‘अनुराधा चंदेल ओस’ स्वतंत्र लेखिका हैं। युवा कवयित्री के रूप में इनकी खास पहचान है। हिन्दी काव्य संसार को इन्द्रधनुषी रंग में रंगने का प्रयास कर रही कवयित्री का मूल नाम ‘अनुराधा चौधरी’ है। ‘ओ रंगरेज’ नामक पहले काव्य संग्रह में अनुराधा, सौंदर्यबोध, युगबोध और निसर्गबोध को लेकर पाठकों के बीच उपस्थित हुई हैं। हिन्दी साहित्य की छात्रा रही लेखिका ने ‘मुसलमान कृष्ण भक्त कवियों की प्रेम सौन्दर्य दृष्टि’ विषय पर शोध कार्य किया है। छात्र जीवन से लेखन कार्य में जुटी लेखिका कविता, कहानी और समीक्षा लिखती है। वागर्थ, आजकल, अहा ! जिन्दगी सहित दर्जन भर से अधिक पत्र- पत्रिकाओं में इनकी रचनाएं प्रकाशित हो चुकी हैं। विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ भागलपुर ने इन्हें डी. लिट की मानद उपाधि प्रदान की है। कई साहित्यिक सांस्कृतिक संगठनों द्वारा सम्मानित कवयित्री को पिछले दिनों दिल्ली की संस्था परिवर्तन ने खासतौर से ‘ओ रंगरेज’ काव्य संग्रह के लिए सम्मानित किया है। आइये पढ़े इनके द्वारा लिखित कविताएँ – शोभा बिसेन की विशेष समीक्षात्मक टिप्पणी के साथ,  जो  जीवन में प्रेम और प्रकृति में जीवन की सार्थकता को व्यक्त करती हैं l …संपादक

                               प्रकृति में जीवन की सार्थकता

अनुराधा ‘ओस’ की कविताएँ जीवन में प्रेम और प्रकृति में जीवन की सार्थकता को व्यक्त करती हैं l वर्तमान में मनुष्य अत्याधिक मशीनी व संवेदनहीन होता जा रहा है, ऐसे में प्रकृति और उसमें समाये विविध रंग ही मनुष्य के भीतर जीवन का संचार कर सकते हैं l ‘ज़िंदगी से मिलना’ कविता में प्रकृति के बीच ही जीवन खोज है l आज बाजारीकरण के युग में वस्तुओं के साथ-साथ प्रेम का भी बाजारीकरण हो चुका है l ऐसे में निश्छल और निस्वार्थ प्रेम की कल्पना सिर्फ प्रकृति के द्वारा ही संभव है l ‘अनहद नाद प्रेम का’ कविता में प्रेम के हुए बाजारीकरण के बीच प्राकृतिक प्रेम की संजीदगी और सजीवता को दर्शाया है l ‘स्वेद और प्रेम’ कविता श्रमशील स्त्री के प्रेममयी स्वरुप को दर्शाती हैl स्त्री का व्यक्तित्व इतना ममत्व से भरा और प्रेमपूर्ण होता है कि वह अत्याधिक श्रम करने के बाद भी अपनी थकान या पीड़ा की चिंता न करके दूसरों की सुख-सुविधाओं की परवाह ज्यादा करती है l वह मुस्कुराती हुई हमेशा सबके प्रति प्रेममयी होती है l ‘क्या करूँ’ कविता में शहरीकरण और बाजारीकरण के कारण लोगों के बदलते चरित्र की विडंबना का चित्रण है l पहले मनुष्य जहाँ एक एक-दूसरे के कार्य में सहभागी एवं सहयोगी होता था, वहीँ अब एक-दूसरे की मुश्किलों की वजह बनता जा रहा है l ऐसे दौर में किसी ईश्वरीय शक्सियत की उम्मीद, जो पुन: लोगों में आपसी प्रेमभाव जागृत कर सकें, यही भाव इस कविता के मूल में हैं l – डॉ. शोभा बिसेन, सहायक प्राध्यापक (अस्थाई), हिंदी विभाग, गुरु घासीदास विश्वविद्यालय, बिलासपुर  

1.
जिंदगी से मिलना

बगीचे में आम की मंजरियों के बीच
टहलना
उनकी सुगन्ध महसूस करना
जिंदगी से मिलना है

जिसमे भरी सुंगध ,मानो
जीवन का अहसास हो

खेतों के किनारों पर उगी दूब
अपनी पूरी हरियाली को
व्यक्त कर रही है धरा पर

मानो पूरा आकाश झुक कर
समेट लेना चाहता हो धरा को

नीले आकाश में भरा है
पानी का प्रतिबिंब
जिसकी गठरी में बंधी है
प्यासे की उम्मीद

मैं धरती को ढक लेना चाहती हूँ
अपनी लाल साड़ी के पल्लू से

हरी धरती में कुछ
लाल रंग भी भरना चाहती हूँ
लाल और हरा रंग

मानो जीवन का रंग हो
निशब्द होकर भी ये रंग

बहुत कुछ बोलतें हैं
हमारे जीवन को रंग से
भर कर
स्वयं कुछ नही कहते

मैं उन्ही रंगों की तरह
होना चाहती हूँ।।

2.
अनहद नाद प्रेम का

जब विन्ध्य पर्वत को
हौले से छू कर हवा

कहती हो सुनो!
मुझको तुमसे
प्रेम हो गया है

उसी समय
सेमल के लाल-लाल
खिले फूलों पर

लगता है किसी ने
छींटा दिया हो
प्रेम का

उसी समय
नदी इठलाना छोड़कर
शांत-मन्थर गति से
मन्थर गति से
बहने लगती है

दहकते पलाशों के बीच
ठिठक-ठिठक कर आती हवा
मानो महुए का
रस घोल रही है

आज जबकि प्रेम का
बाजारीकरण हो चुका है
फिर भी ,देना चाहती हूँ

तुमको ,निश्छल, संदली
हवाओं की तरह प्रेम

उसी तरह जैसे
नदी की लहरें
बालू कणों को
सोख लेती हैं स्वयं में

उसी समय ,अनहद नाद
सुनती हूँ
प्रेम का।।

3.
स्वेद और प्रेम

धूप कड़ी थी
सिर पर उठाए
लकड़ियों का गठ्ठर
घूंघट को मुँह में दबाये
परिश्रम के स्वेद बहाये
वह नीर सी चली आ रही थी
मार्ग कंटकाकीर्ण, मगर दुःख नही
परिश्रम व परम्परा निभाये
वह नीर सी चली आ रही थी
ममता को आश्रय में बसाये
अपने आँचल में सागर सजाये
स्नेहिल अधरों पर मुस्कान बचाये
वह नीर सी चली आ रही थी
पल्लवित हैं पशु,वृक्ष, पक्षी,मनुज
पर अपना अस्तित्व भुलाये ओस
वह नीर सी चली आ रही थी
थक कर क्लांत तुम जब भी आये
पलकों की छांव बिछाये
सपनो के गीत गुनगुनाती
वह आज भी नीर सी चली आ रही थी।।
4 .
क्या करूँ

क्या करूँ
ये शहर अब
वैसा नही रहा
चेहरे वहीं
पर मुखौटे न जाने किसके
कब तक पर्दानशीं
रहें हम
बन्द कर मन की किवाड़
चाहिए कोई खुदा
इन मुश्किलों के दौर में
वहीं जमीं, वहीं आसमाँ
बसावट वहीं
बुनावट वहीं
पर मुश्किलें थमती नही
चाहिए कोई खुदा
इन मुश्किलो के दौर में।।