नवगीत – मनोज जैन मधुर / भावों की लयात्मक अभिव्यक्ति

0
243

गीतकार मनोज जैन मधुर गीतों के गोद में ही पले-बढ़े हैं। इनके पिता गीत संगीत के जानकार थे। इनका परवरिश ही लय सुर और ताल के माहौल में हुआ है। संभवतः इन्हें लिखने की प्रेरणा भी पारिवारिक पृष्ठभूमि से ही मिली है। नवगीत लेखन विधा के वर्तमान दौर में इनकी अपनी खास पहचान है।‘एक बूँद हम’ नामक गीत संग्रह का प्रकाशन हो चुका है। नवगीत परंपरा के कई गीतकारों द्वारा संकलित पुस्तकों में इनके नवगीत संकलित हैं। इसके अलावे इन्हें कई पुरस्कार और सम्मान भी प्राप्त हुए हैं । रेडियो और दूरदर्शन द्वारा आयोजित कार्यक्रम में भी इन्होंने अपनी प्रस्तुति दी है। प्रस्तुत है गीतकार मनोज जैन मधुर द्वारा रचित गीत डा. कृष्णा सोनी की विशेष टिप्पणी के साथ। कृष्णा सोनी फणीश्वरनाथ रेणु डॉट कॉम के संपादकीय संयोजन टीम से संबद्ध हैं।
                     भावों की लयात्मक अभिव्यक्ति
मनोज जैन मधुर का नवगीत बहुरंगी भावों को अपने में समेटे हुए है| कवि ने नवगीत की सारी संभावनाओं को अपने गीतों में अभिव्यक्ति दी है| नवगीत का मूल उद्देश्य शब्दों में भावों की लयात्मक अभिव्यक्ति के माध्यम से पाठक या स्रोत के मन और ह्रदय में प्रवेश करना है| इसके बाद ही वह अपने प्रभाव को दिखा पता है| इस लिहाज से देखें तो मधुर का नवगीत अपने उद्देश्य में सफलता प्राप्त करती दिखाई पड़ती है|कवि की कई पंक्तियां पाठकों को बेचैन करती है, जैसे- जड़ से बांधे रहे दर्द को / तब जाकर हम -/ किसी दु:खी का दुखड़ा लिख पाये।। ये पंक्तियां एक मार्मिक परिवेश को रचती हैं जहाँ पहुच कर पाठक अपने को दुखड़ा को फिर से दुहराने लगता है | कवि ने दर्द की तपिश को सर्वव्यापी बना दिया है| इनके नवगीतों का केनवास बहुत ही व्यापक है जो अनेक सन्दर्भों को अपने में समाहित किये हुए है| उदाहरण के लिए इस बंद को देख सकते हैं-शब्दों में होता सम्मोहन, / शब्दों में होती गहराई। /रचता शब्दों का जादूगर, / शब्दों से सच्ची कविताई। / शब्दों की पावन गंगा में, / जोभी उतरा वह हुआ अमर । / शब्दों ने रच दी रामायण, / शब्दों ने छेड़ा महासमर । ऐसे अनेक स्थल हैं जहाँ कवि ने को शब्दों के मोती को पिरोकर भावों की माला गुथी है| – कृष्ण सोनी, सहायक प्राध्यापक, गुरु घासीदास विश्वविद्यालय, बिलासपुर

*नवगीत*

1 . गीत का मुखड़ा

जब मन हुआ खरे सोने सा,
तब जाकर हम-
किसी गीत का मुखड़ा लिख पाये।।

मन का विभ्रम मन का संयम,
पल भर में टूटा।
अंतर से अन्तरा गीत का,
सोते सा फूटा।

जड़ से बांधे रहे दर्द को
तब जाकर हम-
किसी दु:खी का दुखड़ा लिख पाये।।

नीर क्षीर सा मन था,
जो छंदों से बंधा रहा।
सृजन क्षणों में मानस अपना,
नट सा सधा रहा।।

लय में भाव शक्ति शब्दों में जब हमने फूंकी-
उजले मुख को तब-
चन्दा का टुकड़ा लिख पाये।।

2 . भावों का अभिषेक न हो 

हम बाँधा करते भावों को,
पर शब्द नहीं बंध पाते हैं।
मन बोला ऐसा होता है,
जब कथनी करनी एक न हो।

बंधते हैं शब्द समुच्चय में,
वाणी से मुखरित होते हैं।
शब्दों में ताकत अद्भुत है,
हर मन का कल्मष धोते हैं।
शब्दों में होती शीतलता ,
शब्दों में होती है ज्वाला।
ढल जाते वेद ऋचाओं में
यदि छू ले पावन मन वाला।
हमने चाहा सूरज लिख दें,
पर अंधियारा लिख जाता है।
मन बोला ऐसा होता है
जब नीर औ’क्षीर,विवेक न हो।

ढाई आखर को बिन जाने,
ढाई आखर हो जाने की।
हमने शब्दों से चाह रखी,
मन वांक्षित फल को पाने की।
शब्दों का सच्चा सेवक ही,
आराधक है मतवाला है।
सच है ये शब्द सनातन हैं
शब्दों का रूप निराला है
हमने चाहा कुछ अर्थ खुले,
विस्तार न मिलता भावों को,
मन बोला ऐसा होता है,
जब मानस वाणी एक न हो।

शब्दों में होता सम्मोहन,
शब्दों में होती गहराई।
रचता शब्दों का जादूगर,
शब्दों से सच्ची कविताई।
शब्दों की पावन गंगा में,
जो भी उतरा वह हुआ अमर।
शब्दों ने रच दी रामायण,
शब्दों ने छेड़ा महासमर।
हमने चाहा कुछ गीत लिखें,
पर छंद नहीं सध पाता है,
मन बोला ऐसा होता है,
जब भावों का अभिषेक न हो।

3. सुनहरी सुबह

सुनहरी सुनहरी,
सुबह हो,
रही है।
*
कहीं शंख ध्वनियाँ,
कहीं पर ,
अज़ानें।
चली शीश श्रद्धा,
चरण में,
झुकाने ।

प्रभा तारकों
की स्वतःखो
रही है।
*
सुनहरी सुनहरी,
सुबह हो,
रही है।
*
प्रभाती सुनाते,
फिरें दल,
खगों के।
चतुर्दिक सुगंधित,
हवाओं,
के झोंके।
नई आस मन में,
उषा बो,
रही है।
*
सुनहरी सुनहरी,
सुबह हो,
रही है।
*
ऋचा कर्म की ,
कोकिला ,
बाँचती है।
लहकती फसल,
खेत में ,
नाचती है ।

कली ओस,
बूंदों से मुँह धो ,
रही है।
*
सुनहरी सुनहरी,
सुबह हो ,
रही है।

4 . हम बहुत कायल हुए हैं 

हम बहुत कायल हुए हैं
आपके व्यवहार के।

आँख को सपने दिखाये
प्यास को पानी ।
इस तरह होती रही
हर रोज़ मनमानी।
शब्द भर टपका दिए दो
होंठ से आभार के।

लाज को घूँघट दिखाया
पेट को थाली।
आप तो भरते रहे पर
हम हुए खाली।
पीठ पर कब तक सहें
चाबुक समय की मार के।

पाँव को बाधा दिखाई
हाथ को डण्डे।
दे दिए बैनर किसी ने
दे दिए झन्डे।
हो सके कब जीत के हम
हो सके कब हार के।

5 . दो बोल

कुछ नहीं दें किन्तु हँसकर
प्यार के दो बोल बोलें।

हम धनुष से झुक रहे हैं
तीर से तुम तन रहे हो।
ब्रह्मबंशज हैं भला फिर
क्यों अपरिचत बन रहे हो।
हर घडी शुभ है चलो मिल
नफरतों की गांठ खोलें।
कुछ नहीं दें किन्तु हँसकर
प्यार के दो बोल बोलें।

स्वर्गजैसी सम्पदा हमनें
कभी चाही नही है।
हम किसी अनुमोदना के व्यर्थ
सहभागी नही है।
शब्द के बश में रहें और
आखरों की शरण हो लें।
कुछ नहीं दें किन्तु हँसकर
प्यार के दो बोल बोलें।

फिर भला सुदृण करें क्यों
बैर की बुनियाद को अब।
पुनःस्थापित करें हम
मध्य में सम्बाद को अब।
धूप भरकर मुट्ठियों में
द्वेष का सब तमस घोलें।
कुछ नहीं दें किन्तु हँसकर
प्यार के दो बोल बोलें।

हाथ पर सरसों जमाना ,
तूल देना ,छोड़ देना।
हम न अब तक सीख पाये
व्यर्थ में मन तोड़ देना।
साक्ष्य ईश्वर को बनाएं
और अपने मन टटोलें।
कुछ नहीं दें किन्तु हँसकर
प्यार के दो बोल बो

6 . हम सुआ नहीं हैं पिंजरे के

संदेश नही वि॒ज्ञापन के
जो बिना सुनेे
कट जाएंगे
आराध्य हमारा वह ही है
जिसके तुम नित गुण गाते हो
हम भी दो रोटी खाते हैं
तुम भी दो रो टी खाते हो
छू लेंगें शिखर न
भ्रम पालो हम विना चढ़े
हट जाएंगे

उजियारा तुमने फैलाया
तोड़े हमने सन्नाटे हैं
प्रतिमान गढ़े हैं तुमने तो
हमने भी पर्वत काटे हैं
हम ट्यूव नहीं हैं डनलप के
जो प्रैशर से
फट जाएंगे

है सोच हमारी व्यवहारिक
परवाह न जंतर मंतर की
लोहू है गरम शिराओं का
उर्वरा भूमि है अंतर की
हम सुआ नहीं है पिंजरे के
जो बोलोगे
रट जाएंगे

उलझन से भरी पहेली का
इक सीधा सा हल है
बेअसर हमारी बात नही
अपना भी ठोस धरातल है
हम बोल नहीं है नेता के
जो वादे से
नट जायेगे

7. सिर्फ तुम्हारे लिए

तू जीत गई
मैं हार गया।

कैसा सम्मोहन बातों में,
आकर्षण बांधे,
बंधन में।
तू बिखरी दसों दिशाओं में
रहती मन के
स्पंदन में।
चितवन के एक
छलावे में
मेरा अपना
संसार गया।

तू जीत गई
मैं हार गया।

तू कूका करती कोयल-सी
मेरे मन की
अमराई में।
तू,अन्तर्लय है छंदों की
तू, ही दिल की
गहराई में।
मैं मुक्त हंसी पर
रीझ गया
अंर्तमन अपना वार गया।

तू जीत गई
मैं हार गया।

तुझ से ही यह दिन
सोने-से तुझ से ही
चांदी-सी रातें।
तेरे होने से जीवन में
मिलती रहती
हैं सौगातें।
रूठी तो,भाव
अबोला-सा
धीरे से-आ पुचकार गया।

तू जीत गई
मैं हार गया।