पुस्तक समीक्षा / नवगीत संग्रह की अंतर्चेतना

0
422

नवगीत आन्दोलन से जुड़े ‘शिवानन्द सिंह सहयोगी’ सरकारी सेवा से सेवानिवृत हो चुके हैं। 68 वर्षीय सहयोगी जी के पास गीत, नवगीत, गजल, कविता, मुक्तक, दोहे , दुमदार दोहे , कुण्डलिया, क्षणिका , बालगीत, एवं कहानी लेखन का लंबा अनुभव है। 18 कृतियों के इस रचनाकार के संयोजकत्व एवं संपादकत्व में कई विषेषांकों का भी प्रकाशन हुआ है। साहित्य सृजन के क्षेत्र में इनकी कर्मठता को कई साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्थानों ने स्वीकारा है और इन्हें कई सम्मान और पुरस्कारों से नवाजा भी है। ‘शब्द अपाहिज मौनीबाबा’ गीतकार की नई ‘नवगीत’ संग्रह है। ग्रामीण संस्कृति में पले-बढ़े गीतकार ने अपनी इस कृति में भी ग्रामीण परिवेश, ग्रामीण जनजीवन के यथार्थ से लेकर भूखे-गरीबों के सवाल को स्वर दिया है और वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था पर करारा प्रहार भी किया है। प्रस्तुत है शिवानन्द सिंह सहयोगी द्वारा लिखित नवगीत संग्रह ‘शब्द अपाहिज मौनीबाबा’ की समीक्षा डा. भुवनेश्वर दूबे की शब्दों में। – संपादक

                                      नवगीत संग्रह की अंतर्चेतना
                                           -डा. भुवनेश्वर दूबे
नवगीत मानव मन का अंतःहृदयी आनुभूतिक लयात्मक गीत है ,जिसके माध्यम से मनुष्य अपने जीवन के निजी एवं सार्वभौमिक अवयवों का रसास्वादन करता और करवाता है । मेरी मान्यता है कि गीत के माध्यम से मनुष्य अपने जीवन के आरोह-अवरोह को आत्मसात करते हुए प्रेरणात्मक अवयवों को प्राप्त करता है । गीत मानव मन की प्रस्थिति को प्रस्फुटित करते हैं । इन गीतों के नवीन उत्स ही नवगीत हैं, जो मनुष्य को उनके भटके हुए तथ्य से परिचित कराते हैं और साथ ही यह भी ज्ञात कराते हैं कि जीवन के यथार्थ पहलू क्या-क्या हैं ? और जीवन को समयानुसार सकारात्मकता का जामा कैसे पहनाया जा सकता है । नवगीत ,गीत का वैज्ञानिक पक्ष है । इसकी वैज्ञानिकता को स्पष्ट रूप से परखा जा सकता है । इसमें सृजन अनुकरणात्मक रूप में नहीं किया जा सकता है और पैरोडी के रूप में भी इसका सृजन नहीं किया जा सकता है ,क्योंकि यदि कोई अनुकरणात्मक धृष्टता करता है तो स्पष्ट रूप में नवगीत के अंदर निहित उसकी नवीन सृजनशीलता तथा शिल्प प्रवृत्ति ढह जाती है और इस प्रकार की सृजनशीलता बेदम होकर दम तोड़ देती है । नवगीत की रचना वही कर है । नवगीत में कल्पना की ऊँची उड़ान भी नहीं होती और अगर कोई उड़ान होती भी है तो वह जीवन के प्रत्यक्ष दर्शन की होती है और मनुष्य के व्यावहारिक पक्ष को नवीन रूप में उत्सर्जित करना भी नवगीत का ध्येय है । वस्तुतः नवगीत शब्द ,गीत का उत्स रूप है ,क्योंकि बिना गीत के नवगीत की संज्ञा अर्थहीन हो जाएगी । लेकिन जीवन के नवीन खट्टे –मीठे –तीखे आयामों की नवीन गीत चासनी निश्चित रूप से नवगीत कही जा सकती है ।
नवगीत के प्रथम उन्नायक के रूप में डॉ. शंभुनाथ नाथ सिंह ने सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ को स्वीकार किया है । उनका मानना था कि नवगीत के बीज, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के सृजन में देखा जा सकता है । सभी नवगीतकारों ने डॉ. शंभुनाथ सिंह को ही नवगीत का पुरोधा स्वीकार किया है । नवगीत की जो शुरुआत डॉ. शंभुनाथ ने की थी ,वह आज भी प्रवाह गति से प्रवहमान है । गीतों की परंपरा प्राचीन है किन्तु जब गीत में बासीपन की सुगंध आने लगे तो नवीन सौरभता की आवश्यकता महसूस होने लगती है । ऐसी ही स्थिति को अनुभव करके डॉ. शंभुनाथ सिंह एवं उनके सहायक अन्य नवगीतकारों ने मिलकर नवगीत विधा को प्रतिपादित किया , जो आज तक अनवरत रूप से चल रही है । नवगीत के इस परंपरा में अद्यतन श्री शिवानंद सिंह ‘सहयोगी’ ने अपने काव्य सृजन के माध्यम से नवगीत विधा को पुष्पित एवं पल्लवित किया है । उनकी सृजनशीलता के माध्यम से नवगीत के विकसित रूप को देखा जा सकता है ।
‘शब्द अपाहिज मौनीबाबा’ नवगीत संग्रह शिवानंद सिंह ‘सहयोगी’ की अन्यतम यथार्थ चारुता से युक्त नवगीत मंजरी है । ‘सहयोगी’ जी अनवरत रूप से साहित्य सृजन के द्वारा भारतीय हिन्दी साहित्य की महिमा को मंडित कर रहें हैं । आपका सृजन कार्य हिन्दी साहित्य को वह प्राणवत्ता प्रदान कर रहा है , जिसकी उसे आवश्यकता बहुत पहले से है । आप नवगीत के अद्वितीय साहित्यकार हैं । आपके नवगीत संग्रह को आत्मसात करने पर मन में नवीन ऊर्जा का संचयन होता है , जो मनुष्य को जीवन के सार्थक प्रेरणा युक्त आयाम से परिपूरित कर देता है । आप प्रभावी शब्दों के माध्यम से सृजन की सर्जना करने में पूर्णरुपेण सक्षम हैं ।
‘सहयोगी’ जी ने ‘शब्द अपाहिज मौनीबाबा’ नवगीत संग्रह में तमाम तरह से जीवन की जुड़ी हुई प्रस्थिति को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने का सराहनीय प्रयास किया है । उनके इस नवगीत संग्रह के गीतों में नवीन उन्मेष से युक्त जागरण–पृष्ठपोषण-व्यावहारिकता–ग्रामीण पाठ्यचर्या, ग्रामीण परंपरा, जमीनी तथ्य इत्यादि की संवेदनशीलता को प्रकाश में लाया गया है । नवगीतकार शिवानंद सिंह ‘सहयोगी’ जी ने अपने इस रचना में प्रतिकूलित स्थिति को प्रदर्शित करते हुए तमाम व्यंग्यों द्वारा जनजागरण तथा उत्सर्जन की स्थिति को बताते हुए जीवन के रंगों को उकेरने का प्रयास किया है । “शब्द अपाहिज मौनीबाबा” नवगीत संग्रह के नवगीत ‘सुनो बुलावा’ में नवगीतकार ने मानवीकरण अलंकार के माध्यम से राजनीति से युक्त कलुषित लोगों को व्यंग्य के माध्यम से प्रस्तुत किया है । साथ ही कवि यह भी बताना चाहता है कि ऐसे कलुषित लोगों के पास लालच रूपी मिठाई होती है , जिसको खिलाकर वे सामान्य जनता को मूर्ख बनाते हैं और देव स्थानों पर भी पुजारी–पंडे यही कार्य करने में जुटे हुए हैं । कवि कहता है कि हम सिर्फ आजादी के नाम पर ठगे जा रहें हैं , इसका पूरा फायदा अपने को राजनेता समझने वाले लोग हमसे ठगबाजी करके प्राप्त कर रहें हैं । उनके नवगीत की निम्न पंक्तियों को आत्मसात किया जा सकता है ; यथा –
“सुनो बुलावा !
क्या खाओगे !
घर में एक नहीं है दाना

सहनशीलता
घर से बाहर
गई हुई है
किसी काम से
राजनीति को
डर लगता है
किसी ‘अयोध्या’
‘राम – नाम’ से
चढ़ा चढ़ावा !
धरे पुजारी !
असफल हुआ वहाँ का जाना

आजादी के
उड़े परखचे
तड़प रही है
सड़क किनारे
लोकतंत्र का
फटा पजामा
पैबंदों के
पड़ा सहारे
लगा भुलावा !
वोटतंत्र यह !
मनमुटाव का एक घराना
मिला पलायन
माला लेकर
राजतंत्र के
चित्रकूट पर
भूखमरी का
पेट छछनता
राजभवन के
घने रूट पर
बँधा कलावा !
जनसेवा का
जाना केवल क्षितिज उठाना ”। 1
( शिवानंद सिंह ‘सहयोगी’ – ‘शब्द अपाहिज मौनीबाबा’, पृष्ठ – 49-50 । )
इन पंक्तियों में नवगीत की अंतर्चेतना का आत्मसात किया जा सकता है । इसमें कवि ने आधुनिक युग में हो रहे कलुषित क्रिया–कलापों को मानवीकरण के रूप में रूपायित किया है । नवगीत के माध्यम से वर्तमान समय में संचालित हो रहे जीवनचर्या को कवि ने उकेरने का प्रयास किया है । कवि ने विविध प्रकार के आयामों को अनुभवों को अंगीकार किया है, उसके बाद उसके आस्वादन को नवगीत के माध्यम से उकेरने का प्रयास किया है । कवि का यह कर्म निश्चित रूप से नवगीत की उपादेयता को द्योतित करता है ।
‘शब्द अपाहिज मौनीबाबा’ नवगीत की पंक्तियों के माध्यम से कवि ने जीवन–जगत के उस उत्स को द्योतित करने का प्रयास किया है, जो विवशता से युक्त जीवन को जीने का आदी हो चुका है और परेशानियों से होते हुए अपने जीवन को काट रहा है । अपने जीवन से उसे कोई शिकायत भी नहीं है और वह जैसा जीवन उसे प्राप्त हो रहा है ,उसी जीवन के खट्टे–मीठे–कड़वे स्वाद का आस्वादन करता हुआ बिना कुछ बोले मौन धारण करके अपना जीवन व्यतीत कर रहा है । ऐसा लगता है कि जैसे शब्द अपाहिज हो गए हैं और अब वह किसी से कुछ नहीं कहता, क्योंकि उसे पता है कि कहने से भी उसकी अपेक्षाएँ पूर्ण नहीं होंगी और वह अपने शब्दों को अपाहिज बना दिया है । उसकी इस स्थिति से मौनीबाबा साकारित रूप में प्रत्यक्ष होता है । कवि शिवानंद सिंह ‘सहयोगी’ ने अपने नवगीत संग्रह का नाम ही “शब्द अपाहिज मौनीबाबा” रखा है । यह शीर्षक निश्चित रूप से तार्किक और व्यंग्यात्मक है । इसके कई व्यंग्य हो सकते हैं । पहला व्यंग्य तो यही है कि अगर बोलने की ताकत या हौंसला न हो तो मौनीबाबा बने रखने पर सारे कार्य सिद्ध होते रहेंगे और दूसरा यह कि यदि अभाव ग्रस्त जीवन हो तो शब्द अपाहिज हो जाते हैं और चाहकर भी कोई अपनी बात नहीं कह पाता, फलतः मौनीबाबा ही बना रहता है । इस संसार में बहुत सी ऐसी स्थितियाँ होती है,जिसमें शब्द अपाहिज हो जाते हैं और मनुष्य मौनीबाबा बन जाता है । चालबाजी– बेमानी–धूर्तता–दुष्टता इत्यादि के माध्यम से भी ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है । नवगीतकार शिवानंद सिंह ‘सहयोगी’ ने अपने नवगीत के इस पंक्ति में अभाव ग्रस्त जीवन परिवेश का वर्णन करते हुए इस प्रकार प्रस्तुत किया है ; यथा –
“बड़की को है
कुछ – कुछ नजला
छुटकी को है
कुछ–कुछ खाँसी
घर की हालत ठीक नहीं है

आई चिट्ठी
कल मैके से
गई भतीजी पैदल घर से
बाप वकील
सिपाही भैया
मम्मी मुखिया निकली डर से
बिना बताए
बिना कहे कुछ
घरवाली भी पहुँची झाँसी
घर की हालत ठीक नहीं है

बड़का पैसा
माँग रहा है
भरती उसका जनमा बेटा
जनमा है वह
दुबला–पतला
‘बाल बाटिका’ में है लेटा
बता रहा था
शाली उसकी
लगा गई है कल ही फाँसी
घर की हालत ठीक नहीं है

बदली भाषा
की परिभाषा
शब्द अपाहिज मौनीबाबा
अलग चौपई
रहा अलापा
पड़ा अकेला दुखिया ढाबा
है खिसियाई
काली माई
‘सुनि – सुनि आवत’ ‘जब–तब हाँसी’
घर की हालत ठीक नहीं है ।”2
(शिवानंद सिंह ‘सहयोगी’ – ‘शब्द अपाहिज मौनीबाबा’, पृष्ठ – 55-56 )।
प्रस्तुत नवगीत पंक्ति में यह दर्शनीय है कि नवगीत की यथार्थ नवता क्या है ? नवगीत का जो मूल प्रदेय है ,वह ‘सहयोगी’ जी द्वारा सृजित पंक्तियों में देखा जा सकता है । वस्तुतः गीत की नवता ही नवगीत है । नवगीत में जिस उत्स की आवश्यकता होती है ,वह ‘सहयोगी’ जी के काव्य सृजन में देखा जा सकता है । उनके द्वारा सृजित काव्य संग्रह जीवन की अनुपम नवीनता को प्रदर्शित करता है । यही नहीं उनके इस संग्रह के सभी गीत एक नए उत्स के साथ प्रकट हुए हैं । ‘सहयोगी’ जी ने आज के जीवन परिवेश में घटित होने वाले उन तमाम पहलुओं को अपने सृजन के माध्यम से उकेरने का सराहनीय प्रयत्न किया है । उनके गीतों के नवीन सौम्यता को साधारण जन भी समझ सकने में सक्षम हो सकता है । ‘सहयोगी’ जी के इस नवगीत की पंक्तियों की लड़ियों में नवीन जीवन दर्शन प्रत्यक्ष दिखाई देता है । जहाँ भी उन्हें अवसर मिलता है, वे नवीन आयामों एवं तथ्यों को अपने काव्य सृजन में सृजित करते हैं । आज के समय परिवेश के आडंबरिक नेताओं की चित्रवृत्ति को खिचते हुए वे सभी के समक्ष एक मुखौटा प्रस्तुत करते हैं , जिससे की साधारण आदमी भी नेताओं की आडंबरगीरी को समझ ले । वे अपनी कविता की पंक्तियों के माध्यम से नेताओं की बकवादिता एवं उदंडता को बहुत ही नवीन एवं तार्किक रूप से प्रस्तुत करते हैं ; यथा –
“नेता हैं
कुछ भी कह देंगे
भाषा से क्या लेना-देना
इनको तो बस वोट चाहिए

ये तो हैं
केले के पत्ते
भिड़ के हैं
ये लटके छत्ते
चापलूस
बस बनकर रहिए
भूख–प्यास
की बात न कहिए
जनता से क्या लेना–देना
इनको तो बस नोट चाहिए

संसद में
शतरंज खेलते
राज्यसभा
में डंड पेलते
लगते हैं
काशी का पंडा
लिए हाथ
में ऊँचा झण्डा
रोटी से क्या लेना–देना
इनको तो अखरोट चाहिए

कोई भी
जा बसे जहन्नुम
इनका है
बस एक तरन्नुम
अवसर को
अजमा लेते हैं
मुद्दा मिला
भुना लेते हैं
जनसेवा ? क्या लेना–देना
इनको तो बस ओट चाहिए ”।3
शिवानंद सिंह ‘सहयोगी’ – ‘शब्द अपाहिज मौनीबाबा’, पृष्ठ -59-60 ।
इस पंक्तियों के माध्यम से ‘सहयोगी’ जी ने आधुनिक परिवेश में अपने को नेता कहलाने वाले की क्या दशा और दिशा है ,उसको स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किया है । उनका मानना है कि नेता की जो वास्तविक स्थिति होती है ,वह आज फरेब करने वाले नेताओं में नहीं है । वस्तुतः नेता वही हो सकता है जिसके अंदर नेतृत्व करने की क्षमता हो और जो अपने नेतृत्व के माध्यम से देश के विकास के कार्यों को करते हुए देश को प्रगति एवं उन्नति प्रदान करें । आधुनिक काल में केवल वोट और नोट का खेल चलायमान है ,जिसे प्रकट करने के लिए हमेशा छल–छद्म का खेल होता रहता है और जनता की सेवा एवं भलाई निरंतर पाटन गर्त में समाहित होती जा रही है । कुर्सी का खेल हमारे देश को छिन्न–विछिन्न करते हुए आपसी सामंजस्य को क्षीण बनाते हुए देश को अवनति के चौराहे पर खड़ा कर दिया है । ‘सहयोगी’ जी ने अपने इस नवगीत पंक्ति के द्वारा एक नवीन जागरण को उभारने का अन्यतम प्रयास किया है । उनकी पंक्तियों में वह शक्ति विराजमान है जिसके माध्यम से सामान्य जन आज की राजनीति के छल–छद्म को आसानी से समझ सके और देश को सुरक्षित करने के लिए कटिबद्ध हो सके । वे समझाना चाहते है कि जब तक राजनीति में वोट की स्थिति भयावह है और यह सिर्फ समयान्तराल तक ही सीमित है । नेता बने हुए किसी भी व्यक्ति को गरीब लोगों के रोटी–पानी से कोई मतलब नहीं होता और वह हमेशा देश के धन–धान्य को लूट–खसोट कर अपनी झोली भरने में हमेशा प्रयत्नशील रहता है तथा जो उनके चापलूस होते हैं ,उन्हीं पर अपने कार्य बनने तक विश्वास करते हुए उन्हें भी मालामाल किए रहता है और हमेशा जनता के शोषण में लगा रहता है ।
‘सहयोगी’ जी ने अपने नवगीत संग्रह में ‘घर में बैठी हुई गरीबी’ के माध्यम से सम्यक रुपेण ग्रामीण परिवेश के संबन्धित व्यक्ति–वस्तु एवं अवयवों का चित्रण बहुत अनोखे रूप में करते हुए बिम्बात्मक आरेख को खींचने का प्रयत्न किया है । मानवीकरण से अपने पंक्तियों को सजाते हुए ‘सहयोगी’ जी ने खुरपा–खुरपी और जाँगर–हँडिया–पतुकी–पगडंडी–लकवा–जोहड़–सरपत–बटाई–खटाई जैसे ग्रामीण शब्दों का प्रयोग करते हुए नवगीत की पंक्तियों को सुसज्जित करते हुए नवीन आयाम एवं प्रयोग धर्मिता को निर्वहन करने का अन्यतम प्रयास किया है । नवगीत की सृजनशीलता में ऐसे तथ्यों और प्रयोगों से नवीन सर्जना उत्सर्जित होती है । इन पंक्तियों के लालित्य को आत्मसात करने पर मन में एक अलग प्रकार की अनोखी चित्तवृत्ति निर्मित होती है ,जो हमें अपनी जमीन से जोड़ती है ; यथा –

“घर में बैठी
हुई गरीबी
तोड़े रोज चटाई
हँड़िया–पतुकी
के सब कंधे
हुए शहर के राही
भूख गयी है
पेट कमाने
बाहर खड़ी उगाही
पैर तुड़ाई
पगडंडी पर
सोई पड़ी कटाई

खुरपा–खुरपी
के जाँगर को
मार गया है लकवा
नीचे उतरा
नल का पानी
सूखा जोहड़ पकवा
बंद हो गई
कई साल से
सरपत कुशल बटाई

लाल तिकोना
नहीं किया कुछ
बस दीवार पर ठहरा
दरवाजे के
पास खड़ा है
देता केवल पहरा
भारी पैर
मँगाती छुटकी
इमली और खटाई ।”4
शिवानंद सिंह ‘सहयोगी’– ‘शब्द अपाहिज मौनीबाबा’, पृष्ठ -109-110।
इस प्रकार ‘शब्द अपाहिज मौनीबाबा ’ नवगीत संग्रह के 64 नवगीत अपनी अन्यतम अलंकारिता के माध्यम से भावों का उन्मेष आलोकित करते हैं । शिवानंद सिंह ‘सहयोगी ’ द्वारा प्रणीत यह नवगीत संग्रह निश्चित रूप से मानव मन को आंदोलित करते हुए जीवन के विविध नवीन पहलुओं को उजागर करता है । विविध रसों एवं अलंकारों के माध्यम से नवगीतकार ने नवगीत विधा को एक नवीन पथ एवं आयत्त को प्रदान करने का सराहनीय प्रयास किया है । चूंकि साहित्यकार स्वयं ही जमीनी रचनाधर्मिता से युक्त व्यक्तित्व है और अपने जीवन को विविध आयामों के माध्यम से देखने और परखने का प्रयास किया है । उसकी अंतरात्मा हमेशा एक नवीन उत्सर्जना के लिए हिलोरें मारती रहती है और नवगीतकार उन हिलोरों में स्वयं को तैराते हुए नवीन मीठे–कड़वे अनुभूति को नवगीत के माध्यम से प्रस्तुत करता है । ‘सहयोगी’ जी के हरेक नवगीत में अन्यतम पारदर्शिता के चित्र देखे और परखे जा सकते हैं । मुझे लगता है कि ऐसी सृजनशीलता की आज के परिवेश में बहुत बड़ी अवश्यकता है ,क्योंकि आज का मनुष्य ग्रामीण होते हुए भी भागती–दौड़ती जिंदगी के माध्यम से शहर के पारिवेशिक वातावरण के प्रति आकर्षित होता हुआ गाँव से पलायन की ओर अभिमुख होता जा रहा है । अब उसे शहर की आबो-हवा ज्यादा मखमली एवं सुहावनी लगने लगी है और लगे भी क्यों न , क्योंकि सारी सुख-सुविधाओं की व्यवस्था भी तो शहर में ही हो रही है और अभाव ग्रसित व्यवस्था वाले गाँव से अब ग्रामीण लोग भी उदासीन होने लगे हैं । पढ़ाने–लिखाने से लेकर इलाज कराने एवं उद्योग लगाने तक का काम शहर से ही जुड़ा होता है । यही नहीं ग्रामीण परिवेश में जीने वाले हरेक मनुष्य की जटिल समस्याओं का समाधान भी शहर में ही होता है , इसलिए ग्रामीण परिवेश के व्यक्ति में यह मानसिकता व्याप्त होती जा रही है कि सारी समस्याओं का निदान शहर के अलावा और कहीं संभव नहीं है ,यही नहीं वनस्पति से लेकर हर प्रकार की जड़ी–बूटियाँ एवं विविध प्रकार की फसलों की उत्तम गुणवत्ता भी अब शहर में प्राप्त हो रही है । इसलिए कृषि व्यवस्था वाला आदमी भी कृषि को छोड़कर शहर की ओर पलायन कर रहा है ।
जिसका जन्म शहर में होता है ,वह ग्रामीण परिवेश की स्थिति को नहीं जानता है और न ही जानना चाहता है । गेंहू की रोटी तो खाना चाहता है किन्तु गेंहू कैसे और कहाँ उत्पन्न होता है ,इसकी जानकारी नहीं रखता और शहर की भागती–दौड़ती जिंदगी में गमगीन एवं लीन रहता है । ग्रामीण परिवेश से युक्त तमाम तरह की जानकारियाँ जीवन को उपयुक्त सार्थक आयाम प्रदान करते हैं ,इसलिए इन्हें जानना और जीवन में धारण करना नितांत आवश्यक है । इस अनजानी पहलू से आमना-सामना कराने का कार्य नवगीतकार करता है । शिवानंद सिंह ‘सहयोगी’ के नवगीत निश्चित रूप से भारतीय प्राणवत्ता एवं उत्स को प्रस्तुत करते हैं और जीवन का यथार्थ आईना भी सबको दिखाते हैं ,इसमें कोई दो राय नहीं है ।

समीक्षक का परिचय:- समीक्षक स्वयं कवि एवं गीतकार हैं और गीत व कविता लिखते हैं। इनके लगभग 17 शोध आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। फिलवक्त मीरजापुर स्थित एस.एस.पी.पी.डी.जी.पी. कॉलेज के हिन्दी विभाग में सहायक व्याख्याता के पद पर आसीन हैं।

 

पुस्तक का नाम- शब्द अपाहिज मौनीबाबा
रचनाकार- शिवानन्द सिंह ‘सहयोगी’
संस्करण-२०१७
प्रकाशक- अयन प्रकाशन
१/२० महरौली, नई दिल्ली-११० ०३०
मूल्य.३४०/-रुपये