कहानी – सोनाली मिश्रा / कविताओं के हलवाई

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ग्रामीण पृष्ठभूमि में पली-बढ़ी लेखिका मूलतः अनुवादक हैं। अंग्रेजी में परास्नातक की शिक्षा प्राप्त करने के बाद इनहोंने ‘कविता के अनुवाद के सैद्धांतिक पद्धतिपरक आयाम’ विषय पर शोध प्रबंध प्रस्तुत किया है। अनुवाद पर कार्य करने के दरम्यान ही साहित्य के प्रति आकर्षण पैदा हुआ। अनुवाद कार्य करते हुए इन्होंने कविता और कहानी लेखन शुरू किया। कथादेश, परिकथा , आउटलुक, जनसत्ता सहित कई अन्य पत्र-पत्रिकाओं में इनकी कहानियों का प्रकाशन हो चुका है। ‘डेस्डीमोना मरती नही’ (कहानी संग्रह), ‘रोमा लोमड़ी और इंटरनेट’ नामक बाल कहानी संग्रह का प्रकाशन हो चुका है। लेखिका द्वारा रचित काव्य संकलन भी शीघ्र ही पाठकों के हाथों में होगा। प्रस्तुत है सोनाली मिश्रा द्वारा रचित कहानी ‘कविताओं के हलवाई’ – डा. मधुलिका बेन पटेल की विशेष टिप्पणी के साथ। मधुलिका , फणीश्वरनाथ रेणु डॉट कॉम के संपादकीय कार्यकारिणी से भी संबद्ध हैं। – संपादक 
बदलते हुए परिवेश की अभिव्यक्ति
‘कविताओं के हलवाई’ कहानी में सोनाली मिश्रा ने तेजी से बदलते हुए समाज को बड़े ही कलात्मक शब्दों में सामने रखा है. कहानी की शुरुआत लस्सी से होकर कब पूरे शहर को समेट लेती है, पता ही नहीं चलता. चचा मुरारी की मानसिक उधेड़बुन, खालीपन और इस खालीपन महसूस करने के क्रम में कविताएँ लिखना आदि सब बड़ी सहजता से व्यक्त होता है. इसी बीच मुरारी की पत्नी के ऊपर काम का बोझ, बच्चों की देखरेख और प्रेम से उनका मोह भंग बड़ी बारीकी से अभिव्यक्त किया गया है. सोनाली की कहानी कम शब्दों में बदलते हुए परिवेश को व्यक्त करती है. उन्होंने हर प्रसंग के अनुरूप भाषा का प्रयोग किया है. बीच-बीच में व्यंग्य का पुट भी है. कहानी क्लाइमेक्स प्राप्त कर अंततः एक अच्छे मोड़ पर समाप्त होती है. इसमें महज मुरारी की कहानी नहीं, वरन तेजी से गायब होते गाँव, हर ओर शहरों का कब्ज़ा, कविताओं पर हावी होते चुनावी दौर, काव्य मंचों की खस्ता हालत और इस बीच मुरारी की पत्नी का बड़ी कुशलता से दुकान, घर, और बच्चों को सभांलना सब कुछ बड़े अच्छे ढंग से व्यक्त किया गया है. पूरी कहानी एक साँस में पढ़ी जा सकती है, यह रचनाकार की योग्यता प्रदर्शित करता है. – डॉ. मधुलिका बेन पटेल (सहायक प्राध्यापक) ,हिन्दी विभाग, तमिलनाडु केन्द्रीय  विश्वविद्यालय, तिरुवारूर

                                  कविताओं के हलवाई
                                     सोनाली मिश्रा
पूरे शहर में सबसे बड़ी दुकान थी चचा मुरारीलाल की! मुरारी की लस्सी के नाम से। पहले लस्सी की दुकान थी, खूब मन से लस्सी बनाते थे, पिलाते थे। धीरे धीरे लस्सी की मिठास घुलती गयी और चचा मुरारी के मन में और मिठास पैदा करने का मन हुआ। तो हुआ यूं कि इस छोटे से शहर में जहां केवल सम्बन्धों के आधार पर ही दुकान और मकान चलते थे, मिसिर, पण्डे जी, किसोर की अम्मा जैसे रिश्ते बन जाते थे। जहाँ साइकिल में ही पूरे शहर की सीमा अपने नाम पर धर ली जाती थी, तो उस कसबे नुमा शहर में चचा मुरारी लाल ने लस्सी की दुकान को विस्तारित करने का सोचा।
हलवाई बुलाए, लड्डू और सोनपापड़ी बनाने के लिए कारीगर बुलाए। उन दिनों तक गाँव में रोजगार की किरण पहुँची नहीं थी, वैसे तो अभी भी नहीं है, मगर अब मनरेगा आदि से लोग गावों में टिकने लगे हैं, मगर पहले ऐसा नहीं था, पहले तो कौड़ियों के दाम पे मिल जाते थे। चचा मुरारी ने अपने दुकान के लिए जल्द ही बगल वाले खोखे खाले करवा लिए और बहुत जल्द एक पक्की दुकान बना ली।
धीरे धीरे चचा मुरारी के शहर का भी विस्तार होने लगा था। वह कस्बेनुमा शहर धीरे धीरे फलैट वाला शहर होने लगा था।शहर के बढ़ने की गति चचा मुरारीलाल की सोच से भी तेज निकली थी। बहुत ही तेजी से विकास की सीमाएं नगर को महानगर में, कसबे को नगर में और गाँव को कसबे में बदल रही थीं। कब कसबे नगरवधू की तरह आगोश में आते जा रहे थे, पता ही नहीं चल पा रहा था। एक दिन जहाँ जमीन दिखती, अगले ही दिन वहां पर किसी न किसी बिल्डर का बैनर और लाल पीले झंडे लहराने लगते।चचा मुरारी ने मौक़ा देखा, और उस विकसित होते नगर में मुरारी की लस्सी और मिठाई की एक शाखा खोल ली। उन दिनों वे बहुत ही बिजी रहने लगे थे। इसी बीच चचा मुरारी लाल गौना भी करा लाए, और तीन चार बरस में हर साल एक की तर्ज पर तीन चार बच्चे भी उनके आंगन में दौड़ने लगे। अब चची का काम हो गया घर सम्हालना और चचा का काम हो गया, दुकान। तो जैसे जैसे विस्तार होता गया, चचा की दुकानों की शाखा इस विकसित होते नगर में फैलने लगी।
तीन चार दुकानें होने के बाद एक दो मैनेजर रखने के बाद और गाँव से तीन चार हलवाई लाने के बाद और सभी दुकानों के स्वादों का मानकीकरण करने के बाद चचा फ्री रहने लगे थे। अब चची तो ठहरी ठेठ गंवई चची, उसपे चार चार बच्चे, बच्चे सम्हालें या घर या पति? हालांकि उसमें सबसे हल्का पलड़ा पति का ही रहता।समय के साथ शरीर भी भरने ही लगा था. आईं थी दुबली पतली होकर, चार बच्चों के बाद शरीर ने जैसे विद्रोह हर दिया था कि अब एक सीमा से कम नहीं होना. ऐसे में कैसे गले लगें चचा के. चचा को धीरे धीरे कमरे से बाहर ही धकेल दिया था. बार बार कहतीं “न बाबा न, तुम्हाए प्यार से बहुत डर लगे है, एक रात को प्यार और फिर एक साल का दर्द, न बाबा!” और चचा को प्रोटेक्शन में मजा नहीं आता था, क्या दीवार लगाकर प्यार करना! मगर दीवार न लगा पाने से अब तो ज़िन्दगी भर के लिए जो दीवार लगी, उसने चचा के लिए सारे रास्ते बंद कर दिए. उनकी श्रीमती के लिए तो जैसे हर रोज़ एक जंग ही होती थी, चार चार बच्चे, सवेरे उठते ही उन चारों के लिए चार तरह का नाश्ता बनाना, फिर आठ बजे तक उन्हें तैयार करके स्कूल भेजना, रोज़ ध्यान रखना कि किस दिन हाउस ड्रेस है, किस दिन नॉर्मल है और नौ बजे के बाद से घर के कामों में लगना!
चचा बहुत छुआ छूत वाले थे और परम सात्विक थे, पत्नी के हाथों के खाने और बर्तन के शौक़ीन थे, भला चचा कैसे सह सकते थे कि कोई आता और उनके घर में बर्तनों को हाथ लगा देता।सो उनकी श्रीमती ही बर्तन धोने से लेकर कपडे धोने तक सारे काम करती थीं. अब हलवाई के हाथ की मिठाई खा लेते थे, मगर घर के बर्तन तो श्रीमती ही धोएंगी, और का करेंगी बैठकर. समय के साथ चचा का काम चल निकला था, हर बच्चे के नाम पर एक एक दुकान थी।चचा के पास अब समय ही समय था। अब एक उनका ऑफिस था, उसमें से ही वह अपने मैनेजर, अकाउंटेंट का प्रबंधन करते। चचा बारह बजे तक एकदम फ्री हो जाते, बारह बजे तक वे हर दुकान का एक एक चक्कर लगा आते, फिर पहाड़ जैसा दिन? काटे न कटे! घर जाते, प्रणय का मन होता तो अब चची या तो पोंछा लगाती हुईं मिलती या फिर बच्चों के लिए खाना पकातीं! ज्यादा करते तो उन्हें मन भर भर गालियाँ सुना देतीं,
“हमाए ही करम फूटे थे, जो जे हरवाई किस्मत में मिरो, जे हमें मारके ही दम लाइए! एक तो खबूस खाबूस कर खात रहत है, फिर जाको सरीर चाहिए, जे नहीं, चार चार बच्चन के होन के बाद एक काम वारी ही लगाय दये, न तो तो करो घर को काम और तापे दिन भी आए जात है नोचन के लाएं!”
चचा मुरारी अपनी इस चन्द्रमुखी से ज्वालामुखी में बदली बीवी से डर जाते, मगर प्रयास उनका जारी रहता। अभी पिछले दिनों चची ने दिन में पेटीकोट पहन कर ही सारा काम किया, बच्चों के आने पे भी पेटीकोट ही पहने रहीं, चचा ने टोका तो बोलीं
“अब तुम्हें भकोसने को चाहिए तो भकोसो! अब हमहूँ न पहनिए साड़ी! अब तुम्हए सामने जैसन खड़े हैं, वैसन ही हैं! अब खाओ, तुम्हें जित्तो खान है!”
चचा उस दिन पहली बार लजाए थे, क्योंकि वे भी बदलते समय के साथ इस विस्तारित शहर में आ गए थे, और चार बेडरूम वाले फ्लैट में रह रहे थे। पड़ोस में आवाजें जाने लगीं थीं। चचा बहुत लजा गए थे।चचा ने लजाकर उस दिन के बाद अपने बच्चों के मन में उमड़ते घुमड़ते सवालों से बचने के लिए घर में आना कम कर दिया था और ऑफिस में ही बैठे रहते, विरह के गीत सुनते रहते! चालीस की उम्र और उस पर देह का विरह! देह की अगन चचा को रुलाती! मगर क्या करते चचा मुरारी? चचा को लगता कि कोई तो होता जो उनकी बातों को समझता, कोई मित्र ही आ जाए और उस पर लड़की मित्र हो तो बात ही क्या हो.अब ऑफिस में बैठ बैठ कर व्यापार को ही बढ़ाने में लगे रहते। चालीस पार कर रहे मुरारी को अब कौन मिलती? अब दिल्ली दरबार तो था नहीं कि चालीस पार पे भी कोई आ जाती उनकी झोली में! उनकी झोली तो खाली की खाली ही रहनी थी, तिस पे मिठाई खा खाकर तोंद इतनी बढ़ गयी थी कि चाहकर भी किसी रमणीय लड़की के ख्वाब भी देखना मुश्किल। जैसे ही सपने में किसी को भी मान लें ऑफिस में रिसेप्शन सम्हालने वाली को ही गले लगाने की कोशिश करते, वैसे ही उनकी तोंद बीच में आ जाती! कामदेव ने तीर तो चला दिया था, मगर उस तीर का गलत असर हुआ। दिल और शरीर दोनों ही जल रहे थे, मगर कर कुछ सकते नहीं थे! चचा का मन तो होता कि एक और घर बसा लें, और उसमें केवल देह की अग्नि को बुझाने के लिए ही किसी को रख लें, और यह कोई नई बात तो होनी नहीं थी. अब तो सरकार ने भी दूसरी पत्नी से पैदा हुए बच्चों को अधिकार दे दिए हैं. मगर बच्चा का ध्यान आते ही वह पीछे हट जाते, “अगर ऐसा कुछ करेंगे तो दीवार का इस्तेमाल करेंगे, मिलन इस बार दीवार के साथ!” और ऐसा हो क्यों नहीं सकता, एक ही तो घर है नहीं उनके पास.
हालांकि कहने के लिए उनके पास इस नव विकसित शहर में तीन तीन फ्लैट थे, जिसमें भी मन होता वहां जा सकते थे, मगर जितने उत्साह से सपनों का गुब्बारा फूलता उतनी ही तेजी से वह फूट जाता. इस नए विकसित होते शहर में लगभग हर मोहल्ले में लोग उन्हें जानते थे. खाली समय में फ़्लैट भी बिकवाने लगे थे, तो हर प्रोपर्टी डीलर किसी न किसी का भाई निकलता, अब ऐसे में जिस जिस फ़्लैट को उन्होंने किराए पर चढा रखा था वहां वह कैसे जाते? किस मुंह से खाली कराते और किस काम के लिए? तो उन्होंने फाइनली फिलहाल के लिए दिल के मामले को एक तरफ रख दिया।अब दिल कहें या शरीर कहें, एक ही बात थी। दिन भर ऑफिस में रहते, रात को घर जाकर खाना खाकर सो जाते।
दिन कहें या रात सब कुछ चचा मुरारी का बेकार हो गया था। मगर एक दिन उन्होंने अपने अक्षरज्ञान का कुछ और फायदा उठाया।
मुरारी को शौक था गाने सुनने का। दोपहर में बैठे हुए वे विरह के गीत सुनते रहते। लता, रफी और मुकेश के गाने सब उन्होंने रट डाले! चाँद फिर निकला मगर तुम न आए, तरह के गाने मुरारी के जीवन का अमिट हिस्सा बन गए।और ऐसे ही एक दिन भरी दोपहरी में मुरारी ने दिल की बात लिख डाली कागज़ पर
“दिल हुआ बेचैन है कहाँ हो तुम?
रस्ते में दो नैन हैं कहाँ हो तुम?”

और उस दिन उन्हें अपने अन्दर की छिपी प्रतिभा का भान हुआ। मुरारी को लगा वे तो गजब लिख लेते हैं। अब तो मुरारी को जैसे एक लक्ष्य मिल गया। मुरारी को चस्का लग गया, अब वे रोज़ दो लाइन लिखते और अपने ऑफिस में लोगों को सुनाते। उनके मातहत खूब वाहवाही करते। चाय आदि का लम्बा दौर चलता, मगर एक ही महीने के बाद जब उन्होंने बैलेंस शीट में इनकम कम और खर्चा जयादा देखा तो उन्होंने चर्चा पर खर्चा करना बंद कर दिया और उन्हें यह अहसास हुआ कि अपनी प्रतिभा को वे अपने अधीनस्थों पर नहीं कहीं और ही दिखाएंगे। अब उन्हें लगने लगा था, कि कुछ न कुछ तो करना ही होगा। बीवी के सामने प्रतिभा प्रदर्शन का मौक़ा नहीं था, और बच्चों के सामने? ओह न! वे तो बहुत ही छोटे थे। अब क्या करें? मुरारी के दिमाग ने बहुत ही जल्द पलटी खाई।
मुरारी अपनी दुकानों के बाजारों के व्यापार संघ के घोषित सदस्य थे। अब तक केवल बैठकों में ही जाते थे, कभी बैठकों के बाद चंदा देने के बाद कुछ और करने की या मिलने जुलने की कोशिश भी नहीं की थी।मुरारी ने धीरे धीरे बैठकों के बाद भी बैठना शुरू किया। जब भी बैठक होती, तो सवाल उठाते और सवाल भी किसी न किसी शेर के बाद ही शुरू करते। चंदा देने की घोषणा के समय भी सक्रिय रहते। धीरे धीरे उन्होंने खुद को मुखर कर दिया। और जल्द ही व्यापार संघ के छुटभैये नेताओं के रूप में उनका नाम आने लगा। और उस पर मुरारी कवि भी थे। रियाज़ करते रहने से अब वे देश पर भी कविताएँ गाने लगे थे। दरअसल समय भी था राष्ट्रवादी कविताओं के उभार का। कुकुरमुत्तों की तरह न केवल कविसम्मेलन हो रहे थे, बल्कि ऐसे कवि भी ढेरों उभर आए थे, जो इधर की ईंट और उधर का रोड़ा लेकर नई नई राष्ट्रवादी कवितायेँ लिख रहे थे। छोटे उभरते हुए मोहल्लों में माइक और लाउड स्पीकर के माध्यम से राष्ट्रवाद घोंट कर पिलाया जा रहा था। उग्र स्वर में गाया जाता “भरा नहीं है जो भावों से बहती जिसमें रसधार नहीं, दिल नहीं वह पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं!” कब ह्रदय दिल हो जाता और कब वरिष्ठतम, वरिष्ठम हो जाता पता ही नहीं चल पाता। पता चलता तो केवल और केवल एक ही भाव कि जी देश के लिए कविता रच ली!
गली मोहल्ले में से छोटे छोटे घर गायब हो रहे थे, आंगन गायब हो रहे थे, टूट टूट कर सब फ्लैट बनते जा रहे थे। जैसे जैसे परिवार बंट रहे थे वैसे वैसे विघटन कारी मानसिकता भी अपने पाँव पसारने के लिए जैसे उतारू थी।
मुरारी लाल भी एक राजनीतिक पार्टी के नेता से जुडी संस्था के आजीवन सदस्य बन गए थे।उससे उन्हें दो फायदे होते थे, एक तो हर कार्यक्रम में उनकी दुकान की मिठाई इस्तेमाल हो जाती थी और दूसरी तरफ उनकी एक कविता भी चाव से सुनी जाती। धीरे धीरे मुरारीलाल को लगने लगा कि दिल की कविता आह तो देती है, मगर वाह तो कहीं और से मिलती है। और उस पर उन्हें लग रहा था कि नेता जी की ही पार्टी की सरकार आएगी। व्यापार बढेगा, आखिर अपने ही लोगों को तो सरकार काम दिया करेगी, और जे भाई जी को काम मिलने का मतलब है, अपने भी काम में विस्तार होना। मुरारी धीरे धीरे राष्ट्रवादी कविताओं पर हाथ मारने लगे।
शुरू में जरूर विफल रहे मुरारी मगर बहुत जल्द मनोज कुमार की कई फिल्में देख डालीं। आखिर दोपहरी का समय कैसे बिताएंगे? मुरारीलाल ने देश पर न जाने कितनी खौलती हुई कवितायेँ लिख डालीं! जब भी चुनाव की सभाएं होतीं, मुरारी उस क्षेत्र में सबसे आगे रहते। वे सभा के लिए चंदा तो देते ही, साथ ही रंग बिरंगा बिल्ला लगाकर सबसे पहले भी पहुँच जाते! बिल्ला लगाकर वे खुद को बहुत ख़ास महसूस करते! इस अहसास में वे सब कुछ भूल जाते, और सभा शुरू होने से पहले
“उठ भारत के अमर जवान, तुझको देश पुकारता,
भरी जवानी बैठा है क्यों, तुझको देश का वास्ता”
गाते, उत्साह जगाते। मुरारी सभा समाप्त होते होते भाषा का वह ऐसा मिश्रण जनता को पिला देते कि जनता नेता का खूब इंतजार करती। वह उठ कर न जाती। मुरारी की आवाज़ में मिठास गायब हो गयी थी और वे रासो युग के कवि बन गए थे।
कसम खाते हैं माँ की कि अब न रोने देंगे तुझे,
आंसुओं की धार में अब न भीगने देंगे तुझे!”

“कसम से मुरारीलाल, अगर आप न होते तो इतने लोगों को हम कैसे सम्हाल पाते”
एक दिन राजीव जी ने मुरारी लाल के हाथ पकड़ते हुए कहा।उनकी आंखोंमें कृतज्ञता का भाव था, वे वाकई में कृतज्ञ थे। जनता बोर नहीं होती थी, और एक निशुल्क प्रायोजक भी उन्हें मिल गया था। राजीव जी अब समझ गए थे कि कैसे मुरारी लाल का इस्तेमाल करना है।
जैसे ही मुरारी मंच पर चढ़ते, अपनी पसंदीदा कविता पढ़ते वैसे ही राजीव जी के पाले हुए कुछ गुर्गे वाह वाह की रट लगा देते।
मुरारी इस वाहवाही में डूबते जा रहे थे, मंच पर वाहवाही की जो खुमारी थी, वह उन्हें कहाँ ले जा रही थी, मुरारीलाल को पता भी नहीं चल पा रहा था। चारों दुकानों पर कैसे काम हो रहा था, कैसे नहीं उन्हें इस नशे में मतलब ही नहीं था। कहीं लस्सी की मिठास कम तो नहीं हो गयी? या मिठाई के स्वाद में कुछ कमी तो नहीं आई, उन्हें अब बहुत ज्यादा मतलब रह नहीं गया था। अब वे और उनकी कविताएँ और उनका देश! और उनकी पार्टी और मंच की वाहवाही! और इसके चलते उन्हें शहर में कई छोटे मोटे कवि सम्मेलनों में भी भी बुलाया जाने लगा। वीर रस के प्रकांड कवि के रूप में मुरारी लाल मशहूर हो गए।
“माँ भारती शीश तुम्हारा न झुकने दूंगा,
मस्तक भले ही कट जाए,
तिरंगा न मैला होने दूंगा,
हाथ भले ही कट जाएं!”
दोनों हाथ और मस्तक केवल माँ भारती का ही है!
जैसे ही वह ये कहते, लोगों के मन में वीर रस हिल्लोरे मारने लगता। वे नशे में हो गए थे। या तो संस्था और या फिर कवि सम्मलेन! कौन किस पेपर पर हस्ताक्षर करा रहा है, उन्हें पता ही नहीं चलता!
अखिल भारतीय कवि सम्मेलनों में भी उन्हें बुलाया जाने लगा था। शहरों में होने वाले अखिलभारतीय कवि सम्मलेनों की हालत सभी को पता है। कुछ ही महीनों में वे वीर रस के अखिलभारतीय सम्राट बन गए।
मंच पर उन्हें खूब मजा आने लगा। उन्होंने कवि सम्मेलनों का आयोजन कराने वाली संस्थाओं के लिए दान के दरवाजे खोल दिए। जितना उनका सम्मान होता, उतना ही मोटा उनका दान उस संस्था को होता।सम्मान के शील्ड उनकी चेकबुक के हिसाब से मोटी और पतली होती. इधर सरकार हालांकि उनके मन की नहीं आई,मगर यह संतोष था कि जिस विधायक के लिए उन्होंने इतने गाने गाए थे, वे जरूर जीत कर आ गए थे। मतलब हालात इतने बुरे भी नहीं होने वाले थे, मगर उतने अच्छे भी नहीं, जितने सोचे थे।
अगस्त से लेकर अप्रेल में खूब कवि सम्मलेन अधिकतर संस्थाएं कराती हैं। कुछ बड़ी कम्पनी भी अपनी सीएसआर गतिविधियों में कवि सम्मेलनों का आयोजन कराने लगी हैं। तो उनमें उन्हें भी स्थानीय आयोजकों ने खूब मन से बुलाया। उन्हें अखिल भारतीय वीर रस शिरोमणि के नाम से जाना जाने लगा था।
मगर एक समय के बाद मुरारी इन सबसे ऊब गए, कहाँ से रचें अब बार बार वही माँ भारती, अब वीर रस के कवि बन गए और वो भी मंच के तो सिंगार गा नहीं सकते थे। क्या करें? उनके पास अब फिल्मों और पुरानी कविताओं का स्टॉक खत्म होने लगा था।मिठाई के लिए मिठास और चाशनी ख़त्म होने लगे तो क्या होगा? अब कविताओं के लिए तो मिठाई जैसा कोई तय अनुपात नहीं होता है, नहीं तो मुरारी नहीं थकते।इधर इन दिनों राष्ट्रवादी कविताओं में कम्पटीशन बढ़ गया था। मुरारी तो चचा मुरारी हो गए थे, मगर तेईसचौबीस बरस के कई लड़के अपनी जाति के साथ माँ भारती को जोड़कर कविता रचने लगे थे और बची रही कसर फेसबुक जैसे सोशल प्लेटफॉर्म ने पूरी कर दी थी।
चचा मुरारी दो ही साल में मंच से आउटडेट से होने लगे थे। दो साल जब तक वे चंदा देते रहे थे, तब तक वे वीर रस शिरोमणि बने रहे, मगर अब वाकई के वीर रस शिरोमणि आ गए थे। जो मौक़ा पड़ने पर लाठी भी लगा दें।उन वीररस के लड़कों के लिए एक दो मुक्का लगा देना भी कोई बड़ी बात न थी. और जिस पार्टी का झंडा उनके नेता की गाडी पर होता, वह सभी उसी झंडे को अपना बना लेगे. मुरारीलाल के नाम के आगे चचा लगाने से वे एक पीढ़ी बूढ़े हो गए।चचा मुरारी अब माँ भारती के नाम पर बहुत ज्यादा लिख नहीं पा रहे थे, जबकि उनके सामने राजीव जी की गाड़ी का दरवाजा खोलने वाले मंच पर खूब जोर शोर से “हिन्दू नया साल ही मनाएंगे, और अंगरेजी नहीं!” जैसी पंक्तियाँ बोलकर सारा वातावरण पवित्र कर देते।
और भावों की इस बरसात में चचा मुरारी की आवाज़ अब मेंढकों के सामने दब जाती थी, अब चचा का चंदा भी कम होने लगा था। तो चचा की डिमांड भी कम होने लगी थी। इधर चचा मुरारी ने जब दुकान का हिसाब रखना शुरू किया तो उनका दिमाग घूम गया। न जाने कितने महीनों से एक दुकान को छोड़कर सब घाटे में चल रही थीं। बस एक ही दुकान जो घर के पास थी और जिस पर उनकी पत्नी कभी कभी चली जाती थीं, वह सही चल रही थी।उसके कारण ही बाकी की तीन दुकानों का खर्च चल रहा था। ऐसा क्या कर रही थीं। ऐसा क्या हुनर दिखा रही थीं वे? जो उनके मैनेजर नहीं कर पा रहे थे। मगर फिर भी मंच का मोह था, तालियों का मोह था जो उन्हें अपनी तरफ खींच रहा था। चचा के हिस्से का मंच धीरे धीरे छोटा और संकुचित होता जा रहा था और वह काटकर उनके कथित भतीजों की तरफ होता जा रहा था। चचा सिकुड़ रहे थे जबकि वह शहर और कवि सम्मलेन और संस्थाएं खूब बढ़ रही थीं। चचा को समझ ही नहीं आ रहा था कि आखिर गलत क्या हो रहा है।
अब उनकी अलमारी में रखा हुआ वीरशिरोमणि का सम्मान उन्हें मुंह चिढ़ाता।चचा मुरारी ने बहुत चाहा कि सहेज लें, मगर इस हाईटेक दुनिया में जिस तरह से शब्द कम हो रहे हैं भाव सिमट रहे हैं, उनमें वे जैसे खुद को पीछे पाने लगे।चचा पिछड़ रहे थे, माँ भारती का वंदन करते अब बन नहीं रहा था। माँ भारती की मूर्ती देखते, उन्होंने अपने ऑफिस में बड़ी बड़ी तस्वीरें लगा रही थीं, माँ भारती को नज़र भर निहारते, उनके लिए जो कवितायेँ रच डाली थीं, उन्हें देखते!
एक दिन माँ भारती से नज़र हटाकर उन्होंने फिर से बैलेंस शीट पर नज़र डाली। दरअसल उसी दिन शाम को संस्था द्वारा कवि सम्मलेन का आयोजन था, उन्हें भी श्रोता के रूप में बुलाया गया था।वे उस दिन अपना नया नवेला कुर्ता पायजामा पहनकर पहुंचे थे। मंच का संचालन एक युवा कर रहा था।
“भाइयों और बहनों, बहुत ही जल्द हमारे बीच आज के सबसे सफल कवि उपस्थित होंगी, जिनकी वीर रस की रचनाएं सुनकर आप सब इतना खुश होंगे, इतना खुश होंगे कि क्या कहें!”
उस युवा ने देखा इधर उधर, अभी लोग आए नहीं थे! आने की प्रक्रिया में थे
“आइये साहब, आइये न भाई साहब, हम लोग आज अपनी संस्कृति को बचाने के लिए कवि सम्मलेन में इकट्ठे हुए हैं। आप सबको पता ही है कि हमारी संस्कृति आज कितने खतरे में है!”
और ऐसा करते हुए वह देख रहा है कोई लड़की आई या नहीं!
“हमारी संस्कृति पर इंग्रेज आए, डाका डाला और अभी तक डाल रहे हैं, कभी कपड़ों के द्वारा, कभी विचारों के द्वारा!, देखिये जाइए नहीं, अभी हमारे बीच आपके जिले के तो बिलकुल ही नहीं पूरे देश भर से कवि पधार रहे हैं! जो संस्कृति से भरपूर कवितायेँ सुनाएंगे! जिनमें से संस्कृति और हिन्दू संस्कृति इतनी टपकेगी कि आपकी साहित्यिक प्यास को पूरा कर देगी!”
इधर संस्कृति को वह युवा बार बार टपका रहा था, माहौल बहुत ही संस्कृतिमय हो गया था। कल रात को दो बजे तक वह डिस्को से लौटा था, और आज ही भाई साहब से मंच संचालन के लिए बुला लिया था। जब तक वास्तविक मंच संचालक नहीं आते, तब तक उसे ही सम्हालना था
“देखिये, भाई साहब जाइए नहीं! अभी आपको वरिष्ठम कवियों को सुनना है, जिनकी कविताओं में आपको वह संस्कृति मिलेगी जो खोती जा रही है, देखिये, हमें गायब होती संस्कृति को वापस लाना है, और ये हमें ये कवि लोग ही कराएंगे! कितना बढ़िया होता है, संस्कृति की कविताएँ सुनना! आप सुनिए और संस्कृति को अपना हिस्सा बना लीजिए! माँ भारती के लिए इतना भी नहीं करेंगे! और सुनिए हमें बिलकुल भी अंग्रेजी सभ्यता का हिस्सा नहीं बनना है, दोनों हाथों से कसम लीजिए कि आज के बाद हम कभी भी अंग्रेजी नया साल नहीं मनाएंगे!”
आज तो झकाझक पहने हुए हैं, कपड़ा भैया जी! बातें खूब हो रही थीं, तभी मंच से राजीव जी ने घोषणा की “हम सबके बीच अपने वीर रस शिरोमणि चचा मुरारीलाल भी उपस्थित हैं, तो जब तक कवि नहीं आ रहे हैं तब तक चचा मुरारी लाल आपको वीर रस की कविताएँ सुनाएंगे!”
चचा मुरारीलाल ने खाली मैदान की तरफ एक खाली नज़र डाली। आधे तो इनमें से कविता के शौक़ीन थे ही नहीं, और मैदान अभी बीस प्रतिशत भी नहीं भरा था। मगर राजीव जी का हुकुम था तो चचा चढ़ गए मंच पर!
“माँ भारती को नमन करते हुए आज मैं आपको संस्कृति पर एक कविता सुनाने जा रहा हूँ!
मातपिता का करो सम्मान, इसी में है हमारी शान,
जीवनसाथी का धरो मान, और बढ़ाओ अपनी पहचान!”
जीवनसाथी की बात पर मुरारी लाल रुक गए!
“का चचा, चची याद आ गईं क्या!” नीचे से आवाज़ आई। खुले मैदान में हो रहे इस कवि सम्मलेन में मच्छर भगाने वाली मशीन का स्प्रे हो रहा था। जितने लोग थे, वे भी छितरा गए! इस छितराई हुई भीड़ में उनका मन नहीं हुआ और वे आधी कविता छोड़कर नीचे उतर आए!
वह युवा फिर से मंच पर अपनी माँ भारती की कविताएँ सुनाने लगा था।
मुरारी भारी मन से बाहर निकल रहे थे कि तभी पुलिस की गाडी आती दिखी! अभी मच्छर की मशीन का धुंआ नीचे नहीं बैठ पाया था कि पुलिस के सायरन ने मैदान में खलबली मचा दी! मुरारीलाल भी वहीं खड़े हो गए, मुरारीलाल का मन तो हुआ कि मैदानमें जाएं मगर भीड़ बढ़ने लगी थी, अब चूंकि इस कार्यक्रम में विधायक और मंत्रियों को भी आना था तो पुलिस का आना उन्हें असहज नहीं लगा! धीरे धीरे भरे मन से वे घर को चले गए! राजीव जी ने उन्हें देखा और नज़र बचाकर निकल गए। मुरारीलाल की आँखों के बीच लाल डोरे, उस मच्छर मारने वाली मशीन के कारण दिखे नहीं।
थके और टूटे मुरारीलाल उस दिन शायद एक डेढ़ साल बाद घर पर समय से पहुंचे थे। बच्चों के लिए उनकी पत्नी ने ट्यूशन लगा दिया था। और उनकी दोनों बेटियाँ डांस सीखने गयी हुई थीं। नौकरों की आपसी बातचीत से उन्हें पता चला कि दोनों का ही चयन स्कूल की एक प्रतियोगिता में हुआ है। बेटे पढ़ रहे थे।
पत्नी दुकान पर गईं थीं, उन्होंने दुकान पर जाकर देखा तो पहले तो सब उन्हें देखकर चौंक गए, मगर वहां की साज सजावट देखकर वे एकबारगी चौंक गए और इस नए रूप को ही देखकर उन्हें लगा कि आखिर इस दुकान से इतनी आय क्यों है। दुकान के हर कोने पर पत्नी की सुरुचिपूर्ण छाप थी, लस्सी का एक कोना, मिठाई का एक और खास खालिस यूपी के व्यंजनों का एक नया कोना। उसमें लखनऊ, या कानपुर के ग्राहकों के हिसाब से मिठाई बनती थी।
चचा मुरारीलाल के लिए यह एक नया अनुभव था। दो साल से वे जिस तलाश में भाग रहे थे, वह तो यह थी! उन्होंने काउंटर पर बैठी अपनी पत्नी को देखा, न केवल मुरारीलाल बल्कि उनकी पत्नी की आँखों में भी हैरानी के भाव थे।
मुरारीलाल चुपचाप अपने ऑफिस चले गए, कल मैनेजर के संग मीटिंग करेंगे और हर दुकान को वही रूप देंगे जो इस दुकान को उनकी पत्नी ने दिया है।
उस रात न जाने कितने समय के बाद वे चैन से सोए होंगे।
सुबह हुई, उसे होना ही था। आज की सुबह मुरारीलाल के लिए एक नई सुबह लेकर आई थी। उन्होंने सुबह पांच बजे ही नहा लिया, चाय बनाकर पत्नी को उठाया। हालांकि उन्हें बहुत अचरज हुआ, मगर कहा कुछ नहीं,
छ बजे मुरारीलाल के सामने उनकी पत्नी ने अखबार रख दिया। हेडलाइन देखते ही चौंक गए चचा मुरारीलाल
“कार्यक्रम में भगदड़ !”
और तस्वीर में कल के कार्यक्रम में नैना जी को छूने की फिराक में मची भगदड़ की तस्वीरें थीं। और लाठी खाते हुए युवा कवियों की।
मुरारीलाल ने भगवान के आगे सिर झुकाया और माँ भारती को प्रणाम कर लिया। बच्चों को स्कूल छोड़ने जाना था।