लेख / डा. संगीता मौर्य – आदिकाल से लेकर समकालीन साहित्य के आईने में चित्रकूट

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डा. संगीता मौर्य राजकीय महिला पी. जी. कॉलेज गाजीपुर ( उत्तर प्रदेश ) के हिन्दी विभाग में बतौर सहायक व्याख्याता के पद पर आसीन है। इसके पहले गोस्वामी तुलसीदास राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, कर्वी , (उत्तर प्रदेश) में कार्यरत थीं। पठन-पाठन के साथ-साथ सृजनशीलता में इनकी गहरी रूचि रही है। इनकी सृजनशीलता का सम्मान करते हुए गोस्वामी तुलसीदास महाविद्यालय प्रशासन ने इन्हें महाविद्यालय से प्रकाशित होने वाली पत्रिका ‘प्रयास’ का प्रधान संपदक नियुक्त किया था। पठन – पाठन और संपादन के साथ इन्होंने सबलोग,  युद्धरत आम आदमी, निरूप्रह सरीखे शोध पत्रिकाओं के लिए भी लेखन किया। इसके अलावे बाल कृष्ण पांडेय, डा. प्रभाकरण हेब्बार इल्लत, सूर्यभान राय, सहित कई अन्य संपादक के संपादकत्व में संपादित पुस्तक में भी इनके शोध आलेख संकलित हैं। -संपादक

               आदिकाल से लेकर समकालीन साहित्य के आईने में चित्रकूट

                              डा. संगीता मौर्य

बुंदेलखंड की यह भूमि तप की ही नहीं बल्कि वीरों, कवियों की भी भूमि है| इसकी गौरव गाथा कई उन्नायकों द्वारा निर्धारित होती है| एक ओर रीतिकाल के प्रतिस्थापक आचार्य महाकवि केशवदास हैं तो दूसरी ओर वीरता का गान करने वाले महाकवि भूषण और लालकवि| राष्ट्रीय धारा के कवि मैथिलीशरण गुप्त हैं तो वहीँ ऐतिहासिक उपन्यासकार वृंदावनलाल वर्मा जिन्होंने ‘झाँसी की रानी’ नामक उपन्यास लिखकर मातृभूमि का कर्ज उतार दिया है| हिंदी साहित्य में जिस प्रकार चंद्रधरशर्मा ‘गुलेरी अपनी एक कहानी के बल पर विश्वप्रसिध्द हुए उसी प्रकार आल्हा-उदल की कहानी कहने वाले जगनिक को भला कौन नहीं जानता-                            बारह बरस लै कूकुर जिये और तेरह लै जिये सियार|
बरिस अठारह छत्री जिये आगे जीवन को धिक्कार ||

यह पंक्ति केवल साहित्य जगत में ही नहीं बल्कि लोकमानस में भी व्याप्त है| इसकी लिखित परम्परा तो नहीं मिलती लेकिन यह अल्हैतों के बीच कर्ण परम्परा द्वारा जीवित चली आ रही है| यह हिंदी क्षेत्र की सबसे प्राचीन और लोकप्रिय परम्परा है| सर्वप्रथम 1865ई. में चार्ल्स इलियट ने इसका संग्रह करके छपवाया था| जगनिक के बाद महाकवि ईसुरी के फाग की प्रसिद्धि का पता इस बात से लगाया जा सकता है कि स्त्री रचनाकार मैत्रेयी पुष्पा जो इसी धरती की उपज हैं अपने उपन्यास का नाम ही ‘कहि ईसुरी फाग’रखती हैं जो बुन्देलखंड के इतिहास, संस्कृति और रहन-सहन को पूरी गंभीरता से उकेरता है| ईसुरी के फ़ाग को बानगी स्वरूप देखें-

       ऐगर बैठ लेओ कछु काने, काम जनमभर राने|       
       सब खे लगो रहत लियत भर, जौ कभऊँ बढ़ाने||

यह वही उर्वर भूमि है जिसने ‘रामचरितमानस’लिखने वाले तुलसीदास को पैदा किया है| तुलसीदास द्वारा रचित जिस ‘रामचरितमानस की प्रशंसा करते हुए शुक्ल नहीं अघाते वह ‘रामचरितमानस’ केवल साहित्यकारों तक ही सीमित नहीं है बल्कि पढ़े लिखों से लेकर गांव के अनपढ़ लोगों के हृदय में भी बस गया| बुंदेलखंड की अविस्मरणीय परम्परा को बेनी माधव ‘उरई’ने इस प्रकार अभिव्यक्त किया है-

      भूषण औ मतिराम, केशव का क्रीड़ा धाम,
       तुलसी, बिहारी आदि कवि प्रकटे प्रचंड|
       लक्ष्मी, नाना,आल्हा,उदल का वीर बाना,
       परम पुनीत जम्बूद्वीप में भारत-खंड|
       पूण्य खंड उसका है अपना बुंदेलखंड||

इस प्रकार यहाँ साहित्य की निर्बाध परंपरा चली जिसमें उपर्युक्त कवियों के अलावा गंगाधर व्यास, रामचरण हयारण, शिवानंद मिश्र ‘बुंदेला’आदि ने इस परम्परा को निरंतर बनाये रखा है|

      उत्तर-प्रदेश के सात जिलों का भू-भाग बुंदेलखंड कहलाता है| ये जिले हैं ललितपुर, झाँसी, जालौन, महोबा,  हमीरपुर, बाँदा और चित्रकूट|  

चित्रकूट ‘चित्र तथा ‘कूट’दो शब्दों से मिलकर बना है| जहाँ ‘चित्र’से तात्पर्य विभिन्न रंगों वाले दृश्य से है वहीँ ‘कूट’पर्वतीय क्षेत्रों को अभिव्यक्त करता है| हिन्दू संस्कृति से चित्रकूट का संबंध अनादिकाल से रहा है| हम देखते हैं कि हिन्दू संस्कृति में पाप-पूण्य की अवधारणा विकसित है| चारो धामों की यात्रा एवं स्नान से लोग अपने किये पापों से मुक्ति चाहते हैं| चारो धामों के पीछे जो अवधारणा है वह मिथकों की वजह से है| मिथक लोक विश्वासों पर आधारित लोक प्रसिद्ध या पौराणिक कथा होती है| यह परम्परागत अनुश्रुत कथा भी है जो किसी अति मानवीय प्राणी या घटना से सम्बंधित होती है जो बिना किसी तर्क के स्वीकार कर ली जाती है|

बनारस में श्रद्धालुओं की भीड़ जमा रहती है जिसके पीछे ‘मिथक’काम करता है| ऐसा माना जाता है कि गंगा में स्नान करने से सारे पाप धुल जाते हैं| यहाँ मरने वाला व्यक्ति स्वर्ग जाता है| इसी ‘मिथक’ की वजह से ही मगहर कोई नहीं जाता क्योंकि स्वर्ग की चाह सबको होती है जबकि मगहर में मरने वालों के लिए प्रसिद्ध है कि वे नरक में जाते हैं| अयोध्या, हरिद्वार, ऋषिकेश आदि सभी धार्मिक स्थल अपने मिथकों के लिए ही प्रसिद्ध है| इसीलिए यहाँ दर्शनार्थियों की भीड़ बारहों महीने लगी रहती है|

      राम के चरित्र को तुलसी अपने काव्य में जगह मिथकों की वजह से ही देते हैं| आज ‘चित्रकूट’ में दर्शनार्थियों की भीड़ इकट्ठी होती है जो इसकी प्रसिद्धि का एक कारण है नहीं तो शायद ‘चित्रकूट’का स्थान आज केवल भारत के नक़्शे तक ही सीमित रह गया होता| जबकि आज यहाँ केवल देश के ही नहीं विदेशी लोग भी आते हैं|

      मिथकों की बात चली है तो हम देख सकते हैं कि रामायण कालीन संस्कृति का प्रमुख केन्द्र ‘चित्रकूट’भी रहा है| विदित हो कि जब पुरुषोत्तम रामचंद्र को चौदह वर्ष का वनवास मिला तो वे ‘अयोध्या’से होते हुए ‘प्रयाग’और ‘प्रयाग’से आगे ‘चित्रकूट’आये वाल्मीकि से यह पूछने पर की कोई ऐसी जगह बताइये जहाँ मैं, लक्ष्मण और सीता सहित रह सकूँ? इसके उत्तर में गद्गद स्वर में बाल्मीकि चित्रकूट की प्रशंसा करते हुए कहते हैं-

चित्रकूट गिरि करहु निवासू | तहँ तुम्हार, सब भांति सुपासू |
सैलु सुहावन कानन चारू | करि के हरि मृग बिहाग बिसरू||

(अर्थात आप चित्रकूट पर्वत पर निवास कीजिए वहां आपके लिए सब प्रकार की सुविधा है| सुहावना पर्वत है और सुंदरवन है| वह हाथी, हिरन, सिंह और पक्षियों का विहार स्थल है) यहाँ कल-कल निनाद करती मंदाकिनी रोगनाशक ही नहीं पाप नाशक भी है| इसके संबंध में यह प्रचलित है कि यह महर्षि अत्री की पत्नी अनुसुईया अपने तपो बल से इसको यहाँ लायी थीं जो की गंगा की ही एक धारा है|

नदी पुनीत पुरान बखानी | अत्री प्रिया निज तप बल आनी |
सरसरी धार नाऊ मंदाकिनी | जो सब पातक पोतक डाकिनी || 

शीलवती सीता जी उस अनुसुईया के चरण पकड़ उनसे मिलती हैं जिसके त्याग और सती की चर्चा चहु दिशाओं में व्याप्त थी| जनश्रुति है कि ब्रम्हा, विष्णु, महेश तीनों की पत्नियों को इससे इर्ष्या हुई और अपने पतियों को इनकी परीक्षा लेने भेज दिया| ब्रम्हा, विष्णु, महेश तीनों माता अनुसुईया के पास पहुँचकर कहते हैं कि आप हमें निर्वस्त्र होकर खाना खिलाइए! अनुसुईया के सामने धर्म संकट की निर्वस्त्र होकर खाना खिलाते हैं तो हमारा सतीत्व जाता है और बिना खाए लौट जायें तो अतिथि का अपमान होगा| इस धर्म संकट से उबरने के लिए उनको एक उपाय सुझा और मंत्र पढ़कर इन तीनों देवताओं को बच्चा बना दिया, फिर खाना खिलाकर अपने सतीत्व और कर्तव्य दोनों की रक्षा की|

चित्रकूट में स्थित कामदगिरी जो भगवान श्रीराम की निवास स्थली बनी उसकी प्रशंसा इस प्रकार की गयी है-

कामद में गिरि राम प्रसादा| अवलोकत अपहरत विषादा|
सर सरिता बन भूमि बिभागा| जनु उमंगत अनुरागा||

कामदगिरी की महिमा आज भी बहुत बड़ी है| यहाँ लोगों की मान्यता यह है कि सच्चे मन से मांगी गई मनौती जरुर पूरी होती है| मनौती पूरी होने पर एक-दो नहीं बल्कि सौ किमी. से लोग लेटते-लेटते कामतानाथ पहुँचते हैं यह सुनने में भले ही हास्यास्पद लगे किन्तु यह उनकी श्रद्धा ही है|तुलसीदास को ‘चित्रकूट’बहुत प्रिय है ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरियसी’अपनी जन्मभूमि किसे प्रिय नहीं होती| गोस्वामीजी ‘रामचरितमानस’की रचना विपन्न समाज में करते हैं जिनका एक बहुत बड़ा ध्येय समाज में सामंजस्य लाना है| जब हम जन्मभूमि या मातृभूमि की बात करते हैं तो उसके कुछ ऋण हमें चुकाने होते हैं यही ऋण गोस्वामीजी ‘रामचरितमानस’द्वारा चुकाते हैं| गोस्वामीजी के रग-रग में मंदाकिनी का पानी दौड़ रहा है| वे ऐसे ही नहीं कहते-         

चित्रकूट के घाट पर भई संतन की भीड़|
तुलसीदास चंदन घिसे तिलक देत रघुबीर||

तुलसीदास श्रीरामचन्द्र को चित्रकूट में लाकर उन्हें केवल अपने हृदय में ही नहीं बल्कि समस्त चित्रकूट वासियों के हृदय में बसाते है| अगर श्रीराम के पाँव यहाँ नहीं पड़े होते तो इस निपट जंगल की ओर कौन रुख करता? लेकिन राम और सीता का मिथक ही उन्हें यहाँ खींच लाता है| अपने ‘रामचरितमानस’में गोस्वामीजी चित्रकूट का यशोगान करते हुए कहते है-

      सैल हिमाचल आदिक जेते| चित्रकूट जसु गावहि तेते|
      बिंधि मुदित मन सुखु न समाई| श्रम बिनु विपुल बड़ाई||

पूरा ‘रामचरितमानस’सिर्फ राम के चरित्र का यशोगान न होकर चित्रकूट को भी समग्रता से अंकित करता है| लोगों को यहाँ लाने के लिए तरह-तरह के प्रयास तुलसीदास द्वारा किया जाता है जो यहाँ की पवित्रता, ख्याति को दूर-दूर तक पहुंचाए वे लिखते हैं-

पय पयोधि तजि अवध बिहाई| जहँ सिय लखनु रामु रहे आई|
कहि न सकहि सुषमा जसि कानन| जौ सत सहस होहिं सहसानन||

जिस प्रकार कबीर के समकालीन रैदास थे उसी प्रकार तुलसी के रहीम और इन दोनों से पहले महर्षि बाल्मीकि जिन्हें चित्रकूट बहुत प्रिय है| तुलसीदास ने कहा था-

      चित्रकूट में रमि रहे रहिमन अवध नरेश|
      जापर विपदा परति है सो आवत यही देस||

जैसा कि हम जानते हैं बाल्मीकि पहले दस्यु वृत्ति धारण किये हुए थे| ज्ञान की प्राप्ति के लिए चित्रकूट आये| राम जो कि 14वर्ष का वनवास भुगतने यहाँ आये और रहीम जब राजपाट छीन गया तब आये| श्रीराम और रहीम दोनों राजा ही थे लेकिन विपन्नता में यहाँ आते हैं| जबकि तुलसीदास इसी विपन्नता में ही जन्में हैं| विप्पत्ति के समय यह देश यानि चित्रकूट आने के पीछे कारण यह है कि यहाँ आने पर सब पाप धूल जाते हैं| यह स्थान जिसका विशाल हृदय है सबको शरण देती हैं| तुलसीदास ने कहा है-

झरना झरहि सुधा सैम बारी| त्रिविध तापहर त्रिविध बयारी|

यानि यहाँ अमृत के समानजल झरते हैं और तीन प्रकार की शीतल, मंद, सुगंध हवा तीनों प्रकार के तापों (अध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक) को हार लेती है| इस तरह हम देखते हैं कि बुंदेलखंड की धरती हिंदी साहित्य की परम्परा को आदिकाल, भक्तिकाल, रीतिकाल, आधुनिककाल से होते हुए समकालीन कविता तक निरंतर समृद्ध करती है|

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