व्यंग्य – दीपक भास्कर / राजा मंत्री संवाद।

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लेखक सूबे बिहार के अत्यंत पिछड़ा इलाका अररिया जिला के अत्यंत ही साधारण परिवार किसान परिवार में जन्में है। निरक्षर माँ और साक्षर पिता के संतान दीपक भास्कर फिलवक्त दिल्ली विश्वविद्यालय अंतर्गत दौलतराम कॉलेज में राजनीतिक सिद्धांत, अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति, भारत की विदेश नीति के प्रख्याता हैं। राजनीति शास्त्र के अध्येता होने के बावजूद इनका साहित्य से जुड़ाव है। साहित्य का राजनीतिक नजरिये से विषलेषण को लेकर इनकी अपनी मौलिक समझ भी है। यहां प्रस्तुत है दीपक भास्कर द्वारा  रचित राजनीतिक व्यंग्य – राजा मंत्री संवाद।

राजा की सभा में चिंता का माहौल है। राजा का मंत्री कह रहा है कि राजन! राज्य में सब कुशल नहीं है, राज्य के लोग सवाल पूछने लगे हैं।
राजन! लोग पूछ रहे हैं कि अच्छे दिन कब आएँगे? महँगाई कब घटेगी ? पेट्रोल-डीजल कब सस्ता होगा ? दो करोड़ नौकरियाँ प्रतिवर्ष कब आएँगी ? कब भारत के शिक्षक विदेशों में निर्यातित होंगे, महिलाओं पर अत्याचार कब कम होगा, दलितों-अति पिछड़ों-आदिवासी के साथ कब न्याय होगा, कश्मीर से सेना के जवानों की लाशें आनी कब बन्द होगी, कब लोग ठेकेदारी सिस्टम से मुक्त होंगे………???????
राजा अचंभित हुआ और पूछा… लोग इतने सवाल क्यों पूछ रहे हैं?
मंत्री ने जबाब दिया-राजन! ये सवाल, लोग नहीं पूछ रहे हैं, ये सवाल तो आपने पूछा था राजतिलक होने से पहले, हर गली कूचे में आपने ही तो बड़े-बड़े होर्डिंग पर लिखकर टाँगवा दिया था।
राजा ने कहा कि क्या जनता को पता नहीं कि ये सारे सवाल “चुनावी जुमले” थे। क्या वो तब भी नहीं माने जब हमारे चाणक्य ने भी उन्हें साफ़ कर दिया कि ये चुनावी जुमले ही थे।
मंत्री बोला, नहीं राजन! जनता को आप पर, आपके एक-एक शब्द पर काफ़ी भरोसा था। वो आपको ‘मख्खन पर लकीर’ बनाने वाले नहीं बल्कि ‘पत्थर पर लकीर’ खींचने वाले मानते हैं। ये तो आपने खुद भी स्वीकार किया है राजन!
राजा दु:खी होते हुए बोला, तो क्या इस बार जनता कुछ भी भूली नहीं, यहाँ तो भूल जाना ही “जन-प्रवृत्ति” है।
मंत्री ने कहा नहीं राजन! जनता इस बार बिल्कुल नहीं भूली, असल में हर जगह आप ही आप हैं। हर घर में बस आप है। घर का मालिक, गाँव का मालिक, शहर का मालिक, देश का मालिक, जनपद का मालिक, सब आप हैं। आपको याद नहीं हमने तो राजतिलक से पहले ये नारा भी दिया था, “हर-हर आप, घर-घर आप”।
राजा ने कहा, मंत्री जी! इस बार जनता भूली क्यों नहीं? हमने तो कई जगह ध्यान भटकाने के लिए कितना कुछ किया, जगह-जगह गौ-रक्षा समिति बनी, पड़ोसी मुल्क पर स्ट्राइक भी किया, कितने सारे नाम बदल दिए, फिर भी जनता…..!
जी राजन! हमारी रिसर्च टीम लगी है ये पता करने में।
राजा ने कहा, कोई नहीं, ये मुनादी भेज दिया जाए कि इन सब सवालों का हल तो समय से ही निकलेगा।
मंत्री ने तपाक से कहा कि राजन आपने ख़ुद ही तो समय निर्धारित कर दिया था कि महज “साठ महीने” में सब पूर्ण जो जाएगा। समय पूरा होने वाला है। महज कुछ महीने बचे हैं।
राजा गुस्साते हुए बोला, क्या हम क़ानून न बदल दें, रूस की तरह, चीन की तरह। वहाँ भी तो जीवनपर्यंत राजा बनने का कानून बन गया है।
मंत्री ने रोका, राजन! ये चीन नहीं और रूस भी नहीं। लोकतंत्र यहाँ 70 साल पुराना है। लोगबाग लोकतंत्र में ही अपना हित देखते हैं। फिर लोकतंत्र ने ही तो आपको यहाँ राजा बनाया है।
राजा चिंतित हो गया फिर पूछा कि उपाय क्या है?
मंत्री ने कहा कि राजन, एक उपाय है।
राजा चहक उठा और विस्मित मुस्कान लिए कहा। बताओ।
मंत्री ने कहा कि जो सवाल आपने उठाये थे वो सवाल असल में आपके थे ही नहीं, ये सवाल तो कई सालों से कुछ लोग उठाये जा रहे हैं। इनलोगों ने पहले के राजाओं को भी काफ़ी परेशान किया था इसलिए ये सवाल जिन्होंने उठाये थे उन्हें वापस दे दिया जाए।
राजा बोला लेकिन ये फ़क़त कुछ लोग तो सवाल फिर भी उठाएँगे। इनका क्या उपाय है?
मंत्री ने कहा कि महाराज उनकी चिंता न कीजिए उन्हें कुछ ‘अर्बन नक्सल’ जैसा नाम देकर, जनता को ही उनके ख़िलाफ़ कर दिया जाएगा। जनता ने आपपर से अपना पूरा विश्वास अभी तक नहीं खोया है। राजा खुश हुआ और ट्रोल आर्मी को फौरन आदेश दे दिया गया कि इन लोगों को चिन्हित किया जाए और जनमानस को बताया जाए कि ये राष्ट्र के दुश्मन हैं।
दूसरे मंत्री ने कहा कि राजन! ये लोग जनता के सवाल को लिखते हैं, उन्हें जागृत करते हैं, मानवाधिकार के लिए लड़ते हैं, ये लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए जरूरी है इसलिए इन्हें नकारना लोकतंत्र की हानि होगी। राजा गुस्साते हुए कहा कि ये किन लोगों को आपने सभा में जगह दी है चाणक्य। ये लोग जनता के तरफ से क्यों बोलने लगे हैं। चाणक्य ने कहा राजन! यही लोकतंत्र की मजबूरी है। लेकिन आप चिंता न करें अगली बार ये लोग आप की सभा में नहीं दिखेंगे।
फिर से लोकतंत्र? राजा ने कहा।
मंत्री ने कहा, राजन! आप आपा न खोएँ। सरल उपाय है। इन सबको राज्य के माहौल खराब करने के आरोप में केस दर्ज करने का आदेश दिया जाय।
राजा फिर चिंतित और कहा कैसे?
मंत्री ने कहा कि उन्हें, उनके सवाल वापस कर, गिरफ्तार कर लिया जाए। हम लोगों से कहेंगे कि इनलोगों के वाहयात सवाल ने राज्य में माहौल खराब कर दिया है।
कहेंगे कि राजा तो काम न होने से बहुत दु:खी है। राजा की मंशा काम करने की है, लेकिन ये लोग ही किसी काम को न होने दे रहे हैं।
राजा ने खुश हुआ, आव देखा न ताव और कहा कि गिरफ्तार कर लो इन सबको।
एक नए सभासद ने उठ कहा कि राजन! ये लोग सवाल करने के नाम पर गिरफ्तार नहीं हो सकते हैं। ये क़ानून का उल्लंघन होगा, ये प्रजातंत्र के मूल्यों का हनन है।
राजा ने गुस्से में कहा फिर से लोकतंत्र? प्रिय चाणक्य अगली बार सभा में ऐसे लोग दिखने नहीं चाहिए।
राजा ने हाथ चमकाते हुए कहा कि क्यों इन्हें ये मालूम नहीं कि हम राजा है, हम जो चाहे वो सब कुछ कर सकते हैं। क्या जनता ने बाहुबली नहीं देखा, क्या तब वो खुश नही हुए थे जब शिवगामी देवी ने कहा कि, ‘उनका वचन ही शासन है।’
मैंने कह दिया सो कह दिया। क्या जनता ने अभी तक नहीं समझा कि मैं चाहूँ तो रुपये को आधी रात के समय कागज़ का टुकड़ा बना सकता हूँ। क्या मैनें ऐसा कर नहीं दिखाया।
राजन! जनता का क्या? अभी तक उन्हें तो कुछ भी नहीं मिला। उन्हें जो गैस चूल्हा मिला, उसमें गैस भरवाने की औकात नहीं रह गयी है राजन! एक नए सभासद पूछ लिया।
राजा ने कुछ सोचा और गम्भीरता से कहा कि ऐसे तो जनता विद्रोही हो जाएगी। ऐसे में क्या किया जाय। मंत्री ने धीरे से कहा कि राजन एकमात्र उपाय है।
राजा ने अचंभित होते हुए कहा कि अभी भी उपाय बचा है?
हाँ राजन!
जनता को ‘धर्म’ दिया जाय। उन्हें ‘धर्म’ का अनुशीलन करने सिखाया जाए। उन्हें ये बताया जाए कि उन्हें गर्व करना है ‘धर्म’ पर। और फिर ‘धर्म’ तो सत्ता को बचाने के लिए ही आया है। ‘धर्म’ ही तो समाज में यथास्थिति बनाये रखता है। ‘धर्म’ असल में उस अफीम की तरह है जिसके नशे में सब कुछ ठीक दिखने लगता है। फिर हमारी जनता तो इस नशे में स्वतः डूबी हुई है, उन्हें बस जगाना है, बताना है कि वो जिस नशे में है उसपर खतरा मंडरा रहा है। धर्म खतरे में है। उनकी 80 प्रतिशत जनसंख्या 8 प्रतिशत होने वाली है।
सभा मे ‘धर्म’ का नाम आते ही खुशी का माहौल छा गया है। सभी ने राहत की साँस ली है। सब खुश हैं कि अब राजा का राजतिलक फिर होगा, कोई इसे रोक नहीं सकता। राजा का विश्वास अब अटल हो गया है।
राजा ने आज अविस्मरणीय भाषण देते हुए कहा कि जनता को बता दिया जाए उन्हें सबकुछ 2022 में मिलेगा। तबतक के लिए वे इन्तजार करें।
राजा ने सभा को सम्बोधित किया और कहा कि मित्रों! जनता को धर्म की पुड़िया दे दी गई है और वो कभी भगवान के सामने तो कभी अल्लाह के सामने पुड़िया फाड़ रहे है। ये भी फरमान निकाल दिया गया है कि धर्म कि पुड़िया खाने से ही धन धान्य की बारिश होगी और इस नशे से ही जनता की समस्या का अंत होगा। जनता सुबह-शाम पूड़िये ले रही है और इसे बचाने के लिए चुनाव बूथ की तरफ निकल चुकी है। जनता के लिए इस पूड़िये को बचाना जरूरी है, ये उसके अस्तित्व का सवाल है। वो तकलीफ में तब जाएगी जब ये नशा उतरेगा, इसलिए बस ये नशा उतरने न पाए।
उधर, राजा फिर राजतिलक की तैयारी में लग गया है। पुरोहित मंत्र याद करने लगे हैं। राजा ने 15 लाख का सूट सिलने का आर्डर दे दिया है, 55 हजार किलो वाले मशरूम की सब्जी का आर्डर हुआ है। जनता 2022 के इंतजार में चुप है…
इति राजा मंत्री संवाद समाप्तम् !
सत्यमेवजयते!!