राजेश कमल की कविताओं में संवेदना का ताप

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नवतुरिया युवा कवि राजेश कमल हाल साल के वर्षो में कविता की दुनिया कदम रखे है। वैसे साहित्य और संस्कृति से इनका जुड़ाव लंबे अरसे है। कवियों, लेखकों और संस्कृतिकर्मियों के सोहबत में रहकर इन्होने पहले स्वयं को साधने का प्रयास किया है । फिर घोषित रूप से कवियो की श्रेणी खड़ा होने के लिए संघर्ष कर रहे है। राजेश की यही साफगोई और ईमानदारी इनकी कविताओं में कमल की तरह खिलती है। और फिर पाठक इस नवतुरिया कवि कि कविताओं में संवेदनाओ की ताप को महसूस करता है और संभावनाओं को तलाशता है। सहरसा की धरती पर पैदा हुआ कवि का डेरा-बसेरा इनदिनों पटना में है। कवि हृदय के राजेश कमल जीवनचर्या के लिए रोजी रोजगार करते हैं। वैचारिक रूप से जनवादी हैं, जन संस्कृति मंच से भी इनका जुड़ाव रहा है। प्रस्तुत है राजेश कमल की आठ कविताएं डॉ अनुराधा ‘ओस’ की विशेष टिप्पणी के साथ – संपादक

                         राजेश कमल की कविताओं में संवेदना का ताप

कविता में संवेदना का ताप ज्यों-ज्यों घनीभूत होता है,त्यों-त्यों अभिव्यक्ति और सशक्त हो उठती है,समकालीन गद्य कविता उस दौर से गुजर रही है,जब समाज में परिवर्तन के साथ अनेक विसंगतिया ,गुम होती मानवीयता का बोलबाला है,’कृष्ण से बातचीत ‘कविता में समाज को कृष्ण जैसे ,भाई, सखा,मार्गदर्शक, गुरु,नायक की आवश्यकता है, तुम्हारी खुशबू से ही तो / महक रहे थे हम / चंहुदिश / हे कृष्ण / न जाने क्यों / सन्यासियों की नाक फ़टी जा रही है / महाभारत फिर से घट रहा है / राजा तब भी अंधा था / राजा आज भी अंधा है / उनकी कविता जाती व्यवस्था पर चोट करती है। वर्तमान समाज के परिवेश को यथातथ्य प्रस्तुत करता है,कवि का संवेदनशील मन विचलित हो उठता है, कई बार / दफ्तरों में /हाट में /दुश्मनों के बीच / मजाक में या गुस्से में / लोग पूछ लेतें है / आपकी जाति क्या है / अपने स्वर को सहेज कर जब कवि लिपिबद्ध करता है तो,बहुत सी उम्मीदें उसको ताक रही होती हैं। उनकी कविता ‘साक्षी’ में असूर्यमपश्यवों के देश में / कहां से आ गई तुम / माना यह इक्कीसवीं सदी है/ लेकिन भ्रूण हत्याएं/ पंडितो, मुल्लों,खांपो के देश मे / कैसे बचाया तुमने खुद को / वर्तमान समय मे झूठ का स्वर इतना ऊंचा है कि सच की आवाज सुनाई ही नही पड़ती ,राजेश कमल की कविता में ,झूठ का स्वर इतना कर्णप्रिय होगा / कभी सोचा न था / सबसे बड़ा संगीतज्ञ हारमोनियम से नही / झूठ से ले रहा आलाप / कवि का जीवन विविध अनुभवों से समृद्ध रहता है, कविता इन्ही से होकर अपना मार्ग ढूढ़ती है, नायक कविता में देखिये, कोई बहुरूपिया है/ कोई विदूषक/ कोई मूर्ख है / धूर्त बलात्कारी भी/ होड़ मची है इनमे / हमारा नायक बनने की/ ‘दर्जी’ कविता को पढ़ते हुए आज का मानव हमारे समक्ष उपस्थित हो जाता है। आदमी तो वह तब भी नही था / जब दर्जी था / लेकिन मुल्क की महान परम्पराओं की / व्यवस्था ऐसी थी/ कि सम्भावनाएं देखी जा सकती थी / चाहे वो फर्जी क्यो न हो / बहुत बड़ी विसंगति उभर रही है। समाज मे व्याप्त जातीयता से कवि का मन व्यथित है। कवि जाति के नाम पर आइकॉन तलाश रहे समाज पर कटाक्ष करता है। कायस्थ मनाते हैं राजेन्द्र बाबू की जयंती / राजजपूत महाराणाप्रताप की जयंती मनातें हैं / दिनकर को भूमिहार ऑइकन मानते हैं / ब्राह्मण समय -समय पर ऑइकन बदलते हैं / क्योंकि उनकी जाति हजारों सालों से / नायकों की फौज तैयार की है / शुक्र है जातियां बची हुई हैं / वरना हम कब के भूल चुके होते / अपने नायको को, राजेश कमल की कविताओं में समय की संवेदना का ताप है,जो उनकी कविता में झलकती है,आगे समय उनसे बहुत कुछ लिखवाएगा समाज के लिए,संवेदना से भरी कविताएँ। – डॉ अनुराधा ‘ओस’—–

1. जन्म दिवस

कायस्थ मनाते हैं राजेंद्र बाबू की जयंती
राजपूत महाराणा प्रताप की जयंती मनातें हैं
दिनकर जी को भूमिहारों ने आइकॉन बनाया है
और ब्राह्मण समय समय पर अपने आइकॉन बदलते रहते हैं
क्योंकि उनकी जाति ने तो हजारों सालों से नायकों की फौज तैयार की है

भगत सिंह को एक नेता वर्षों राजपूत मानता आया
और हमारे इलाके में उनकी जयंती मनाई जाती रही
जब इल्म हुआ तब बंद हुआ
आजकल बाबू वीर कुंवर सिंह की जयंती मनाई जाती है

शुक्र है कि जातियाँ बची हुई हैं
वरना हम कब के भूल चुके होते अपने नायकों को !

2. कृष्ण से बातचीत

तुम्हारे खुशबू से ही तो
महक रहे थे हम
चहुंदिश
हे कृष्ण
न जाने क्यों
संन्यासियों की नाक फटी जा रही है
या कुछ और फट रहा है !
मुझे तो लगता है
महाभारत फिर घट रहा है
राजा तब भी अँधा था
राजा अब भी अँधा है

हे कृष्ण
उन्हें समझा दो
छल युद्ध अब न होवेगा

हम
हर एक धुन में गाएंगे प्रेमगीत
हर एक गली को बना देंगे वृन्दावन
रचाएंगे रास
हर एक कान्हें को मिलेगी राधा
हर एक गोपी को मिलेंगे कृष्ण

3 .नायक

कोई बहरूपिया है
कोई विदूषक
कोई मूर्ख है
तो कोई हत्यारा
धूर्त भी हैं यहाँ
और बलात्कारी भी
होड़ सी मची है इनमेंहमारे नायक बनने की
हमारा ठप्पा भी इन्हीं में किसी को नसीब होता है
हम तर्क भी इन्ही के पक्ष विपक्ष में गढ़ते रहते हैं

इस विकल्पहीन समय में माफ़ करना भगत सिंह
हम भी उसी मुल्क के नागरिक है जिसकी शान हो तुम

4 . अफीम

झूठ का स्वर इतना कर्णप्रिय होगा
कभी सोचा न था

सबसे बड़ा संगीतज्ञ हारमोनियम से नहीं
तोप से ले रहा है अलाप
श्रोता मंत्रमुग्ध
दिमाग का दही कर दिया भेन्चो
कट्टे से बजा रहा है बेन्जो
और श्रोता मंत्रमुग्ध

क्या अफीम खिलाई है मालूम नहीं
इस चिलचिलाती धूप में भी
नशा फट नहीं रहा

जब होश आएगा
तब इल्म होगा
क्या लुटा क्या क्या लुटा

5. जाति
कई बार
दफ्तरों में
हाट में
दोस्तों के बीच
दुश्मनों के बीच
हंसी में
मजाक में
गुस्से में
या
यूँ ही
लोग पूछ ही लेते हैं
आपकी जाती क्या है
आपका गोत्र क्या है
आप कमल हो या कमाल हो
जो भी हो
हो कमाल के
आपको आपकी जाति नहीं मालूम

6. साक्षी
असुर्यम्पश्यवों के देश में
कहाँ से आ गयी तुम
माना यह इक्कीस्मी सदी है
लेकिन
भूर्ण हत्याएं
तो कोई मध्यकाल की बात नहीं
फिर
कहाँ से आ गयी तुम

पंडितों,मुल्लों,खापों के देश में
कैसे बचाया तुमने खुद को
कैसे बनाया तुमने खुद को

सिखा दो न
इस देश की तमाम साक्षियों को
कि कैसे पटकते है
जिंदगी की कुस्ती में
रंगे सियारों को

तुम्हे इस कुस्ती के लिए
देता हूँ पूरा सोना

सलाम है उसे जिसने दी तुम्हे यह काया
सलाम है तुम्हे जिसने तोड़ी सब माया

7 . दर्जी

आदमी तो वह तब भी नहीं था
जब दर्जी था
लेकिन मुल्क की महान परम्पराओं की व्यवस्था ऐसी थी
कि संभावनाएं देखी जा सकती थीं
चाहे वो फर्जी ही क्यूँ न हो

झक सफ़ेद
रंगबिरंगे
कड़क कलफदार
कपड़ों में
सलीके से कटी दाढ़ी लेकर
जब वह बी ऍम डब्लू से उतरता है
तो छटा देखते ही बनती है

आजकल उसकी दुकान का नाम
बदल गया है
एक्सक्लूसिव है
दुनिया का एकलौता
सपनों का हाट

मासूम
भोले
मूर्ख
कुछ अर्ध विद्वान
कुछ पूर्ण विद्वान
सब पट गये हैं
यहाँ से वहाँ
इस हाट में

सौदागर मुस्कुराता है
सौदागर ठहाके लगाता है
सौदागर उपहास उड़ाता है
सौदागर नाचता है
सौदागर गाता है

और खरीददारों की लम्बी लम्बी कतारें लगी है

8 . भ्रम

जिन्हें रीढ़ की हड्डी बताया गया था
गले की साबित हुए

फिर भी
कुछ बंधु
लटके पड़े हैं
शायद तब तक रहेंगे
जब तक
वो मांस का लोथरा ना साबित हो जाएं