शिखा सिंह की कविताएं / स्त्री तेरे कितने कैदखाने

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युवा कवयत्री ‘शिखा सिंह’ लेख-आलेख और कविताएँ लिखती है। दैनिक अखबार से लेकर साहित्यिक पत्र – पत्रिकाओं में इनकी रचनाएँ लगातार प्रकाशित हो रही हैं। इन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की है। घरेलू काम-काज के अलावे सामाजिक सरोकार से भी इनका गहरा जुड़ाव है। फिलवक्त इनका डेरा-बसेरा फतेहगढ़, फर्रूखाबाद उत्तर प्रदेश है। स्त्री प्रश्नों को उकेरती कवयित्री सवाल खड़ा करती हैं – ‘स्त्री तेरे कितने कैदखाने ‘ ? स्त्री मन को झकझोरती कविताएँ पढ़ें – ‘विरल पटेल ‘की समीक्षा के साथ। – संपादक

स्त्री सम्वेदना और प्रेम की धारा को अपनी विशिष्ट दृष्टि से देखने वाली शिखा सिंह की कविताएं स्त्री जीवन की हालिया सामाजिक परिस्थिति के खोखलेपन को उजागर करने वाली है। उनकी लेखनी उन सपनों देखती है जो संसार को प्रेमपथ पर बढ़ाने के साथ साथ प्रेम में पूर्ण समर्पण की भावना को स्वीकारती है।‘देह की ताकत’ कविता तो वाकई ताकतवर कविता है। स्त्री अस्तित्व की पहचान यह कविता स्त्री देह को देह की निर्मात्री और शक्तिस्वरूपा बताती है। कवयित्री शब्दों से स्वाभिमान को ललकारती हुई दिखती हैं। ‘कैदखाने’ कविता के प्रसंग को देखे तो स्त्री-पुरुष की समान रूप रेखा के बावजूद एक प्रश्न चिन्ह लगाते हुए पूछती है कि ‘स्त्री तेरे कितने कैदखाने’ कभी पति के नाम से किये श्रृंगार का कैदखाना है, तो कभी रिश्तों के जकड़न की कठोर बेड़ियां, तो कभी घूंघट की कैद । कवयित्री कहती है कि भले वह कैदखाने में है मगर सृष्टि चक्र को चलाने के लिए स्त्री हमेशा आजाद है वो ही है असली ताकत। कैदखाना तो महज पुरुष की सत्तान हड़पे जाने के डर से है जिसका कभी तुम्हें स्वार्थ ही नहीं तुम निः स्वार्थ हो।
बेहतरीन शब्दों का कलेवर सजाए ‘सपने’ कविता कवयित्री की श्रेष्ठतम उपलब्धि कही जा सकती है। हर एक शब्द-मोती को बखूबी तराश कर पिरोया है। स्त्री मन की सम्वेदना जो महज कभी न पूरा होनेवाला स्वप्न बनकर रह जाती है, को उकेरा है। जो हमेशा अपनों की कल्पनाओं को साकार करने में लगी रहती है, जिसके हाथ तालियां बजाने को उठते हैं तो दूसरे लोगों की खुशी पर इतना ही नहीं यह परोपकारी स्त्री मन स्वयं के सपनो का दाह कर खुद को पावन सोना बना देती है। कवयित्री ने शब्द को ईश्वर स्वरूप बताया है। शब्द-सृष्टि के बिना जीवन उस पानी के समान है जहां पेड़ उगाने को जमीन न हो, और जमीन हो तो वहां पानी न हो। शब्द प्रेम है, तो शब्द बर्बर भी है, शब्द आवारा है तो शब्द का अपना वजूद भी है। आधुनिकता के इस दौर में शब्द प्रेम रस का गान गुनगुनाना चाहते है। एक और हम अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे है शब्द भी वृद्ध लोगों के प्रति सत्कार, सम्मान व्यक्त करने को उतारू है वे चाहते है भावनाओं के सोते में बह जाना। मगर ये शब्द खो गए है दौड़ भाग भरी जिंदगी में कहीं। शिखा सिंह की कविताएँ सरल, सहज शब्द गुम्फन के साथ अपनी अभिव्यक्ति को सार्थकता प्रदान करने में सक्षम है।कुल मिलाकर कविताएं अपनी सार्थकता पहचान करवाने में सफल रही है। – डॉ विरल पटेल

    ‘स्त्री तेरे कितने कैद खाने ‘ ?
1. प्रेम
तुम कविता का शीर्ष बनों
मैं शब्द कोश का ढे़र बन जाती हूँ
तुम सपनों के पंख वनों
मैं शरीर बन जाती हूँ
चलो करे एक नयी चिनगारी का काम
इस दुनिया को कुछ महीन सी मोहब्बत सिख लाती हूँ

2. देह की ताकत

स्त्री एक देह मात्र आमंत्रण नहीं है
स्त्री एक पुरुष के बराबर की रूप रेखा है
जो एक स्त्री के ही द्वारा निर्मित होती है
एक ही वक्ष से दो पहलू साथ साथ बड़े होते हैं।
स्त्री देह को आगे रखते हुये
अपनी कमज़ोरियों को आमंत्रित करती है
उसको विरासत में मिली सीख
कमज़ोर बनाती है
शालीनता को पहले दर्जे़ पर रखती है
उसकी देह मात्र कमज़ोर सुखों का साधन बन जाता है
उस वक्त जब वहशी दरिंदे भूख में केवल
स्त्री देह को खाना चहाते हैं
फड़फडाती स्त्री चील बन सकती है
परन्तु गुम है स्त्री होने में
मै स्त्री हूँ क्या करती मर्द की ताकत के सामने
स्त्री यह नही जानती की उतनी ही ताकत है तुझमें
जब एक मर्द को जन्म देते वक्त थी
परोस मत अपने स्वाभिमान को
तेरा हक वजूद जिन्दा रहेगा हमेशा …….

3. कैद खाने
स्त्री तेरे कितने कैदखाने
माँथे पर बिंदी की कैद
नाक में बेशर की कैद
गले में हसली की कैद
हाथों में चूड़ी की कैद
सर से पांव तक तू कैद है
कैद है घूघट में मुखडे की कैद
बिन व्याही माँ है तो पिता के घर न लौटने को कैद
अगर तू प्रेमिका है तो समाज के जुल्मों में कैद
विधवा है तो दूसरे मर्द को न सोचने को कैद
स्त्री तू कितनी कैद है फिर भी तू आजाद है
तन तेरा पाँच मीटर के लम्बे लिहाफ में कैद है
आंचल तेरा दो गज बिलाऊज में कैद है
तेरी चाल चौखट के अन्दर कैद है
स्त्री तू फिर भी आजाद है
जिस के लिये तुझे कैद किया जाता है
वो है पुरुष
फिर भी तुझे पुरुष को दिया जाता है
तुम में वो शक्ति है
कैद के बाद भी देती है एक और जन्म
कैद को और शक्त करने के लिये
एक स्त्री और पुरुष को जन्म
जन्म देने को तुम आजाद हो
संसार की प्रगतिशीलता के गठबंधन के लिए
तुम आजाद हो
तुम कभी कैद नहीं हो सकती
स्त्री तुम हमेशा आजाद थी
आजाद हो आजाद रहोगी
हर बार जन्म देने के लिये
किताब पढ़ी जा सकती है
लिखी जा सकती है मगर फाडी़ नही जा सकती
हमेशा को खत्म करने के लिये
स्त्री तुम आज़ाद हो
अगर तुमको कैद किया है तो डर है
उस पितृ सत्ता को कहीं उसका हक तुम्हें न मिल जाये
लेकिन तुम्हें नही चाहिए
उनका हक क्योंकि तुम खुद आज़ाद हो
नयी विरासत के जन्म के लिये
सब तुम्हारा है बस डर उनका है
स्त्री तेरे हिस्से कितने कैद
फिर भी तुम आजाद हो

4. सपने
चूले की ताप से खुद को तपा रही थी
हीरा तो नही पर सोना खुद को बना रही थी
नया आकार हर किसी में देने को
जीवन से पहेलियां बुझा रही थी
कभी रिश्तों से कभी जरुरतों और हसरतो से
मुलाकात निभा रही थी
मंदिरों में पर्त बन चमक रही थी
समझ नही आरहा था।
कौन हूँ मैं क्यों इतना तड़प रही थी।
खुद को किस लिये तपा रही थी
मन चहा रहा था एक सुवह होगी मेरी
कल की लगी जंग झड़ जायेगी
और तपे हुए मन को निर्मल बना रही थी
कोरी सी ख्वाहिशे कितने रंग बना रही थी
चलती हुई जिन्दगी में
एक नया रोज पौधा उगा रही थी।
कही तो कोई तो समझ सकता मन
मन में सिर्फ कला बना रही थी।
भाँप तो लेते है मन बहुत से
पर जीवन के सफर में
हँसते हुये लोगों पर तालियाँ बजा रही थी
उनकी चाहत सिर्फ जरुरत थी
मन की ओखली में इतना ही कूट पा रही थी।
समझ नहीं आ रहा था
किस लिये खुद को तपा रही थी।
दीवारों की दरारें भरने की कला भी आजमा रही थी
खिड़कियों की सासों से हवा फिर भी आरही थी।
फूलदान में सजे फूल की तरह शोभा तो दे रही थी।
खशबू कहां उड़ गयी समझ नही पा रही थी।
रोशनदान की खिड़कियाँ बार बार खडकडा़ रही थी
कौन हूँ मैं चहाती क्या हूँ खुद ही समझ नही पा रही थी
एक अनसुलझी पहेलियाँ बुझा रही थी।
कल्पनाओं को और प्रगतिशील बना रही थी
पैरों में भी है उंगलियां फिर भी
कुछ उनसे खा क्यों नही पा रही थी
रिश्वत की बेडि़या साफ बता रही थी
उठ कर खुद चलो
जमीन को रौंदने का काम बता रही थी
उगंलिया सिर्फ रास्ता बता रही थी।
कितने कल होगे जिन्दगी के
बस यही उम्मीद लगा रही थी

5. शब्द जो विमुख है
शब्द जो विमुख है
अपनी पहचान बनाने को
शब्द जो तलाश कर रहे है
उस व्यक्ति को
जो उसका बालात्कार न करे
तैर रहे है सभी की
आँखों के सामने
पहचान कर रहे उन आँखों की
जिनमें जुनून हो सच का
घुस जाना चहाते है
उस रोशनी में
शब्द काटते है भावनाओं को देख कर
किस की झोली तलाशूँ
एक निर्मम हत्या होती है मेरी
कभी कानून के कटघरे में
कभी सड़कों की चौडाई पर
कभी घर की दहलीज पर
कितनी बर्बरता से
उधेड़ है मुझे वो प्रेम के रिश्ते
जो मुझे ढूँनने को तरसते थे कभी
क्या लिखूँ
अपने प्यार को सफर कराने के लिये
मैं भंवरों में भी गुनगुनाता था
मगर छोड छिप गये कहाँ मुझे
कितनी कूँकती थी कोयल मुझसे
भूल उस बगीचे को
सब भूल रहे है मुझे
बस बदला है तो इंसान
मुझे मुँह के साँचे में कैद कर रखा है खोलते है अपनी हैसियत के अनुसार
किसी पर भी उडेलते है
मेरी बिना सहमति के
मैं भी बूढा होता हूँ उम्र के लोगों तले
मगर मरता नही कभी
जन्में है मुझमें भी बच्चे पीढी दर पीढी
मेरा वजूद था हमेशा रहेगा
मैं हर की आवाज हूँ
मेरे बगैर अंधकार हो तुम सब
मत करो मुझे आवारा
बाँध लो मुझे अच्छा लगता है
मैं जब काटता हूँ
तिल तिल कर बिखेरते है सब
मै मर्ज भी हूँ मैं दवा भी
मै प्रेम भी हूँ और क्रोध भी
किस रूप में अपनाओगे तुम मुझे
मैं लालायत हूँ।
तुममें सिकुड़ जाने को
मै आवारा हूँ
कही भी बोलता हूँ किसी भी मुख से
मैं, मैं हूँ
मै ईश्वर भी हूँ, मैं प्रकृति भी हूँ
मैं ही दुनिया के कण-कण में हूँ
मैं आवाज हूँ मैं शब्द हूँ