कहानी – स्नेह सुधा / कदम कदम मंजिल

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युवा कथाकार ‘स्नेह सुधा’ भारतीय भाषा केंद्र, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में पोस्ट डोक्टोरल फ़ेलो हैं। ‘प्रमुख हिंदी कवि और काव्य: रीतिकाल’ नामक पुस्तक की सहलेखिका हैं और ‘वक़्त – बेवक़्त’ कविता संग्रह की लेखिका भी । इन्होंने ‘परदे के पीछे की बेख़ौफ़ आवाज़ें’ और ‘शब्दों की अदालत’सरीखी पुस्तकों का सह संपादन भी किया है। इनके कई शोध पत्र और पुस्तक समीक्षाएँ प्रकाशित हुई हैं। इसके अलावे कहानियाँ भी लिखती है। इनकी कुछ कहानियाँ प्रकाशित भी हुई है। ‘क़दम क़दम मंजिल’ पढ़ी – लिखी वैसी युवती के संघर्ष की कहानी है जो हालात से समझौता करने के बजाये रोजगार का वैकल्पिक मार्ग तलाशती है। नई पीढ़ी को प्रेरणा प्रदान करती कहानी को पढ़े डॉ. ‘अनुराधा चन्देल ओस’ की विशेष टिप्पणी के साथ। – – संपादक 

मौजूदा समय में स्त्री लेखन अपने ,विचार विमर्श और गहराई, सामाजिक परिवर्तन , दृष्टिकोण, विचारधाराओं की पीठिका है, कहानी आज के परिप्रेक्ष्य को साकार करती है, युवा वर्ग किस हताश, निराशा, कुंठा, के साथ जी रहा है, हर कोई अगली पंक्ति में खड़ा होना चाहता है, जिसको पाने के लिए वह किसी भी हद तक जाने को तैयार है,
      ‘अवसरों को जब छीना जाता है
       कर्ण न बन जाऊं यह डर गहराता है।
सांची इसी बाजारवादी व्यवस्था में अपना अस्तित्व तलाशती है, सांची के पास प्रतिभा है, डिग्रियाँ भी है, लेकिन वह कई इंटरव्यू देने के बाद सफल नही हो पाती क्यों? इस क्यों का जवाब शायद उसे पता भी है, समाज मे वर्गवाद, जातिवाद, भाई- भतीजावाद हावी है, शीर्ष पर बैठे लोग इसका लाभ लेते हैं, प्रतिभा का मापदंड गलत है, उचित अवसरों का अभाव है, नौकरी पाने के लिए, तन और धन का भी सौदा होता है, उसे पता है, परंतु वह परिस्थितियों के आगे हार नही मानती, एक स्त्री घर से बाहर निकलती है अनेक कारणों से शिक्षा के लिए, रोजगार के लिए, समाज की निगाहें उसकी खामियों को ढूढ़ने में ज्यादा रहती है, समाज की इसी मनःस्थिति का चित्रण तथा अनेक ऐसे प्रश्न जो अनुत्तरित हैं, लेखिका ‘स्नेह सुधा ‘ने उठाया है, महिला को ऐसी परिस्थितियों में बिना विचलित  हुए स्वयं को मजबूत करना है,
“यह दुखद है धरा जो सम्बन्ध सृष्टि का आधार है, वह स्वार्थ पूर्ति के माध्यम बनता जा रहा है, हमारे यहाँ विवाह को संस्कार माना गया है, इसी तरह गर्भधारण भी “
“सही कहा सांची पर व्यवस्था की कोढ़ ने स्त्री पुरुष के दैहिक सम्बन्ध का स्वरूप ही बदल दिया है ” यह सच है कि युवा वर्ग नौकरी के पीछे भाग रहा है, स्वरोजगार की जगह , नौकरी की मृग-मरीचिका की लालसा में दौड़ लगा रहा है, सांची इसी युवा-वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है, समाज के सभी युवा इससे दो चार हैं, और अंत मे लेखिका ने इसका समाधान भी करवाया ,कोचिंग सेंटर खोल कर ,अध्यापन करने का मार्ग ढूँढ़ा। –  डॉ. अनुराधा चन्देल ओस

                                             क़दम क़दम मंज़िल
स्नेह सुधा

साँची ने सर्टिफिकेट की फ़ाइल और अपने प्रकाशनों को संभाला, इंटरव्यू बोर्ड के सभी सदस्यों को नमस्ते कर बाहर निकल आई। धरा अपने स्थान से उठी और साँची की ‘पूँजी’ को बैग में डालने में मदद करने लगी। सबकुछ सँभालने के बाद धरा ने साँची से पूछा-
“कैसा रहा इंटरव्यू?”
“ठीक ठाक।”
“यार, तुम्हारा ठीक ठाक होगा तो अच्छा किसका होगा?”
“जो मुझसे अधिक प्रतिभावान होगा। प्रतिभा भी अपना निहितार्थ रखती है धरा!(व्यंग्यपूर्ण मुस्कान के साथ) जो मेरे पास है नहीं।”
“क्या बकवास कर रही हो? इस बार तुम्हारी नियुक्ति को ब्रह्मा भी नहीं रोक सकते हैं।”
“पर शिव तो तांडव कर ही सकते हैं, और सब एक पल में समाप्त।”
“तुम भी न! चलो कुछ खा पी लें… । भूख से हालत ख़राब हुई जा रही है।”
“हाँ, चलो… अपने चक्कर में तुम्हें भूखी रखूँगी तो माँ (दोनों एक दूसरी की माँ को माँ और पापा को पापा ही संबोधित करती थीं-आपस की बातचीत में…) मुझे कभी न छोड़ेंगी। मार-मार कर भुरता बना देंगी मेरा।”
“क्यूँ ख़ामख़ा माँ को बदनाम करती हो? कब मारा है, तुम्हें?”
“मेरी प्यारी धरा! मारने के लिए हाथ उठाना ही ज़रूरी नहीं होता है।एक नज़र भी बहुत कुछ कमाल कर जाती है।”
“तुमसे पार पाना मुश्किल है।”
“सो तो है।”
“देख अपने मुँह मिया मिट्ठू न बन!कुछ सुना न मुझको… ।”
“क्या सुनेगी, बता!”
“राग मल्हार…”
“क्या!”
“तो पूछती क्यूँ है? तू कुछ काव्य पंक्तियाँ सुना सकती है, वही सुना।मैं वाह, वाह! कर सकती हूँ, वही करूँगी।”
“अभी नहीं यार! अंदर आग लगी है…कब से सुलग रही हूँ।”
“तो उसी तपिश को शब्दों में ढाल दे, मेरी जान!”
“ठीक है, सुनो…यह तब लिखा था जब एक बार मेरी तड़प की इंतहां हो गई थी-

“अवसरों को जब जब छीना जाता है।
कर्ण न बन जाऊँ, यह डर गहराता है।।
जब जब होता है अपमान जीवन पथ पर।
टूट कर बिखर जाते हैं सब अरमान।
आँखों से आग न बरसने पाता है।
कर्ण न बन जाऊँ, यह डर गहराता है।।
आत्मा भीतर ही भीतर छटपटाती है।
आत्मशक्ति बोझिल सा गीत सुनाती है।
जीवन ज्योति मद्धिम पड़ती जाती है।
कुछ अच्छा सुनने को कान तरस जो जाते हैं।
कर्ण न बन जाऊँ, यह डर गहराता है।।“
“शब्द नहीं हैं मेरे पास, इस अभिव्यक्ति के लिए।साँची तू शब्दों में रूह को उतार देती है। स्त्री पुरुष प्रेम से इतर भी आँखें नम करने के बहुत सारे विषय हैं तुम्हारे पास… ।”
“पोट ले पूरी तरह धरा। आज कोई मिला नहीं तुझे?मुझ बेरोज़गार का जितना मज़ाक उड़ा सकती है, उड़ा ले। आसमां पर चढ़ा दे फिर एकबारगे औंधें मुँह ज़मीन पर गिरा देना।”
“क्या अनाप सनाप बक रही है?”
“सही है…”
“और सुन, जिस दिन गिरने की बारी आएगी, धरा तुम्हें संभाल लेगी। दोस्ती निभानी आती है उसे…। मैंने कितनी बार कहा मेरे साथ शिफ्ट हो जा। कंपनी ने मुझे फ़्लैट दिया है, तेरा रूम रेंट बच जायेगा। पर, नहीं तेरा स्वाभिमान बस मुझे रुलाता रहेगा और तेरी भी परेशानी बढ़ती रहेगी।”
“जब कोई उपाय नहीं बचेगा तब आ जाऊँगी, धरा! तू मेरे लिए बहुत करती है, पर मैं नहीं चाहती कि ज़िंदगी के किसी मोड़ पर तुम्हें ‘अपने करने’ और ‘मेरे न कर पाने’ का अफ़सोस हो।”
“तू जानती है, ऐसा कभी न होगा।”
“मैं जानती हूँ, तू चाहकर ऐसा कुछ भी नहीं करेगी,पर ऐसा हो सकता है। मनुष्य हर काम सोच समझ कर ही करे- यह ज़रूरी नहीं होता।”
“क्या मतलब?”
“मतलब यह है धरा! कि पैसे का लेन देन या फिर इकतरफ़ा विनिमय रिश्ते में दरार ला देता है। जीने खाने का इंतज़ाम तो मैं कर लूँगी पर दोस्त कहाँ से लाऊँगी?”
“हमारी दोस्ती इतनी कमज़ोर नहीं है। कभी भी आज़मा कर देख लेना।”
“मुझे भी यक़ीन है हमारी दोस्ती पर। फिर भी आज़माना नहीं चाहती।”
“क्यों?”
“क्योंकि मुझे अपनी दोस्ती में कोई उथल पुथल नहीं चाहिए। ऐसे ही कम परीक्षाएँ हैं जो दोस्ती की परीक्षा भी लूँ?और…साँची ने अपनी बात पूरी भी नहीं थी कि धरा ने बीच में ही सिर पीट लिया- हे भगवान!”
“क्या हुआ पुत्री!” साँची ने मज़ाक किया।”
“तुम्हारी बकैती में घर पहुँच गए। अब खाना ऑर्डर करना पड़ेगा?”
“ओह, माय गॉड!”
“क्या हुआ?”
“मतलब मेरी धुलाई पक्की…। कार रुकी तो साँची ने दरवाज़ा खोला और नीचे उतर कर अचानक से धरा की तरफ़ का दरवाज़ा खोलने लगी। धरा के उतरते ही पूरे नाटकीय अंदाज़ में उसकी दोनों हथेलियाँ अपनी मुट्ठी में भींचते हुए लगभग विनती करती हुई सी कहने लगी- प्लीज़, प्लीज़ माँ से कुछ मत कहना।”
“हटो भी, धरा ने साँची को मुस्कुराते हुए बग़ल किया। फिर ख़ुद ही नाटकीय अंदाज़ में कहने लगी- ठीक है, नहीं कहूँगी, पर एक शर्त है।”
“मुझे तुम्हारी हर शर्त मंज़ूर है”- साँची ने धरा की बात बीच में ही काटते हुए कहा।
“शर्त यह है कि खाने पर खर्च मुझे करने दोगी और आज रात तुम यहीं रुकोगी।”
“इससे अच्छा क्या होगा?पेट भी भर जाये, पॉकेट भी ढीली न हो और तुम्हारा दिमाग़ चाटने को मिल जाये!”
“डराओ मत, साँची!”
“अब कुछ नहीं हो सकता, पृथ्वी माता! यह सब सोचना था तो साहित्य और साहित्यवालों से दूर रहना था। अब तो गई।”
“सही में बचने का कोई रास्ता नहीं है।”
“न, न…कोई भी नहीं।”
खाना आर्डर हुआ। खा-पीकर दोनों धम से बिस्तर पर पड़ गयीं। टी.वी. चलाया- 43इंच, फुल एच.डी. स्मार्ट टी.वी. । धरा को टी.वी. का शौक़ था। बेरासी हज़ार लगाकर उसने टी. वी. ख़रीदा था। सास बहू सीरियल वह तभी लगाती थी, जब साँची साथ होती । दोनों को ऐसे सीरियल में अलग ही आनंद आता था। दोनों सीरियल की पटकथा और पात्रों की बेमतलब की परेशानियों का मज़ाक उड़ाने में बहुत आनंदित होती थीं। अकेले में धरा सिनेमा, समाचार या ज्योग्राफी चैनेल देखती थी। दोनों ने बहुत देर तक सीरियल देखा, जब हँसते-हँसते पेट में दर्द हो गया तो टी.वी. बंद कर दोनों सो गयी।
सुबह तैयार होने के बाद दोनों ने साथ नाश्ता किया। घड़ी की सूई ने दस बजाया। रविवार के कारण धरा को ऑफ़िस नहीं जाना था। शाम में दोनों ने घूमने फिरने का कार्यक्रम बनाया। दोनों ने अपने थोड़े काम निपटाए और फिर अलसायी सी दोपहरी में बिस्तर पर लेट गयीं। बातों का सिलसिला शुरू करते हुए धरा ने साँची को टोका-
“साँची!”
“हाँ, बोलो।”
“उदास हो क्या?”
“हाँ, हूँ… ।”
“उदासी दूर करने का कोई उपाय?”
“फ़िलहाल नहीं… ।”
“ऐसा क्यों?”
“क्योंकि न व्यवस्था बदलने वाली है और न मैं?”
“क्या मतलब?”
“कुछ नहीं, जाने दो… ।”
“जाने कैसे दूँ साँची? दोस्त हूँ तुम्हारी। बोलो न, शायद हमारी बातचीत के बीच से कोई रास्ता निकल आए… ।”
“मुश्किल है।”
“एक कोशिश… ।”
“देखो धरा! इस व्यवस्था ने मुझे और मुझ जैसे कइयों को खोखला कर दिया है, बिलकुल खोखला।”
“ऐसा क्यों कह रही हो?”
“सच है धरा, जानती हो अगर प्रतिभा और योग्यता का सम्मान होता तो मुझे यक़ीन होता कि कभी न कभी मेरा भी नंबर आएगा, मेरे सपने साकार होंगे…लेकिन…”
“लेकिन क्या?”
“मेरे जैसों के सपने टूटने के लिए ही बने होते हैं। ऐसा नहीं है कि जिसका भी चयन होता है वह अयोग्य होता है। दिक़्क़त यह है कि चयन का आधार उनकी योग्यता नहीं होती। इसका आधार उस प्रत्याशी पर पड़ने वाली कृपादृष्टि होती है। विडम्बना यह है कि इसके साथ हर क्षेत्र में यौन इच्छाएँ अपना जाल फैलाती जा रही हैं। यौन इच्छाओं की पूर्ति किसी न किसी रूप में नौकरी पाने या पदोन्नति से जुड़ती जा रही है। कभी दबे-छिपे रूप में तो कभी… ।”
“तो तुम्हें क्या लगता है- शिक्षा का क्षेत्र भी इससे बचा नहीं है?”
“शायद नहीं… इसकी चपेट में सब आएँ हों, ऐसा नहीं है। ऐसे बहुत से शिक्षक, प्रशिक्षक, प्रोफ़ेसर या साहित्यकार हैं, जिनमें चाहे जो कमी हो- पर यौन इच्छाएँ नियंत्रण में हैं। क्षेत्रवाद,जातिवाद,परिवारवाद बहुतों की कमज़ोरी होती है, पर इस कमी से वे बचे रहते हैं।”
“तुम्हें पूरा यक़ीन है कि यह सब पुरुष मानसिकता का परिणाम है?”
“बहुत हद तक…। उच्च पद पर स्त्री के रहने पर ऐसे उदाहरण अपेक्षाकृत कम मिलते हैं। इसके पीछे समाज की यह धारणा है कि ‘ख़रबूज़ा चाकू पर गिरे या, चाकू ख़रबूज़े पर,कटता ख़रबूज़ा ही है’ अर्थात बदनामी हर हाल में स्त्री की होती है, लांछन उस पर ही लगता है। बहुत कम पुरुष ऐसे संबंध में अपनी हानि देखते हैं। उन्हें अपने दोनों हाथों में लड्डू नज़र आता है। पढ़े लिखे समाज में यौन संबंध अधिकतर सहमति से ही बनते हैं, भले बाद में दोनों में से कोई उस संबंध के ‘आधार’ से मुक़र जाये।”
“मतलब?”
“मतलब- नौकरी या पदोन्नति देने से मुक़र जाये…और फिर यह सहमति बलात संबंध का रूपाकार ले ले। इसलिए घर से बाहर की दुनिया में रखने के साथ ही एक लड़की को अपना आत्मबल बढ़ाना चाहिए और ग़लत से इनकार करने की ताक़त अपने अंदर पैदा करनी चाहिए। उसकी एक ग़लती पर तिल का तार बनाने वालों की कमी नहीं होगी, उसके आस-पास। कभी छोटी-मोटी ग़लती हो जाए तो तुरंत संभल जाना चाहिए। वह इंसान है, ग़लतियाँ कर सकती है, पर समाज उसकी ग़लतियों को गुनाह साबित करने कि पूरी कोशिश करेगा।”
“एक बात बताओ, साँची! क्या नैतिकता अनैतिकता का प्रश्न केवल शरीर से जुड़ा है?” शरीर की पवित्रता अपित्रता को कैसे व्याख्यायित करोगी?”
“देखो धरा! नैतिकता अनैतिकता को केवल शरीर से जोड़ना उचित नहीं है, पर पूरी तरह उसे नक़ारा भी नहीं जा सकता है। प्रेम संबंधों में शारीरिक संबंध की सीमा का निर्धारण करने का अधिकार प्रेमी युगल को है। विवाह पूर्व या विवाह के बाद संबंध के स्वरूप और उसकी सीमा का निर्धारण व्यक्ति विशेष की मान्यताओं पर निर्भर करता है। फिर भी मेरा मानना है कि हर रिश्ते की अपनी मर्यादा होती है, उसे निभाना चाहिए। रिश्ते की मर्यादा के अभाव में सामाजिक व्यवस्था बिगड़ जाएगी। स्त्री पुरुष में शारीरिक संबंध से परे जो रिश्ते होते या बनते हैं, उनमें स्नेह की मद्धिम आँच होती है। किसी भी काम को करने के लिए स्वतंत्रता की बात करते समय हमें यह याद रखना चाहिए कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता वहीं समाप्त हो जाती है, जहाँ से दूसरे की शुरू होती है। इसका मतलब साफ़ है कि कोई भी व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता या ख़ुशियों के लिए दूसरे की क़ुर्बानी नहीं दे सकता है।
“लेकिन तुम कौन होती हो यह निर्धारित करने वाली कि कहाँ यह संबंध उचित है,कहाँ अनुचित?”
“ठीक कहा मैं कोई भी नहीं होती हूँ। मैं समाज की नियामक नहीं हूँ। मेरी व्यक्तिगत मान्यता के अनुसार बहुत से रिश्तों में स्त्री पुरुष होना याद रखने के साथ यह भी याद रखना ज़रूरी है कि हम किस रिश्ते में बंधे हैं। उसके अनुसार सीमा निर्धारित करनी चाहिए। हाँ, पर यहाँ मैं विशेष रूप से व्यावसायिक संबंधों में शारीरिक संबंधों के घालमेल के बारे में कर रही हूँ। बहुत से रिश्ते ऐसे होते हैं,जिसके संबंध में लोगों की राय अलग अलग होती है।”
“किन रिश्तों की बात कर रही हो?”
“गुरु-शिष्या संबंध। मेरे अनुसार यहाँ स्नेह, आदर का स्थान होना चाहिए, शारीरिक संबंध का नहीं… । इसमें भी कुछ लोग उम्र को पैमाना मानते हैं। मसलन अगर उम्र में बहुत अंतर न हो और विवाह संभव हो तो वे शारीरिक संबंधों की मर्यादा का उल्लंघन करते हैं। जब तक यह प्रश्न किसी व्यक्ति विशेष के भावों से जुड़ा है, मैं उसे उसके व्यक्तिगत निर्णय पर छोड़ती हूँ। हाँ, जब यह संबंध दिल नहीं बल्कि दिमाग़ की उपज हो,तो समस्या होती है। ऐसे में समाज की व्यवस्था बाधित होती है। जब करियर बनाने के लिए ऐसे संबंध बनाये जाते हैं तो कइयों का वाजिब हक़ मारा जाता है। ज़ाहिर सी बात है कि सीमा का अतिक्रमण सबके वश की बात नहीं होती है।”
“पर, साँची! जैसे जो मेहनत करता है, उसे फल मिलता है, वैसे ही जो क़ुर्बानी देता है उसे…”
धरा की बात बीच में ही काटते हुए साँची ने कहा-“क़ुर्बानी अलग बात है, धरा! क़ुर्बानी तब है जब किसी की रक्षा में ऐसे संबंध को स्वीकार करना पड़े।”
“और वेश्या…?”
“उनके लिए क्षम्य ही नहीं, बल्कि सहानुभूतिपूर्ण है।”
“कभी कभी लगता है,तुम्हारी बातें मुझे पाग़ल बना देंगी।”
“ऐसा है तो मैं चुप हो जाती हूँ, धरा!”
“नहीं,साँची! तुम कहती रहो। मैं अपनी समझ जितना ग्रहण कर लूँगी।”
“तुम्हारी समझ मुझसे कम नहीं है धरा, बस उसका विषय क्षेत्र अलग है।”
“शायद…”
“शायद नहीं यक़ीनन…। तो हम कहाँ थे धरा?”
“वेश्या के संबंध में शारीरिक…”
“हाँ, याद आया…तो वेश्या की बात अलग है। अधिकांशतः यह उनका चयनित व्यवसाय नहीं होता है। लेकिन…”
“लेकिन क्या साँची?”
“कई बार लड़के और लड़कियाँ शारीरिक संबंध को सीढ़ी के रूप में इस्तेमाल करते हैं।”
“तो तुम्हें क्या लगता है साँची! अकादमिक जगत में सारा कूड़ा बस इसी कारण फैला हुआ है?”
“न…ऐसा नहीं है, बस ऐसे दबे-छिपे मामले अकादमिक जगत की गंदगी में खाद पानी का काम करते हैं। फिर भी यह एक अध्याय है…पर है, महत्वपूर्ण अध्याय… । अच्छा बाक़ी बातें फिर कभी…। चलो थोड़ा घूम आयें…।”
“ठीक है, चलो।”
“कहाँ चलना है? शॉपिंग करनी है?”
“ऐसा कोई ख़ास मन तो नहीं है।”
“तो चलो पार्क चलते हैं, मौसम बहुत सुहावना हो रहा है।”
“ठीक है चलो, पर मैं झूला भी झूलूँगी।”
“झूल लेना…बिलकुल नहीं बदली तुम?”-कहती हुई धरा हल्के हाथों से साँची को सिर पर छूती है।”
“क्यों बदलूँ, भला!”
“न बदलो, मेरी माँ!”हँसते हुए धरा ने साँची को गले लगा लिया।“
साँची और धरा पार्क पहुँचे। वहाँ कुछ बच्चे चहलक़दमी कर रहे थे। दोनों ने एक-दूसरे को देखा और इशारा समझ कर पल में बच्चों के संग बच्ची बन गयीं।आधे घंटे के बाद दोनों झूले की तरफ़ दौड़ पड़ी। उन्हें देखकर लग रहा था कि अचानक दोनों बचपने को जीने और महसूस करने लगी हैं। धरा झूले तक पहुँची और हाथ हिलाकर कहने लगी-“फ़र्स्ट…फ़र्स्ट…। साँची ने मुँह लटकाने का अभिनय करते हुए कहा-“हाय री मेरी क़िस्मत…यहाँ भी।”
धरा के चेहरे पर उदासी छा गयी। रोनी सूरत बनाते हुए कहा-“यह तो खेल है साँची… ।”
साँची ने धरा को गुदगुदाते हुए कहा- “तो मैं भी तो खेल ही रही हूँ और हँसते हुए झूले पर बैठ गयी।”
साँची ने धरा को लगभग ललकारते हुए कहा-“दम है तो मुझसे ऊँची पेंग लगाकर दिखाओ!”
“यह बात है”-कहते हुए साँची ने पूरा ज़ोर लगाया।
साँची तो दोस्ताना मुक़ाबले के लिए तैयार बैठी थी। इसलिए उसने क़रारा जवाब दिया। दोनों हँसती गाती और बीच बीच में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करते हुए झूलती रही।
पार्क से निकलते हुए उनकी नज़र अचानक झालमूढ़ी वाले पर पड़ी। दोनों ने झालमूढ़ी का भरपूर स्वाद लिया। थोड़ी दूर पर पार्किंग थी। वहाँ से निकल कर दोनों घर की और चल पड़ी।कार कुछ ही दूर चली थी कि साँची का फ़ोन बजा। धरा ने मज़ाक मिश्रित मुस्कराहट के साथ पूछा-“किसका?”
“अखिल”-साँची ने जवाब दिया।”
“बी.एफ.?”
“नहीं…एफ…”-तुमसे बाद में निपटती हूँ,पहले फ़ोन पर बात कर लूँ।“
साँची ने फ़ोन का रिसीव बटन दबाया-“हैलो…कैसे हो अखिल?”
“ठीक हूँ, तुम बताओ?”
“बेरोज़गारी में जितनी ठीक हो सकती हूँ,उतनी हूँ।”
“क्या हो गया है तुम्हें? नौकरी मिलेगी। निराश होने से क्या होता है? तुम्हें मैंने हमेशा ऊर्जावान देखा है, पर आजकल तुम निराशा की फैक्ट्री होती जा रही हो।”
“क्या कहा, तुमने?निराशा की फैक्ट्री? हा हा हा….तुम भी न अखिल, अच्छा बताओ फ़ोन क्यों किया था?”
“इंटरव्यू का परिणाम आ गया है।”
“मुझे बताने दो…रोहित और सुनीता…उपनाम याद नहीं।”
“तुम्हें कैसे पता?”
“इनका नाम सुना था। यही जानती थी कि इंटरव्यू इनके लिए ही हो रहा है। फिर भी मेरा इंटरव्यू अच्छा हुआ था, इसलिए कुछ उम्मीद सी बंध गयी थी।”
“तुम न पाग़ल हो, बिलकुल। सब कुछ जानते हुए उम्मीद… । अच्छा सुनो, तुम्हारा नाम वेटिंग 1 में है।”
“मैं प्रतीक्षारत ही रह जाऊँगी, हमेशा की तरह, है…न…!”
“95 प्रतिशत यही उम्मीद है,5 प्रतिशत है कि दोनों में से कोई ज्वाइन न करे, तो तुम्हें ज्वाइन करवा लें ।”
“चलो ख्याली पुलाव पकाते हैं। इसे बनाने में थोड़े से सपने और बहुत थोड़ा सा समय लगता है।”
“सही कहा, अच्छा अभी रखता हूँ। कभी कैम्पस आओ तो मिलते हैं। बाय…।”
“ठीक है, बाय… ।”
साँची मोबाइल को वापस अपने स्लिंग बैग में रखने लगी। इतने में धरा ने पूछा-“हाँ, तो मैडम, अब बताइए,कौन हैं ये साहबज़ादे?”
“अरे यार, सहपाठी है और दोस्त… ।”
“मुझे लगा…”
“यही तो समस्या है- तुम्हें लगता बहुत है। चुपचाप गाड़ी चलाओ।”
“ओके बाबा!”
घर पहुँच कर दोनों ने पैर हाथ धोए और धरा खाने की तैयारी में जुट गयी। साँची ने पूछा, “चाय पीओगी?”
“हाँ, बनाओ।”
“मैं…”
“पूछा तुमने है तो फिर कौन?”
“बड़ी हिम्मती हो…दुनिया की सबसे घटिया चाय पीना चाहती हो?”
“तुम घटिया चाय बनाती हो और मैं चाय बनाने में महा आलसी हूँ।”
“तो चाय,कैंसिल?”
“नहीं…चलो, साथ बनाते हैं।”
“चाय है या छप्पन भोग… दोनों मिलकर?”
“मतलब चाय और पकौड़े।”
“अजीब सी बात है…पकौड़े बना सकती हो, चाय नहीं?”
“क्या करोगी? सब लीला है…।” (दोनों हँसती हैं।)
थोड़ी देर में कढ़ाई और तेल गर्म होने पर धरा ने उसमें पकौड़े का मिश्रण डाला। प्याज़ की कचड़ी (पकौड़े) बनाना तय हुआ था तो बेसन में प्याज़, हल्दी, नमक और बारीक कटी हरी मिर्च मिलाकर धरा ने मिश्रण तैयार किया था।
साँची ने धरा को टोका-“तुमने पानी नहीं मिलाया था।”
धरा ने जवाब दिया, “ज़रूरत नहीं पड़ती, प्याज़ का रस पर्याप्त होता है।”
“चलो चाय भी तैयार है, मज़े करते हैं।” (साँची ने धरा को चलने का इशारा किया।)
दोनों सोफ़े पर बैठकर गरमा गरम कचड़ी और चाय का आनंद लेने लगीं। चाय की चुस्की लेते हुए धरा ने कहा-“सुबह हमारी बातें अधूरी रह गयी थीं।”
“बाप रे बाप!”
“क्या हुआ?”
“तुम्हारी हिम्मत अभी बची है?”
“बातचीत में हिम्मत?”
“हाँ, क्योंकि हमारी बातचीत का विषय हँसी- ठिठोली नहीं था।”
“हाँ, हिम्मत है…अब बताओगी?”
“कहाँ से शुरू करूँ?”
“यह बताओ साँची, कि क्या शोषण का आधार केवल शारीरिक है? क्या दैहिक इच्छाएँ इतनी प्रबल होती है?”
“देखो धरा! देह बहुत बड़ा खेल खेलती है। सिर्फ़ अकादमिक में ही नहीं, अन्य क्षेत्रों में भी। एक बार मुझे लॉ की एक लड़की मिली थी। उसने बताया कि उसके लॉ में भी यह गंदगी फैली है। इंटरन्शीप करने जाओ तो वरिष्ठ वक़ील अधिकतर काम प्रशिक्षु से करवाते हैं। प्रशिक्षु अगर लड़की हुई तो उसे ‘अतिरिक्त काम’ के ‘अतिरिक्त पैसे’ मिलते हैं। साथ ही जल्दी सफल होने का रास्ता भी।”
“अतिरिक्त काम?”
“जी…”
“नहीं…”
“हाँ…”
“ऐसा क्यों, साँची?”
“इस क्यों का क्या जवाब दूँ?कई लड़कियाँ भी तो देह के रास्ते सफलता के पायदान चढ़ना चाहती हैं।”
“सही कहा, मेरे ऑफ़िस में भी ऐसे ‘संबंध’ बनते हैं।”
“यह दुखद है धरा! जो संबंध सृष्टि का आधार है,वह स्वार्थपूर्ति का माध्यम बनता जा रहा है। हमारे यहाँ विवाह को संस्कार माना गया है। इसी तरह गर्भधारण को भी।”
“सही कहा, साँची!पर व्यवस्था की कोढ़ ने स्त्री पुरुष के दैहिक संबंध का स्वरूप ही बदल दिया है। आगे बढ़ने के लिए स्वेच्छा या स्वीकृति से और बदला लेना है तो बलात्कार।”
“अच्छा धरा! खाना पीना है या बातों से ही पेट भरना है?”
धरा ने समय देखा। बातों बातों में 10.30 P.M. बज चुके थे। धरा ने हँसते हुए कहा-“शुक्र है माँ का फ़ोन नहीं आया। नहीं तो अच्छी ख़ासी धुलाई हो जाती।”
साँची अपनी जगह से झटपट उठती है और तेज़ी से किचन की तरफ़ जाती है। वह वहीं से आवाज़ लगाती है- “धरा जल्दी आओ,खाना बना लें।”
धरा हँसते हुए बहुत धीमी आवाज़ में कहती है-“नौटंकी…।”
खाना पीना, बर्तन बासन के तामझाम समेटने के बाद दोनों बिस्तर पर आ गयी। धरा ने टोका- “साँची!”
“कुछ विकल्प पर ध्यान दो।”
“हाँ,सोचती हूँ। अब सो जाओ। और हाँ,कल मैं सुबह सुबह निकल जाऊँगी। अगले सप्ताहांत या अगले महीने आऊँगी।”
“ठीक है, जैसा तुम ठीक समझो।”
“गुडनाईट”
“गुडनाईट”
सुबह नहा धोकर, नाश्ता करके धरा ऑफ़िस के लिए निकलने लगी। साँची भी तैयार हो गयी, ताकि दोनों जहाँ तक संभव हो,साथ चल सके। घर पहुँचकर साँची कई दिनों तक विकल्प के बारे में सोचती रही। एक दिन उसने अपने कई दोस्तों को फ़ोन लगाया। कइयों से अधिकतम दो मिनट बात हुई तो कइयों से बातों का सिलसिला लंबा चला। साँची कुछ कुछ नोट करती जा रही थी। 15-20 दोस्तों से बातें करने के बाद साँची का मन थोड़ा स्थिर हुआ।पहले उसने सोचा था कि सारी योजना काग़ज़ से ज़मीन पर आ जाए,तब धरा से बात करेगी। फिर विचार बदल दिया। आख़िर धरा उसका हर क़दम पर साथ देती है, तो क़दम क़दम मंज़िल पर उसका भी हक़ बनता है। रात में उसने धरा को फ़ोन लगाया-“हैलो…”
“हाँ, बोल… ।”
“तुम्हारी मदद चाहिए थी।”
“ख़ुशनसीबी…इनायत… ।”
“तुम भी न! कुछ दोस्तों के साथ एक मीटिंग रखनी थी। तुम्हारे फ़्लैट पर ठीक रहेगा? मैं तो जहाँ रहती हूँ, तुम जानती ही हो…एक कमरे में…दो से तीन हो जाएँ तो कितना भरा भरा लगता है।”
“कारण गिनाने की ज़रूरत नहीं है। दिन तय कर बता देना। बस अपनी चाभी रख लेना।”
“ठीक है, बहन! कोई बात होगी तो फ़ोन करूँगी, वरना सिर्फ़ मैसेज कर दूँगी। ठीक है, न!”
“तू जानती है, सब ठीक है।”
“यार, तू इतनी अच्छी क्यों है? पिछले जन्म में मैंने ज़रूर कोई पुण्य किया होगा,जो तू मिली।”
“पग़ली, चल फ़ोन रख।बाय…और हाँ, अपना ख्याल रखना।”
“तू भी अपना ख्याल रखना।बाय… ।”
साँची थोड़ा अच्छा महसूस कर रही थी। उसे मंज़िल साफ़ साफ़ तो नहीं नज़र आ रही थी, पर हाँ, धुँधला धुँधला सा ही कुछ तो था। निर्धारित दिन साँची और उसके सभी दोस्त धरा के घर पहुँच गए। बातों का क्रम शुरू हो गया।
“यार बात तो तुम्हारी सही है, पर योजना पुख़्ता बनानी पड़ेगी।”- निशिता ने बात शुरू करते हुए कहा।
“इसीलिए तो तुम सब को यहाँ बुलाया है।”कहते हुए साँची ने बातों को दिशा दी।
तपन अब तक तो चुप बैठा था, पर चुप बैठना उसकी फ़ितरत में नहीं था। उसने कहा- “ठीक कहा साँची, अकेले सब कुछ संभव नहीं होता है।”
इस पर अखिल ने कहा – “अच्छा साँची, यह बताओ कोचिंग शुरू कहाँ करनी है? दिल्ली?”
साँची ने जवाब दिया- “नहीं, पटना?”
“और, अगर पटना पर सबका मन स्थिर न हो तो?” तपन ने फिर से अपनी सक्रिय भागीदारी दिखायी।
साँची ने हँसते हुए कहा,“कोचिंग की शाखा खोल लेंगे। शुरूआत पटना से करते हैं।”
निशिता कुछ देर से सबकी बातें सुन रही थी। अचानक ही कहा -“मुझे कोई एतराज़ नहीं। मैं तो बस मुक्त होना चाहती हूँ, अपनी पीड़ा से। पाँच साल प्रयोगशाला में बिताने के बाद भी पीएच.डी. लिख नहीं पायी। गाइड ने मेरा पूरा शोध अपने नाम छपवा लिया।”
निशिता की बात सुनकर तपन को गुस्सा आ गया। उसने कहा,“लेकिन ऐसा वो कर कैसे पाए?”
इस पर निशिता कब चुप बैठने वाली थी? उसने भी तेवर में ही कहा-“कैसे का क्या है, तपन? मैं जो कुछ करती थी, उनके निरीक्षण में। मुझे नहीं पता था कि उन्होंने मुझे ऐसा विषय दिलवाया था, जिस पर उनका रिसर्च निष्कर्ष तक नहीं पहुँच पा रहा था और वे पुस्तक लिखना चाह रहे थे।”
दृष्टि ने दुखी होते हुए कहा, “पर यह तो ग़लत है, बहुत ग़लत…।”
अखिल ने बात को फिर से विषय की ओर मोड़ते हुए कहा,“अच्छा साँची, कितने विषय रखेंगे हम?”
साँची ने बातों को समापन की तरफ़ ले जाते हुए कहा, “फ़िलहाल जितने हम रख सकते हैं-हिंदी, भूगोल, रसायन, राजनीति विज्ञान, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र और गणित। बाक़ी विषय ज़रूरत के हिसाब से और शिक्षक मिलने पर।”
समय पर उनकी कार्य योजना पूरी हुई पटना, बोरिंग रोड पर ‘नई दिशा’ नाम से सब ने मिलकर कोचिंग सेंटर खोला। पूँजी सब ने मिलकर लगाई थी। काम ठीक ठाक चल रहा था। एक दिन धरा ने साँची से पूछा-“अब क्या तुम यहीं रूक जाओगी? साक्षात्कार नहीं दोगी?”
“दूँगी धरा, कोशिश करती रहूँगी। इतना ज़रूर है कि अब बेचैन नहीं रहूँगी। पढ़ाने की इच्छा पूरी हो रही है। बहुत सुकून मिल रहा है। जीने की राह मिल रही है…।”
“हम्म्म… मतलब तुमने क़दम क़दम मंज़िल को पहचान लिया है।”
“ऐसा ही कुछ है…।”