कविता – डॉ. भारती अग्रवाल की पांच कविताएँ

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डॉ. भारती अग्रवाल दिल्ली विश्वविद्यालय के स्वामी श्रद्धानंद महाविद्यालय में सहायक व्याख्याता के पद पर तैनात(पदस्थ) हैं। हाशिए पर खड़े समाज के प्रति संवेदनात्मक आलेख का लेखन कई पत्र-पत्रिकाओं के लिए किया है। ‘शानी के रचना संसार का समाज’ नामक पुस्तक का प्रकाशन भी हो चुका है। वैसे थर्ड जेंडर पर विशेष कार्य करने में जुटी हैं। इस विषय पर केन्द्रित इनके कई आलेख विभिन्न पुस्तकों में संकलित है। लेख के अलावे कविताएं भी लिखती हैं। ‘हिन्दी की चर्चित कवियत्रियाँ’ नामक कविता संकलन में इनकी कविताएँ संकलित हैं। सन 2000 में इन्हें वालकन जी बारी संस्था द्वारा राष्ट्रीय युवा कवि सम्मान भी दिया गया गया था। आप सभी सुधि पाठकों के बीच प्रस्तुत है डा. भारती अग्रवाल की कविताएँ शोभा बिसेन की विशेष टिप्पणी के साथ। – संपादक

                       दोहरे व् महत्वाकांक्षी स्वरूप को अभिव्यक्त कविताएँ
भारती अग्रवाल की कविताएँ लोगों की दोहरी राजनितिक नीति, अविश्वसनीयता, छीजती मानवीयता तथा स्त्री जीवन की विवशता को रेखांकित करती है। आज मनुष्य की महत्वाकांक्षा इतनी अधिक बढ़ गयी है कि उसे थोड़े से संतोष नहीं होता । वह अपने स्वार्थ के लिए दोहरा चरित्र अपनाते हुए लगातार अपने अधीनस्थ लोगों का शोषण करता है । ‘भेड़िये’ कविता मनुष्य के इसी दोहरे व् महत्वाकांक्षी स्वरूप को अभिव्यक्त करती है । ‘सफेदपोश’ कविता भी कमोबेश इन्हीं भावों को उजागर करती है कि कैसे धवल छवि निर्माता, कुलीन या सभ्य कहलाने वाला समाज अपने हितों के लिए दुसरों से विश्वासघात करता है । ‘विशिष्टों की लिस्ट’ कविता का विचारात्मक आधार वे लोग हैं जो समाज के सामने स्त्री अधिकारों, स्त्री-पुरुष समानता की पैरोकारी करते हैं किन्तु उनके घर की स्थिति इसके उलट होती है । ये विशिष्ट लोग अपने घर में उन्हीं पितृसत्तात्मक मानदंडो को अपनाते हैं जो स्त्री की उन्नति के मार्ग में बाधक है । भय का वातावरण निर्मित करके कोई भी काम करवाया तो जा सकता है, किन्तु उससे आने वाली पीढ़ी के कोमल बालमन में जिस हिंसात्मक प्रवृत्ति का विकास होगा, उसके दुष्परिणामों को ‘बचपन’ कविता में कम शब्दों में बखूबी इंगित किया है । विवेकशून्य होने या कर दिए जाने के क्रम में लोगों के जीवन एवं सम्बन्धों की गर्माहट के समाप्त होने याकि जीवन में फैलते सर्दपन से मनुष्य के लाशों में तब्दील होने की त्रासदी को ‘लाशों के घर नहीं होते’ कविता में दर्शाया गया है। –शोभा बिसेन,सहायक प्राध्यापक, गुरु घासीदास विश्वविद्यालय, बिलासपुर|

1.भेड़िये

दोगले, दोमुँहे चहरे
भेड़िये की खाल में
शहर कहे जाने वाले इस जंगल में
ढूंढ़ते है नरम चारा
पेट भरने के लिए
खाते जाते है
दलान भर चारा।
नहीं जानना चाहते
संतोष के लिए
काफी होता है
चावल का एक दाना।।

2.सफेदपोश 

सफेदपोशों की भीड़ में
सबके हाथ में
दवे-छुपे चाकु थे
मैं स्तब्ध…और चुप
वे गले मिलते

घोंप देते
एक-दूसरे की पीठ में चाकू
अगली बारी मेरी थी।।

3. विशिष्टों की लिस्ट

विशिष्टों की लिस्ट में
सबसे आगे रहने वाला शिष्ट
प्रत्येक सभा, क्रांति, आंदोलन का प्रमुख
बटोरता है सुर्खियाँ
लुटता है वाह-वाही
बनता है न्यूज हेड लाइन।।

पत्नी के सम्मान में
स्त्री के अधिकार में
यह शिष्ट दिखने वाला
परांगत है हर शिष्टाचार में
दिखता है सच।
जब लौटता है घर
महकता है
पत्नी द्वारा उतारे गए
जूतों की जुराब में
टूटे हुए भ्रम से
भर जाता है घर।।

4. बचपन

मजबूर थी मैं
फुसफुसाते हुए कहा उसने
मेरे पास पाँच साल का मासूम बच्चा
और
उसके हाथ में थी ए. के. 47
वो जो-जो कहता गया
मैं बन्दूक की नोंक पर करती गई
भूल गई बस इतना
मासूम सीख रहा है सयानापन
समझ रहा है
कैसे मनवाई जाती है अपनी बात।।

5. लाशों के घर नहीं होते 

लाशों के घर नहीं होते
कुछ कर पाने की शक्ति से चुके
होते हैं मानव लाश,
लाश मानव नहीं होते।
लाशों के घर नहीं होते।।

लाशों का दिखता है सिर
विवेक नहीं होता।
होते हैं हाथ,
हाथ से काम नहीं होता।
लाशों का घर नहीं होता।।

लाशें रखी जाएँ
चाहे मिट्टी में, कब्र में या मकान में
साजो-समान से भरे-लदे, नक्काशीदार
ताबूत मकान नहीं होते,
इसी तरह
सजे मकान घर नहीं होते।।

बिना किसी फरमान के,
फरमान मानने के आदी लाशों के
जज्बात नहीं होते
जज्बात बिना घर नहीं होते।
लाशों के घर नहीं होते।।

एक टुकड़ा साबुत जज्बात
बच जाएँ गर
सड़ जाने के डर से
कर दिया जाता है सर्द
सर्द जज्बाती लाशों के घर नहीं होते।।

खुला कब्रिस्तान या श्मशान ही
मिल पाता है लाशो को,
लाशों के सगे-संबंधी रिश्तेदार नहीं होते
लाशों के घर नहीं होते।।