कविता / वर्तमान विद्रूपताओं को उकेरती जूली जानवी की पांच कविताएँ

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बिहार के मुरलीगंज में जन्मी कवयित्री जूली जानवी का डेरा-बसेरा कोलकाता में है। इनके व्यवसायी पिता को भी कविता लेखन का शौक था। वे ग्रामीण थियेटर से भी जुड़े थे। कला और साहित्य के माहौल में पली-बढ़ी जूली जानवी बचपन में अपनी पिता द्वारा लिखित रचनाओ को कोरे कागज पर उतारा करती थी। स्कूली जीवन के दरम्यान इन्होने कुछ कविताओं की रचना की थी। बाद के दिनों में पढ़ाई के बढ़ते बोझ के बीच कविता लेखन का शौक कहीं दब गया था। लेकिन जब सांसारिक जीवन में प्रवेश की तो सामाजिक वर्जनाओ से टकराती जिन्दगी ने संवेदनाओ को पुनः जागृत कर दिया। २००९ से लगातार रचनात्मक कार्यों में जुटी हैं। पिछले दस वर्षो में इनकी कविताओ को कई पत्र पत्रिकाओं में स्थान मिला है तो कहानियों का प्रसारण रंगीला एफ. एम. रेडियो से हुआ है। सुगठित भाषा और कम शब्दों में वर्तमान परिदृश्य से परिचित कराती जूली जानवी की कविताएँ पढ़े मधुलिका पटेल की समीक्षात्मक टिप्पणी के साथ।…संपादक

   वर्तमान विद्रूपताओं को उकेरती जूली जानवी की कविताएँ
जूली की कविता वर्तमान की विद्रूपताओं को उकेरती है। ‘मासूम’ शीर्षक कविता में अपहृत बच्चों की चिन्ता हैं उन्हें। यह बात किसी से छुपी नहीं कि आज अपहरण एक पेशा का रूप धारण कर लिया है। पैसे के दम पर अपहरणकर्ताओं की पकड़ इतनी मजबूत है कि उनके खिलाफ शिकायत करना भी दूभर हो जाता है। बच्चों के अपहरण की घटना अत्यंत भयानक हैं। उन्हें भिखारी बन कर सड़कों पर भीख मांगते हम देखते हैं और आगे बढ़ जाते हैं। इस कविता के माध्यम से जूली लोगों को चेतावनी देती हैं कि अगर हम समय पर इन बच्चों के लिए नहीं खड़े हुए तो एक दिन ऐसा आएगा जब अपहरण की काली छाया हमारे बच्चों पर भी मंडराने लगेगी। ‘स्त्री’ कविता में स्त्रियों के जीवन का समर्पण, त्याग, उनकी चुप्पी, उनको लेकर पुरुषों का भय और छलावा सब कुछ एक साथ अभिव्यक्त होता है। ‘सपना’ कविता में अधूरे सपनों की छटपटाहट है। वे डायरी के अधफटे पन्नों से बाहर आना चाहते हैं।सभ्यता के यथार्थ को दिखाती है उनकी‘सभ्यता’ शीर्षक कविता तथाकथित सभ्य लोगों की रातें निशाचर की भांति कुत्सित होती हैं। दिन के उजाले में वही कुंठा देवताका रूप धर लेती है। जूली अपनी इस कविता में ऐसे लोगों को बेनकाब करती हैं। ‘युग’ कविता समय के भयानक मंजर को लेकर आती है। चुप्पी का दौर है। जिसने जुबान खोली उसे संस्कृति के नाम पर मसल दिया जाता है। ख़ामोशी तोड़ने वाले खून से लथपथ कर दिए जाते हैं।युग बदलने की परिभाषा आज खून में लिपटी है। जूली की कविताओं की भाषा सुगठित है। कम शब्दों में पूरे परिदृश्य को उकेरने की क्षमता से लैस हैं कविताएँ। . डॉ. मधुलिका बेन पटेल , सहायक प्राध्यापक , हिन्दी विभाग , तमिलनाडू केन्द्रीय तिरुवारुर
1. मासूम
सड़कों पर जुल्म ही जुल्म
और हम रोज आंखें मीचे
चुपचाप अपने शाख पर लौट आते !

मासूम बेबसी का कटोरा
रख सामने
अपनी ही बर्बादी का
गुहार हमसे लगाते

हमने न खोई जान (बच्चा) अपनी
तो दर्द क्यों होगा हमें
तमाशा देख जुल्मी का
बेखौफ़ कैसे सो रहे हम !

एक दिन बारी हमारी आएगी
गिद्ध ताक में बैठा सुबह से
सम्भलो जरा
चूक न हो जाए हमसे …

2.स्त्री
सृजन कर कोख में जीवन
सृष्टि को साकार करती हुई
मकान को घर में बदलतीहुई
एक घरोंदा परिवार का बुनती हुई
मैंएक स्त्री हूँ

सामाजिक पतन करती हमारा
कुछ विकृतियां
भूल क्यों जाता समाज
उनकी विरासत
पुरुष हीप्रधान
सदियों से क्यों बनते रहे
शायद खौफ गहरा था तुम्हारा
जो अंजाम यूँ देते रहे

3.सपना
जब ऊंघने लगती हैं कमरे की दीवारें
चीखती हैं खिड़कियाँ
खुली हवा की तालाश में
मेज पर धूल खाती हुई कुछ ख्वाहिशें जो
डायरी के किसी अधफटे उजले पन्ने में कैद
फरफराते हैं अपने परों के लिए

सपने अब खुद ही हकीकत बनने को आतुर
हों तो भला हमारा कसूर क्या है

4.सभ्यता
कितने ही ख्वाब कालजयी रातों मे
धराशायी कर दिए गए
उसके मुख से केवल निकला था
नहीं…..
कहीं से खरीदा कही पर बेचा
फ़िर बार बार बेचा
जब तक कि वह शरीर मुर्दा न हो जाए
खरीदने वाला रात में निशाचर
और दिन में देवता
जिसकी लम्बी उम्र के लिए उपवास रखा गया
बार बार रखा गया
हैरत है न

5.युग
तुम्हारी चुप्पी एक गम्भीर मसला है
जो कितनी अनुशासित और पंक्तिबद्ध है
तुम सलीके से रख दिए जाओगे …

जिसने तोड़ी चुप्पी
वो टांग दिए जायेंगेहरेक जुबान पर
मसले जाएंगे संस्कृति के नाम पर
और युग बदल दिए जाएंगे
       

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