लेख / डा. रूपेश कुमार – लोकतंत्र और नक्सलवाद

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इलाहाबाद के ग्रामीण परिवेश में जन्में और पले-बढ़े डा. रूपेश कुमार फिलवक्त महात्मागांधी अन्तर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय वर्धा के हिन्दी एवं तुलनात्मक साहित्य विभाग में सहायक व्यख्याता के पद पर आसीन है।  विश्वविद्यालय प्रशासनिक और अकादमिक अनुभव रखने वाले लेखक के पास लेखन का भी विपुल अनुभव है। इलाहाबाद  विश्वविद्यालय के शिक्षार्थी रहे रचनाकार की पहली आलोचनात्मक कृति ‘रामविलास शर्मा की साहित्येतिहास दृष्टि’ नामक पुस्तक का प्रकाशन हो चुका है। अनुशीलन, नागरी, अनुसंधान, बहुवचन, पुस्तक वार्ता सरीखे कई अन्य शोध पत्रिकाओं में लेख व पुस्तक समीक्षाएं प्रकाशित हो चुकी हैं।  विश्वविद्यालय एवं प्रकाशकों द्वारा प्रकाशित लगभग आधा दर्जन पुस्तकों में इनके लेख पुस्तक अध्याय के रूप में भी संकलित है। वर्धा में पठन-पाठन कार्य करते हुये इन्होंने पाठ्य सामग्री का भी लेखन किया है। इसके अलावे महात्मागांधी अन्तर्राष्ट्रीय  विश्वविद्यालय द्वारा निर्मित फिल्म ‘मुहावरे’ का पटकथा भी इन्होंने ही लिखी है। आप सभी सुधि पाठकों के बीच प्रस्तुत है देश के ज्वलंत मुद्दे पर केन्द्रित डा. रूपेश  कुमार द्वारा लिखित लेख ‘लोकतंत्र और नक्सलवाद’। लेखक फणीश्वरनाथ रेणु डॉट कॉम  के संपादकीय कार्यकारिणी से भी संबंद्ध हैं। – संपादक 

                                     लोकतंत्र और नक्सलवाद

                                                        डा. रूपेश  कुमार

             भारत की आजादी के समय दुनियां में दो महत्वपूर्ण व्यवस्थाएं- लोकतांत्रिक और कम्युनिस्ट स्थापित थीं | आजाद भारत के सामने दोनों में किसी एक व्यवस्था को अपनाने का विकल्प था | जिसमें सीमित मतभेदों के बीच लोकतंत्र को अपनाया गया | ऐसी स्थिति में आजादी की लड़ाई में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने वाले वामपंथी विचार से प्रभावित दल और जन के सामने यह संकट था कि वे लोकतंत्र के साथ सामंजस्य बैठाकर आगे बढ़ें अथवा कम्युनिस्ट व्यवस्था को स्थापित करने के लिए पुन: संघर्ष करें ? अधिकतर बड़े वामपंथी नेताओं ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से सर्वहारा के हित में कार्य करने का निर्णय लिया किन्तु इस पर आम सहमति नहीं बन पाई, पार्टी के कुछ नेता इससे असहमत थे | वे चाहते थे कि वामपंथ के आधार पर देश को चलाने के लिए पुन: संघर्ष करना चाहिए | इस असहमति के बावजूद दोनों प्रकार की सोच रखने वाले लोग 1967 ई. तक एक साथ कार्य करते रहे | नक्सलवादी विचारधारा के जनक चारू मजूमदार जो 1967 ई. से पहले भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मा.) के सदस्य और उत्तरी बंगाल में पार्टी के प्रमुख कार्यकर्ता थे | उनके संबंध में कहा जाता है कि “नक्सलबाड़ी से बहुत पहले ही मजूमदार ने नक्सलवाद का सूत्रपात किया | उन्होंने नक्सलवादियों की अगुवाई में श्रीकाकुलम और अन्य सचेष्ट सशस्त्र विद्रोहों के पीछे मुख्य प्रेरणास्रोत का काम किया और मृत्युपर्यंत पार्टी संगठन को मजबूती से अपने नियंत्रण में रखा | वे आन्दोलन के प्रवर्तक थे, भारतीय पैमाने पर अध्यक्ष माओ के प्रतिरूप |”1 चारु मजूमदार के विचार पार्टी के अन्दर भी छद्म नाम से प्रसारित किये जाते थे | स्पष्ट है कि चुनाव में भाग लेने वाली वामपंथी पार्टी के अन्दर ‘संसदीय व्यवस्था’ को उखाड़ फेकने और कम्युनिस्ट शासन स्थापित करने की इच्छा रखने वाले लोग शामिल थे | ऐसे लोग 1967 ई. से पूर्व किसानों और मजदूरों से जुड़े आन्दोलनों को व्यवस्था परिवर्तन का आन्दोलन बनाने की हर संभव कोशिश करते रहे, किन्तु सफलता 1967 ई. में नक्सलबाड़ी के रूप में मिली |

         नक्सलबाड़ी पश्चिम बंगाल स्थित दार्जलिग़ जिले के सिलीगड़ी तहसील का एक हिस्सा है, जो पहाड़ी सौंदर्य और चाय बागानों के कारण भ्रमण के लिए प्रसिद्ध है | इसकी आबादी में अधिकतर संथाल, उरांव, मुंडा और राजवंशी आदिवासी हैं | यहाँ के आदिवासी किसानों की समस्या देश के अन्य भागों में बसने वाले आदिवासी किसानों जैसे ही थी | जिसमें ‘आदिवासियों का उस जमीन से बेदखल किया जाना, जिसकी उन्होंने सफाई और जुताई की थी | जमीन का लेखा-जोखा ठीक प्रकार से नहीं रखा जाता था और आदिवासियों को खुद जमीन संबंधी क़ानून की पेचीदगियों की जानकारी नहीं थीं | उनका खेती-बाड़ी का तरीका – जंगल को साफ़ करना, कुछ समय के लिए जमीन पर खेती करना और फिर उसे छोड़ दूसरी जमीन पकड़ना – उन्हें वन विभाग के अधिकारियों और स्वार्थी जमींदारों के साथ टकराव में ले आती जो जंगल साफ़ होते ही मिल्कियत का दावा करने लगते थे |’2 इस क्षेत्र में आदिवासी किसानों की मदद के लिए धीरे-धीरे वामपंथी कामरेड सक्रिय होने लगे | जिसमें नक्सलवादी आन्दोलन के प्रमुख कानू संन्याल भी थे | जिन्होंने इस इलाके के आदिवासियों की बोलियाँ सीखीं और किसानों के बीच घुल-मिल जाने का प्रयास किया और सरकारी नियमों कानूनों से अनजान अनपढ़ आदिवासियों की हर संभव मदद करने लगे | भोले-भाले आदिवासियों के लिए ऐसे लोग किसी भगवान से कम न थे, वे उन्हें अपना समझने लगे |

         नक्सलबाड़ी 22 मई 1967 ई. में तब चर्चा के केंद्र में आया जब ‘एक जमीदार ने अदालत के आदेश के खिलाफ एक गरीब कास्तकार को उसकी जमीन से जबरन बेदखल करने की कोशिश की | अगली भिडंत दूसरे रोज चाय की एक जागीर के समीप जमीन पर काबिज आदिवासियों और जागीर के सशस्त्र संतरियों के बीच हुई | 24 मई को पुलिस के जवानों की एक छोटी टुकड़ी उस क्षेत्र में गई परन्तु उस पर घात लगाकर हमला किया गया, जिसमें एक अफसर मारा गया | अगले दिन गाँव में एक और बड़ा पुलिस दस्ता भेजा गया और भाग जाने के कारण आदिवासियों के न मिलने पर इसने प्रदर्शनकारी महिलाओं और बच्चों पर गोली चलाई जिसमें नौ व्यक्ति मारे गए |’3 इस घटना ने आदिवासियों को लामबंद कर दिया | कम्युनिस्ट व्यवस्था की इच्छा रखने वाले कामरेडों ने इसे अवसर के रूप में देखा और इसका नेतृत्व करते हुए शीघ्र ही इसे व्यवस्था परिवर्तन के संघर्ष में बदल दिया | बिना समय गवांये ‘मई 1967 के अंतिम सप्ताह की पहली घटनाओं के फ़ौरन बाद ही मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की नक्सलबाड़ी यूनिट के नेताओं ने क्षेत्र को ‘मुक्त इलाका’ घोषित कर दिया जहाँ पुलिस और सरकारी अधिकारियों को कदम रखने की इजाजत नहीं थी | इलाके की सुरक्षा के लिए हथियार बंद दस्तों का गठन किया गया | विद्यालयों व अन्य जन गतिविधियों के प्रशासन को हाथ में लेने के लिए ग्राम समितियों की स्थापना की गई और उन्होंने न्यायिक संस्थाओं का कार्य भी सम्पन्न किया | अमीर किसानों के घरों पर छापे मारे गए | उनके चावल के भण्डार जब्त कर लिए गए और उनके अधिकार में गिरवी और उधार संबंधी दस्तावीज नष्ट कर दिए गए |’4 नक्सलबाड़ी में इस व्यवस्था को लागू करने वाले लोगों को नक्सलवादी कहा गया | आदिवासियों के पास इस नेतृत्व को स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प न था, क्यूँ कि सत्ताधारी नेता, स्थानीय प्रशासन और जमींदार सब एक थे | नक्सलबाड़ी में स्थापित यह शासन बहुत अधिक दिनों तक नहीं चला फिर भी सरकार को इस पर नियंत्रण प्राप्त करने में दो माह लग गए | बागियों को मार डाला गया अथवा जेल में डाल दिया गया | इस घटना से प्रभावित होकर कम्युनिस्ट व्यवस्था में विश्वास करने वाले अन्य कई छोटे संगठनों ने दूसरी जगहों पर भी यह प्रयोग प्रारंभ किया | परिणाम स्वरूप एक बड़ा क्षेत्र आज नक्सलवाद से प्रभावित है | सरकार भी समस्या का निराकरण करने के लिए कोई अन्य उपाय खोजने के बजाय अड़तालीस साल पुराने उसी तरीके का इस्तेमाल कर रही है जो उसने नक्सलबाड़ी में किया था |

          परिस्थितियाँ बताती हैं कि नक्सलवाद के जन्म का कारण आदिवासी किसानों का शोषण रहा है, जिसे लोकतांत्रिक तरीके से भी हल किया जा सकता था, किन्तु समय रहते ऐसा नहीं किया गया | जिसके कारण इसे फलने फूलने का अवसर मिला | यह चिंता का विषय है कि आजादी के इतने साल बीत जाने के बावजूद आदिवासी किसानों की समस्या को हल करने में लोकतांत्रिक सरकारें असफल रहीं हैं | सत्ताधारी पार्टियों ने आदिवासी, किसान और मजदूरों की बेहतरी को लेकर कभी कोई गंभीरता नहीं दिखाई, जिसका लाभ नक्सलवादियों ने उठाया | उन्होंने इन वर्गों के बीच अपने कार्यों द्वारा उनकी सहानभूति प्राप्त की | इतना ही नहीं आदिवासियों पर चिंतन करने वाले लोग भी शासन सत्ता द्वारा उनको उपेक्षित किये जाने की अपेक्षा नक्सलवादियों के द्वारा उनके अन्दर चेतना और जागरूकता फैलाने के कार्यों को बेहतर मानते हैं | जैसा कि मानवशास्त्री नदीम हसनैन लिखते हैं कि “यह जरूरी नहीं है कि आदिवासी मार्क्सवाद या माओवाद से प्रेरणा लेते हैं | जनजाति समुदाय अगर उनके साथ है तो इसका कारण यह है कि उग्र वामपंथ ने जनजातियों को लामबंद कर उन्हें राजनैतिक नेतृत्व प्रदान किया तथा वे जनजातियों के अधिकारों के लिए लड़ने की सक्षमता देते हैं | अपनी कमियों व तथाकथित ‘अपराधों’ के लिए उग्र वामपंथी संगठनों को दोषी करार दिया जा सकता है लेकिन कम से कम इस बात के लिए उनका सम्मान किया जाना ही चाहिये कि उन्होंने आदिवासियों को आवाज दी है और उन्हें शोषण व अन्याय के खिलाफ लड़ने का हौसला दिया है |”5 किन्तु अपनी शर्तों और कीमत पर अपने राजनैतिक उद्देश्यों के लिए | सत्ता के दो ध्रुओं के बीच पिसते आदिवासी समुदाय की समस्या का हल हथियार नहीं है |                        

          वर्तमान स्वरूप में नक्सलवाद देश की सबसे बड़ी आतंरिक समस्या और लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है, इससे कोई इनकार नहीं कर सकता है | बहस इस बात को लेकर नहीं है कि सरकारें इसकी गंभीरता को समझ नहीं रहीं हैं | बहस इस बात को लेकर है कि आखिरकार इस समस्या का समाधान क्या है ? इस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है | इसके लिए नक्सलवाद की स्वीकार्यता के कारणों को जानना होगा | नक्सलवादी जिन लोगों का नेतृत्व करते हैं वे लोग उनका साथ व्यवस्था परिवर्तन के लिए नहीं बल्कि पूंजीवादी शोषण से बचने के लिए देते हैं | वैश्विक स्तर पर पूंजी के गठजोड़ से पूंजीवादी शक्तियां मजबूत हुई हैं, दुनियां भर की सरकारें उनके दबाव में काम कर रहीं हैं, भारत इससे अछूता नहीं है | पूंजीवादियों को गरीब आदिवासियों और किसानों के विकास से लाभ नहीं है बल्कि लाभ उनके विनाश से है | अगर भारत के मानचित्र में देखें तो पता चलेगा कि जहाँ-जहाँ नक्सलवाद फैला वे क्षेत्र प्राकृतिक संसाधन से भरपूर हैं | पूंजीवादी शक्तियाँ इन संसाधनों का दोहन करना चाहती हैं | जिसके कारण सरकार उनके अनुकूल नीतियों का निर्माण करती है, जैसा कि रमेश दीक्षित लिखते है कि “वैश्वीकरण के दौर की शुरुआत के बाद भारतीय राज्य की कारपोरेट समर्थक और पोषक खनन नीतियों की वजह से बदहाली की दशा में पहुँच चुके आदिवासी समूहों के बीच माओवादियों की पैठ आदिवासियों के हमदर्द के रूप में ही संभव हो सकी है | राज्य की आर्थिक नीतियों में बुनियादी बदलाव और इन इलाकों की वन, जल और खनिज संपदा की अंधाधुंध लूट पर रोक लगाए बगैर केवल कानून और व्यवस्था कायम रखने के लिए चलाये जा रहे सैन्य और पुलिस अभियानों को कोई कामयाबी मिलने वाली नहीं है | जिसमें कोई संदेह नहीं कि समुचित सामाजिक आर्थिक विकास न होने, रोजी रोटी के वैकल्पिक अवसर न मिलने तथा पुलिस और वन विभाग के अधिकारियों- कर्मचारियों द्वारा दैहिक, आर्थिक शोषण के कारण स्थानीय आदिवासियों में राज्य और उसकी सभी एजेंसियों तथा जंगल के ठेकेदारों के प्रति उपजा असंतोष इन इलाकों में माओवादियों के प्रभाव क्षेत्र के विस्तार का वैध आधार बना है |”6 इस वैधता को स्थानीय स्तर पर लोगों की समस्याओं को दूर करके ही चुनौती दी जा सकती है | इसके लिए इन क्षेत्रों से प्राप्त खनिजों के दोहन को ध्यान में रखकर नीतियाँ बनाने के बजाय स्थानीय समस्याओं को ध्यान रखकर लोगों की सहमति से नीतियाँ तय होनी चाहिए | इसके साथ ही देश के विकास हेतु नीति निर्माण में पूंजीवादी के साथ समाजवाद को भी जगह देनी होगी, जो धीरे-धीरे समय के साथ कम होती गई है | देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने इसी नीति का पालन किया था | शायद यही कारण है कि उनके समय में ऐसी समस्या पैदा नहीं हुई |

            देश को आजाद हुए सत्तर साल हो गए भूमि, खनिज और वन संबंधी बहुत से नियम कानून अग्रेंजों के समय से चले आ रहे हैं, उसमें जो सुधार हुए हैं वह अपर्याप्त हैं | इसमें व्यापक पैमाने पर बदलाव और इसे कड़ाई से लागू करने की जरूरत है | इसके साथ यह भी जरूरत है कि इन क्षेत्रों में बसने वाले लोगों के प्रति सरकार, सरकारी नुमाइंदों और पूंजीपतियों के कार्य व्यवहार का तरीका और नजरिया बदले | अगर ऐसा नहीं होता है तो नक्सलवाद यूँ ही फलता फूलता रहेगा और लोग इस वैकल्पिक व्यवस्था का साथ देते रहेंगे |

संदर्भ ग्रन्थ-

  1. गुप्त, विप्लवदास (अनु. संजय), नक्सलवादी आंदोलन, नई दिल्ली (1981 ई.), मैकमिलन इंडिया लिमिटेड, भूमिका
  2. वही, पृष्ठ-3
  3. वही, पृष्ठ-3
  4. वही, पृष्ठ-8,9
  5. हसनैन, नदीम, मध्यभारत के जनजातीय क्षेत्रों में अलगाववाद एवं उग्र वामपंथ : चेतावनी संकेत, हिंसा और समाधान, बहुवचन (अंक 28, जनवरी-मार्च 2011 ई.), वर्धा, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय |
  6. दीक्षित,रमेश, भारत की मौजूदा परिस्थियों में माओवाद पूरी तरह अप्रसांगिक है, बहुवचन (अंक 28, जनवरी-मार्च 2011 ई.), वर्धा, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय |