अमृतलाल नागर पुरस्कार से पुरस्कृत ‘मदारीपुर जंक्शन’ की जियोमामी फिल्म फेस्टिवल में भी धूम

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वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित उपन्यास ‘ मदारीपुर जंक्शन ’ के संबंध में अशोक चक्रधर की टिप्पणी है – ‘अत्यंत पठनीय उपन्यास।’उपन्यासकार बालेन्दु द्विवेदी को ‘मदारीपुर जंक्शन’ के लिए उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान ने वर्ष 2017 का ‘अमृतलाल नागर’ पुरस्कार प्रदान करने का घोषणा की है। इस चर्चित कृति को प्रकाशक की ओर से ‘मामी फिल्म फेस्टिवल’में भी भेजा गया था। इस फेस्टिवल में रचनाकार बालेन्दु द्विवेदी ने स्वयं प्रजेंटेशन दिया। इस उपन्यास ने देश के 9 प्रोडक्शन हाउस का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया है। फिल्म जगत से जुड़े प्रोडक्शन हाउस ‘मदारीपुर जंक्शन’को सिलवर स्क्रीन पर उतारने में कितनी दिलचस्पी दिखाते हैं ? यह बात भविष्य के गर्भ में छुपी है। ‘मदारीपुर जंक्शन’ उपन्यास के संबंध में स्वयं लेखक की अभिव्यक्ति है कि – मदारीपुर कस्बा होते-होते रह गया। अर्थात कथा का कथानक न तो गांव है और ना ही कस्बा। वैसे हिन्दी साहित्य में यह कोई नई प्रवृत्ति नहीं है। फिर भी यह उपन्यास खासा सुर्खियों में है। आखिर ‘मदारीपुर जंक्शन’ क्यों सुर्खियों में है ? इससे रूबरू होने के लिये पढ़े उपन्यास का संक्षिप्त स्क्रीप्ट। इसी स्क्रिप्ट के आधार पर ‘मामी फिल्म फेस्टिवल’ में इस कृति का चयन हुआ है। – संपादक

                     मदारीपुर में पूरी-की-पूरी मदारी टीम है 

              मदारीपुर कोई सामान्य गाँव नहीं है बल्कि यहाँ पूरी-की-पूरी मदारी टीम है।यहां भाँति-भाँति के चरित्रों का जंक्शन है।मूल रूप से इस गाँव के केंद्र में ‘पट्टी’ है जहाँ ऊँची जाति के लोग रहते हैं। इस पट्टी के चारों ओर झोपड़पट्टियाँ हैं जिनमें तथाकथित निचली जातियों के पिछड़े लोग रहते हैं।मदारीपुर की पट्टी भी कई उप पट्टियों में बँटी है- अठन्नी,चवन्नी और भुरकुस आदि पट्टियों में। अठन्नी और चवन्नी वाले कभी एक साथ नहीं हो सकते थे,इसे लेकर गाँव में एक कहावत भी प्रचलित थी कि ‘यदि कभी ऐसा हो पाता कि दोनों पट्टियों के माँस को एक ही बर्तन में पकाया जाता तो स्वाभाविक विद्वेष के चलते,एक की हड्डी अपने-आप से ही छिटक कर बर्तन से बाहर गिर जाती..!’खैर..!यहां लोगों की आदत है हर अच्छे काम में एक दूसरे की टांग अड़ाना। लतखोर-मिजाजीऔर दैहिक शास्त्रार्थ में यहां के लोग पारंगत हैं।गांव है तो पास में ताल भी है जो जुआरियों का अड्डा है।पास ही मंदिर है जहां गांजा क्रांति के उदभावक पाए जाते हैं। एक बार इस मंदिर के पुजारी भालू बाबा की ढीली लंगोट व नंगई देख कर औरतों ने उनका पनही-औषधि से ऐसा उपचार किया कि फिर वे जीवन की मुख्य धारा में लौट नहीं पाए।
मदारीपुर जंक्शन के भी केंद्र में परधानी का चुनाव है। इस गांव में भूतपूर्व प्रधान छेदी बाबू,वर्तमान प्रधान रमई,परधानी का ख्वाब लिये बैरागी बाबू,उनकी सहायता में लगे वैद जी,दलित वोट काटने में छेदी बाबू द्वारा खड़ा किया गया चइता,केवटोली कें भगेलूराम,छेदी बाबू के भतीजे बिजई-सब अपनी अपनी जोड़-तोड़ में होते हैं।ऐसे वक्त गांव में जो रात-रात भर जगहर होती है, दुरभिसंधियां चलती हैं,तरह-तरह के मसल और कहावतें बांची जाती हैं वे पूरे गांव की सामाजिकी के छिन्न-भिन्न होते ताने-बाने के रेशे-रेशे उधेडती चलती हैं।कुछ भी नहीं छूटता परधानी और मुखिया के चुनाव में-जात हो,सुरा व भात हो या लात हो.कई बार ये चुनाव राजनीतिक न होकर व्यक्तिगत भी होते हैं.चुनाव जीतना इसलिए ज़रूरी नहीं समझा जाता की पद खुद को मिल जाये, वरन जीतना इस लिए जरूरी है की फलां को पद न मिले.
छेदी बाबू और बैरागी बाबू दोनों परधानी के चुनाव में प्रतिद्वंदी हैं.हालांकि दोनों काका-भतीजा के बीच कभी दांत-काटी दोस्ती का रिश्ता रहा है पर अब वे दोनों जानी-दुश्मन हैं.एक चवन्नी पट्टी से आते हैं तो दूसरे अठन्नी पट्टी के सबसे कद्दावर नेता हैं.छेदी बाबू चवन्नी पट्टी की शान हैं-गोरे-चिट्टे,लम्बी काया के मालिक,उम्र पचहत्तर के पार परन्तु गाँव के सबसे ‘बुजुर्ग नौज़वान’, स्वभाव से हँसोड़,गप्पें मारने में उस्ताद और ‘गपाष्टक पुराण’ के स्थानीय सम्पादक,बात-बात में गाली देने वाले-‘भोंसड़ी’ शब्द का इस्तेमाल ऐसे-जैसे बाक़ी ‘जैराम जी की’ के लिए किया करते हैं,ख़तरनाक़ इतने कि उन्हें देखकर बिल्ली भी अपना रास्ता बदल दे और डरपोंक इतने कि अगर बिल्ली रास्ता काट जाए तो तीन दिन तक घर से न निकलें.मग़र सब कुछ के बावजूद हर प्रकार की चिंता से दूर रहने वाले,हर ग़म को चुटकी में रखकर मसल देने वाले और सबसे बढ़कर स्त्री-सौंदर्य पर सब कुछ न्यौछावर कर देने वाले..!
बैरागी बाबू स्वभाव से धीर-गंभीर-अंतर्मुखी हैं;अपने उसूलों के बिलकुल पक्के हैं;जो ठान लेते हैं उसे किसी कीमत पर पूरा करके ही दम लेते हैं;विपरीत परिस्थितियों में भी अपना आपा नहीं खोते;सक्रिय राजनीति से निर्लिप्त रहते हुए भी ‘राजनीति के चाणक्य’ हैं;यारों-के-यार हैं;गाँव की सभी भौजाइयों के जन्मना देवर हैं;हृदय से कवि और ‘गाँव के एकमात्र सेक्सपीयर’ हैं.हालाँकि उनके पूरे व्यक्तित्व पर उनके भीतर का साहित्यकार बुरी तरह से छाया हुआ है.बताते हैं कि अपने कालेज के दिनों में उन्होंने अतिउत्साह में एक प्रसिद्ध हिंदी उपन्यास ‘आवारा मसीहा’ का अपने स्थानीय भाषा में ‘बरबाद लवंडा’ नाम से एक उत्कृष्ट अनुवाद भी कर डाला था.
बैरागी बाबू अठन्नी की राजनीतिक शक्ति है तो बैदजी अठन्नी की बौद्धिक शक्ति.दरअसल बैदजी का हाथ कई पीढ़ियों से जनता की नब्ज़ पर है.वे अपने पुरखों के अनुभव से यह बखूबी जानते है कि वे जिस माटी में पैदा हुए है वहाँ के बच्चे से लेकर बूढ़े तक का काम-भावना के प्रति अतिरिक्त लगाव है.इसकी चर्चा करते ही वहाँ के गूँगों की ज़बान भी हिलने लगती है और नितांत मूढ़,गँवार और लड़खड़ाकर बोलने वाले भी अचानक से साहित्यिक हो जाते है.यही नहीं,तमाम खटियापकड़ लोगों के शरीर तक में भी हरक़त पैदा होते देखा गया है और एकाध वाक़या तो ऐसा भी हुआ बताते हैं जब मुर्दे भी उठकर बैठ गए.इलाके के तमाम ऐसे रोगियों के लिए बैदजी अब उम्मीद की एकमात्र किरण है.अपने इस पेशे के अलावा बैदजी,बैरागी बाबू के लिए राजनीतिक माहौल बनाने का काम भी बखूबी करते है.
बहरहाल,छेदी और बैरागी-दोनों के अपने-अपने स्थायी दरबार भी हैं और दरबारी भी.छेदी बाबू के साथ उनके भतीजों की एक पूरी पूरी टीम काम करती है जिसे लोग ‘कमेटी’ के नाम से सम्बोधित करते हैं.उधर बैरागी बाबू के साथ ठिठोली करने के लिए,सम्राट अकबर के दरबारियों की भाँति नवरत्नों की एक टोली अक़्सर मौज़ूद रहा करती है -जिनमें मुख्यरूप से माथाकुँवर, नागेश्वर उर्फ़ नगई,सीरा काका, खब्बू पाड़े,गुरूघंटाल, भौकाली भाई,करैली गुरु,केला मिसिर और एक स्त्री सदस्या मन्नोरानी उर्फ़ मनरखनी आदि है.मन्नोरानी गाँव में ही एक चाय की दूकान चलाती है और सभी के आकर्षण का केंद्र हैं.सुबह-सुबह सारा गाँव उनकी दूकान की और इस कदर भागता चला जाता हैं मानों कशी में गंगा स्नान के लिए जा रहा हो..!इनके अलावा मिट्ठू भाई और बदलू सुक्कुल जैसे कुछ एक थाली के बैंगन भी हैं जो दोनों दरबारों में वक्त-बेवक्त जरूरत पड़ने पर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते रहते हैं.
छेदी बाबू और बैरागी बाबू के अलावा ‘मदारीपुर जंक्शन’ में एक तीसरी दुनिया भी है.यह दुनिया है पिछड़ों और शोषितों की,जिसमें धीरे-धीरे जागरूक हो रही हरिजन टोली और केवटोली है।चुनाव के वोटों के समीकरण से दलित वर्ग का चइता भी परधानी का ख्वाब देखता है और केवटली का भगेलू भी।मदारीपुर जंक्शन उपन्यास में एक चीज जो पाठकों को सबसे अधिक आकर्षित करती है,वह है-हरिजन बस्ती के युवक चइता के माध्यम से दलित चेतना का उभार।परधानी के चुनाव में वह भी चुनाव लड़ने के लिए खड़ा होता है।चइता को ब्राह्मण वर्ग के छेदी बाबू का सहयोग प्राप्त है।छेदी बाबू के भीतर दलितों के प्रति प्रेम नहीं उमड़ पड़ा है बल्कि वह वैरागी बाबू को नीचा दिखाने के लिए,उन्हें हारता हुआ देखने के लिए चइता को चुनाव मैदान खड़ा करते हैं।लेकिन मौका मिलते ही चइता ब्राह्मणवादी-सवर्णवादी व्यवस्था की धज्जियां उड़ाना शुरू करता है।वह निचले वर्ग के लोगों को जागने के लिए कहता है।उन्हें अपने ऊपर हो रहे अत्याचार के खिलाफ उठ खड़े होने के लिए कहता है।वह कहता है –
“अब किसी भी रूप में उनका जोर-जुलम-अत्ताचार सहन नहीं किया जाएगा।“ “…. तो हम संघर्ष करेंगे…अब हमें हर हाल में सट्टा (सत्ता) चाहिए।“दरअसल चइता को इस बात का आभास हो गया है कि अगर व्यवस्था बदलनी है तो सत्ता के शिखर तक पहुँचना ही होगा।लेकिन जो व्यवस्था सदियों से उन्हें गुलाम बनाकर रखती आई है वह इतनी आसानी से हार कैसे मान लेगी?परधानी के चुनाव के दौरान ही चइता की हत्या कर दी जाती है।चइता को छेदी के भतीजे ने मार डाला तो बेटे पर बदलू शुकुल की लडकी को भगाने के आरोप में भगेलू को नीचा देखना पड़ा ।चइता के शव को उसकी पत्नी जिस तरह से अंतिम विदाई देती है,वह वर्णन पाठकों के भीतर करूणा और वेदना की गहरी हूक पैदा करता है.एक बानगी देखिए – लगभग डेढ-दो घंटे तक मेघिया रुक-रुककर फावड़ा चलाती रही. अन्त में उसने फावड़ा एक ओर फेंका और चइता के शव को घसीटते हुए खोदे हुए गड्ढे में लाकर रख दिया. फिर वह गड्ढे में नीचे उतरकर उसके एक कोने में घुटने के बल बैठ गयी और चइता के साथ लिपटकर रोने लगी. इस बार मेघिया की आवाज़ में हृदय को कंपा देने वाली करूणा थी. थोड़ी देर तक यह सब चलता रहा.फिर मेघिया झटके से उठी और गड्ढे से बाहर निकाली गयी मिट्टी को कभी फावड़े से और कभी अपने हाथों की अंजुरी से चइता के शव के ऊपर उड़ेलने लगी मानो अब जाकर उसे अन्तिम रूप से विदा कर रही हो! चइता का शव ज्यों-ज्यों ढंकता जाता, मेघिया की आंखों से आंसू बहने की तीव्रता बढ़ती जाती थी…’ पर राह के रोड़े चइता व भगेलू के हट जाने पर भी,छेदी और बैरागी के लिए परधानी की राह इतनी आसान नहीं।हरिजन टोले के लोग चइता की औरत मेघिया को चुनाव में खड़ा कर देते हैं।दलित चेतना की आंच सुलगने नहीं बल्कि दहकने लगती है,जिसे पट्टी के लोग बुझाने की जुगत में रहते हैं।—और संयोग देखिये कि मेघिया दो वोट से चुनाव जीतकर परधान भी बन जाती है।पर चइता की मौत की ही तरह उसका अंत भी बहुत ही दारुण होता है।लिहाजा जब जीत की घोषणा सुन कर,वह अपने घर के पिछवाड़े में चइता की समाधि पर पहुंचती है तो वह वहीं सोई ही रह जाती है.इस प्रकार चुनाव जीत कर भी वह हरिजन टोले के सौभाग्य और स्वाभिमानी पीढ़ी को देखने के लिए जिन्दा नही रहती।नरेटर का बयान है – “मेघिया सो गई थी-हमेशा के लिए… चिरनिंद्रा में। वह इस षड्यंत्रकारी दुनिया से दूर एक ऐसी दुनिया में जा चुकी थी, जहाँ उसे और उसके ‘परान’ को परेशान करने वाला कोई न था।“ तो इस प्रकार उपन्यास का अंत दुखांत होता है।एक नजरिया तो यह कहता है कि नरेटर को दलित वर्ग के चइता के बाद मेघिया को नहीं मारना चाहिए था। मेघिया के परधान बनते ही इस उपन्यास का अंत कर देना चाहिए था। परन्तु यदि नरेटर यहीं कहानी का अंत कर देता तो लगता कि क्या निम्नवर्ग का संघर्ष इतना आसान था ? मेघिया के चिरनिंद्रा में चले जाने का अर्थ कदाचित यह भी है कि सत्ता के शिखर तक पहुंचने के लिए अभी और बलिदान करना होगा;अभी और जागरूक होना होगा ताकि अपने खिलाफ चली आ रहे षड्यंत्रों को समझा जा सके। इसलिए यह कहा जा सकता हैं कि यद्यपि ‘मदारीपुर-जंक्शन’ की कहानी एक प्रमुख किरदार मेघिया की मौत पर समाप्त होती हैं तथापि वह भारी नहीं लगती.इस सन्दर्भ में शेक्सपियर के tragic नाटक याद आते हैं जो मौत पर समाप्त होने के बावजूद ‘life goes on’ का ही सन्देश देते हैं।कुल मिलाकर मदारीपुर जंकशन वास्तव में एक पठनीय उपन्यास बन पड़ा है।