रूढियों से जर्जर समाज पर प्रतिघात करती संदीप तोमर की लघुकथाएं

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गणित , समाजशास्त्र और भूगोल में स्नातकोत्तर तथा शिक्षाशास्त्र में एम. फिल. की डिग्री प्राप्त कर पठन-पाठन से जुड़े संदीप तोमर युवा रचनाकार हैं। कविता, कहानी, लघुकथा,

आलोचना, नज्म, गजल आदि विधाओं में लगातार लेखन कर रहे हैं। इनका पहला – कविता संग्रह – ‘सच के आस पास’, कहानी संग्रह – ‘टुकड़ा टुकड़ा परछाई’ लघुकथा संग्रह – ‘कामरेड संजय’ और समाज (लेखों का संकलन शोध-प्रबंध) सरीखे पुस्तकों का प्रकाशन हो चुका है। इसके अलावे ‘महक अभी बाकी है’ नामक कविता संकलन का संपादन भी किया है। 2017 में प्रकाशित ‘थ्री गर्ल्सफ्रेंड्स’ नामक उपन्यास से चर्चा में आए तोमर सृजन व नई जंग त्रैमासिक पत्रिकाओं में बतौर सह-संपादक के रूप में जुड़े हैं। ‘परत दर परत’ लघुकथा संग्रह, ‘ये कैसा प्रायश्चित’, ‘दीपशिखा’ उपन्यास ’यंगर्स लव’ कहानी संग्रह और ‘परमज्योति’ कविता संग्रह शीघ्र पाठकों के बीच होगी। हिन्दी अकादमी दिल्ली सहित कई अन्य साहित्यिक संस्थानों द्वारा सम्मानित रचनाकार की लघुकथा पढ़े भावना शुक्ल की विशेष टिप्पणी के साथ। – संपादक

             रूढियों से जर्जर समाज पर प्रतिघात करती लघुकथाएं
संदीप एक प्रगतिशील सोच के साहित्यकार है जो जमीन से जुड़े हुए है। रूढ़ियों प्रपंचों के प्रति तीव्र प्रतिरोध व्यक्त करते हैं। ये उनकी लघुकथाओं में स्पष्ट दिखता है । आम धारणा के उलट लघुकथा ‘एकदम अलग’ की शब्बो अलग होकर भी बिल्कुल भी अलग नहीं है । ” रवि बाबू बीस रुपये की ही बात है, हफ्ते बाद यही गुलाब आप सौ रूपये में भी खोजोगे।” यह एक पंक्ति वर्तमान से भविष्य की ओर लुढ़कती परिभाषाओं को इंगित करती है। लघुकथा ‘हद’ में बताया गया है कि लोग आत्मश्लाघा में इतने डूब गये हैं कि उन्हें किसी के जीने मरने से कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। ये वह परजीवी लोग हैं जिनकी जड़े नहीं हैं ये उन पर पनपती हैं जो जमीन से जुड़े हैं । और उन्हीं जमीन से जुड़े को चूसकर हरीभरी होती है और अंततः जमीन में धंसे उस जीव को मिट्टी में मिलाकर ही छोड़ती हैं।
संदीप तीव्रता से प्रतिरोध का स्वर उठाते है जिसके कारण प्रथमतः उनकी छवि गुस्सैल व्यक्ति की बनती है उसके उलट वह कोमल ह्रृदय के व्यक्ति है । वर्तमान से संदर्भित और आहत होकर लघुकथा जनहित में बताते हैं कि कैसे जनहित के नाम पर कुकर्मों को स्थापित किया जा रहा है/ किया जाता है।
लघुकथा “तांत्रिक सोच” डायरी शैली में लिखी गयी कथा है इस शैली में गिनी चुनी लघुकथाएं लिखी गई हैं जो काल के प्रकोप से बची हुई हैं । जहाँ विज्ञान नित नये आयाम तय कर रहा है वहाँ आज भी शिक्षित समाज में टोने टोटकों पर विश्वास करनेवाले लोग हैं।
एक सजग साहित्यकार की भाँति वर्तमान परिवेश में चल रहे मंदिर मस्जिद के झगड़े का एक व्यावहारिक ‘समाधान’ वहाँ शिक्षण संस्थान खोलने के रूप में दिया है। हालांकि मंदिर मस्जिद वालों के लिए शिक्षा के अर्थ भी अलग अलग हैं ऐसे में शिक्षा दीक्षा का स्पष्ट उल्लेख न होना अखरता है।
जितनी तीव्रता से संदीप प्रतिरोध करते हैं उतनी ही महीनी से हालात पर कटाक्ष कर जाते हैं । लघुकथा ‘मिल्कियत’ में ऐसे ही एक सरकारी फरमान की चर्चा की गई है। हाँलाकि मिल्कियत शब्द का लोकतांत्रिक व्यवस्था में इस्तेमाल अखरता है लेकिन वर्तमान व्यवस्था में जो रहा है उसके आधार पर इसे बेहतर शब्द चयन कहा जा सकता है।लघुकथा ‘बालमन’ पीढ़ियों के अंतर्द्वंद से उपजी परस्थितियों में भविष्य की चिंता से अवगत कराती है। लघुकथा ‘आपसी समझ’ इस भौतिकवादी दौर में अलग अलग रह रह नवदंपति के आपसी सामंजस्य के वारे में बताती है। संदीप की आम रचनाओं से अलग यह एक कोमल सी रचना है । इसलिए यह पढ़ते वक्त भी एक कोमल हृदय की माँग करती है। – भावना शुक्ल , (अतिथि व्याख्याता, दिल्ली, विश्वविद्यालय, दिल्ली) ।

1. “एकदम अलग”

रविकांत क़स्बे से दिल्ली विश्वविद्यालय में पीएचडी करने आया है। सब्बो उसकी नयी-नयी दोस्त बनी है। बनारस की रहने वाली सब्बो अपनी माँ के साथ दिल्ली आई। सब्बो विश्वविद्यालय परिसर में गुलाब बेचने का काम करती है। रवि अक्सर अपनी मित्र नव्या के साथ कमला नेहरु उद्यान में खली समय में बैठा करता है।
आज वह परिसर में नव्या के साथ बैठा है। सब्बो उनसे गुलाब लेने का निवेदन कर रही है। नव्या ने उससे पूछा-“तुम अपना नाम क्या लिखती हो?”
सब्बो जवाब देती है-“हम तो स्कूल ही नहीं गए दीदी, हाँ माँ हमको सबिता कहती है बाकि सब सब्बो।“
अचानक वे दोनों सहम गए हैं। कभी-कभी लोगो को खुद की बातचीत भी अटपटी लग जाती है। रविकांत को लगा शायद उनसे भूल हुई।
सब्बो ने कहा-“ रवि बाबू, बीस रुपये की ही बात है, हफ्ते बाद यही गुलाब आप सौ रूपये में भी खोजोगे।“
रविकान्त उसके सवाल पर आश्चर्य नहीं करते।
सब्बो ने बहुत महीन से कपड़े पहने हैं, जबकि आज शहर का मौसम कहीं अधिक ठंडा है। उसका शरीर बहुत सुन्दर है लेकिन वह ठण्ड में भी शरीर को ढक नहीं पाती है।
नव्या एक बार फिर उससे देश, जाति, धर्म पर जानकारी के लिए सवाल करती है, जिन पर वह चुप हो जाती है। नव्या समझ जाती है कि वह इन सब सवालों से अलग है, एकदम अलग।
रविकांत ने उसे बीस रुपये देकर गुलाब खरीद लिया है। वह जाने के लिए मुडती है। रविकान्त आवाज लगाकर उसे नट्स वाली चोकलेट देता है जो वह नव्या के लिए लाया है। नव्या रविकांत की आँखों में झाँकने की कोशिश करती है। वह कहीं खो सा गया है, मानों देश का भविष्य उसकी आँखों में बस गया हो। यकायक वह बोल पड़ता है-“नव्या चलो उडुपी चलें, तुम्हें भूख लगी होगी।“

2 . “बालमन”

बिट्टो रोज घर में रोशनदान में बने गौरैया के घोंसले में होने वाली हलचल पर नजर रखती। कैसे गौरैया और उसका चीड़ा तिनका-तिनका इकट्ठा करके घोसला बना रहे थे। फिर उसके अंडे देने से चूजे निकलने और उन चूजों को चुग्गा देने तक की घर घटना को उसने देखा था। चूजों के बड़े होने तक भी वह उन्हें चुग्गा देती रही। फिर उन्हें पंख फड़फड़ा कर उड़ना भी सिखाया।
आज बिट्टो ने जो देखा वह उसके लिए अप्रत्याशित था। गौरैया अपने ही बच्चो को चोंच मारकर घोसले से भगा रही थी।उसने जब माँ से इस बारे में जानना चाहा तो माँ ने उसे बताया कि अब उसके बच्चे बड़े हो गए हैं इसलिए वे अपना नया घोसला बनाएंगे। तभी तो गौरैया उन्हें भगा रही है।
बिट्टो ये सोच मायूस हो गयी कि एक तरफ ये पक्षी हैं जो अपने बच्चों के बड़े होने पर उन्हें स्वावलंबी बनाने के लिए घोसला छोड़ने को कह रहे हैं और एक उसके पड़ोसी हरीश अंकल हैं जिन्होंने अपने माँ बाप को घर से निकाल दिया था।
बिट्टो का बाल मन कराह उठा था।

3. “हद”

मैं यानि सोशल मीडिया का एक क्रांतिकारी लेखक। अभी मेरी निगाह एक वायरल हुई तस्वीर पर पड़ी है। मुझे मेरी ही नज़र कचोट रही है। आँखें बंद भी कर रहा हूं तो ये डर से भरी नज़र पीछा नहीं छोड़ रही है। मैं समझना चाह रहा हूँ उस तस्वीर के विभत्स दृश्य को।तस्वीर में एक फटे कपड़े पहने लड़का है जिसे उसके ही कुछ कपड़ों से बांधा गया है। बांधने वाला भी तस्वीर में साथ ही दिखाई दे रहा है। और एक बहादुर लड़के का चेहरा भी मैं साफ-साफ देख रहा हूँ, जिसने ये सेल्फी लेकर वायरल जी है।
मैं खोजी टाइप लेखक इस बांधे गए लड़के यानि जनेसर का इतिहास खोजता हूँ। पूंजी के चक्रव्यूह ने इसका पूरा गॉंव खाली करा लिया है। इस गॉंव की जमीन पर कई किस्म के रोजगार और वन के दोहन की फैक्ट्री लगनी है। गांव के सब लोग अपना घर बार सब कुछ छोड़ गए हैं।
जनेसर को अपनी माटी से प्यार है, वह यहां से न जाने का निर्णय करता है।पेट की भूख मिटाने के लिए वह रोटी और भात चुराता है। पिछले पंद्रह दिनों से उसने कुछ नहीं खाया है।आज वह एक कटोरा भात चुराते हुए पकड़ा गया है। तस्वीर में इसकी उस नज़र को साफ साफ देखा जा सकता है जो पेट की को बयाँ कर रही है और साथ में उन लोगों के मन को भी, जो एक पंद्रह दिन के भूखे इंसान को इसलिए पीट-पीट कर मार रहे हैं क्यूँकि उसने चावल चुरा लिया है।
लेखक यानि में हैरान हूं कि अभी इंसानियत का कितना गिरना बाकी है?
सोचता हूँ कि ये भी गिरने की एक हद ही है कि कोई वहाँ पीछे मरने वाला है और आप सेल्फ़ी ले रहे हैं।

4 . “आपसी समझ”

गाँव से दूर रहकर वह कृषि विज्ञानी का काम कर रहा था। शोध के चलते वह छुट्टी भी नहीं करता था। उसने अपने चिर-प्रतीक्षित होली के त्यौहार के लिए छुट्टियां सहेज कर रखी हुई थी। यहां उसे रविवार की छुट्टियां भी सहेजने की सुविधा थी। विवाह के बाद यह उसकी दूसरी होली थी।पहली होली पर उसकी प्रियतमा के मायके जाने के चलते वह घर भी नही जा पाया था।
इस बार खूब धमाल मचाने के चलते उसने अपने दोस्तों को भी फोन करके बता दिया था। गाँव की होली का ख्याल आते ही उसके मन में रोमांच पैदा हो गया। अपनी प्रियतमा के साथ होली खेलनें की बात से उसके शरीर में सिहरन होने लगीं। उसे याद आया, जब वह पिछले साल ससुराल गया था।साली-सलज और गांव गली के लड़के, औरतें उसके साथ खूब होली खेली थी। लेकिन उसकी प्रियतमा ने कहा था-
“सुनिए मुझे रंगों का ये त्योहार बदरंग लगता है। चिढ सी है मुझे इस त्योहार से।”
“ठीक हैं तुम्हारे घर आया हूँ। जैसी तुम्हारी मर्जी हो करना, लेकिन मेरे यहाँ तुम्हारी एक न चलेगी।”
घर फोन से आने की सूचना देकर ट्रेन में बैठा। पिछले साल की बातें याद करते हुए, कभी नींद में तो कभी उनींदी सफर काट उसने गॉंव के लिए रिक्शा पकड़ी ही थी कि अचानक एक कार की टक्कर से रिक्शा पलटा।
होश आया तो घर के अंदर वाले कमरे में था। पैर के घुटने और एक हाथ में प्लास्टर देख वह कांप गया। शरीर दर्द कर रहा था।
आंखें खोलते ही उसने अपनी प्रियतमा को सामने पाया।
उसे लगा कि वह कुछ कहना चाहती है, लेकिन शब्द गले में ही रुक से गए हैं।उसने ही पूछा- ” क्या सोचने लगी?”
यही कि आपका पसंदीदा त्योहार और आप…..।”
“तुम्हें पसंद नहीं है ना, इसलिए….।”
“सुनो, मैं आपके लिए रंग जरूर खेलूंगी। आपके इच्छा का सम्मान करना मेरा फर्ज है फिर आपने ही तो कहां था, मेरे यहाँ तुम्हारी एक न चलेगी।”
“धत्त पगली, होली के बिना क्या मैं जिंदा नही रहूँगा। जो तुम्हें पसंद नही, वह काम मैं भी क्यों करूँ भला?”
उसने देखा उसकी प्रियतमा की आंखों से एक अश्रुधारा बह निकली।उसकी बाँह पकड़ उसने अपनी ओर खींचना चाहा, प्लास्टर लगे हाथ के दर्द ने उसे बेचैन कर दिया।
“जनहित”
एक मास्टर था, दूसरा वैज्ञानिक। दोनो ही अलमस्त। पहले ने मास्टरी छोड़ी तो दूसरे ने वैज्ञानिक के पद से इस्तीफा दे दिया। दोनो ही आला दर्जे के फक्कड़।
वैज्ञानिक महोदय नई खोज का जुनून पाले रहते तो मास्टर साहब उनके लिए फंड का जुगाड़ लगाते।
एक शाम को वैज्ञानिक महोदय मास्टर साहब के पास आये, बोले-” एक जबरदस्त खोज होने वाला है। एयर प्रेशर से टॉयलेट साफ करने का सूत्र हाथ लगा है। सैद्धान्तिक तौर पर कामयाबी मिल गयी। बस दो चीजों का इंतज़ाम करना है, एक सिलेंडर और दूसरा एक कमोड। लोहे का खाँचा बनाने में,डाई बनाने में बड़ा खर्च आएगा। कुछ जुगाड़ लगाइये, ताकि इस काम को अंजाम दिया जा सके।”
मास्टर साहब ने उन्हें अपने पुराने से स्कूटर पर बैठाया और रेलवे के ट्रेक पर ले आए और एक बॉगी के टॉयलेट में ले जाकर बोले-” इससे काम चलेगा?”
“हाँ काम तो चलेगा लेकिन…..।”- वैज्ञानिक ने मानो कुछ कहना चाहा।
“फिर ठीक है।”-कहकर मास्टर साहब ने कमोड उखाड़ने के लिए बारी से अभी पहला वार ही किया था कि रेलवे का चौकीदार आ धमका। आवाज सुन उसने दोनो को बोगी से उतारा और गरजकर बोला-” चोरी करते हो। अभी तुम्हें ठीक करता हूँ।”
वैज्ञानिक साहब को प्रोजेक्ट जेल में सड़ता नजर आया लेकिन मास्टर साहब ने बात संभाली-” देखिये कोतवाल साहब, हम ये चोरी देश हित में कर रहे हैं। ये बहुत बड़े वैज्ञानिक हैं। अपने प्रयोग से कम पानी से धोने और साफ करने की सुविधा देने वाले हैं। आपके सहयोग से ये सब संभव हो सकता है। देश आपका ऋणी रहेगा।”
मास्टर साहब ने सौ का मुड़ा-तुड़ा नोट उसकी ओर बढ़ाकर पूरी योजना समझा दी।
चौकीदार को खुद को कोतवाल सुनना बेहद अच्छा लगा। उसने सौ का नोट अपने खाकी कोट की जेब में ठूंसते हुए थोड़ा डपटने के लहजे में कहा-” ठीक है – ठीक है। लेकिन खबरदार इस कमोड का उपयोग जनहित में ही होना चाहिए।”

5 . “तांत्रिक सोच”

(डायरी शैली में लिखी गयी कथा)
7:30 पी.एम.
दिनाँक- 4 मार्च
बेटी का फोन आता है-“पापा आप कहाँ हो?”
“बेटा, अभी मीटिंग में हूँ। बताया हुआ है ना, जब बाहर जाता हूँ तो फोन मत किया करो। जल्दी आता हूँ। बाय।”
मैं फोन काट देता हूँ। चिंता मन में है। बेटी कभी ऐसे फोन नहीं करती। कुछ तो बात है। मेरा मन आशंकित हो जाता है।
8:30 पी.एम.
मैं घर आता हूँ। देखता हूँ-बेटी की आईब्रो कटी हुई है। बेटी से पूछता हूँ। बेटी बताती है-मम्मी ने मुझे सिलाई वाली के घर लहंगा लेने भेजा। सिलाई वाली ने मुझे लहंगा दिया और पड़ोस के दूसरे घर किसी काम से भेजा। मैं पड़ोस के घर गयी। वापिस आयी तो मम्मी ने देखा कि मेरी आईब्रो कटी हैं।
मैं बेटी से सारी तहकीकात करता हूँ। बेटी सब बातों से अनजान है। मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचता हूँ कि बेटी को सम्मोहित किया गया। फिर उसकी आईब्रो काटी गई।
10:30 पी.एम.
बेटी को मैं खाना खिलाता हूँ। वह डरी हुई है। दूसरे कमरे में जाते हुए भी डरती है।
11:30 पी.एम.
मैं अपने कुछ दोस्तों को फोन करता हूँ। वो बताते हैं कि तंत्र विद्या के लोग यौवन पाने की गरज से बच्चो को अपना शिकार बनाते हैं। शायद किसी ने बिटिया पर ऐसा प्रयोग किया है। मैं प्रगतिशील विचार का व्यक्ति हूँ। मुझे ऐसे विचार पर हँसी आती है।
12:30 ए.एम.
मैं बेटी को सुलाने की कोशिश करता हूँ। उसे नींद नहीं आ रही है। मैं बेटी का सिर गोद में रख लेता हूँ।
3:00 ए.एम.
बेटी अभी भी नहीं सोई है। उसे घबराहट हो रही है। मैं उसका बदन छूता हूँ। उसका बदन तप रहा है। उसके बालमन पर चोट लगी है।
21वी सदी में तंत्र-सन्त्र पर विश्वास करने वाले लोगो की सोच से व्यथित हूँ।

6. “जख्मी”

उन्हें समाजवाद से ऐतराज था…आज सुबह ही एक जत्था लोहिया पार्क की ओर रवाना हुआ…लाठी,डंडे, पत्थर उनके हाथों में थे।
पार्क में पहुँच जत्था राममनोहर लोहिया के बुत पर पिल पड़ा। जिसके हाथ में जो हथियार था उसका भरपूर इस्तेमाल किया। एक ने स्याही की बोतल उछाली, जिसके छींटे क्षत-विक्षत बुत पर गिर गए। दूसरा अभी जूतों के हार को गले में डालने ही वाला था कि मामले का रुख बदला। लोहिया के अनुयायी पीछे से प्रहार कर चुके थे।
पहले वाला जत्था भाग गया, हार पहनाने वाला धरा गया था।
जूतों का हार पहनाने वाला ज़ख़मी हो गया। एक सामजवादी ने कहा-“ये बहुत जख्मी है, चलो इसे लोहिया अस्पताल ले चलें।”
जख्मी को अस्पताल ले जाने की तैयारी होने लगी थी।

7 . “समाधान”

कहते हैं मुसलमान बादशाह बनने से पहले वहां भव्य मंदिर था।मुसलमान शासक ने उसे गिराकर आलीशान मस्जिद बनवा दी। मुसलमान शासक के शासन का खात्मा हुआ तो लोगो ने वहां फिर से मंदिर बनाने की गरज से मस्जिद को तोड़ डाला।
एक दीगर बात ये थी कि न मुसलमान को वहां इबादत में दिलचस्पी थी न ही हिन्दू को पूजा-अर्चना में। यह अहम और वहम का मसला था।
मामला पेचिंदा हुआ, मंदिर बनाने के लिए जनमत था लेकिन कानून की अड़चन थी।
दोनों पक्ष के लोग बुद्धिजीवी के पास गए, बोले आप समझदार हैं कानून से भी बेहतर समाधान सुझा सकते हैं।
बुद्धिजीवी ने कहा-” तुम दोनों ही पक्ष न वहां इबादत कर पाएंगे न ही पूजा-अर्चना, एक काम क्यों नहीं करते- वहां तालीम यानि शिक्षा-दीक्षा की संस्था मिलकर खड़ी कीजिये, आने वाली पुस्तें तो आपस में नहीं लड़ेंगी।”

8 . ‘मिल्कियत”
“कहाँ घुसे चले आ रहे हो?- सरकारी शौचालय के बाहर खड़े जमादार ने अंदर घुसते हुए भद्र को रोकते हुए कहा।
“हाजत लगी है।”-भद्र पुरुष ने जवाब दिया।
“तुम ऐसे चुपचाप नहीं जा सकते।”-जमादार ने प्रतिउत्तर में बोला।
“अरे भाई हाजत क्या ढिंढोरा पीटकर जाऊँ?अजीब बात करते हो।”-भद्र पुरुष झुंझलाया।
“मेरे कहने का मलतब है फोकट में नहीं जा सकते।”
“क्यों भाई ये सरकारी शौचालय नहीं है?क्या ये किसी की मिल्कियत है।”
“वो सब हमें नहीं मालूम, सूबे के हाकिम का आदेश है, आज से हाजत का दस रुपया देना होगा। खुल्ला दस का नोट हो तो हाथ पर रखो वर्ना दफा हो जाओ।”
भद्र पुरुष का मरोड़ के मारे बुरा हाल था। एक हाथ से पेट पकड़ वह दूसरे हाथ से जेब टटोलने लगा।

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