को लेकर जूझते रहे।

सुबह प्रथम पाली शुरू होने के पहले वह हाजरी घर के बाहर खडे पाये गये। घोर आश्चर्य के साथ मजदूरों के बीच काना-फूसी शुरू हो गयी थी -’’लगता है, हाजरी चेक करने आये है। लोग कह रहे है, बडा टाइट पीओ है। ’’

’’ छोड न यार , पहले हाजरी बाबूओं को तो ’’टाइट ’’ कर लें।’’

इसी बीच वे पैंतालीस मजदूर भी आ गये थे जो बेकाम बैठे रहते थे। डहरवाल साहब ने उनसे कहा -’’देख रहे हो सामने रोड पर कैसे कैसे गढे बन आये है। चलो उठो , सब मिलकर इसे भरो। आज से यही काम तुम सबको हर दिन करना है। हाजरी भी तुम सबों का अलग बनेगा। हाजरी बाबू भी अलग होगा – ठीक ’’

कुछ ने इस पर इतराज किये पर अधिकांश ने इसे सहज रूप से करने को तैयार हो गये थे।

अब समस्या थी इन सबों से हर दिन ऐसे काम कौन करा सकेगा ? पैंतालीस मलकटे – पैंतालीस भेड़ -भेडियों की तरह ही थे । जिन्हे कोई काबिल गडेरिया ही इनसे काम ले सकता था। बस में रख सकता था।

खान प्रबंधक दूबे साहब ने एक दिन दूधराज सिंह का नाम डहरवाल साहब के सामने रख दिया। दूबे साहब को चमचे पालने का बडा शौक था। ऐसा उनके बारे में लोग कहा करते थे।मुंशी दूधराज सिंह को जब यह बात मालूम हुई तो वह गिरता-पडता पहुंचा था डहरवाल साहब के पास। बोला-’’ सर मै यह काम कर सकूंगा- ऐसा मुझे नहीं लगता है। इसका आइडिया नहीं है मुझे। ’’

’’ दुनिया में आदमी के लिए कोई काम कठिन अथवा मुश्किल नहीं होता। उस काम को करने वाले की सोच उसे कठिन या सरल बना देता है।’’ डहरवाल साहब ने दूधराज को डहर दिखाने की तरह बोला था-’’ गिरने से डरो मत पहले खडा होने को सीखो , तुम यह काम कर सकोगे ,इसका मुझे विश्वास है। बस कभी गलत काम नहीं करना। कभी झूठ हमसे बोलना मत। बाकी हम सब देख लेगें- ठीक। ’’ और इस तरह बलालू दंगल सरदार के रूप में उस दिन दूधराज सिंह पर मुहर लग गयी थी।

इसके पहले हाॅलरोड-मेनरोड की गडढों के भरायी और बुस कंटिंग के नाम पर कंपनी के जो लाखों रूपये सलाना बहुरूपये ठेकेदार गड़प कर जाते थे। डहरवाल साहब के आगमन के साथ ही इस लूट पर विराम लग गया था। अब यह सारे काम दूधराज सिंह के बलालू दंगल के जिम्मे आ गया था।

अपनी भात पर लात पड़ते देख तथार्किथत वैसे ठेकेदार जो बिना काम किये घूस के बल ’’बिल ’’ निकाल लेते थे एक दम से बौखला गये थे। अब यह सब ’’काम ’’ उन्हें मिलेगा नहीं से उनमें खिसियाहट भर गया था।

खतरे की घंटी सिर्फ ऐसे ठेकेदारों के लिए ही नहीं बजी थी बल्कि दारूवालों ,सूदवालों और राशनवालों के मन में भी खलबली शुुरू हो गयी थी। कहीं से उन्हें यह भनक लगी थी कि मजदूरों को मिलने वाला मासिक वेतन अब कोलियरी में न मिलकर बैंक से मिलेगा। यह एक ऐसी खबर थी। जिसके बाद कोलियरी में गरम भाप का निकलना स्वाभाविक था। कहूॅं तो बैंक से वेतन भुगतान वाली बात ने कोलियरी में भेष बदलकर मजदूरों को लूटनेवालों की आंखों की नींद उडा दी थी। सूद के नाम पर लाखों कमाने वाले सूदखोर, दारू पिलाकर महीना भर की कमाई छिन लेने वाले दारूवाले और पांच का पन्द्रह बनाकर लूटने में माहिर राशन वाले की चूल्हें तक हिल गयी थी । तब – मृत जानवर देख जमीन पर उतरने वाले गिद्धों की तरह ही ये सारे गिद्ध मिलकर एक साथ दौड पडे थे मजदूरों के बीच उन्हें उल्टी-सिद्धि पटटी पढाने।

हांलाकि बैंक से भुगतान संबधित सूचना आनी अभी बाकी थी, उसके पहले डेढ-दो दर्जन मजदूरों के अंगुठा लगा एक दरखास्त डहरवाल साहब को मिल गया। लिखा था-’’ बैंक से वेतन हम नहीं लेगें। हमारी तनख्वाह का भुगतान कोलियरी से ही किया जाये।’ इनमे से अधिकांश मजदूर दूधराज सिंह के बलालू दंगल के थे। बैंक में तनख्वाह न जाने पाये इसके लिए दलालों का एक दल कोलियरी में सक्रिय हो उठा था। एक दिन रास्ते पे मुटरा बाबू की मोटरसाईकिल रोक दी गयी। दो चार मजदूरों के साथ एक दारूवाला आगे आकर बोलने लगा -’’ हम सबको पता है बैंक में तनखवाह भेजवाने के पीछे आपका भी सपोट है। इनलोगों का तनख्वाह बैंक में नहीं जाना चाहिए-यही हम कहने आये है।’’

’’ यह तुम्हारा आदेश है या धमकी..?’’ मुटरा बाबू मुस्कुरा रहे थे।

’’ जो समझे। हमे कहना था-कह दिया बसकृा’इसके साथ ही वे आगे से हट गये थे।

अगले ही दिन डहरवाल साहब की जिप्सी पर उस वक्त पथराव कर दिया गया जब वे साइडींग में क्रसर चालू कर आॅफिस लौट रहे थे। बाद में पता चला सूद का धंधा करने वाले साइडींग के ही कुछ लोग थे। मतलब बैंक वाली बात ने सभी धंधेबाजों को बौखला कर रख दिया था।

बात शुरू हुई थी। बलालू दंगल के सरदार दूधराज सिंह से। उस दिन वह हाॅलरोड की गढों के भरवाने काम कर रहा था। तभी खदान जा रहे खान प्रबंधक दूबे साहब ने उसे पास बुलाकर आहिस्ता से कहा -’’मेरे बंगले में काम करने वाला नौकर घर चला गया है। लौट आने तक एक मलकटा मेरे बंगले में कल से भेज देना। ’’ इसके साथ ही उनकी जीप आगे बढ गयी थी। दूधराज देर तक दूविधा मे पडा रहा। बार बार उसे डहरवाल साहब को दिये वचन याद आते रहे-’’ आपसे कभी कुछ नहीं छिपाउॅंगा साहब। न कुछ गलत करूंगा। ’’

सप्ताह दिन बाद फिर दूबे साहब सामने पड गयो फिर उसने कहा-’’ मै तो तुमसे अपने दंगल का मलकटा मांगा था। तुमने एक गंवार को भेज दिया। पैसा कौन देगा-तुम..?’’ तभी एक कामनि तरफ इशारा करते हुए दूबे साहब ने कहा था -’’ उसको भी कल से मेरे बंगले मे भेज देना। धोबिन बीमार पड गयी है। ’’

आज भी दूधराज की कोई भी बात सुने दूबे साहब आगे बढ गया था। और दूधराज एक बार फिर घोर दूबधिा में पड गया था। उबरने में वक्त लगा। लेकिन डहरवाल डगर से वह एक कदम भी डीगा नहीं। उसके हित में यह हुआ कि कुछ माह बाद ही दूबे साहब का दूसरे कोलियरी में तबादला हो गया था।

तभी वह सूचना निकली थी-’’ मजदूरों का मासिक वेतन का अब भूगतान बैंकं द्वारा किया जायेगा…..।’’

डहरवाल साहब के इस आदेश ने आग में घी डालने जैसा काम किया था। हवा वैसे ठेकेदारों ने भी दिया था जिनका काम और कमाई छिन गया था। परिणाम मजदूर दो वर्गो में बंट गये। एक वो जो अपना वेतन बैक से लेने को तैयार थे और दूसरा वे जो इसका विरोध कर रहे थ। नतीजा भी दूसरे दिन देखने को मिल गया जब आॅफिस गेट के सामने मजदूर आपस में ही भीड गये। और एक दूसरे पर झोडा-झोडी फेकने लगे। उसी दिन तीन बैकों के अधिकारी और कर्मचारी मजदूरों के खाता खोलने आॅफिस आ पहुंचे थ। आज मुटरा बाबू डहरवाल साहब के साथ खडे थे। और पहला खाता भी मुटरा बाबू के नाम ही खुला था। दूसरा दूधराज के नाम।

मुटरा बाबू ने साफ कहा था -’’ हम अपने मजदूर भाईयों को दारू और सूदवालों के हाथो लूटाने नहीं देगे।’’

जैसा कि एक समय सीमा के अन्दर अफसरों का जाना भी तय रहता है। चार साल बाद डहरवाल साहब का भी बदली हो गया। पर जब तक रहे नियम के साथ रहे और नियम के साथ चले। कोलियरी का वह पीओ थे तो मजदूरों के नेता भी वही थे। मजदूरों के वेतन और उनकी विसंगतियों पर उनकी पैनी नजर रहती वहीं कोयले का उत्पादन और उनकी गुणवता पर कभी कम्परमाइज नहीं करने वाले डहरवाल साहब के जाते ही कोलियरी में कौवों को पंख लग गये।

पीओ बनकर पी के पंढारी साहब का आना कोलियरी के लिए शुभ नहीं था। दारू और देह का शैकीन पंढारी साहब को कोयला उत्पादन में कम ही मन लगता था। और ठीकेदारों दोस्ती ज्यादा थी। खदान बहुत कम जाते और आॅफिस न के बराबर आते थे। बंगले को ही उसने अपना आॅफिस बना लिया था। लेकिन बंगला भी आॅफिस कम दारू अडडा ज्यादा लगता था। उन दिनों ठेकेदारो के मुंह से यह गाना खूब उडता था-’’एक बंगला बडा न्यारा..।

एक दिन पी.ओ. आॅफिस मे मुटरा बाबू ने ताला जड दिया और एक कागज पर लिख कर चिपका दिया -’’ कोलियरी का पीओ लापता है। ’’

पढारी साहब भागा भाागा मुटरा बाबू के पास पहुंचा फिर हांफता हुआ बोला -’’ मुटरा बाबू , आप इतना नाराज क्यों हो गये। आपके जो भी काम हों फाईल बना कर पियून के हाथो मेरे पास भेजवा दे। महीने भर का संडे-ओ.टी एक ही बार साइन करवा लें। परन्तु प्लीज आॅफिस में ताला न लगावें।’’ वह अब भी हांफ रहा था।