पेशे से भूजल वैज्ञानिक राजीव रंजन शुक्ल मूलतः बिहार के रहने वाले हैं। वैसे कविता लेखन में रूची तो विद्यालयीन जीवन से है। यदा-कदा लिखते भी थे। लेकिन विज्ञान विषय के विद्यार्थी होने के कारण साहित्य लेखन में डुबकी लगाने से वंचित रह गए। जियोलाजिकल सर्वे ऑफ इंडिया में भूजल वैज्ञानिक के पद पर कार्य करते हुए इन्होंने पुनः कविता लेखन शुरू किया है। देश दुनिया के बदलते परिवेश के बीच मानव जीवन त्रासदी इनके लेखन का प्रिय विषय है। प्रस्तुत कविता में राजीव रंजन शुक्ल की प्रदूषित हो रहे पर्यावरण का मानव जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों का चित्रण है। आइये पढ़े इनकी पांच कवितायें मधुलिका बेन पटेल की समीक्षात्मक टिप्पणी के साथ। मधुलिका, फणीश्वरनाथ रेणु डॉट कॉम के संपादकीय कार्यकारिणी टीम की सक्रिय सदस्या हैं। … संपादक

                                               मन को छू जाने वाली कविता

राजीव रंजन शुक्ल की कविता ‘माँ’ मन को छू जाने वाली कविता है।  निसंदेह माँ पर लिखना अत्यंत कठिन है;क्योंकिउसके प्रेम, त्यागकी तुलना करने के लिए शब्द नहीं मिलते. माँ धरा की अनमोल कृति है । उसे कोई शब्द नहीं तोल सकता.‘नयी सदी में हवा’ शीर्षक कविता पर्यावरण की दशा का चित्रण करती है । आज दूषित हो चुकी हवा में साँस लेना मुश्किल है । मनुष्य ने प्रकृति का दोहन इस कदर किया कि आज जीने के लिए स्वच्छ वायु भी दुर्लभ है । रचनाकार चेतावनी देते हैं कि अगर हम अभी भी नहीं सतर्क हुए तो वह दिन दूर नहीं, जब हवा को कम्पनियाँ प्रोडक्ट की तरह बेचना शुरू करेंगी । कविता‘भूजल विज्ञान’ में इस बात की चर्चा की गयी है कि वैज्ञानिक शोधों द्वारा धरती के भीतर की वास्तविकता का ज्ञान होता है । ‘आज का युग’ कविता में राजीव शुक्ल बदलते मूल्यों की ओर संकेत करते हैं । भाषा को लेकर बड़े या छोटेपन की भावना, नवयुवकों के व्यवहार, कंपनियों के सामान से घिरे लोगों के भीतर संवेदना की तलाश कवि अपनी कविता के माध्यम से करते हैं । उनकी कविता में तमाम अंतर्विरोधों की चर्चा है । भ्रष्टाचारी के हाथों में नेतृत्व का होना इस युग की सबसे बड़ी विडम्बना है । ‘शब्द’ कविता शब्दों की विभिन्न भंगिमाओं को व्यक्त करती है. शब्द जीवन की भांति हैं । इनसे बहुत कुछ संभव है. जहाँ तक कविता की भाषा का प्रश्न है तो राजीव शुक्ल की कविताओं में नूतनता के साथ लयात्मकता भी प्राप्त होती है -डॉ. मधुलिका बेन पटेल (सहायक प्राध्यापक) हिन्दी विभाग, तमिलनाडु केन्द्रीय विश्वविद्यालय, तिरुवारूर

1.   माँ
माँ
दुनियां की अनमोल कृति
धरा पर ईश्वर की प्रतिलिपि
कोख में जिसने नौ महीने पाला
दुःखों को स्वयं पी डाला
अपने खून से जिसने है सींचा
हर दुख को हम से है खींचा
मीठी लोरी जिसने हमें सुनाया
स्वयं जगकर हमें सुलाया
भूखी रहकर हमें खाना खिलाती
जग के तानों को गले लगाती
माँ का आँचल है बच्चों का पलना
जैसे मरूथल में मीठा सा झरना
उसके त्याग से है हम
सब कुछ है माँ के प्यार से कम

2. नई सदी मेंहवा
नई सदी की एक खबर
नर हें हम इससे बेखबर
बिक रही है दिल्ली में
‘पहाड़ों की हवा शुद्ध’
खबर नहीं यह चेतावनी है
प्रकृति की मौन बानी है
जल को किया प्रदूषित
भूमि भी हो गयी दूषित
रौंद कर पौधों को
किया भूमि बंजर
इसीलिए देख रहे हम
शुद्ध हवा बिकने का मंजर
मिलेगा हवा रीचार्ज का सिम
खुलेंगे हवा पम्प
और कहेंगे
हमने लगाया
विकास का
एक और जंप
बेचेंगी अब कंपनियाँ
शुद्ध हवा के सिलेन्डर
सोचकर यह
लगता है डर
चलो पेड़ पौधे लगायें
धरती पर हरियाली लायें
3. भूजल विज्ञानभूजल वैज्ञानिक को
कहते हाईड्रोजिओलोजिस्ट
वे होते बहुत औप्टिमिस्ट
करते भूजल की खोज
क्या है धरा के अंदर
कर इसकी सोच
किया जाता
शैल की पहचान
इससे हो जाता
काम आसान
वे करते भूगर्भीय अध्ययन
आंकड़ों पर चिंतन और मनन
यदि धरती है मैदानी
तो समझो
है पानी ही पानी

मिले जहाँ
बजरी बोल्डरऔ रेत
हो सकती वहाँ
जल से भेंट
यह तो मैदानों की बात
पहाड़ों में क्या है खास
जल यहाँ
नहीं आसान
पर करनी होगी
उसकी पहचान
तोलेते
कृत्रिम उपग्रह
का साथ
ईमेजरी से
स्थलानुरेख की बात
जहां हो विभंग और भ्रंश
वहाँ हो सकता
जल का अंश
पर हो सकती यहाँ
सूखे की निशानी
कहता यह
भू-भौतकी विज्ञानी
घबराने की नहीं
कोई बात
वर्षा जल तो है
साथ
अब करो
भूजल का विश्लेषण
क्या है इसमें
कोई प्रदूषण

यदि हो उसमें
फ्लोराइड औ आर्सेनिक
तो समझो
जल है यह दूषित
करना मत
इसका उपयोग
नहीं है
यह पीने योग्य
आज यह लो ठान
करना है इसका निदान
जल ही है सबका प्रान
कर सकते हैं हम
इसका समाधान
वर्षा जल संरक्षण
कृत्रिम पुनर्भरण
है विद्यमान
जल संचयन है आसान
भूजल पुनर्भरण की विधि अपनाओ
उसे रोक कुआं तालाब बनाओ
जल से पूरित होगी धरा
जीवन होगा हम सबका हरा भरा

4. आज का युग
आइये
है देखते
आज का युग
माँ और पिता को भेज
वृद्ध आश्रम
नहीं आ रही
बच्चों को कोई शर्म
अभिवादन की
बदल रही है शैली
‘हेल्लो’ ‘हॉय’ की अबूझ पहेली
हिन्दी बोली वाले को
हैं समझते गॅवार
करो अंगरेजी मेंया…या…
तो होशियार
देखते ही मुहल्ले के
मामा और चच्चा
बुझा देता था सिगरेट
बिगरा बच्चा
अब बुजुर्ग ही
बदल देते हैं रास्ते
क्योंकि धुओं के छल्ले
छोड़ मुँह पर
चल देते है वे
हँसते हँसते
आज हर रिश्ते को
अर्थ में तौलते है
इसीलिए पैसा बोलते हैं
ऊँचीं दीवारों में है
मानव शरीर
धन के लिए ही
लगी है भीर
पास हमारे टीवी
स्मार्ट फोन औ फ्रिज
ब्रांडेड सामानों की
सजी है सीरीज
खो गया
बचपना बच्चों का
खेल रहे वे
कलेश औफ़ क्लेन
और मिनीमिलिसिया का खेल
अपनों से होता न इनका मेल
चैनलों की है ब्रेकिंग न्यूज
‘बेटों ने माँ-बाप’
को धन के लिए
किया है फ्यूज
गुरुओं ने
शिष्याओं पर
डाली बुरी नजर
है यह नई खबर
आज घोटाले पर घोटाला
फिर भी है
वही नेतृत्व करने वाला
सावधान!!!
बदल रहा परिवेश
भ्रष्टाचारी बलात्कारी ने
बदला है भेष
हत्या लूट डकैती की
नहीं होती है चर्चा
मजबूर है इतना कि
ईमानदारी पर ही
करनी पड़ती परिचर्चा
ध्वंश कर प्रकृति का
मनाते हैं इसका दिवस
फैलाकर दुर्भावना
सद्भावना दिवस
काटकर जंगल
बनाया भवन कंक्रीट
फिर क्लाइमेट चेंज का
डंका दिया पीट
गूगल अर्थ से
देख रहे विश्व
पर भूल रहे
है खतरे में
अपना ही आस्तित्व
रिश्ते और संबंधो को
गए हैं हम भूल
पर फेसबुक फ्रेंडलिस्ट है फूल
ट्विटर वाट्सअप पर
करते मैसेज तुरंत
लगता जैसे
मिलने की रीत का
हो रहा अंत
नौजवानों,
करता हूँ अनुरोध
बुजुर्गो कान करो विरोध
5. शब्द
शब्द
बहुत कुछ कह जाते
कर भी जाते
शब्द ही
करते हमें निःशब्द
उससे ही हम सशक्त
शब्दों में
होती है धार
क्रांति की यह सूत्रधार
सब है शब्दों की माया
कविता में भी शब्दों की काया
शब्द से हार है
शब्द से ही जीत
शब्दों से
बनते हम मनमीत
शब्द से ही दुश्मन बनते अगणित
इसलिए मनोदशा को शब्द से न मिलाए
बाद मे जिससे हम न पछताए
मनोदशा तो फिर बदल सकती
निकले कटु शब्द केवल पछतावा देती
शब्द बहुत कुछ कर भी जाते
शब्द बहुत कुछ कह भी जाते॥