कविता / डॉ प्रतिभा सिंह की लंबी कविता – अहल्या

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युवा कवयित्री डा.प्रतिभा सिंह गाजीपुर में जन्मीं और पली-बढ़ी हैं। फिलवक्त आजमगढ़ में इनका पारिवारिक डेरा – बसेरा है। इतिहास और शिक्षाशास्त्र की डिग्री के जरिये कवयित्री रोजी-रोजगार पाने के लिए संघर्षरत हैं। अतिथि व्याख्याता के रूप में पूर्वांचल पी. जी. काॅलेज रानी का सराय आजमगढ़ से जुड़ी हैं और इतिहास के छात्रों को पढ़ाती है। साहित्य में इनकी गहरी रूची है। अभिनव सृजन, सप्तवर्णी, प्राची प्रतिभा, कथा समवेद, सहित कई अन्य साहित्यिक पत्रिकाओं के लिए लगातार कविता, गीत, मुक्तक, कहानी आदि का लेखन कर रहीं है। स्त्री समस्याओं पर केन्द्रित कहानी संग्रह ‘जाउँ कहाँ’ का प्रकाशन हो चुका है। ‘मन धुआँ – धुआँ सा है’ नामक काव्य संग्रह शीघ्र ही पाठकों के बीच होगी। प्रस्तुत है डा. प्रतिभा सिंह की लंबी कविता डॉ.शोभा बिसेन की समीक्षात्मक टिप्पणी के साथ। डॉ.शोभा, फणीश्वरनाथ रेणु डॉट कॉम के संपादकीय संयोजन टीम से जुडी हैं।
                                प्रेम और विश्वास के बीच स्त्री जीवन का सच
अपनी लम्बी कविता ‘अहल्या’ में प्रतिभा सिंह ने हिन्दू मिथकीय स्त्री पात्र अहल्या के माध्यम से पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री जीवन की विवशता व पीड़ा को अभिव्यक्त किया है। पुरुष प्रधान समाज में नारी देह की शुचिता का प्रश्न ऐसा संहारक अस्त्र है जिसने स्त्री को नैतिकता की बेड़ियों में कैद करके उसे ज्ञान, शक्ति और सम्पदा से वंचित कर दिया है। उसे जरखरीद गुलाम बना लिया है। पितृसत्ता में व्यभीचारी पुरुष के लिए कोई दंडविधान निर्धारित नहीं है, केवल स्त्री ही दंड की भागीदार है गलती चाहे किसी की हो। परपुरुष के छल-प्रपंच में फंसकर यदि स्त्री से कोई तथाकथित अनैतिक कार्य हो जाये तो भी वहां सम्यक स्थिति को न देखते हुए स्त्री ही दोष की भागी एवं दंडाधिकारिणी होती है। उसका परिवार के लिए त्याग, पति के प्रति समर्पण तथा उसके विविध स्त्री स्वरूपों को नजर अंदाज कर दण्ड स्वरुप सारे अधिकार एवं कर्तव्यों से बेदखल व बेसहारा कर दिया जाता है। इस कविता में अहल्या का सुचिंतित वक्तव्य स्त्री जीवन की त्रासदी एवं त्रासदी के लिए जिम्मेदार लोगों की स्त्री विरोधी पुरुष मानसिकता को बेनकाब करता है l ‘हम स्त्री के भाग में कैसी विवशता?/चाहकर भी बोल नहीं सकते/स्त्री पुरुष को समानता के तराजू में तोल नहीं सकते’ पंक्तियों के माध्यम से कवयित्री पितृसत्तात्मक मूल्यों को सवालों के कठघरे में खड़ा करती हैं तथा स्त्री सशक्तिकरण की पक्षधरता की हिमायत करती है कि – ‘वह अपनी उर्जा को समेटकर/ ज्ञान की उपासना में रमाये/…….मिटा दे हर मिथक को/ जिसमें हर हाल में/ वही अपराधिनी है/ समेटकर उर्जा/ उड़ने दे स्वप्न/निर्बाध गति से/सम्मिलित हो जाये/अस्तित्व की दौड़ में/कि विश्व उसकी मुट्ठी में/आने को आतुर है। – डॉ. शोभा बिसेन, सहायक प्राध्यापक (अस्थाई), हिंदी विभाग, गुरु घासीदास विश्वविद्यालय, बिलासपुर
                       डॉ प्रतिभा सिंह की लंबी कविता – अहल्या
सुनो राम
जो काम और क्रोध को न जीत सके
वह संत कैसा?
और जो पत्नी की पीड़ा न समझ सके
वह कंत कैसा?
पौरुष पर
स्त्रीत्व ही जले सदा
तो प्रारब्ध का अंत कैसा?
माना
मैं पाप की भोगी
पर गौतम भी है
उतने दोषी
जब पुरुष सत्ता के दर्प से
बुद्धि खण्डित होने लगे
और स्त्रीत्व पर पौरुष
महिमाण्डित होने लगे
तब विनाश निश्चित है
सभ्यता का
सृष्टि का
सृजन का
जीवन का
जानते हो क्यों?
क्योंकि स्त्री ही सृजन है
जीवन है
सभ्यता है
और सृष्टि का आधार है
सुनो राम!
मैं पति परित्यक्ता
शापित होकर
जड़वत पड़ी हुई थी
वर्षों से
तुम्हारे कदमो की बाट जोहती
आशा है
मुझे पूरी तरह पवित्र कर दिया होगा
अपने समिधासम चरणों के स्पर्श से
और मेरे स्वामी मुझे अपना लेंगे अब
उनकी कुटिया में
मुझ दासी को एक कोना मिल जाएगा
फिर भी
मुझे डर है कहीं
मैं थोड़ी सी भी अपवित्र रह गई
तो मेरे भाग्यविधाता
पुनः मुझे पत्थर न बना दें
फिर मुझे
तुम्हारे अगले अवतार की प्रतीक्षा करनी होगी
की कब आकर मुझ
अभागन पापभोगी को
मेरे तारणहार
अपने पैरों से ठोकर मारकर पवित्र करेंगे
मेरे वर्षों के कष्टों को हरेंगे
और मैं
उनके पैरों की धूल को
माथे पर लगाकर जी उठूँगी
सुनो राम!
इस निर्जन वन में
जब ग्रीष्म ऋतु आग बरसाने लगी
और जलने लगी धरा
प्यास से जब तड़पने लगे पशु
और पंक्षी मरने लगे
चोच में प्यास लिए
वृक्ष सुखकर दावाग्नि में आहूत हुए
चटखने लगी भूमि
जब हवाए शुष्क होकर आग उगलने लगीं
और सूरज बन गया एक ज्वालामुखी
तब मैंने
अपने आसुओं को पीकर खुद को जीवित रखा
तो इसलिए नहीं की जीवन का मोह था
बल्कि इसलिए की
मैं खुद को बचाये रखना चाहती थी
तुम्हारे आने तक
की पूछ सकूँ कुछ प्रश्न
जिनके उत्तर शेष हैं
सुनो राम!
जब वर्षा ऋतु आई
वन हरे हुए
और धरती लहरा उठी
आसमान धुलकर मनमोहक हो गए
और पुष्पित सरोवर
सुगन्धित हुए
काले बादलों की छाँव में
शीतल हवाओं के बीच
प्रेयस -प्रेयसी
हाथों में हाथ डाल घूमने लगे
एक दूसरे में खोकर
सावन झूमकर बुलाने लगा
सभी जोड़ों को
तब मैं
वर्षों की मृगतृष्णा लिए
भटकती रही यहां- वहां
की ढूंढ़ सकूँ मेरे पत्थर होने का कारण
जब वर्षा सुंदरी ने
आर्यावर्त में बसेरा डाला
तो झूम उठी दिशायें
चलने लगीं हवाएँ
दादुर बोलने लगे
कीट पतंगे मादों से निकलकर
जलमग्न हो आनंदित हुए
और काले बादलों से ढ़की साँझ में
मोर -मोरनी का जोड़ा
प्रेम नृत्य करने लगा
आसमान की मुट्ठी से निकलकर
इंद्र धनुषी रंग
बिखर गए पूर्वी क्षितिज पर
तब मैं अभागन
पिघलती रही
पश्चाताप की अग्नि में
उन अपराधों की सजा लिए
जो मैंने किये ही नहीं
सुनो राम!
जब शीत ऋतु आई
और ठिठुरने लगी धूप भी
तो मैंने क्रोध के अलाव से
खुद को बचाये रखा
इन बर्फ हो रहे पत्थरों में
तो जानते हों क्यो?
क्योंकि मैं जीना चाहती थी
किन्तु दूसरों के लिए नहीं
खुद के लिए
कि मेरे होने का उद्देश्य सिर्फ मैं हूँ
कोई और नहीं
यह सिद्ध कर सकूँ।
मैं ब्रह्मपुत्री
त्रिलोक सुंदरी
चाहती तो
स्वर्ग पर राज कर सकती थी
मृत्यु लोक का
हर वैभव प्राप्त कर सकती थी
आकश को रौंद सकती थी
पाताल को मुट्ठी में समेत सकती थी
अपने सौन्दर्य के बल पर
किन्तु मैंने
भौतिक सुख वैभव का मोह छोड़
जिस ज्ञानी का वरण किया
उसने ही मेरे विश्वासों का हरण किया
तुम्हीं बताओ
यदि मैं लोभी होती
इंद्र के बाहुपाश की
फिर क्यों करती
योगी का वरण
क्यों तजती?
विलास नगरी का सुख
इंद्र पत्नी बनने का मोह
क्यों चुनती मैं
निर्जन वन के वासी को?
क्यों जेठ दुपहरी जलती?
पैरों के छालों पर चलती
क्यों सावन भादों की रातें
पर्ण कुटी में बैठ बिताती?
फिर भी भाग्य लेख पर अपने
सुख पाती इतराती।
और पूष माघ की शीतलहर में
निर्जन वन में रैन बिताती।
सुनो राम !
गौतम से हारकर स्वीकारा है अपराध को
किन्तु मैं कायर नहीं हूँ
बस नतमस्तक हो जाती हूँ
विद्वत पौरुष के तप से
कहो तुमने भी
तीन माओ की गोद में खेला है
और तुम्हारे पिता ने भी
जीवन का हर सुख भोगा है
क्या नहीं चाहिए था की वो भी
एक पत्नी व्रती रहते
सुनो !
भविष्य में होगा एक महासंग्राम
कि नष्ट हो जायेगे असंख्य प्राणी
बस तुम्हारे पिता के कारण
किन्तु मुझे दुःख है
कि सारा दोष तुम्हारी पत्नी पर जायेगा
वहां भी पितृसत्ता हावी होगी
स्त्री पर
क्योंकि सदा ही
निर्बल पर अत्याचार होता है
मैं देख रही हूँ
अतीत के गर्भ में
एक विनाशक युद्ध पल रहा है
और दशरथ के कारण
अगर तुम्हारे पिता
काम क्रिया के वस में आकर
नारी देंह का लोभ न करते
नहीं होती तीन पत्नियां
फिर नहीं होता वन तुम्हारे भाग में
और कोई माँ न जलती
पुत्र मोह की प्रबल आग में
किन्तु पिता के कर्मो की सजा तुम्हे ही लेनी है
परन्तु मुझे दुःख है कि
दुनियां तुम्हारी पत्नी को कोसेगी
कि स्त्री ही कारण है युद्ध हुआ
जबकि पुरुष की वासना और
महत्वाकांक्षाओं ने स्त्री को
प्रयोग किया
जब जब जरूरत पड़ी
और स्त्री मूक दर्शक बनकर भोग्या बनी रही
जैसे मैं बनी
कि पति की सेवा ही सर्वोपरि है
यही सोचकर तो गौतम के वेश में
कामी इंद्र से मिली थी
मैं इतनी पण्डिता भी तो न थी
कि अपने तेज के बल पर पहचान
लेती इंद्र के जाल को
बोलो रघुनंदन
मेरा दोष क्या था?
मैं तो पति की सेविका बन समर्पित थी
उन्हें देवता मानकर
तन -मन से उनकी आराधना कर रही थी
नींद उनकी जागरण था मेरे हिस्से
पूण्य उनके साधना थी मेरे हिस्से
सर्जना उनकी थी सारी वर्जनाएं मेरे हिस्से
पर बदले में मुझे क्या मिला?
एक तिरस्कृत जीवन
और वो जिसने छल किया
क्या ये जरुरी न था कि
उससे देवपद छीन लिया जाता
और देवराज के सिंहासन से
बहिष्कृत कर दिया जाता
कराया जाता उसे भी नर्क का भोग
लोगो के कोप का भाजन बनता
सामाजिक घृणा में डूबकर जीवन बिताता
पश्चाताप की अग्नि में जलता
किन्तु वह
यथावत अप्सराओं के बीच
सिंहासन पर बैठ
देवराज का पद भोगता रहा
हँसता रहा स्त्रियों की बेवशी पर
कि ये भोग्या हैं
सोच रही हूँ
क्यों छोड़ नहीं पाती हैं ?
ऐसे कामी पतियों को पत्नियां
देखती हैं सबकुछ मूकदर्शक बनकर
जैसे इन्द्राणी देखती है रोज
इंद्र का काम नृत्य
जलती होगी मन में दिनरात
कुंठा को लिए
क्या उसका हृदय न मचलता होगा
परपुरुष को देखने को नेह भरकर नजर
क्या घृणा से भर न जाता होगा
उसका रोम रोम
कि तजकर व्यभिचारी को
किसी योग्य का वरण कर ले
हम स्त्रियों के भाग में कैसी विवशता?
चाहकर भी बोल नहीं सकते
स्त्री पुरुष को समानता के तराजू में तोल नहीं सकते
स्त्री के नैसर्गिक अधिकार पर भी पाबन्दियाँ
बस इसलिए की जीत हो पुरुषों के
कुंठित वासना की।
राम !
पूरी दुनियाँ जानती थी
कि दोषी इंद्र था
पर मुझे ही क्यों श्राप का भागी बनाया
गौतम को महर्षि बनने का लालच था
या सामाजिक भय
जो इस तरह अपमानित कर चले गए
इस निर्जन से वन में छोड़कर
वे तो मेरे अपने थे
हम लम्बे युग के सहवासी थे
फिर क्यों न समझ सके वे मुझको
जब रचा जा रहा था षड्यंत्र
मेरी अस्मिता को लूटने का
क्यों न जान सके वे
अपने तप के बल पर
चन्द्रमा की भी कुटिलता को
उसने भी तो पहरेदारी की थी रातभर
मुझको दुष्कर्म का भागी बनाते
क्या लाज न आई उसको
क्या ये जरूरी न था कि उससे
उसका सौंदर्य छीन लेते
जिसपर उसे दर्प है
मामूली से दाग का श्राप देकर क्या बिगाड़ा
ठीक है उसकी कलाएं घटती बढ़ती रहीं
पर मेरी तरह पत्थर तो न हुआ
और उस मुर्गे से भी
उसका कूकना छीन न लेना चाहिए था
जिसने समय से पहले ही
भोर होने की घोषणा की
उल्टा उसे कुसमय कूकने का श्राप देकर
तो और अनर्थ किया
कि कलयुग में मेरे जैसी न जाने कितनी
अहल्याओ का लज्जाहरण होगा
उषा और प्रातः के संदेह में
निमिष की गोद में
फिर किसी और के अपराध का भागी
कोई और होवे
यह कैसा न्याय है?
गौतम के न्यायशास्त्र का
मैने तो छोड़ रखा था उन्हें
तप और ध्यान के निमित्त
कि मनीषि होये मेरा पति
त्रिकालदर्शी होकर
लोक का कल्याण करे
छप जाए उसके मस्तिष्क पर
ब्रह्मांड का ज्ञान सारा
ऐसा भविष्यदृष्टा बन जाये कि
अनर्थ के आगमन से पहले
अर्थ को रास्ता दे दे
मुझे खुद पण्डिता बनने की
आकांक्षा कब थी
मन मे कभीं नही आया कि
मैं भी तप और ध्यान करती
जीवन को सफल बनाती
अपने पति की तरह
पत्नी धर्म निभाया मैने
भले ही गौतम
पति धर्म न निभा सके
कई अमावाश की रातों को
निर्जन वन में बैठ बिताया
आग उगलती गर्मी को
काटा है मैने
उनकी यादों की शीतल छाँव में
प्रचण्ड हो रही बरसातों में
टपक रहे टूटे छाजों में
स्मृतियों की छतरी ताने
सहम- सहम कर रात गुजारी
कहो दिलीप के वंशज
मेरी सेवा में कमी रही
या तप ही तपस्वी को ना आया
जो उसके जीतेजी शचीपति
कुटिल वेश को धरकर आया
थी अंजना अबोध बालिका
कैसे वो रक्षण कर पाती
जबकी जान रहे थे गौतम
मेरी रूप राशि से मोहित
इंद्र बना रहा घाती
जिसको मैने जीवन सारा
बन्द आँख अर्पित कर डाला
हाय उसी ने मेरे कर्मो का
कैसा निष्कर्ष निकाला
कहो भगीरथ के कुलगौरव
कैसे मैं अब धीर धरूँ
वचन सभी झूठे निकले
साथ -साथ जीने मरने के
वो छोड़ गए मुझको कठोर बन
दिन थे जब पीड़ा हरने के
स्मृतियों के चित्र बनाकर
आँखों मे हूँ रोज सजाती
रोज बुलाती हूँ सपनो में
मिलकर भी पर मिल ना पाती
सुनो राम एक बात कहूँ
नहीं चाहिए मुझे रूप यह
आजीवन षोडशी स्वरूपा
मैं तजना चाहती हूं इस यौवन को
जो पुरुष काम का साधन है
मुझे मेरी उम्र के अनुकूल
एक प्रौढा का रूप चाहिए
जिसके माथे पर अनुभव की लकीरें हों
हृदय में गम्भीरता हो
चेहरे पर धैर्य हो
और आँखों मे तेज
मेरे अनुभवों से
त्रेता ,द्वापर और कलयुगी औरतें सीखलें
कि स्त्री का अनजाने में भी
किया गया अपराध भी अक्षम्य है
इसलिए
वे हृदय को पत्थर बना लें
पहले से ही
ताकि उसपर
किसी भी श्राप का असर न हो
और वह चलती रहे अपने रास्ते
जबतक जीवन है
लक्ष्य साधती रहे
समझ ले कि वह भोग्या नहीं
जननी है सृष्टि की
मैं यह सोचकर
विक्षोभ से बेकल हूँ
कि पत्नी से पहले एक माँ थी
क्या अधिकार था गौतम को
एक पुत्री से मां छिनने का
कैसे रही होगी अंजना मेरे बिन
कैसे बिन आँचल के मेरे
दिन काटे होंगे उसने
जिन कोमल हाथों को
मां के चुम्बन ने सहलाया होगा
कैसे उन हाथों से उसने
घर- द्वार रोज बुहराय होगा
बिन मां की बच्ची की पीड़ा
क्या देख पिता पछताया होगा
जिस अंजना की सेज
मां को गोद हुआ करती थी
कैसे उसने अँधेरी कुटिया में
काटी होगी रात अमावश
आग उगलती दमिनियों से
कैसे डरकर सिमटी होगी
और प्रचंड सी आँधी में जब
घने कुञ्ज में भटकी होगी
भयातुर होकर वह
वृक्षों से तो लिपटी होगी
बिन मेरे
कैसे काटा होगा उसने
बरसातों की रातों को
शिशिर ग्रीष्म में उसने
बाट मेरी तो जोही होगी
तब गौतम ने क्या कहकर
उसको दिया दिलासा होगा
मां कुलटा थी तेरी
या फिर खुद को ही कोसा होगा
कैसे मिला सकूँगी नजरें
अपनी उस बेटी से ही
जिसपर जीवन ही अपना
मैन सारा वारा था
उसके बिना न जीवन मे
कोई और सहारा था
उसकी प्रश्निल आँखों में
कैसे झाँक सकूँगी मैं
उसकी पीर की गहराई को
कैसे नाप सकूँगी मैं
कहो अयोध्या के हितकारी
क्या मुझ बिन तड़प -तड़प गौतम ने
काटे होंगे बारह मासा
जब बासंती मधुमास में
प्रकृति ने रस छलकाया होगा
जब सावन ने बरस बरसकर
हृदय में आग लगाया होगा
और किसी ने आकर उसकी
गलती पर समझाया होगा
तब क्या गौतम थोड़ा सा भी
करनी पर पछताया होगा
जिस निर्मोही हेतु
स्वर्ग को छोड़कर
पर्ण को वास बनाया
उसी ने ही सूखे पत्ते सा
मसल मुझे घर से बिसराया
मैं उस क्षण को कैसे भूलूँ
गौतम के अंतिम दर्शन के
बिन अपराध किये ही मैं
देख रही थी सजल नेत्र से
क्षमा माँगती जड़वत होकर
वन, प्राणी स्तब्ध खड़े थे
आँखों मे गंगा की धारा
कोमल हृदय हुआ पाषाण
पर सच कह दूँ तो
रुदन मेरा इसलिए न था
बन व्यभिचारिणी हुई शापित।
इसलिए ये आँखें सजल हुई
जिसको मैने सर्वेश्वर माना
उसको ही विश्वास न था
मेरे जीवनभर के तप का
इससे बड़ा परिहास न था
हे कौशल्या के लाल बताओ
क्यों कोई स्त्री अराधे?
पति को अपना सर्वेश्वर माने
क्यों दिवा -रात सेवा में उसकी
तन मन अपना बिसराये?
क्यों दासियों सी
रहे वो नतमस्तक होकर?
जब उसकी अनजाने में
की गई भूल भी
अक्षम्य अपराध बन जाये
तब अच्छा हो
वह अपनी ऊर्जा को समेटकर
तप और ध्यान में लगाये
ज्ञान की उपासना में रमाये
चहुदिशाओं का भ्रमण करे
और गुंजित कर दे
अपनी मीठी वाणी से
धरती आसमान को
जमा दे पैर पाताल लोक में
और उठा ले हाथ मे स्वर्ग
बता दे विश्व को कि
वह एक शरीर नहीं है
जिसे बस भोगा जाये
वह पशु भी नहीं है
जिसे पराधीनता का पथ पढ़ाया जाये
उसकी भी महत्वाकांक्षाएं हैं
इच्छायें हैं
आदि से अनंत तक जाने की
उसके तन -मन मे भी
स्वाभिमान का ज्वार -भाटा आता है
प्रेम की लहर उठती है
क्रोध की दामिनी चमकती है
यदि उसे त्याग करना ही है
तो इच्छाओं का नहीं
संकोच और भय का त्याग करे
मिटा दे हर मिथक को
जिसमे हर हाल में
वही अपराधिनी है
समेटकर ऊर्जा
उड़ने दे स्वप्न
निर्बाध गति से
जब उसका हृदय
कुछ करने को व्याकुल है
खींचकर लम्बी सांस
बांध लें हाथ
सम्मिलित हो जाये
अस्तित्व की दौड़ में
कि विश्व उसकी मुट्ठी में
आने को आतुर है।

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