लेख / डॉ. सूर्या ई. वी – भूमण्डलीकरण के दौर में अनुवाद की भूमिका

0
914

केरल के कण्णूर जिले के कल्याश्शेरी गाँव में जन्मीं लेखिका ‘डॉ. सूर्या ई. वी ‘अनुवाद प्रोद्योगिकी विभाग, इलाहाबाद केन्द्र, महात्मागांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक (अस्थाई) के पद पर कार्यरत हैं। हिंदी और मलयालम की कहानियों में स्त्री विमर्श (बीसवीं सदी के अंतिम दशक के विशेष संदर्भ में), अनुवाद समीक्षा, हिंदी-मलयालम स्वयं शिक्षक नामक पुस्तके  इनकी  प्रकाशित कृतियां  है।  अनुवाद और समीक्षा कार्य में इनकी गहरी रूचि है। इसके साथ ही साथ फणीश्वरनाथ रेणु डॉट कॉम के संपादकीय मंडल की सक्रिय सदस्य भी हैं।   
                             भूमण्‍डलीकरण के दौर में अनुवाद की भूमिका

                                            डॉ. सूर्या ई. वी

 विमर्श शब्द मूलत: गहन सोच विचार, विचार-विनिमय तथा चिंतन  मनन को सूचित करता है| साहित्य के क्षेत्र में विमर्श की अवधारणा आधुनिक काल की देन है| आज विमर्श के कई रूप – स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श, मीडिया विमर्श, सत्ता विमर्श, अल्पसंख्यक-विमर्श आदि अपनी भिन्न-भिन्न संकल्पना को लेकर हमारे समक्ष मौजूद हैं|  इस तरह जीवन से संबंधित किसी भी पक्ष व विषय पर विमर्श हो सकता है|  अत: कह सकते हैं कि विमर्श का स्वरूप व्यापक है|  लेकिन किसी भी विषय पर विमर्श तब उठ खड़ा होने लगता है जब उसका अस्तित्व खत्म होने की ओर उभरकर आता है या नहीं तो वह हाशिए पर होता है| ऐसे संदर्भ में हमारे समक्ष उस  हाशियेकृत पक्ष को  विमर्श के साथ जोड़कर देखने की एक पृष्ठभूमि तैयार होती है तांकि वह मुख्य धारा के साथ जुड़े और उस विषय पर  गहन सोच विचार विनिमय हों|  यहाँ पर सवाल अनुवाद के अस्तित्व को लेकर  खड़ा होता है| अनुवाद एक महत्वपूर्ण विधा होते हुए भी आज उसकी स्थिति क्या है?  शुरू से लेकर वर्तमान  समय तक अनूदित रचनाओं की कितनी अहमियत रही है और क्या अनुवाद एक विमर्श का विषय नहीं बन सकता है? इत्यादि बिंदुओं पर गौर करना आज की ज़रूरत है|

वैश्वीकरण के परिणामस्वरूप आज के युग की माँग की उपज ‘अनुवाद’ है। भारत एक बहुभाषिक एवं बहुसांस्कृतिक देश है जिसमें विश्व के लगभग सभी भाषाओं का विशेषतः अनुवाद की दृष्टि से बहुत योगदान रहा है।  हम अनुवाद के  माध्यम से विश्व की प्रत्येक भाषा के साहित्य,  उसकी भिन्न-भिन्न सामाजिक स्थितियाँ, आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक आदि विशेषताओं को समझ सकते हैं। केवल साहित्यिक क्षेत्र में ही नहीं बल्कि साहित्येतर क्षेत्र जैसे विज्ञान, गणित, सूचना प्रौद्योगिकी आदि क्षेत्रों में भी अनुवाद की भूमिका महत्वपूर्ण है। यहीं नहीं, संसार का समग्र ज्ञान पाने के लिए जीवन सीमित है और यह समग्र ज्ञान-विज्ञान किसी एक भाषा में समाहित नहीं है। ऐसी स्थिति में अनुवाद का अपना विशेष महत्व है| यदि तकष़ि शिवशंकर पिलै, जी. शंकर कुरूप, सआदत हसन मंटो, अमृता प्रीतम, महाश्वेता देवी, सुब्रह्मण्य भारती, टैगोर, कृशन चंदर, इस्मत चुगताई आदि  यशस्वी रचनाकारों की रचनाएँ अनुवाद के माध्यम से हम तक नहीं पहुँचती, तो भारतीय साहित्य सम्बन्धी हमारा ज्ञान कितना सीमित होता, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है| अनुवाद आज केवल साहित्य व कार्यालयी कामों तक ही सीमित नहीं बल्कि फिल्मों, गानों के ज़रिए भी अपना प्रभाव बहुत तेजी से फैला रहा है| लोग न केवल अन्य भाषा की फ़िल्मों को देखकर मनोरंजन प्राप्त करते हैं, साथ ही साथ कई नई चीजों का ज्ञान होता है और उन्हें समझने का मौका भी मिलता है| आजकल दक्षिण भारतीय व अन्य भाषाओं के फ़िल्म और सीरियल आदि का हिंदी में और हिंदी से इतर भाषाओं में और विदेशी फिल्मों को क्षेत्रीय भाषाओं में दिखाने का प्रयास किया जा रहा है| इसके ज़रिए अनुवाद विधा भी, लोगों के बीच प्रसिद्ध होती  जा रही है| अतः कुल मिलाकर यदि कहा  जाए, तो आधुनिक युग में अनुवाद राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के निर्वाह का एकमात्र साधन है। इसलिए भारत या विश्व के विकास में अनुवाद को महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता है।  

अनुवाद के बिना देश का विकास संभव नहीं है| लेकिन यहाँ पर सवाल यह है कि देश के विकास में अनुवाद एक महत्वपूर्ण विधा होने के बावजूद, आज भी दोयम दर्जे की स्थिति में क्यों है? अनुवाद के प्रति इस दोहरी मानसिकता को खत्म करना एक बहुत बड़ी चुनौती है| क्या अनुवाद को मौलिक कोटि में रखा जाए या नहीं, यह हमेशा से ही एक विवादास्पद विषय रहा है| जिस तरह हम मूल रचना को प्राथमिकता देते हैं उसी तरह अनूदित रचना को भी महत्व देना चाहिए| क्योंकि सृजन चाहे मूल रचना का हो या अनूदित रचना का, वह लोगों के ह्रदय में जगह बना लेता है| जिस तरह एक रचना अपनी भाषा में अद्वितीय है, उसी तरह, अनूदित रचना भी उसकी खुद की भाषा में एकस्मान है|  वह द्वितीय श्रेणी का लेखन नहीं, मूल के बराबर का ही उत्कृष्ट प्रयास है। अनुवादक को भी संवेदनशील रहते हुए मूल भाषा के भाव का संरक्षण करने के लिए सर्जनात्मक होना पड़ता है| जिस तरह लेखक अपनी सामाजिक, सांस्कृतिक, भौगोलिक तथा आर्थिक सूझ-बूझ के सहारे विचारों और भावनाओं को रचना के माध्यम से प्रस्तुत करता है, उसी तरह अनुवादक भी कथ्य को आत्मसात करता है, उसे अपनी चित्तवृत्तियों में उतारकर पुन: सृजित करने का प्रयास करता है । तभी वह रचना सफल अनुवाद हो सकती है|

यही नहीं, कभी-कभी अनूदित रचना मूल रचना की अपेक्षा अधिक लोकप्रिय हो जाती है| इस संदर्भ में बच्चन जी का विचार द्रष्टव्य है – “मैं, ‘अनुवाद को यदि मौलिक प्रेरणाओं से एकात्मक होकर किया गया हो’, मौलिक सृजन से कम महत्त्व नहीं देता। अनुभवी ही जानते हैं कि अनुवाद मौलिक सृजन से अधिक कितना कठिन-साध्य होता है। मूल कृति से रागात्मक सम्बन्ध जितना अधिक होगा, अनुवाद का प्रभाव उतना ही बढ़ जाएगा। वस्तुत: सफल अनुवादक वही है जो अपनी दृष्टि  भावों, कथ्य, आशय पर रखे। साहित्यानुवाद में शाब्दिक अनुवाद सुन्दर नहीं होता। एक भाषा का भाव या विचार जब अपने मूल भाषा-माध्यम को छोड़कर दूसरे भाषा-माध्यम से एकात्म होना चाहेगा तो उसे अपने अनुरूप शब्दराशि संजोने की छूट देनी ही होगी। यहीं पर अनुवादक की प्रतिभा काम करती है और अनुवाद मौलिक सृजन की कोटि में आ जाता है।” (साहित्यानुवाद, संवाद और संवेदना, पृ. 85)

कहने का तात्पर्य यह है कि श्रेष्ठ अनुवाद की महत्ता मूल से कम नहीं हैं| जैसे- “कालीदास रचित अभिज्ञान शाकुंतलम का विलियम जोन्स द्वारा अंग्रेजी अनुवाद का फिर से जर्मन भाषा में जोर्ज फोर्स्टर ने जो अनुवाद किया, उससे कालीदास की प्रतिष्ठा विश्व में अँग्रेज़ी अनुवाद से काफी बढ़ी|” इस तरह अनुवाद किसी भी रूप में दोयम दर्जे की चीज नहीं है| अनुवाद एक श्रमसाध्य और कठिन रचना-प्रक्रिया है। अत: कुल मिलाकर कहा जाए, तो हमें इस महत्वपूर्ण रचना विधा को ‘अनुवाद साहित्य’ व ‘अनूदित साहित्य’ का नाम देकर इसे मुख्य धारा में लाना होगा, जो अनुवाद के भविष्य के लिए अत्यावश्यक है| ‘जब तक अनुवाद मुख्यधारा के साथ नहीं जुड़ेगा तब तक साहित्य का भी पूर्ण विकास संभव नहीं होगा|’ क्योंकि अनुवाद आज भी हाशिए पर ही है, भले ही विज्ञान, तकनीकी, साहित्य, धर्म-दर्शन, अर्थशास्त्र आदि ज्ञान-विज्ञानों के विकास ने अनुवाद की आवश्यकता को बहुत अधिक बढ़ावा दिया है| इस संदर्भ में गौर करने की एक ओर बात यह भी है कि जिस तरह भारतीय साहित्य का इतिहास व प्रत्येक भाषा के साहित्य का इतिहास की किताबें हमारे समक्ष आज मौजूद हैं उसीतरह  भारत के अनूदित साहित्य का  इतिहास व प्रत्येक भाषा के अनुदित साहित्य का इतिहास की किताबें नहीं के बराबर हैं| इस तथ्य के आधार पर ‘अनुवाद विमर्श’ की ज़रूरत ओर भी सही स्थापित हो रही है|                  

अन्य विषयों की तुलना में अनुवाद को कम प्राथमिकता देना अनुवाद के समक्ष एक मुख्य चुनौती ही है| इसके दो कारण हो सकते हैं :-या तो जागरूकता की कमी, या रोजगार के अवसरों का अभाव| इस दयनीय स्थिति का आभास अनुवाद के अध्ययन करनेवाले विद्यार्थियों  पर पड़ता है| अनुवाद का अध्ययन करने वाले छात्र जब अनुवाद संबंधित किताबों की तलाश में शहर के जाने-माने प्रकाशन से संपर्क करते हैं, तब भी उन्हें किताबें नहीं मिलने की स्थिति दिखाई देती है| जब किताबें नहीं मिल रहीं तब जो अनुवादक बनना चाहते हैं वे अनुवाद के सैंद्धांतिक पक्ष को कैसे जानें या वह एक सफल या सक्षम अनुवादक कैसे बनें? क्योंकि बहुभाषिक देश भारत की  संस्कृति को एक सूत्र में साहित्य द्वारा पिरोए रखने का महान उत्तरदायित्व अनुवादकों का है|  इसलिए हमें अनुवाद कार्य को सुगम और सफल बनाने के लिए उसका मार्ग आसान करने या भारत में अच्छे अनुवादकों का निर्माण करने की व्यवस्था में सुधार  लाने की ज़रूरत है|  इसके लिए कुछ ऐसे भी प्रयास किये जाने चाहिए, जैसे कि अनुवाद के महत्व को ध्यान में रखते हुए भावी पीढ़ी में अनुवाद को लेकर एक जागरूकता लाने के उद्देश्य से अनुवाद का पठन-पाठन स्कूलों में शुरू किया जा सकता है| इसमें देश की प्रान्तीय/क्षेत्रीय भाषाओं सहित विदेशी भाषाओं को शामिल किया जाना उचित होगा, जिससे अनुवाद विधा का महत्व तो बढ़ेगा ही साथ-साथ राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर सांस्कृतिक संबंधों के साथ ही साथ रोज़गार के अवसर भी बढ़ेंगे। विश्वविद्यालयों में जहाँ अनुवाद का अध्ययन नहीं हो रहा है वहाँ पर भी इसे लागू किया जा सकता है  और  विश्वविद्यालयों व कॉलेजों में अनुवाद संबंधित हो रही कार्यशालाओं को अधिक समृद्ध किया जा सकता है| अनुवाद के साथ-साथ एक महत्वपूर्ण  बात यह भी है कि अन्य भाषा को सीखना| क्योंकि अनुवाद के महत्व को जानने या जागरूकता लाने मात्र से अनुवाद को हम मुख्यधारा में नहीं ला सकते हैं उसके लिए हमें दो अलग-अलग भाषाओं की जानकारी भी होनी चाहिए| यह तब संभव होगा जब हमारे स्कूलों के पाठ्यक्रम में अपनी मातृभाषा के अलावा अन्य दो–तीन भाषाओं को ऐच्छिक के रूप में भी रखा जाए, और बच्चे अनिवार्य रूप से अपने स्कूलों में, उनमें से एक भाषा ज़रूर सीखें और उसका अभ्यास करने का प्रयास  करें| साथ-साथ अनुवाद के प्रति बनाई गई दोयम मानसिकता व अनुवाद को मात्र मूल की कॉपी समझनेवालों को अपनी इस मानसिकता से मुक्त होकर अनुवाद के महत्व और विकास पर ध्यान देते हुए अनुवाद विधा के प्रति अपनी रूचि बढ़ानी चाहिए| 

दूसरी प्रमुख विडम्बना यह है कि इस क्षेत्र में अन्य क्षेत्र की अपेक्षा अभी तक रोज़गार के अवसर कम रहे हैं| अगर सरकारी संस्थाओं में अनुवादक का पद निकलता है, तो भी उस पद की संख्या एक-दो से ज्यादा नहीं हो सकती है| अगर निजी संस्थाओं की बात की जाए, तो वहाँ पर जितना काम करवाते हैं उतना पैसा नहीं देनेवाली स्थिति देखने को मिलती है| अत: जब तक इन स्थितियों में बदलाव नहीं आएगा तब तक अनुवाद विधा का विकास संभव होना तो दूर की बात है| लेकिन साथ-साथ यह भी एक महत्वपूर्ण बात है कि भूमंडलीकरण के इस दौर में पहले की अपेक्षा अनुवाद के  क्षेत्र में रोज़गार के कई अवसर आने  भी लगे हैं| अनुवाद में रुचि लेने से आप साहित्यिक हो या साहित्येतर हो या किसी भी विधाओं व विषय के हो, स्वतंत्र रूप से अनुवाद कर सकते हैं| यदि आप स्वतंत्र काम नहीं करना चाहते है, तो सरकारी और गैर सरकारी एजेंसियों, विश्वविद्यालयों, प्रशिक्षण केन्द्रों तथा बहुराष्ट्रीय कंपनियों में रोज़गार पा सकते हैं। मीडिया में अनुवाद का महत्व बढ़ा है। आजकल विदेशी और दक्षिण भारतीय फिल्मों की  हिंदी में या अन्य भारतीय भाषाओँ में खूब डबिंग हो रही है| इसके उपलक्ष्य में  फिल्म के क्षेत्र में भी अनुवादकों की जरूरत होती है| इस लिहाज़ में देखें तो अनुवादकों को पहले से ज्यादा और विविध क्षेत्रों में कई अवसर मिल रहे हैं।
इसके अलावा अनुवाद के क्षेत्र में काफी ऐसी विडंबनाएँ भी हैं जिनके कारण अनुवाद आज भी हाशिए पर ही है| यदि अनुवाद के संदर्भ में दक्षिण भारत की बात की जाए, तो वहाँ के हिंदी प्रेमी विशेष रूप से अनुवाद में अपनी रुचि रखते हुए दिखाई देते हैं| इसका मुख्य कारण वहाँ के  राज्य की बहु भाषिकता है| अर्थात वहाँ के हिंदी जाननेवाले अहिंदी भाषी, अपनी मातृभाषा के अलावा  हिंदी और अंग्रेज़ी भाषाओं से भी संपर्क रखते हैं और ये इन तीनों भाषाओं में परस्पर अनुवाद करते हैं| यहाँ पर  कहने का तात्पर्य यह है कि हिंदी  भाषा से दक्षिण भारतीय भाषाओं में काफी अनुवाद हुए हैं और आज भी हो रहे हैं|  लेकिन दक्षिण भारतीय भाषाओं  का हिंदी में अपेक्षित बहुत कम अनुवाद हुआ है|  इसके पीछे की  विडंबना यह रही  है कि आज भी दक्षिण भारतीय भाषाओं की रचनाओं को हिंदी क्षेत्र में वह स्वीकृति नहीं मिली जितना हिंदी रचनाओं का दक्षिण भारत में स्वागत हुआ है| इस स्थिति में बदलाव आना ज़रूरी है| दक्षिण भारतीय भाषाओं या अन्य भाषाओं  से  हिंदी अनुवाद को प्रोत्साहन देना चाहिए ताकि द्रविड़ भाषा या अन्य भाषाओं के साहित्य का हिंदी भाषा में अनुवाद की स्थिति में बढोत्तरी हो जाए| इस तरह के  प्रयासों से  अनुवाद के क्षेत्र को ओर भी समृद्ध किया जा सकता है|
आशा करते हैं कि अनुवाद से सभी भारतीय भाषाओं के बीच सद् भावना का माहौल बने, वे एक-दूसरे से भावनात्मक स्तर पर जुड़ें और उनके बीच पारस्परिक आदान-प्रदान हों, लेकिन अनुवाद के महत्व को ध्यान में रखते हुए इस विधा को उच्चतम श्रेणी का दर्जा  दिलाने व  ‘अनुवाद विधा’ व ‘अनूदित साहित्य’ को मुख्य धारा में लाने के लिए इस विषय पर गहन सोच विचार, विचार-विनिमय तथा चिंतन मनन की ज़रूरत है जिसे हम विमर्श का नाम देते हैं, जो कि इक्कीसवीं सदी में भी हाशिए पर ही है| अत: उपर्युक्त चुनौतियों को दूर करके उत्तर आधुनिकता के  प्रौद्योगिकी प्रगति के साथ अनुवाद को  श्रेष्ठ बनाये रखने का प्रयास किया जा सकता है| 

संदर्भ-ग्रंथ-सूची:-  

अनुवाद विज्ञान की भूमिका, कृष्णकुमार गोस्वामी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली.
अनुवाद सिद्धांत एवं प्रयोग- डॉ. जी.गोपीनाथन, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद.
अनुवाद विज्ञान–भोलानाथ तिवारी, किताबघर प्रकाशन.
साहित्यानुवाद, संवाद और संवेदना, डॉ. आरसु, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली.