कहानी / निर्देश निधि – ” तुम्हारी कौन सी जमीन “

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इतिहास की छात्रा रहीं निर्देश निधि साहित्य में भी दखल रखती है । कविता, कहानी, संस्मरण, और समसामायिक विषयों पर लेखन के जरिये इन्होंने अपनी खास पहचान बनाई है। अमर उजाला, जनसत्ता, दैनिक जागरण, कादाम्बनी, नया ज्ञानोदय, हंस, पाखी, कथाक्रम, इंद्रप्रस्थ भारती सहित कई अन्य प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं के लिए लगातार लेखन कर रही हैं । ‘झांनवाद्दन’ नामक कहानी संग्रह का प्रकाशन हो चुका है। आकाशवाणी से भी इनकी रचनाएँ प्रसारित होती रहती है। ‘बुलंदप्रभा’ साहित्यिक पत्रिका में उपसंपादक हैं और  बुलंदशहर  नगरपालिका की त्रैमासिक पत्रिका ‘प्रगति’ का भी संपादन  करती हैं। काव्य गरिमा, हिन्दी श्री और  सृजन सम्मान से सम्मानित लेखिका निर्देश निधि की कहानी पढ़े कृष्णा सोनी की विशेष टिप्पणी के साथ। – संपादक

                        अलग कथ्य और मिजाज की कहानी

 निर्देश निधि की कहानी “तुम्हारी कौन सी ज़मीन” हिंदी कहानी के इतिहास में एक बिलकुल अलग कथ्य और मिजाज की कहानी है| प्राकृतिक स्वभाव के विरुद्ध जीने की आज की व्यक्ति स्वतंत्र वाली भावना ने अस्मिता के प्रश्न को किस तरह खंडित किया है इसका बहुत ही सटीक उदाहरण है यह कहानी| नर और नारी प्रकृति की अदभुत उपादान हैं जिससे जीवन और सृष्टि संचालित होतेहैं लेकिन आधुनिकता और अस्मिता के संघर्ष की अंधी आंधी ने मनुष्य के जूनून को मानवता से भी बड़ा कर दिया| मानुष ने वैज्ञानिक खोज के माध्यम से प्रकृति के नियमों को चुनौती देने शुरू किया| पर इस दुर्दम्भिक्षा ने मनुष्यता और मनुष्य की सामाजिकता दोनों के मूल स्वभाव को लांछित किया|  निर्देश निधि ने आज के इस महत्वपूर्ण मानवीय समस्या का चित्रण विनीता से विनीत बनाने की प्रक्रिया के माध्यम से हमारे सामने प्रस्तुत किया है| प्रकृति अंतिम सत्य है| उसने प्रत्येक जीव का सृजन एक विशिष्ट स्वभाव के अनुकूल किया है| पर वैज्ञानिक आविष्कार ने उसे चुनौती देने लगा है| आज कई स्त्री-पुरुष अपना लिंग परिवर्तन कर अपने को जन्मजात पहचान और अस्मिता से मुक्त होने की कोशिश करता है| पर अंततः वे उस वर्जना एवं स्वभाव से कभी मुक्ति नहीं पाते| क्योंकि प्रकृति की विशालता के सामने इंसान बहुत तुच्छ साबित हुआ है| मनुष्य कि संपूर्णता उसकी नैसर्गिकता में है अगर हम उसके विरूद्ध होंगे तो अपनी पहचान तो खो ही देंगे दूसरी पहचान भी हमें लांछित ही करेगी| यह कहानी अपने आप में बिलकुल अलग और नवीन शैली की है| भाषा के माध्यम से जेंडर डिस्कोर्स का प्रसंग अत्यंत प्रासंगिक है – कृष्ण सोनी, सहायक प्राध्यापक, गुरु घासीदास विश्वविद्यालय, बिलासपुर|

तुम्हारी कौन सी ज़मीन

                                           निर्देश निधि

हमारे बचपन साथ – साथ लगभग एक ही जैसी परिस्थितियों में और एक ही जैसे परिवेश में गुज़रे । जहांमुझेखुद के लड़की होने पर कुछ – कुछ गर्व की अनुभूति थी, वहीं तुम्हें अपने लड़की होने पर बेहद शर्म क्यों थी यह कभी समझ नहीं आया । भाइयों और बाल सखाओं की तरह आऊँगा, जाऊंगा, खाता हूँ, जाता हूँ,बोलने का शौक था तुम्हें , क्या जाने कौन सी कुंठा ने तुम्हारे मन पर अपना साम्राज्य जमाकर रखा था कि तुम्हें लड़की होने की हर बात से शर्म थी । संबोधनों और शब्दों की इतनी औकात तो नहीं होती न कि मनुष्यों के जेंडर बदल सकें, आखिर तुम यह क्यों नहीं समझती थी । उल्टा तुम समझती थी कि खुद के लिए जाता हूँ, खाता हूँ पुकारने से तुम अपने घर में अपने भाइयों में सम्मिलित हो जाओगी, या समाज के पुरुषों में तुम्हारी गिनती होने लगेगी, आखिर ऐसा भी क्या विशेष दिखाई देता था तुम्हें पुरुष हो जाने में? अपनी इस आदत पर भी तुम अपने घर में डांट – फटकार ही तो खाती थीं । तुम्हें डांट – फटकारें तो बर्दाश्त थीं पर खुद को लड़की मानना बर्दाश्त नहीं था । तुम्हारे भीतर वो लड़का बनने का जुनून, तौबा । स्कूल का साथ छूट जाने के बाद जिन – जिन भी सहपाठियों को तुम याद रही होओगी निश्चय से कह सकती हूँ कि तुम्हारे इस जुनून का उस याद में बहुत बड़ा हाथ रहा होगा,तुम्हारी किसी और विशेषता की वजह से तुम शायद ही किसी को याद रही होओ । तुम्हें तो भूला जा सकता था पर तुम्हारे इस जुनून को हम दोस्तों में से कोई एक भी तो नहीं भुला सका होगा । तुम ऐसी क्यों थीं इसके सही कारण शायदतुम्हारे घर में खोजे जा सकते होंगे । तब ही क्या, आज भी अधिकांश घरों में बेटियों को बेटों से पीछे ही तो रखा जाता है । तुम स्वीकार नहीं कर सकीं । अस्वीकारने के भी बहुत से तरीके हो सकते थे पर तुमने अजीब ही तरीका अपनाया । सबसे कमजोर और वाहयात, अतार्किक  तरीका,  जिसने तुम्हें बेहद कमजोर साबित किया, जो स्त्री जाति के लिए बहुत नकारात्मक रहा । तुम्हारे उस तरीके ने स्त्री के मान, उसके सकल अस्तित्व को ठेस लगाई , उसके महत्व और आत्मविश्वास को कम ही किया । मैं मानती हूँ कि जब तुम बच्ची थी तो घर में भाइयों का महत्व तुमसे अधिक था, बड़ी हुई तो बिना बात ही हाशिये पर इसलिए ठेल दी गई कि तुम स्त्री थी । तुमने सारे सामाजिक विरोधों और दबावों के बाद अपने अथक परिश्रम से खुद को कार्यकारी बनाया था । कार्यालय में भी तुम दो हिस्सों में बंटी हुई थीं । यानि तुम स्त्री की देह में पुरुष बनकर खड़ी थीं ज़ाहिर है इसीलिए तुम वहाँ भी हास्यास्पद बन गईं, और एक किनारे पड़ी रहीं, किसी ने गंभीरता से लिया नहीं तुम्हें, कोई लेता भी कैसे जब तुमने ही खुद को गंभीरता से नहीं लिया था । तुम्हारी स्त्री वाली देह को अक्सर ताने मिल जाते, जिनके अर्थ लगभग यही होते कि हिसाब – किताब बस का नहीं है तुम्हारे, जाओ घर की चार दीवारी की बहुत सी ज़रूरतें हैं, उन्हें निभाओ । विवाह हुआ तो निश्चित हुआ हमेशा के लिए तुम्हारा दोयम दर्जे का होना, वह भी बिना किसी बहस – विवाद के । उसके बाद तय हुआ चूल्हा – चौका करो, बच्चे पालो, करो खूब साज सिंगार पुरुष को रिझाने का, खूब सामान जुटाओ उसे लुभाने का । पुरुष की जूती में पाँव फँसाने का सपना क्यों सँजोया ? साहस ही कैसे हो गया तुम्हारा , नहीं करना था न , किया तो अब भुगतो भी इस सपने को अपने फ्रस्ट्रेशन के रूप में, ओढ़ो बिछाओ इस असंतोष को । बचपन में ही माँ ने कहा था न कि,“तू मेरे बबलू की बराबरी कैसे कर लेगी, तू तो लड़की है लड़की की तरह ही रह । घर के काम – काज सीख यही नसीब है लड़कियों का ।“काम – काज के बँटवारे को लेकर नहीं माना अपनी अनुभवी माँ का कहा तुमने, यह तो ठीक किया पर तुमने अपने लड़की होने को सम्मान न देकर, अपने भाग्य में खुद ही लिखा असंतोष के भंवर में गोल – गोल घूमते रहना । क्या लड़की रहकर बाहरी काम-काज नहीं किया जा सकता था ? और सचमुच ही कभी – कभी तो तुम्हें भी हुआ ही होगा पछतावा कि क्यों साधे वे पंख जिनकी जगह ही नहीं थी आसपास । क्यों पाली ऐसी महत्वाकांक्षा जिसे फेंफड़े फाड़ कर रख देने वाला प्रयास भी साध नहीं पाया । तो क्या असंतोष की इन्हीं भयावह गलियों में भटकती रहूँगी ? हिज्जे – हिज्जे होकर ही जीती रहूँगी अब, यही सोचा होगा तुमने ।फिर तुम्हारी हर बार जीत लेने की ललक ने खींचतान कर यह आशा अपने सामने खड़ी कर ली होगी कि  कोई न कोई रास्ता तो निकल ही आएगा तुम्हारी जीत का । पर किन्हीं – किन्हीं गंतव्यों के रास्ते होते ही नहीं । वे तो बनाने पड़ते हैं, पहाड़ काटने पड़ते हैं , कटे पहाड़ों की मिट्टियाँ खाइयों में भरनी पड़ती हैं, कंटीली धारदार झाड़ियों के बीच से  गुजरना पड़ता है, बिच्छू घास के दंश सहने पड़ते हैं,जंगली जानवरों के खौफ से उबरना पड़ता है और शहरी जानवरों से कई स्तरों पर सुलटना पड़ता है । झुलसा देने वाली हवाओं को तन के आर – पार गुज़रते हुए सहना होता है । जमा देने वाली शीत का अत्याचार पोसना पड़ता है । शायद सब कुछ सोच ही लिया होगा और तुम निकल पड़ी होंगी राह पर । कई बार तो उस राह पर तुमने मससूस किए होंगे कर्णप्रिय संगीत भी । पर उस राह के संगीत की ध्वनि और गति दोनों ही बहुत धीमी थी उसके सहारे तो खड़ी नहीं रह सकती थीं तुम इतना तो मैं जानती ही हूँ तुम्हें । विरोध भरी आंधियों ने भर – भर कर तुम्हारी आँखों में धूल उड़ाई होगी  सदियों से स्त्री विरोध के प्रपात तुम्हारी सोच को धो डालने की साजिश लिए तुम्हारे सामने अट्टहास लगाते हुए गिर रहे होंगे, वैचारिक विरोध कीनदी पार करते वक्त खुद स्त्री होकर उस वैचारिक नदी ने भी तुम्हारे मान को डुबोने का अनथक प्रयत्न किया होगा । खुद स्त्रियों ने भी तो तुम्हें गिराने में कोई कसर नहीं रख छोड़ी होगी । ठीक उसी तरह जैसे गया में राम की अनुपस्थिति में वैदेही ने दशरथ के आग्रह पर फल्गू नदी की बालू से  उनका श्राद्ध कर दिया था पर स्त्री होकर फल्गू नदी ने राम के समक्ष वैदेही द्वारा श्राद्ध कर दिये जाने की गवाही नहीं दी थी,वैदेही के बार – बार आग्रह करने पर भी और झूठ बोल दिया कि नहीं कियाश्राद्ध और नदी स्त्री ने मानुषी स्त्री का साथ नहीं दिया , भले ही वह उस असत्य के बदले जलहीन हो जाने का श्राप लेकर आज तक वहाँ रेत बनी पड़ी है । गया जी में बहने वाली फल्गू नदी की तरह घर में बहने वाली नदी माँ से लेकर बाहर बहने वाली तमाम नदियों तक, किसी ने तुम्हारा सहयोग नहीं  किया होगा । अपनी इस अवहेलना पर तुम भीतर तक सुलग उठी होंगी । बरसों तिलमिलाती रही होगी खुद के लिए पुरुष जैसा सम्मान हासिल न कर पाने के कारण, फिर असहाय होकर आँखों से गिराईं होंगी  आंसुओं की स्त्री सरीखी कई – कई नदियां । पर तमाम विरोध दर्ज कराकर भी,रही तो तुम दोयम दर्जे की ही थी । तुम्हें  पित्रसत्तात्मक समाज ने बता दिया होगा कि  तुम्हारी सोच, तुम्हारा मन, तुम्हारा तन, रूप – यौवन, यहाँ तक कि तुम्हारी कोई समस्याएँ तक तुम्हारी नहीं हैं सब किसी न किसी पुरुष की धरोहर हैं, उसी की संपत्ति हैं कभी लिखित तो कभी अलिखित । इतना तुम्हारे लिए पर्याप्त था कि तुम अपनी सांस ले सकीं जीवित रह सकीं, वह भी किसी न किसी पुरुष के लिए,किसी पुरुष को ही जन्म देने के लिए। स्त्री को तो जन्म भी मत दे देना , दिया, तो होना प्रताड़ित स्त्रियों से भी । क्योंकि समाज, देश काल, घर – परिवार कुछ भी उनके लिए नहीं है कहीं । अगर उन्हें जन्म दे भी दिया  गया  तो यह कहकर तोल दी जाएंगी  बेटों यानि पुरुषों से कि, उनकी परवरिश बेटों से भी बेहतर की  जा रही है । यानि उनके अस्तित्व और सम्मान की तौल भी पुरुषों के ही पास है । अगर मिला तो उन्हें कोख से साबुत बाहर आने का कोई एक अवसर ही मिल सकता है । दुबारा अगर वहाँ वास किया तो स्वयं कोख की स्वामिनी ही पूरी निर्ममता से उनका अस्तित्व मिटा देगी, अपनी कोख की धरती से जंगली घास की तरह उखाड़ फेंकेगी । इस बात से तो ठीक से समझ आनी ही चाहिए उन्हें  अपनी औकात यदि फिर भी नहीं आई होगी तो और भी झेली होंगी स्त्री विरोधी वैचारिक तेज़ाबों की बारिशें  अपने कोमल तन मन पर , उसी तन पर जिसे तमाम कसरतों के बाद उन्होने साँचे में ढाला था, चेहरे को करीने से संवारा था  केशों की देखभाल कर उन्हें आकर्षण की घनी छांव बनाया था,  ग्रीवा को  नायाब गहनों से सजाया था, वक्ष को तराशा था, बाँहों को चिकनाया था  और अपने पेट को गहरे कहीं कमर के भीतर धंसा दिया था  कमर को भी कमर कहाँ रहने दिया था, उसे भी तो लचकती डाली में तब्दील कर दिया था, पाँवों की स्वतन्त्रता को पायलों से बांध छोड़ा था , यहाँ तक कि उँगलियों तक को नहीं छोड़ा बांधे बगैर। ताकि वे खूबसूरत फूल बनी दिखेँ  और कोई एक भँवरा भी उनके आकर्षण से छूट न जाए, पर फिर भी उन्होने अनगिनत प्रताड़नाएँ सहीं होंगी । स्त्रियों की इन्हीं असफलताओं ने तुम्हें तुम्हारा निर्णय लेने को बाध्य किया होगा । परंतु ….

बचपन की बात और थी जब तुम खुद को लड़कों की श्रेणी में रखना चाहती थीं ।  समस्या तो तब आई जब तुम बड़ी होने पर समाज के दबाव में आकर अपने स्त्री होने को व्यर्थ समझ बैठीं और अपने स्त्री होने से हार गईं । काश कि तुम स्वयं को स्थापित करने के लिए समाज से लड़ने का साहस करतीं, उसका क्यों विरोध नहीं किया तुमने,पुरुष के साथ खड़ी होने के लिए पुरुष बनना ही क्यों ज़रूरी लगा तुम्हें ?स्त्री की क्षमताओं को हीन समझकर तुमने भी सकल स्त्री समाज के साथ वही किया जो पुरुष समाज ने स्त्री के विरोध में किया ।  क्यों समाज की कुरीतियों को ही नीति समझ लिया तुमने?आरंभिक अत्याचारों को सहकर अगर तुम न झुकी होतीं तो तुम्हारा इतिहास आज कुछ और ही होता पर, इतिहास वर्तमान तो नहीं होता न । वर्तमान तो वही है जो ठीक तुम्हारी आँख के सामने है । इतनी जुझारू तो तुम थीं ही कि अपनी विगत भूलों पर सिर्फ पछतावा कर रोते तो नहीं रह सकतीं थीं ।

वैज्ञानिक विकास भी तो हुआ था समाज में , तुम्हें उसे भी तो दोहना था । तुम स्त्री होकर हर वक्त पुरुष से जीतने की चाह तो रख सकती थीं पर जीत नहीं सकती थीं । और जीतना तो तुम्हें था ही । तो तुम्हें जीत का कोई और ही रास्ता निकालना था । जीत का कोई भी रास्ता आसान होता है क्या? जीत का हर रास्ता कोई न कोई भेंट मांगता है, बहुत बड़ी भेंट । और बहुत बड़ी सी भेंट देकर वह रास्ता निकाला तुमने जीत का,तुमने तो अपने स्त्रीत्व की ही भेंट चढ़ा दी । तुम्हारी सोच के मद्देनज़र हालांकि मुझे होना तो बिलकुल नहीं चाहिए था फिर भी मेरे आश्चर्य की सीमा नहीं रही यह सुनकर कि तुमने तो लिंग परिवर्तन करा लिया ! पर यह रास्ता कहाँ था , यह तो खाई थी, भंवर था, तुम्हें अपने भीतर खींच लेने वाला दलदल था। अब तो तुम स्त्री भी नहीं रहीं थीं । विनीता का दम घोंटकर अब तुम विनीत हो गईं थीं ।मार डाला न तुमने भी, स्त्री होकर स्त्री को ही । पर अपना अनुभव सांझा ज़रूर करना कि क्या सुरेश, राजेन्द्र, प्रवीण या अन्य ऐसे ही नामों के मध्य विनीत का अस्तित्व दृढ़ता से स्थापित कर पाईं थीं तुम ? स्त्री के अस्तित्व को धक्का देकर कहीं दोनों ही मोर्चों पर हार तो नहीं गईं थीं तुम?बोलो तुम्हारी कौन सी ज़मीन हैं ?कहीं ऐसा तो नहीं कि अब कोई ज़मीन तुम्हारी नहीं रही, और स्त्री होकर स्त्री से छल करके फल्गू नदी की तरह रेत से भरी शापित जलहीन नदी बनकर तो  नहीं रह गईं तुम । कहीं अब पैंडुलम सी झूल तो नहीं रहीं तुम स्त्री और पुरुष होने बीच ? विनीता अब मैं तुम्हारे साथ वैसी अंतरंग कैसे रह सकती हूँ तब जबकि तुम खुद की ही हत्यारिणी हो, क्या जाने कब मेरी हत्या पर ही तुल जाओ । अब तुम पर विश्वास नहीं कर सकती मैं, अब तुम मेरी जाति, मेरे सकल समाज से अलग हो गई हो ।  इसलिए नहीं कि तुम पुरुष हो गयी  हो, मेरा तो पुरुषों से भी कोई बैर नहीं, बल्कि इसलिए कि स्त्री की ह्त्या करके उसकी मृत देह पर पुरुष बनी खड़ी तुमने स्त्री जाति को हराने उसे महत्वहीन बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी । अलविदा विनीता, अलविदा । हाँ बताना ज़रूर कि जिस तरह मैंने तुम्हें अलविदा कहा उस तरह तुम्हारे तथाकथित पुरुष समाज ने तुम्हारे स्वागत में कोई एक शब्द भी कहा क्या ?