पुस्तक समीक्षा / साँझ की चौखट पर दीया जलाती कविताएं

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स्वतंत्र लेखिका ‘अनुराधा चंदेल ओस’ अपनी पहली काव्य कृति – ‘ओ रंगरेज’ में सौदर्यबोध, युगबोध और निसर्गबोध को लेकर पाठकों के बीच उपस्थित हुई हैं। हिन्दी काव्य संसार को इन्द्रधनुषी रंग में रंगने का प्रयास कर रही कवयित्री का मूल नाम ‘अनुराधा चौधरी’ है। हिन्दी साहित्य की छात्रा रही लेखिका ने ‘मुसलमान कृष्ण भक्त कवियों की प्रेम सौन्दर्य दृष्टि’  विषय पर शोध कार्य किया है। छात्र जीवन से लेखन कार्य में जुटी लेखिका कविता, कहानी और समीक्षा लिखती है। वागर्थ, आजकल, अहा ! जिन्दगी सहित दर्जन भर से अधिक पत्र- पत्रिकाओं में इनकी रचनाएं प्रकाशित हो चुकी हैं। विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ भागलपुर ने इन्हें डी लिट की मानद उपाधि प्रदान की है। कई साहित्यिक सांस्कृतिक संगठनों द्वारा सम्मानित कवयित्री की काव्य कृति ओ रंगरेज’ की समीक्षा पढ़े ‘अरविंद अवस्थी’ के शब्दों में। – संपादक 

              साँझ की  चौखट पर दीया जलाती कविताएं—
                              अरविंद अवस्थी
किसी ने कवि को किसान कहा तो किसी ने मनीषी परिभू:,स्वयंभू:किसी ने प्रजापति कह दिया -“कविरेव प्रजापतिः”सबके अपने -अपने दृष्टिकोण होंगे ,अपने -अपने तर्क होंगे और अपनी -अपनी आस्था होगी ।एक मराठी संत ने कवि को शब्द का ईश्वर कहा है।वरिष्ठ कवि एवम वागर्थ के पूर्व संपादक एकांत श्रीवास्तव ने अपने काव्य संग्रह’बीज से फूल तक’के पूर्व कथन में कहा है कि यदि कवि शब्दों का ईश्वर है तो यह ईश्वर राजसी वस्त्रों,सिंहासन और अपने मोर- मुकुट से वंचित दूसरे मनुष्यों की तरह एक साधारण मनुष्य है।समाज मे जो असाधारण है।और समाज मे जो साधारण है, कविता के संसार में वह असाधारण है।साधारण को असाधारण में परिवर्तित कर देना हो तो कविता की शक्ति और कवि की रचनाशीलता का सामर्थ्य है।
  इसी रचनाशीलता का सामर्थ्य लेकर कवयित्री अनुराधा चन्देल ‘ओस’साहित्य जगत में अपनी उपस्थिति दर्ज कराती हैं।अनुराधा चन्देल ‘ओस’का संभवतः पहला काव्य संग्रह ‘ओ रँगरेज’शशि प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है।इस संग्रह में कुल 6 खण्डों में 105 कविताएं हैं।मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि ये छः खण्ड छः ऋतुओं का संकेत देतें हैं अर्थात अलग-अलग मौसम की तरह परिवर्तन का अलग-अलग आस्वाद कराती हैं कविताओं के छः खण्ड 105 कविताओं का योग भी(अंको का योग)छः ही आता है।भले ही ऐसा संजोग से हुआ हो किंतु इस पुस्तक में संगृहीत कविताओं की नियति ही कुछ ऐसी ही है।
 कवयित्री ने अपने कविता संग्रह का शीर्षक’ओ रंगरेज’रखा है। इस संग्रह में पृष्ठ 53 पर ‘ओ रंगरेज’ और पृष्ठ 104 पर ‘रंगरेज’शीर्षक कविताएं हैं। ये दोनों कविताएं कवयित्री के सौंदर्यबोध ,युगबोध और निसर्गबोध का परिचय देतीं हैं।इनका उत्स वही ‘रंगरेज’है जो तितलियों के परों में रंग-बिरंगे विविध रंग
भरता है, आकाश को सतरंगी इंद्रधनुष से सुसज्जित कर देता है और पहाड़ों की चोटियों से मोतियों की बूंदें गिराता है।मोती की बूँद धरती पर आकर ‘ओस बन जाती है।कवयित्री ने अपना उपनाम भी तो ‘ओस ‘रखा है।ओस बनते ही उसमे प्रकृति के सारे रंग एक साथ समाहित हो जातें हैं।इन्ही रंगों में से किसी एक रंग भरने के लिए कवयित्री ओ रंगरेज! कहकर उस नियंता का आह्वान करती है।यहीं ‘रंगना’रंग जाना ही तो कवि की साधना होती है।यहीं से उसे संजीवनी मिलती है।यहीं से उसे संवेदना का स्पंदन प्राप्त होता है जो उसका अनुभव या जीवनानुभव बन जाता है।कवयित्री। अनुराधा ‘ओस’प्रेम -प्रकृति और लोक के साथ इसीलिए तो तादात्म्य स्थापित कर एकाकार होने की बात करती हैं—–
                   सुन ओ रंगरेज
                    अपने ही रंग में 
                   रंग दे मुझे
                   चाहे हो कोई भी रंग
                    नीला-पीला-हरा-बसन्ती
                   जैसे धरती को रंग दिया 
                     तूने अपने ही रंग में
                    वैसे मुझे भी रंग ले
                    अपने रंग में
                    प्रेम और प्रकृति के
                     एकाकार होने तक …..(पृष्ठ 53)
कवयित्री के मानस पटल पर इंद्रधनुषी रंगों की बिखरती आभा उसकी कविताओं में भी विविध रंग भर देती है।’ओस’की कविताओं में खदबदाहट है, कुलबुलाहट है और कहीं अकुलाहट भी है।उनकी कविताएं कभी उदास झोपड़ी में झांकती हैं तो कभी गली में।कभी किसी लाचार की विवशता पढ़ लेती हैं तो कभी खंडहरों में बस्ती न बस पाने की कशमकश
पहचान लेती हैं।यदि पसीने में भीगे नोट देखकर उआँ हांथो के श्रम का आकलन करतीं हैं तो कभी रात की बची रोटी की भूखी सुगन्ध महसूस करती हैं।जब’ क्या करूँ’जैसी लाचारी देखतीं हैं तो उम्मीदों का सूरज उगा लेतीं हैं।’एक स्त्री’पर तो उन्होंने एक खंड ही लिख डाला है, जिसमें पांचाली की पीड़ा से व्यथित अंतर्मन को ढांढस देते हुयेआधुनिक नारी के परिप्रेक्ष्य में फेसबुक चलाती लड़कियों की उंगलियों की तारीफ भी करतीं हैं और हरी बटन की ओट में बैठे खतरे से आगाह भी करतीं हैं।बदलते परिवेश में स्त्रियों को अपना अस्तित्व बचाते हुए अपने होने का अहसास जमाने को कराने का मंत्र भी फूंकती हैं।कविता के विशेषज्ञ और आलोचक कहतें हैं कि कविता का स्वभाव ‘कम बोलना’है।कविता बोलने से ज्यादा इशारा करती है।कविता में शब्द बिम्ब और संगीत परस्पर’पानी मे लौन ‘की तरह घुले -मिले रहतें हैं।प्रसिद्ध आलोचक डॉ रमाकांत शर्मा कहतें हैं—“शब्द और अर्थ की लय कविता को राग में रंगती है।एक मुक्कमल कविता एक साथ श्रव्य और दृश्य होती है।बिम्ब, प्रतीक,रूपक,ध्वनि,लक्षणा, व्यंजना और फैंटेसी कविता को श्रव्य -दृश्य बनातें हैं।कविता प्रकृति और जीवन के अन्तः सम्बन्ध को चित्रमयता के साथ प्रस्तुत करती है।”कवयित्री अनुराधा ‘ओस’की कविताओं में प्रकृति और जीवन के अंतस्सम्बन्ध को सजीव होते देखा जा सकता है।संग्रह की पहली कविता का शीर्षक है—‘कविता खदबदा रही है’।कवयित्री ने सामाजिक बदलाव में जिस विसंगति की ओर इशारा किया है—-
           ये वो समय है जब
           कविता खदबदा रही है
          चूल्हे की आंच पर रखी
           देगचियों में भात की तरह
         हवा-पानी,आसमान बदल रहें हैं
         लेकिन सबसे ज्यादा बदला कौन है
        मुक्त छंद सी बहती जिंदगी
          केसर की क्यारियों में 
         उगती बन्दूक की फसलें
        सूखती नदियां, भीगती बारिशें
       और हम
         प्यासी बस्तियां…..(19)
ऐसे समय मे किसी के मन मे खदबदाहट हो या न हो किंतु कवि का मन तो खदबदाएगा ही और उसी की खदबदाहट से जन्म लेती है कविता जो आमजन की पीड़ा को अभिव्यक्ति देती है।इस बदलाव की त्रासदी को कवयित्री ने संकेतों से उकेरने की कोशिश की है कि ऐसे समय मे जब सरकारें दलित,मजदूर,किसान,
श्रमिक और वंचित लोगों को कुछ देने की योजनाएं तैयार करती है, तब भी बस्तियां प्यासी रह जाती हैं।उनका लाभ पहले से अघाये लोग ही उठातें हैं।भीगती बारिशों ‘में अर्थ विस्तार के साथ बिम्ब विधान भी है।भीगती बारिशें उस वर्ग संकेत करतीं हैं जो साधन संपन्न है।वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना ने अपने काव्य संग्रह का नाम रखा है’समुद्र पर हो रही बारिश’. समुद्र पर बारिश का क्या लाभ?इस कविता में कवयित्री हवा
,पानी,आसमान से गुजरती हुई समाज और सामाजिक
जीवन की यात्रा करती है।यहीं है प्रकृति और जीवन का अन्तस्सम्बन्ध ।जब चौराहे पर विकास के गीत गाये जा रहें हैं, शिलान्यास और उद्घाटन के जश्न मनाए
जा रहें हैं।चंद्रमा पर जमीन खरीदी जा रही है, मंगल पर पानी ढूंढा जा रहा है।ऐसे समय मे उस ‘उदास झोपड़ी’को देखना कवयित्री नहीं भूलती जिसका दरवाजा ‘विकास’ने कभी नही खटखटाया।वह उदास झोपड़ी वर्षों से आधुनिक विकास का इंतंजार कर रही है—
            एक उदास झोपड़ी
             चौराहे के कोने पर खड़ी
            देख रही है चकाचौंध शहर की
             जो शायद वर्षों से 
            इंतजार कर रही है
             आधुनिक विकास का 
            जो कभी नही खटखटाता 
            दरवाजा उसका…..(20)
ऐसे लोग कभी सत्ता के विरोध में कुछ नही बोलते।उन्हें यथास्थिति में रहने की आदत पड़ जाती है।ऐसे लोगों के लिए ही दुष्यंत कुमार ने ही लिखा —–
    ‘न हो कमीज़ तो पाँवो से पेट ढंक लेंगे
   बहुत मुनासिब है ये लोग इस सफर के लिए”
कवयित्री भी लिखती हैं कि-लेकिन कोई मलाल नही /स्वयं को उपेक्षित/किये जाने का /उसे”(पृ 21)अनुराधा’ओस’सामाजिक विघटन से चिंतित हैं।यत्र-तत्र सर्वत्र होते जंगोजदल से बेचैन हैं।प्रेम के जिंदा जलाए जाने से संतप्त हैं, मासूमों तक पर बढ़ते जुल्म और अत्याचार से व्यथित हैं तभी तो लिखती हैं—-‘कविता लहूलुहान है आज-प्रेम के गीत विरह में डूबे/व्यथा की नदी का किनारा नहीं/क्यों तोड़े जा रहे अधखिले पुष्प /क्यो गाए जा रहे शोक गीत/उन होंठो से /जिनसे गाती थी लोरियां/कवयित्री अनुराधा’ओस’अज्ञेय की उआँ पंक्तियों से प्रभावित हैं
जिनमे वे सांप को सभ्य होने और नगर में बसने के बहाने विषैला होने की बात करतें हैं।कवयित्री भी आदमी के जहरीले होने पर प्रश्न करती है—‘कहाँ से भरा इतना विष आदमजात में आज/
स्त्री को वैसे दया, क्षमा ,करूणा की प्रतिमूर्ति कहा जाता है।वह समाज की पीड़ा को अपनी पीड़ा बना लेती है।कवयित्री में भी यह पीड़ा सहज देखी जा सकती है।वह जाड़े की रात में किसी को ठिठुरते हुए देखकर ,भूख से रोते हुए या चिथड़े बदन समेटे  हुए देखकर ग्लानि-दुख और पीड़ा में डूब जाती है।यहीं ‘डूबन’उसे अभिव्यक्ति के लिये झिंझोड़ कर रख देती है।’हूँ देखती ‘कविता में उसकी पीड़ा को पढा जा सकता है-
             मैने देखा है/लोगों को /मानवता शर्मशार करते हुए/इंसानियत की धज्जियां उड़ाते हुए/उस क्षण ग्लानि-पीड़ा दुख में डूब जाता है मन/दुख होता है स्वयं पर/( पृ 23)यहां मैं कवयित्री को जरूर कहना चाहूंगा कि कवि की कलम में तलवार की धार होती है।कवि कभी कमजोर ,अशक्त और लाचार नही होता।वह तो कविता के माध्यम से या यों कहें कि अक्षर शक्ति से क्रांति ला सकता है।उसे समाज को शक्तिशाली बनाने की जिम्मेदारी निभानी होती है।वह 
लाचार नही हो सकता ।इतनी भयावह स्थितियों के बावजूद कवयित्री गली में ‘लिटके’से आकृतियां बनाकर बेचने वाले कि जिजीविषा और उसके अंदर के मनुष्य की पहचान कर लेती हैं–
                 ,समाज से /महंगाई से/गृहस्थी की असंख्य पीड़ाओं से/फिर भी इतनी कड़वाहटों के बीच/कैसे निकल लेता है वह/इस गली के लिए/इन बच्चों के लिए/जीवन और संघर्ष एक दूसरे के पर्याय हैं।यहीं संघर्ष हमें जीवन जीवन के उतार चढ़ाव से परिचित कराता है।’ओस और काँटे’ओस सदा चुनती है/कांटों की नोक/अपने जीवन को आगे बढ़ाने के लिए/सधे हुए सन्तुलन के साथ/जैसे हर क्षण स्त्री जीती है समझौतों के साथ/कांटा अपना स्वभाव नही छोड़ता/ओस अपनी तरलता/( पृ 30)
डॉ अनुराधा ‘ओस’की कविताओं में कोरे आदर्शवाद का रसायन नही मिलता, वहां तो यथार्थ औऱ जीवनानुभव का अनुशासन है।भले ही उनका भोगा हुआ यथार्थ न हो वे उस बेबसी को चुनौती देती हैं—
             ‘सुनो!मुझे न समझना 
               अखबार की कतरन
               या टूटी हुई चाय की प्याली
               मैं सूरज की तपिश भी हूँ
यहीं आवाज ‘लहरों सुनो!कविता में भी मुखर होती है—–लहरों सुनो /तेरे विरूद्ध तैरना है मुझे/सागर के गर्भ छिपे/रत्न की तरह /उत्तर स्वयं के प्रश्न का /ढूढ़ना है मुझे/काशी में एक कबीर के विद्रोह की तरह/(85)
सच यही हैं कि कवि को कबीर बनना ही होता है।जब कबीर की वाणी का प्रस्फुटन होने लगे तो कवि और कविता दोनो सार्थकता को प्राप्त करतें हैं।’मांग लूंगी”जल्दी में सब”किला और नदी ‘ ‘चांदनी के फूल”आने वाले कल के लिए”सूरज को ‘ आदि कविताएं भी कवयित्री की।रचनाधर्मिता का दस्तावे है।
जैसा पहले ही कहा जा चुका है कि’ओस’की कविताओं में समाज और प्रकृति के साथ प्रेम का अतुलनीय सौंदर्य मिलकर संतुलन बनाता है—
         सागर में सीप की तरह/फूल में में सुगन्ध की तरह/तलाश ही लूंगी मैं/आकाश में सूर्य की तरह/दिलों में प्रेम की तरह /तलाश ही लूंगी मैं/(पृ 70) कवयित्री सुन्दर समाज को देखना चाहती हैं जहां कोई भूखा  न हो,जहां कोई उपेक्षित न हो जहाँ नफरत न हो,भाईचारा और चेहरों पर मुस्कान हो।कवयित्री ने अपने काव्य संग्रह में जिस रचनाक्षमता ,विचारसम्पन्नताऔर संवेदनशीलता का परिचय दिया है वह स्वागत योग्य है, कहीं -कहीं व्याकरणिक झंझावातों के चलते शब्दो के तिनके बिखर गयें हैं।हम पूरी उम्मीद है कि दूसरे संग्रह में कविताओं में अपेक्षित परिपक्वता और प्रौढ़ता के दर्शन होंगे ,मैं इनके विचार-वैभव की कामना करता हूँ।
समीक्षक का परिचय -कस्बाई शहर मिर्जापुर निवासी अरविंद अवस्थी  पेशे से अध्यापक हैं , पठन -पाठन के साथ -साथ साहित्यकर्म से भी जुड़े हैं ,  कुशल समीक्षक के रूप में भी जाने जाते हैं। 

 

 

समीक्ष्य कृति:ओ रंगरेज
कवयित्री:डॉ अनुराधा चन्देल’ओस’
प्रकाशक:शशि प्रकाशन,सहयोगी अंतिका प्रकाशन ग़ाज़ियाबाद
मूल्य.-350 रू.