बिहार के बक्सर में जन्मी डॉ. सुमिता का डेरा-बसेरा फिलवक्त वाराणसी में है। गणित विषय से इन्होंने स्नातकोत्तर की शिक्षा प्राप्त की है। पीएच-डी. के लिए इन्होंने जिस विषय का चयन किया , वह अपने आप में अत्यंत ही नायाब है। इनके शोध का विषय था – ‘गणित व हिन्दुस्तानी संगीत के अन्तर्सम्बन्ध’ । इस विषय पर शोध के लिए एक ऐसे गाइड की जरूरत थी , जो गणितज्ञ के साथ संगीतज्ञ भी हो। अपने पिता के मित्र द्वारा सुझाये गए इस विषय पर कार्य करने के लिए इन्हें दीया लेकर गाइड की तलाश करनी पड़ी।  ‘स्टारडस्ट’  से जुड़कर फिल्म पत्रकारिता करते हुए इन्होंने विषय केंद्रित गाइड की तलाश जारी रखी। और अंततः इनकी जिद्द पूरी भी हुई। ‘स्टारडस्ट’ की एसोसिएट एडिटर रह चुकी सुमिता ने महज दो वर्ष तक सितार वादन का प्रशिक्षण लिया था। गणित संगीत और फिल्म पत्रकारिता के अलावे  इनका गहरा जुड़ाव साहित्य लेखन से भी है।  फिलवक्त स्वतन्त्र लेखन कर रही हैं। देश के कई प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं और ब्लॉगों के लिए निरंतर कविताएँ, आलेख और शोध-निबन्ध लिखते रहती है।  ध्वन्यात्मक और गणितीय शब्दावली के इस्तेमाल से सृजित डॉ. सुमिता चुनिन्दा कविताएं पढ़ें डॉ. विरल पटेल की समीक्षात्मक टिप्पणी के साथ। विरल, फणीश्वरनाथ रेणु डॉट कॉम के वरीय संपादन सहयोगी टीम से जुडी हैं। … संपादक

              ध्वन्यात्मक और गणितीय शब्दावली  से सृजित कविताएं

सृष्टि में ईश्वरीय सत्ता के अस्तित्व को सर्वेसर्वा मानने से नकारते हुए नारी की दुर्गेश्वरी सम-शक्ति से पहचान करवाती डॉ सुमिता की कविता ‘ईश्वर-तुमसे’ का शीर्षक “केवल तुम ही नहीं /रचयिता /मैं भी तो हूँ” पंक्तियों पर एक नजर करें तो अधूरा- सा प्रतीत होता है । लीक से हटकर एक-शब्दीय अंदाज वाली कविता शब्दों में ही विलीन करती शब्द-योजना अपने में गूढ़ अर्थ को समाहित किए हुये है। भाग-दौड़ से  भरे जीवन में यह कविता मानव को तनिक विश्राम के साथ एकांत में खुद से मिलकर खुद को पहचानने की बात करती हैं। जीवन की सार्थकता को तलाशती पंक्तियाँ “भरम है, जागने का भरम है/देह की सुषुप्ति से प्रवाहमान/ काल बीच” ‘जीवन है जीवन का नर्तन’ कविता की वर्तमान दौर के जीवन शैली पर खरी उतरती है । कविता में दिमागी चूहा/शाही बिल जैसे नवीन प्रतिकों का प्रयोग सराहनीय है। चाक-चिक, हूम-हा,कूँ-का, चूँ -चा, सड़-सड़ाक जैसे ध्वन्यात्मक शब्दों का प्रयोग भी कविता की सुंदरता को बढ़ाता है। प्रस्तुत कविता में गणितीय शब्दावली का भी बखूबी इस्तेमाल किया है। शब्दों की इस चक्र-व्यूहीय रचना का सार कष्टों-दुखों को झेलते-लड़ते हुए सृजन का अनुगामी बनाना है। ‘विस्मयादिबोधक’ गृहस्थी रूपी रंगमंच के दो मुख्य पात्र स्त्री और पुरुष में से पुरुष की सकारात्म्क वृत्ति की ओर क्षणिक प्रकाश डालती है। साथ ही रंगमंच के स्वगत कथन-सी अन्तर्मन में अपनी अस्मिता पहचानता स्त्री रूपी बेबस पात्र सोचता है। ‘अर्थ मण्डूका आख्यानम’ में मण्डूका स्वयं रचनाकार ने अपने लिए प्रयुक्त किया है। प्रकृति एवं उसमें निहित प्राणियों की हलचल के माध्यम से तथा विज्ञान की अच्छी समझ वाली लेखिका ने अपने विज्ञान की शब्दावली जैसे ल्यूनट अट्ट्रेक्षण का सिद्धान्त, कंटेनर ओज़ोन परत,ग्लोबल वार्मिंग आदि में गूढ रहस्यों को समेटा है जो कि कविता को एक बार नहीं बार-बार पढ़ने को बाध्य करता है। यहाँ मेंढक स्त्री जाति का प्रतीक है तो दादुर-पुरुष का तथा उस पुरुष का विवाहोपरांत स्वप्निल महल तो दिखा देता है मगर बाद में ताश के पत्तो की तरह उसे ढेर कर देता है और उन ताश के पत्तों के बीच अहम हिस्सा होते हुये भी जोकर, जोकर ही कहलाता है। स्त्री परिवार का अहम हिस्सा होते हुये भी स्त्री आखिर स्त्री होती है। मगर यहाँ लेखिका ने स्त्री अस्तित्व को बचाए रखने में सफलता हासिल है। – डा. विरल पटेल , सहायक व्याख्याता , दीव कॉलेज , दीव ,( दमन एंड दीव संघ प्रदेश)  

                                                डॉ. सुमीता की सात कविताएँ
1 . ईश्वर- तुमसे
द्रुत गति, चंचल
या धीर, सधे कदम
या हांफते, कराहते, डगमगाते
केवल मुझे ही आना हो तुमतक
तो
तुम ईश्वर ही सही
नहीं मुझे कबूल
तुम्हारी दोस्ती.

अपनी अघट ऊर्जा, श्रमशक्ति, मेधा
प्राणों की बिजली और अक्षरा आस्था के
पंचमहाभूतों से
रच लूंगी अपना सुन्दर संसार
पृथ्वी और आकाश.

केवल तुम ही नहीं
रचयिता
मैं भी तो हूँ.

2. देखो हमरी काशी

ठाठ मारती चीखें
एक दिन समाप्त हो जाती हैं
फिर बच रहता है
भाँय-भाँय करता खारा खालीपन.

ऐसे ही खालीपन पर आसन जमाए योगी की
अँगुलियों बीच फँसी
कलम की सूख चुकी स्याही से
झड़ा सफेद राख
महाश्मसान पर रानी के खो गए
मणिकर्ण का निशान लिए जम गया और
पुरनूर चन्दनी चन्द्रमा बन
जा अटका
आदि औघड़ की ध्यानस्थ जटाओं में
जहाँ पुण्यवती अविरल गंगा
त्रिशूल की चमचमाती नोक पर
कोटि-कोटि प्रबुद्ध दीयों से जगमगाती धूसर काशी
और चँद्रमा की चकमकाहट
दोनों को समदूरी समकोण से विस्मित निहारती
अहर्निश प्रज्जवलित महाश्मसान की ज्वाला को
शीतलता का आचमन कराती
काल के कूल का नैरन्तैर्य हो रही है…

जगत माता के नेह-परस से निखरी
काशी नगरी का कैसा अलबेला अपनापा कि
इसकी गलियों के चक्कर काट थके
धूलि-धवलित
गणेश और नन्दी
किसी गली के धूल भरे रास्ते के किनारे
सुस्ताते बैठे हैं…

3.एकान्त

एकान्त:
एकालाप
प्रलाप
विलाप
आलाप.

एकान्त:
विभ्रम
सम्भ्रम
भ्रम
निःभ्रम.

एकान्त:
अशान्ति
विशान्ति
शान्ति
प्रशान्ति.

एकान्त:
लय
लय
लय
विलय.

4.आत्मीयता

वह रोज ही दिखती थी
अपनी रसोई की विंडो स्क्रीन पर
जीवन के खटरागों के बीच
बाल-बच्चे, घर-संसार
सँवारने की नियत भूमिका
सुरूचिपूर्वक निबाहती
जीवन्त यांत्रिकता के साथ
(शायद मैं भी उसे ऐसी ही दिखती होऊँ)

हम पड़ोसी
एक जैसे फ्लैटों के वासी
लगभग एक सी जिन्दगी
अमूमन एक सी दिनचर्या
बारी-बारी से आते-जाते
दिनों और रातों में
खिड़की के फ्रेम में जड़ हो जाने का
लगभग एक-सा ही समय.

शब्द नहीं थे हमारे बीच
कुछ चीजें सामान्य नहीं थी जैसे
भाषा, धर्म, संस्कार…
जीने के नियम और ईश्वर भी एक न थे
उन्मादी जेहाद
रेलमपेल, … भागमभाग
जोड़-घटाव, काट-पीट के
संशयी पागल तमाशे बीच
आस्था पर आघात की पीड़ा से सशंकित
हमारे बीच टँगा रहा
एक निरपेक्ष अपरिचय.
महानगर में समय के जटिल समीकरण भी
अवकाश का हल नहीं देते.

आधुनिक तकनीकी युग में सूचनाएँ गन्ध, रंग या
खिड़की फुसफुसा जाती थी धीमे से जैसे
आज उदास है बहुत,
शहर से बाहर है जो दिखी नहीं इतने दिन,
घर में मेहमान आए हैं,
कोई पर्व है या किसी बच्चे का जन्मदिन…

निश्चित-सी दूरी से
कभी नजरें उठती तो उसे अपनी ओर देखती पाती
कभी जब वह नहीं देखती, मैं देखती रहती
उसका रोटी सेंकना, सब्जी तराशना
उबलते पानी के भाप से जली अँगुलियाँ सहलाना…
हमारे बीच पहचानेपन के अदृश्य सूत्र से
ये क्रियाकलाप
हमारे बीच अबोलेपन का झीना भराव थे.

पहले से कई बार मिल चुकी नजर
आज पहली बार लाई है मेरे लिए
उसके चेहरे पर उतर आई
बस यूँ ही सी मुस्कान
(ऐसा ही कुछ प्रत्युत्तर-सा था मेरे चहरे पर भी)

लहरीली थिरकन की नाजुक भाषा गुनगुनाती
रंग-बिरंगी तितलियों-सी वह मुस्कान
सजती रही मेरे आसपास
हमारी देहों में बहते एक-से लहू के
टहकदार लाल रंग की सुन्दरतम अल्पनाओं में
जिसमें हरा या केशरिया रंग
उतना ही था जितना
पत्तियों और पंखुरियों भर की जरूरत थी

मुझे घेरती रही प्रफुल्ल एक पुलक
बार-बार
आत्मीयता का अपूर्व उजास
बस एक सहृदय मुस्कान
सहज मानवीय एहसास .

5.जीवन है, जीवन का नर्तन है

सपने में सपनों की कड़ियाँ हैं
तलछट का कंकड़ है
काई है फिसलन है
दंशों से भरे हुए सर्पिल आवर्तन हैं
औंधे मुँह धम-धड़ाम
चाक-चिक, हूम-हा
कूँ-काँ, चू-चाँ, सड़-सड़ाक
जीवन है, जीवन का नर्तन है.

रहस्यमय घुमावदार रास्तों के
खतरनाक अंधे मोड़ों पर
चमकदार गोपन के असंख्य छिलकों सी
भूमार्गी सीढियाँ
पाताल से आकाश तक के असमाप्त गलियारे में
तकनीकी सज्जा का आकर्षक आधुनिक फैशन परेड है
सच से आभासी कृत्रिम चकाचौंध में रोशनी
अंधियारे का, ध्वनिओं और मौनों का
सहमा-सा कथन है.

भरम है, जागने का भरम है
देह की सुसुप्ति से प्रवाहमान काल बीच
दैनन्दिन गणित के निश्चित फॉर्मूलों-प्रमेयों में
विचारों की किरचें हैं
बिगड़ने को बेचैन अनगिन व्यवस्थाएं:
दिमागी चूहा सैकड़ों कमरों वाले
अपने शाही बिल में चैन भर की जगह तलाशता
दौड़ता ही फिरता है
निरर्थक सक्रियता?- भीतर किसी
धड़कते जिन्दा पिण्ड का तिल-तिल मरण है.

सार्थक की तलाश:
बौधिक, सृजनधर्मा, कलाविद, आलोचक
गुप्तचर, सिपाही, राजनेता, विज्ञानवेत्ता
गलियों-गलियों, नालियों-पुलियों
खेतों-झाड़ियों, पाठशालाओं-पुस्तकालयों
और प्रयोगशालाओं में
चाक-चौबन्द-चौकस फैले हैं
निरीह दुखों को मथकर शक्तिमान प्राण का
अथक शोध बहुत गहन है
इसीलिए मान लूँ
जो अ-जीवन है, विकास का वचन है.

कभी भी पिघलकर बह जाने वाली
बर्फ-सी या कुहा-सी जमी
गहरी उदासी का ठंडा असहाय दर्द:
सरल-वक्र, क्षैतिज-लम्बवत, वृतों-वलयों
असंख्य जटिल आकारों-प्रकारों के
एक-दूसरे को काटते जाने कितने कोणों वाले
भव्य तिलिस्मी दुर्भेद्य किले में
धारदार हथियारों से बचाते
शानदार कवचों और चमचमाते ढालों की
परतों के भीतर
सृजन की एक नन्हीं-सी आँच
खुद से खुदी के हरण का सच-सा मरम है.

6.विस्मयादिबोधक

गमकौआ तेल से सुचिक्कन सँवरे केशों में
टह-टह लाल सिन्दूर से खिंची
सरल रेखा के ठीक नीचे
माथे के बीचोंबीच
लाल गोल बिन्दी के आवर्त में
विस्मयादिबोधक सी वह
रेणु की कथानायिका सी दिखी.

गली के मोड़ पर जबसे
यह नई दुकान खुली है
भाजी-तरकारी खरीदने वह खुद ही
चली आती है अक्सर शाम को.
दुकानदार की लाख मनाही के बावजूद
पूरी ढिठाई से नर्म-नर्म भिंडियाँ चुनती उसकी अंगुलियाँ
इन भिंडियों से ज्यादा मुलायम थी कभी…
उदासी की एक रेख-सी
उसके चेहरे को छूकर निकल जाती है कि
पूरी मुस्तैदी से भंटे को तजवीजती
उसकी नजर एकाग्र हो सके.

ये तो अच्छा हुआ कि
यह दुकान खुल गई
नहीं तो उसका ‘गोबर गनेश’ पति
कुछ भी उठा लाता था कड़ा-सड़ा-गला.
अरे, जब मोल लेनी है तो वह तो
ठीक से ठोक-बजाकर ही चुनेगी शाक-भाजी !
‘चुनेगी’ शब्द उचककर बैठ जाता है
उसकी पुतलियों पर
एक निर्वात्-सा रचता
जिसमें अर्से से तिरा हुआ था
एक लहरीली धानी चूनर का थमा हुआ रंग…
इस रंग के मायने अबूझ थे उसके लिए
इस रंग से बावस्ता एक ही दृश्य
अंकित था उसकी याद में
‘क्रान्ति’ फिल्म में जंजीरों से जकड़ी
भारत माता की मूर्ति
और उसकी मुक्ति के गीत गाते नायकों की टोली…

पीहर में जोड़ा-पारी की लड़कियों में
सबसे तेज-तर्रार गिनी जाती थी वह
जिसकी चमकीली आँखों की गीली जमीन में
किसी खास सपने का कोई बिरवा नहीं अँकुरा था
जहाँ माँ अपनी दुलारी धिया को
सैंत-सैत कर भविष्य की सुघड़ बहुरिया
बनने के सारे गुर सिखा रही थी पूरी जतन से
और पिता
बेटी ब्याह कर बरी हो जाना चाहते थे
अपनी सबसे बड़ी जिम्मेदारी से
सो एक दिन पिता बरी हो ही गए
रंग ले ही आई माँ की
पूरी जतन से की गई मेहनत
और जैसे उसकी सहेलियाँ ब्याह बाद
अपने-अपने ससुराल बस रही थीं
वह भी आ गई अपने पति के घर.

सबको नहीं होता नसीब
ऐसा भाग है उसका
कि पति मिला है सीधा-सादा
मान लेता है अधिकतर उसका कहा
और ठीक-ठाक चल रही है
उसकी साधारण-सी गृहस्थी
बाल-बच्चे, घर-संसार, लोक-परलोक…
जिसमें न स्थान है, न चाव
साधारण से ऊँचे सपने देखने का.

वह भारत देश की लाखों मध्य-वय
भली औरतों जैसी ही एक भली औरत है
जो कर लेती है संविधान प्रदत्त
मताधिकार का प्रयोग
हर पाँच साल पर दे आती है वोट
सूचना-तरंगों के रेलमपेल में
होती है ऊभ-डूब
जो रोज-ब-रोज
दाल-चावल से कंकड़ चुनते हुए
अक्सर सोचती है कि
क्यों न चुना उसने निजी कोईं स्वप्न
जन्म और जीवन !

7. अथ मण्डूका आख्यानम्

किसी सावन
सजीले नंदनवन में
कमनीय हरियल नाजुक नवेले पत्ते पर
बूंदों की टिप-टिप को
दिप-दिप बड़ी-बड़ी आँखों से
बिटिर-बिटिर ताकती
चिकनी चमकीली हरी त्वचा वाली मेंढकी
सुभग सौन्दर्य के जादू में तिरी
उस एक स्वर्गिक सुरीली दादुर ध्वनि के
पीछे हो ली जिसकी गुंजायमान टर्राहट
महाकवि तुलसीदास को भी वेद-मन्त्रों से
सुनाई पड़े थे कभी.

यह आवाज लोकप्रिय कहानी के
उस प्रसिद्ध बाँसुरीवादक की नहीं थी
जिसके पीछे शहर भर के चूहों के बाद
बच्चे चल पड़े थे
बौराई मेंढकी ने इसे
नितान्त निजी समझ लिया था:
“चल सुभवे हमारा ही देस रे
नननवा वनवा छोड़ के हो ना…”
अपना आप भूल चल पड़ी वह
इस आत्मीय पुकार के पीछे
न जाने किस लोक …

समुन्दर में पिन्हा नया लोक
जगर-मगर रंगों के
काँच का कंटेनर था विशाल
बेहद बारीक नक्काशी से सजा
कलात्मक और खूबसूरत.

नए लोक में क्रांति की सी हलचल थी
हिचकोले लेता समुन्दर प्रक्षेपित करता रहता
सूचनाओं के लहरों के ज्वार
और भाटे में
अजब-गजब बातें थीं, बहसें भी
चतुर्दिक ज्ञान (?) की रंगीनियाँ थी, जलसे भी
मेंढकी हर्षित थी, विस्मित भी…

नए लोक पर
वारी-बलिहारी जाती
कुएँ की मेंढकी ने देख लिया था समुन्दर
अहा! अहो भाग्य! धन्य जीवन!

फिर जाने क्या बात हुई कि समुन्दर
खफा हो गया चाँद से
ल्यूनर अट्रैक्शन के सिद्धान्त के विपरीत
ठहराव के इस शून्य-काल का
उपयोग किया जा रहा था
किसी बेहद महत्वाकांक्षी प्रयोग के परीक्षण में
जिसके लिए बढ़ाया जा रहा था
काँच के कंटेनर का तापमान
धीरे… बेहद धीरे…
और विडम्बना तो यह थी कि
इस प्रयोग का कर्ता-धर्ता मेंढकी का
दादुर ही था अपना
जन्मना ही सहज हासिल थी जिसे
बाकी दादुरों की आम सहमति
इस तथ्य से बेखबर
अपने कंटेनर पर रौब दाबिल करती
खुश होती मेंढकी
बारीक नक्काशी के बेल-बूटों पर
सलमा-सितारे टाँकती रही.

अपनी धमनियों में धीरे-धीरे बढ़ते तनाव के
कारण से अन्जान मेंढकी
अनुकूलन की विधियाँ आजमाती रही
उसे पता नहीं चल सका कि कब
बदल गया पूरी तरह उसकी खाल का रंग
बाहर कंटेनर के तापमान का
बदस्तूर बढ़ना जारी था
वह ग्लोबल वॉर्मिंग, ओजोन परत में बढ़ते छेद, रशेसन
जैसे सुने हुए आभिजात्य, विदेशज, चमत्कारपूर्ण
किन्तु डरावने पदों का
जीवन्त असर समझ खुद को छलती रही…

बढ़ती बेचैनी के अदृश्य कारणों से जूझती
मेंढकी की शिराएँ सख्त होने लगीं
दिल भिंचने लगा अपने ही पिंजर में
और जब तड़कने लगा तन्तु-तन्तु का तनाव
असह्य दर्द में आँखों के पानी ने पहले भाप
और फिर चिंगारियों से अपनी शक्ल बदल ली
चटकती प्यास, अकड़ती देह और दरकती दृष्टि के बीच
क्षणभर के फ्लैश की तरह चमक गई
बूझ की एक चिनगी…

उबलकर मर जाने के ठीक पहले
बचे-खुचे प्राण समेट
पूरी ताकत से कूद पड़ी मेंढकी
उस कंटेनर से बाहर.

बलुही-पथरीली जमीन पर
धीरे-धीरे आँखें खोलती
वह मेंढकी मैं ही थी.
*****