यादों में घुले : काज़ी अब्दुल सत्तार

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                       यादों में घुले : काज़ी अब्दुल सत्तार

                                         रामलखन कुमार

खालिद शरीफ़ का मशहूर शेर है ‘बिछड़ा कुछ इस अदा से कि रुत ही बदल गई, इक शख्स सारे शहर को वीरान कर गया।’‘काज़ी अब्दुल सत्तार’ साहब का जाना अलीगढ़ के लिए कुछ ऐसा ही है। 29 अक्टूबर 2018 की यह तिथि ने उर्दू के एक महान साहित्यकार को खो दिया है। आज जब चारों ओर धार्मिक उन्माद चरम पर है ऐसे में सत्तारजी का जाना दोहरी क्षति है। आजीवन एकता और भाईचारा का पाठ पढ़ाने वाले, अमत समतामूलक समाज निर्माण के हिमायती आज यही यहीं खो गए।इन्टरनेट पर देश भर से श्रद्धांजलि दी जा रही है। लोग उनके व्यक्तित्त्व को याद कर रहे हैं। हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए आजीवन संघर्षरत काज़ी साहब बेजोर मिसाल है, आज की युवा पीढ़ी के लिए। वह हमेशा इस बात को लेकर चिंतित थे कि लोग धर्म को लेकर उन्मादी क्यों होते जा रहे हैं, विभाजन और हिन्दू-मुस्लिम दंगे को उन्होंने कई बार देखा था। उनका समग्र साहित्यिक चिंतन भी इस बात का गवाह है। आज जब काज़ी अब्दुल सत्तार साहब हमारे बीच नहीं हैं तो ऐसे में उनके विचार हमेशा लोगों के मन-मस्तिष्क में कौंधते रहेगे।
उनके निधन पर अलग-अलग अख़बारों और सुधिजनों का पोस्ट उनके न होने का दर्द बया करता है। 29 अक्टूबर 2018 को ‘अमर उजाला’ ने लिखा कि “किस्सागोई चुप है और हर पल उदास’, पद्मश्री काज़ी अब्दुल सत्तार के निधन पर शहर में शोक की लहर।” सत्तारजी का जन्म 1933 ई. में सीतापुर जिले के मछरेटा में हुआ था। वे पहले लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्र रहे और बाद में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में शोधार्थीऔर फिर उर्दू विभाग में लंबे समय तक प्रोफेसर रहे। उन्होंने कयी किताबें लिखीं जो आज भी उन्हें उर्दू साहित्य में ऊँचे ओहदे के लेखक बनाती हैं। सत्तारजी का लेखन हमेशा कुछ बदलने की हिमायत करता है। उनहोंने कई अफसाने लिखे। ‘शिकस्त की आवाज़’, ‘मज्जू भैया’, ‘गुब्बार ए शाब’, ‘सलाहुद्दीन अयुब’, ‘दाराशिकोह’, ‘गालिब’, ‘हजरत जान’, ‘पीतल का घंटा’ और ‘बादल’आदि काफी चर्चित है। सत्तारजी को साहित्यिक योगदान के लिए आधे दर्जन से भी अधिक सम्मान प्राप्त हुआ। 1973 ई. में गालिब सम्मान,1974 ई. में पद्मश्री, 1977 ई. में मीर अवार्ड, इसी साल उतर प्रदेश अकादमी ने भी सम्मानित किया।साथ ही 1987 ई. में आलमी और राष्ट्रीय पुरस्कार, 1996 ई. में निशान-ए-सर सैयद, 1997 ई. में ज्ञानेन्द्र, 2002 ई. में बहादुर शाह जफर, 2005 ई. में अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार दोहा,2008 ई. में आईएसटी यूनिवर्सिटी उर्दू शिक्षक पुरस्कार और 2011 ई. में उतर प्रदेश हिंदी संस्थान सम्मान से नवाजा गया। जनवादी लेखक संघ की जब स्थापना हुई तो उस स्थापना समारोह का उदघाटन काज़ी अब्दुल सत्तार के कर कमलों से किया गया। यह उनकी प्रगतिशील चेतना का परिचायक है। वे ताउम्र जनवादी लेखक संघ से गहरे रूप से जुड़े रहे।
सत्तारजी के निधन पर ‘हरीश बेताब’ की ये पंक्तियाँ उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करती हैं-
‘किस्सागोई चुप है और हर पल उदास है
रोती हुई आँखों का ये काजल उदास है
पत्थर गिरा के झील में देखा तो ये लगा
पानी भी कह रहा है कि हलचल उदास है
हरीश बेताब की यह पंक्तियाँ सत्तार साहब के न होने का दर्द बया करती हैं। यह अलग बात है कि आज के भागमभाग में लोग उनसे कम परिचित हो पाए हैं, लेकिन जो लोग उन्हें जानते हैं उनके साहित्य को पढ़ते रहे हैं,वेहरीश बेताबजी के इस दर्द को समझ सकते हैं। मशहूर शायरा ‘रिहाना शाहीन’ भी कुछ इसी प्रकार से सत्तारजी को याद करती हैं। वे कहते हैं कि “हमने अलीगढ़ का एक ऐसा हीरा खो दिया है जिसकी चमक पूरी दुनियाँ में थी। काज़ी अब्दुल सत्तार अब इस दुनियाँ में नहीं हैं। उन्होंने अदब के जमाने में बदली हुई अलग-अलग सूरतों में हमारे वह जेहन में सदियों तक जिंदा रहेगा। मैंने उनके अफ़साने बहुत पढ़े हैं। वो एक जिंदादिल इंसान और गज़ब की निगाह रखने की सलाहित रखते थे।”
आज भी जब कभी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में दोस्तों के बीच किसी प्रोफेसर के बारे में बातचीत होती है। उनकी जीवन-शैली तथा समय के पाबंद और कद्र करने वाले विद्वानों की चर्चा होती है तो सत्तार साहब के बिना यह चर्चा अधूरी होती है। वे समय को बहुत महत्त्व देते थे। इसका उदाहरण डॉ. गुलाम फरीद साबरी के वक्तव्य से समझ में आता है। वे कहते हैं- “ एक बार मैं किसी मैगजीन के विषय पर बात करने के लिए समय माँगा तो उन्होंने मुझे दोपहर बारह बजे आने को कहा। मुझे पहुँचने में दो मिनट देर हो गई। उन्होंने दरवाजा खोला और टाइम देखा। बोले आप दो मिनट लेट हैं। कल आइएगा।” वक्त की पाबंदी और कद्र का ऐसा मिसाल बहुत कम देखने को मिलता है।
काज़ी अब्दुल सत्तार उर्दू के नॉवेलनिगार थे। ‘कुर्तुल एन हैदर’ ने उन्हें उर्दू का अनोखा उपन्यासकार कहा। हिन्दी के सुप्रसिद्ध रचनाकार ‘नागार्जुन’ ने सत्तार साहब को उर्दू का प्रेमचंद कहा। उनके नॉवेल में जो सबसे अहम मामला है, जो उन्हें अन्य उपन्यासकारों से अलहदा बनाता है, वह है, उनके उपन्यासों में जंग का जीवंत और लोमहर्षक वर्णन। युद्ध का जितना विलक्षण आँखों देखा हाल सत्तार साहब के उपन्यासों में वर्णित हुआ है, कदाचित ही किसी भारतीय भाषा के उपन्यासों में आपको देखने को मिले। न केवल जंग का वर्णन बल्कि उसका सालों तक प्रभाव भी हृदय को चीर देने वाला है। जश्न-ए-रेख्ता कार्यक्रम में जब उससे पूछा गया कि आप जंग का इतना प्रभावशाली वर्णन कैसे लिख लेते हैं तो उन्होंने कहा कि इसके लिए दुनिया भर का साहित्य पढ़ना पड़ता है। पुराने से लेकर नए साहित्य से ज़बरदस्त रु-ब-रु हुए बिना जंग का यथार्थ वर्णन संभव नहीं। उनका एक बेहतरीन उपन्यास है ‘सलाहुद्दीन’। यह इतिहास का ऐसा चरित्र है, जिसके बारे में कम लोगों को पता है। सत्तार साहब बताते हैं कि इसने आक्रमण में खून का एक कतरा भी नहीं बहने दिया। इसलिए इस चरित्र पर गंभीर शोध के पश्चात मैंने चरित्र प्रधान उपन्यास लिखा है। इनके ऐतिहासिक उपन्यासों में इतिहासबोध, कल्पनाशीलता और व्यक्तित्व विश्लेषण का अद्भुत संयुक्त रूप देखने को मिलता है। सत्तार साहब ने औरंगजेब के बेटे दाराशिकोह पर उपन्यास लिखा। उपन्यास के लिए ऐतिहासिक चरित्रों का चुनाव ही बहुत कुछ कह जाता है। दाराशिकोह मज़हबी उदारता के मिसाल थे। अरबी के साथ-साथ संस्कृत का ज्ञाता। उन्होंने संस्कृत के कई ग्रन्थों का अनुवाद किया। अन्य धर्मों के प्रति उदारता ही उसकी हत्या का कारण बना। सत्तार साहब ने अत्यंत संवेदनशीलता के साथ दाराशिकोह का चरित्र गढ़ा है।सत्तार साहब कथा साहित्य में वे जर्जर सामंती संस्कृति के विध्वंस की सूक्ष्म अभिव्यक्ति हुई है। चूँकि वे स्वयं जागीरदार परिवार से थे, इसलिए उनकी रचनाओं में जागीरदारी व्यवस्था और उसके टूटने का दंश-कथा अत्यंत विश्वसनीय बन पड़ी है।
फेसबुक पोस्ट में संजीव कौशल ने उनके निधन पर शोक व्यक्त करते हुए लिखा है कि “उर्दू के नामचीन अदीब, पद्मश्री काज़ी अब्दुल सत्तार साहब का इंतकाल हिन्दी उर्दू की अदबी दुनिया और तरक्कीपसंद जम्हूरियतपसंद तहरीक के लिए एक बहुत बड़ी क्षति है। जनवादी लेखक संघ परिवार काज़ी अब्दुल सत्तार साहब के इंतकाल पर शोकसंतप्त है और उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है।” अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी हिन्दी-विभाग के प्रो. कमलानन्द झा ने काज़ी अब्दुल सत्तार को याद करते हुए अपने पोस्ट में कहा है कि “ काज़ी अब्दुल सत्तार का जाना हिंदुस्तान की साझी संस्कृति और साझी विरासत के एक मज़बूत स्तंभ का जाना है। आज जिस तरह से हमारी इस संस्कृति को तबाह करने की आँधी सी चल पड़ी है, सत्तार साहब की उपस्थिति आश्वस्तकारी थी। उनका होना एक भरोसे का होना था, कि हमारे बीच एक ऐसा लेखक है जो सच को सच की तरह कहना जानता है। हमलोगों की पीढ़ी सत्तार साहेब जैसे लेखकों को पढ़कर अपना साहित्य विवेक बनाती रही है। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में आने के बाद उन्हें तीन-चार बार सुनने का मौका मिला। उम्र के इस अंतिम पड़ाव पर भी उनमें जो जज़्बा था, साहित्य और संस्कृति के प्रति जो लगाव था, वह अचंभित करने वाला था। व्हील चेयर पर बैठकर उनका कार्यक्रम में आना जाना, लड़खराती आवाज़ में भी अपनी बात कह देने की काश्मकश उनकी अकूत जीवटता और सघन प्रतिबद्धता को ही दर्शाता था। इस प्रतिबद्धता को लाल सलाम।” हिन्दी पट्टी के और भी कई नामचीन साहित्यकारों ने काज़ी अब्दुल सत्तार को याद करते हुए श्रद्धांजली दी।
आशुतोष कुमार अपने फेसबूक पोस्ट पर ‘सत्तार’ साहेब को कुछ इस प्रकार से याद करते हैं “ अलविदा काज़ी साहब। शिकस्त की आवाज़, शव गजीदा, गालिब और दारा शिकोह जैसे नायाब उपन्यास लिखने वाले काज़ी अब्दुल सत्तार भारत की महान गंगा जमनी सभ्यता के मजबूत स्तम्भ थे। लेखक होने के अलावाएक बेहद प्यारे और सख्त दोस्त अलीगढ़ के आसमान से चमकते साहित्य नक्षत्रों में सबसे अलहदा. आपकी बहुत याद आएगी। आशुतोष कुमार के इस पोस्ट पर ‘उदय प्रकाश’ ने लिखा “ऐसा साथी, ऐसा इंसान, ऐसा सुखनवर, ऐसा हमारा अपना कभी रुखसत नहीं होता। वो साथ हैं। उन्हें अलविदा कहने का ख्याल तक नहीं आता आँसू भले आ जायें।” उसी पोस्ट में नरेश सक्सेना ने लिखा “दुखद! वे नायाब कथाकार थे और बेहद संवेदनशील। जब-जब अलीगढ़ गया वे कार्यक्रम में मौजूद रहे। मेरे एक काव्य पाठ की सदारत भी की और गज़ब की सराहना भी। मेरी कविताओं को लेकर खास प्रसंग था उसे अलीगढ़ के प्रेम कुमार और संजीव कौशल बेहतर बता सकते हैं। डॉ. नमिता सिंह ने भी सत्तार जी के निधन को कथा-संसार और संस्कृति का बहुत बड़ा नुकसान बताया। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की शोध-छात्रा नीरज शर्मा ने भी अपने पोस्ट के द्वारा ‘सत्तारजी’ को भावभीनी श्रद्धांजलि दी।
दैनिक जागरण ने भी 29 अक्टूबर 2018 को काज़ी अब्दुल सत्तार को याद करते हुए लिखा कि “जमी की गोद में सदा के लिए सो गए उर्दू के साहित्यकार पद्मश्री काज़ी अब्दुल सत्तार।” सत्तारजी का जाना वाकई उर्दू साहित्य के लिए एक बड़ी क्षति है, जिसे भुलाया नहीं जा सकता है पर आज सत्तार साहेब के साहित्य और उनके विचारों को अपने जीवन में उतारकर, उनकी कही गई बातों को अमल में लाकर एक सच्ची श्रद्धांजलि दी जा सकती है। उनके द्वारा लिखित साहित्य हमेशा ही लोगों के बीच नफ़रत को कम करता रहेगा। आज जब किसी कौम को लेकर अलग-अलग तरीके से बात की जाती है। धार्मिक उन्माद को बढ़ाना आज किसी खास दलों की नियतिबन गयी है, ऐसे में सत्तारजी का समग्र साहित्य हमें नयी ऊर्जा प्रदान करता है।

परिचय – रचनाकार बिहार के मधुबनी जिला के रहने वाले हैं और अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में शोधार्थी हैं । राष्ट्रीय – राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों में सम्मलित होकर शोध-पत्र प्रस्तुत चुके हैं । इनके आलेख और शोध – पत्र भी प्रकाशित हुए हैं।