महाराष्ट्र के नांदेड़ जिला अन्तगर्त धर्माबाद तहसील के बेल्लूर गांव में जन्में रामडगे गंगाधर पिराजी मूलतः मराठी भाषी हैं। इनका जन्मस्थान महाराष्ट्र और तेलांगाना की सीमारेखा पर अवस्थित है, इसलिए तेलगु भाषा की भी जानकारी रखते है, फिर भी हिन्दी साहित्य में इनकी गहरी रूची है। अनपढ़ किसान पिता के पुत्र तमिलनाडु केंद्रीय विश्वविद्यालय में ‘हिन्दी और मराठी किन्नर आधारित कथा साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन’ विषय पर शोध कार्य कर रहे हैं। इनके गाँव के लोग आज भी शिक्षा के प्रति बहुत जागरूक नहीं हैं। गंगाधर अपने गाँव के इकलौते बेटा हैं जो उच्च शिक्षा प्राप्त करने में जुटे हैं। हाशिए के परिवार और समाज में पैदा हुए हैं इसलिए इन्हें अपनी जिम्मेवारी का अहसास भी है। हाशिए के समाज से संबंधित विषय वस्तु यथा – दलित, स्त्री, आदिवासी और थर्ड जेंडर  में विशेष रूचि हैं। इसके अलावे कविता, कहानी भी लिखते हैं। हाशियाकृत समाज के लिए लेखन करने वाले युवा रचनाकार रचित ‘अस्पताल और मरीज’ कहानी पढ़े मधुलिका बेन पटेल की विशेष टिप्पणी के साथ। मधुलिका, फणीश्वरनाथ रेणु डॉट कॉम के संपादकीय कार्यकारिणी से भी संबद्ध है। – संपादक

                             पैसे पर टिकी है मरीजों की जान

‘अस्पताल और मरीज’ कहानी अस्पतालों की खस्ता हालत को दर्शाती है। मरीजों की भारी भीड़ इस बात की ओर संकेत करती है कि यहाँ अस्पतालों की बहुत कमी है। देश में बीमारी से तंग आकर आत्महत्या करने वाले लोगों के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों से पता चलता है कि वर्ष 2001 से 2015 के बीच भारत में 18.41 लाख लोगों ने अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली। इनमें से 3.85 लाख लोगों ने विभिन्न बीमारियों के कारण आत्महत्या की थी। 1.18 लाख लोगों ने मानसिक रोगों के कारण और 2.37 लाख लोगों ने लंबी बीमारियों से परेशान होकर जीवन का अंत कर लिया। सरकारी अस्पतालों में सुविधाओं की कमी और भीड़ से तंग लोग मजबूर होकर प्राइवेट अस्पतालों की ओर रुख करते हैं। डाक्टरों की भारी फीस गरीबों के बस की बात नहीं। जेब खाली होते ही वे तड़प-तड़प कर जान देने के लिए अभिशप्त हैं। डॉक्टरी पेशा हो गया है और मरीजों की जान पैसे पर टिकी हुई है। इस कहानी में गंगाधर ने विवेक के बेटे और एक अन्य बच्ची साक्षी के माध्यम से हर बीमार व्यक्ति की पीड़ा को उकेरा है। गरीब मरीजों के प्रति अधिकतर डॉक्टरों और दूसरे व्यक्तियों का रुखा व्यवहार भी सामने आता है। देश में सही इलाज न होने के कारण जाने कितने लोग मर जाते हैं और उनकी मृत्यु स्वाभाविक मान ली जाती है। यह अत्यंत भयावह है। यह कहानी अस्पतालों में गुजारे गए अनुभव को सामने लाती है। – डॉ. मधुलिका बेन पटेल, सहायक प्राध्यापक, हिन्दी विभाग, तमिलनाडु केन्द्रीय विश्वविद्यालय, तिरुवारूर

                                     अस्पताल और मरीज

                                   रामडगे गंगाधर पिराजी

सुबह यही कुछ सात बज रहे होंगे।विवेक के मामा अस्पताल के बाहर टपरी पे चाय पीने नीचे गये हुए थे। विवेक भी जाकर कुल्ला करके चाय पीने बैठ गया। चाय पीते-पीते टेबल पर पड़ा समाचर पत्र उठाया तो पहले ही पन्ने पर बड़े अक्षरों में लिखा था ‘दिन-दहाड़े चोरों ने व्यक्ति को लूटा।’ दोपहर के समय दिन-दहाड़े बैंक के आगे से एक व्यक्ति का पैसों से भरा सूटकेस बदमाशों ने लूट लिया था।इस बात पर मामा और चायवाले की चर्चा बढ़ती गयी। चर्चा में सिर्फ चोरों की प्रशंसा हो रही थी कि दिन दहाड़े दोपहर के दो-ढाई बजे चोरों ने कितनी चतुराई से पैसे चुराए होंगे ? कमाल है भई! उनकी बातों में रूचि न लेते हुए विवेक वहाँ से उठकर अस्पताल की ओर बढ़ा । अस्पताल में भर्ती कराये अपने बेटे को देखकर आज वह प्रसन्न था,क्योंकि उसके बेटे ने दस दिनों बाद आँखें खोली थी। नन्हा सा बालक अपने छोटे-छोटे नन्हें हाथ-पैर हिला रहा था। एक क्षण के लिए ऐसा लगा जैसे किसी तितली का जन्म हो गया हो और वह आकाश में ऊँचाइयों को छूने के लिए दौड़ रही हो।

विवेक अस्पताल की तीसरी मंजिल की खिड़की से सड़क की ओर नीचे देखा तो एक व्यक्ति बाँसुरी बजाते हुए अस्पताल के सामने से गुजर रहा था। वह बाँसुरी बजाते हुए साथ में गुब्बारें भी बेच रहा था। छोटे बच्चे उन गुब्बारों को देख ख़ुशी से झूमते हुए उस व्यक्ति के पीछे दौड़ रहे थे। तभी अचानक एक औरत बच्ची को गोद में लिए अस्पताल की ओर तेजी से बढ़ी। बच्ची जोर-जोर से चिल्लारही थी। उसके रोने की आवाज औरों से अलग थी। अस्पताल में प्रवेश करते ही बाबूराव ने उसका फार्म भरकर उसे आगे वाली कुर्सी पर बैठने का इशारा किया और डॉक्टर के आने तक इंतजार करने को कहा। बाबूराव उस अस्पताल का कंपाउंडर था। फार्म पर उस बच्ची का नाम लिखा गया – साक्षी। कितना प्यारा नाम है ना ? उम्र से वह आठ-दस साल की लग रही थी और वह औरत उसकी दादी। उसके बाल थोड़े लंबे और घुंघराले थे,सांवला रंग और आँखों में काजल था जो आंसुओं से  मिटता जा रहा था।

साक्षी की आवाज से पूरा अस्पताल गूंज रहा था । अस्पताल में सारे लोग उसके पास भीड़ की तरह जमा हो गये, लेकिन उसे किसी से कुछ लेना-देना नहीं था ।वह बस रोते ही जा रही थी। न जाने उसे क्या दर्द था ? रो-रोकर पागलों की तरह बर्ताव कर रही थी ।

ग्यारह बजने को थे। अभी तक डॉक्टरों का कोई अता-पता न था। माँ शांता आँखों से आंसू बहाते हुए,साक्षी को मनाने की कोशिश कर रही थी लेकिन वह कुछ न समझती। उसने गोद से नीचे उतरने का इशारा किया तो दादी ने नीचे उतारा। उतरते ही वो फर्श पर लेटकर फिर से रोने लगी। पिता रामू की आँखों में भी आँसू थे। वहां से थोड़ी दूर दीवार के पीछे जाकर गमछे में चेहरा छुपाते हुए रो रहा था। एक तरफ़ पिता तो दूसरी ओर शांता और दादी, साक्षी की हालत देखकर वे एक-दूसरे की ओर उदास नजरों से देख रहे थे। यह सब देख विवेक भी अपने आँसू रोक नहीं पाया । वह मन-ही-मन भगवान से प्रार्थना कर रहा था साथ में बुदबुदा रहा था ‘तुम बहुत कठोर हो !  इंसान को दु:खी देखकर, उसके आँखों में आँसू देखकर, तुम्हें बहुत आनंद मिलता होगा ?’ खुद को संभालते हुए विवेक डॉक्टर को भी गालियाँ देने लगा-‘दोपहर होने को आया और डॉक्टर का अभी तक पता नहीं।’ उसके मन में अनेक सवाल थे, तभी पीछे से विवेक-विवेक पुकारने की आवाज सुनाई दी। उसने पीछे मुड़कर देखा तो मामा उसे आवाज दे रहे थे। मामा ने विवेक के हाथ में दवाइयों की पर्ची थमा दी। पर्ची लेकर वह दवाइयाँ लेने मेडिकल स्टोर चला गया। वहां दवाइयों के लिए मरीजों के परिजनों की भीड़ लगी थी। इतनी कीमती-कीमती दवाइयाँ? लोग पानी की तरह पैसे बहा रहे थे।अस्पताल वालों को इससे क्या फर्क पड़ता है? डॉक्टरों को तो पैसा चाहिए और परिजनों को अपना साथी।पैसा चाहे कितना भी लगे। वह भी अनजाने में महंगी दवाइयाँ लेकर आ गया। तब तक डॉ.साजिद भी आ गए थे।

साक्षी का रोना अभी तक कम नहीं हुआ था। डॉ.साजिद सबसे पहले साक्षी की ओर बढ़े। चेकअप के बाद आशंका जताई कि ‘उसे ब्रेन प्रॉब्लम है और साथ ही शरीर में रक्त की कमी है। फिर भी रिपोर्ट आने के बाद ही सब कुछ पता चल पायेगा। डॉ.साजिद साक्षी के पिता रामू से कह रहे थे कि ‘साक्षी के शरीर में खून की कमी है और साक्षी का ब्लड ग्रुप ‘ओ’ पॉजिटिव है। यह ब्लड ग्रुप हमारे पास उपलब्ध नहीं है।आपको ब्लड-बैंक से लेकर आना होगा। ब्रेन का भी एक्स-रे करवाना होगा।उसके लिए मैं आपको लिखकर देता हूँ, आप दूसरे अस्पताल से करवाकर ले आइए। और हाँ, जाने से पहले नीचे के मेडिकल स्टोर से दवाइयाँ ले लेना। रामू ने दवाइयाँ ले ली और कागजात लेकर साक्षी का एक्स-रे करवाने दूसरे अस्पताल जाने वाला था, क्योंकि यहाँ एक्स-रे की सुविधा तो थी नहीं।रामू उसे ले जाने की कोशिश कर रहा था और वह बार-बार मना कर रही थी।उसकी हालत बहुत गंभीर थी।विवेक तुरंत अस्पताल से बाहर चला गया। अस्पताल के दाहिनी तरफ हाई-वे था और उस हाई-वे पर गाड़ियाँ एक के पीछे एक तेजी से दौड़ रही थी।उन गाड़ियों के शोर में साक्षी की आवाज खो गयी।विवेक उन गाड़ियों को देखकर अपनी और साक्षी की पीड़ा को भूलने की कोशिश कर रहा था। सड़क के उस पार उसे एक मंजिल दिखाई दी। उस मंजिल की छत से बच्चों का कोलाहल सुनाई दे रहा था। वे बच्चे उस छत पर खेल रहे थे। कोई लुक्का-छुप्पी तो कोई पतंग उड़ा रहा था। सभी साक्षी के हम-उम्रलग रहे थे। साक्षी अगर बीमार न होती तो वो भी इनकी तरह ही हँसती, खेलती, पतंग उड़ाती।

दोपहर के कुछ2:30 बज रहे थे। विवेक को भूख भी लग चुकी थी। भोजन और पानी इंसान के जीवित रहने के लिए अमृत सा है। उसके बिना जीवन जीवन नहीं लगता।अस्पताल के सामने ही एक होटल था। मन तो किया कि जाकर पेट की आग को मिटाए, लेकिन अस्पताल के पास होने की वजह से होटल मालिक ने खाने की चीजों की कीमतें बढ़ा रखी थी। खुद को संभालते हुए वो अस्पताल की ओर मुड़ा ही था कि आगे उसकी माँ दिखाई दी। उसके लिए वह गाँव से रोटी बना कर ले आयी थी और बहू के लिए सादी खिचड़ी। विवेक अपनी माँ को अस्पताल के जनरल वार्ड में ले गया, जहां उसकी पत्नी थी। शीला की रो-रोकर हालत ख़राब हो चुकी थी। इस नन्हे से बच्चे को अपने माँ के पास  उसकी गोद में होना चाहिए था लेकिन धरती पर कदम रखते ही उसे माँ की गोद की जगह आई.सी.यू. में रखा गया था। जब अपने बच्चे को देखने का मन करता तो वह आई.सी.यू. के पास जाकर शीशे का परदा हटाकर, चुपके से देख लेती। अपना बच्चा होकर भी चुपके से देखना पड़ता था, क्योंकि यह अस्पताल है। डॉक्टर ने कहीं देख लिया तो डांट पड़ेगी इसीलिए चुपके से देखना पड़ता था। डॉक्टरों का कहना भी गलत नहीं था। उन्हें शांति से काम जोकरना पड़ता था लेकिन माँ की ममता को वे पढ़े-लिखें लोग कैसे समझते? अपनी सास को देखते ही शीला की आँखें फिर से भर आई । सास-बहू गले मिलकर ऐसे रो रही थी, मानो भगवान ने उन्हें किसी अपराध का दंड सुनाया हो।

धीरे-धीरे धूप कम हो रहा था, दिन ढलता जा रहा था। सुबह से विवेक और मामा ने सिर्फ चाय हीपी थी। भूख तो सभी को जोरों की लग रही थी। अस्पताल में किसी को खाना खाने का मन ही नहीं कर रहा था। करता भी कैसे ? मरीजों और उनके परिजनों के लटकते चेहरों को, उनकी उदासी को देखकर एक निवाला भी मुंह में नहीं जा रहा था। विवेक माँ के साथ खाने तो बैठ गया लेकिन रोटी तोड़कर मुंह में डालने की हिम्मत ही नहीं हुई।

शाम के समय आई.सी.यू.वार्ड में बच्चों का चेकअप करने के लिए डॉ.साजिद आ चुके थे। चेकअप के बाद बाहर आते ही माँ डॉक्टर से पूछने लगी ‘डॉकटर साब ! अब कैसा है मेरा पोता ?’ डॉक्टर ने कहा‘आप कौन हैं उस बच्चे की?’ ‘जी मैं, उसकी दादी हूँ |’ ‘बच्चे की तबियत तो चिंताजनक है लेकिन आप हौसला रखिये| सब ऊपर वाले के हाथ में है।’ डॉक्टर ने चिंताजनक बात सहज रूप से कह दी। कहते क्यों नहीं, रोगियों का इलाज करते-करते उनका दिल भी कठोर बन गया था| उनके लिए तो ऐसे अनेक होंगे लेकिन उस मरीज की कीमत उसके परिजनों से पूछिए | विवेक की आँखों से आंसू बहने लगे। सुबह ही तो उसमें सुधार दिखाई दे रहा था | शाम होते-होते उसके सुधार की भी शाम हो गई थी| इस नन्हे बच्चे ने कुछ दिन पहले ही तो धरती पर कदम रखा था | उसने भला किसी का क्या बिगाड़ा होगा ? उसे इतनी बड़ी सजा क्यों मिल रही थी। आँखों से आँसू बह रहे थे फिर भी हिम्मत कर विवेक ने कहा, ‘डॉक्टर साब ! कुछ भी करिये लेकिन मेरे बेटे को जीवनदान दे दीजिये।’ डॉक्टर ने जवाब दिया, ‘हम उसे बचाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। आप हिम्मत रखिये|’ विवेक को समझाते ही डॉ. साजिद वहाँ से चले गये।विवेक की आँखें,दोनों गाल और गमछा भी आंसुओं से गीली हो चुकी थी। उसे भी वहां ठहरने का मन नहीं कर रहा था।वह बाहर चलागया। बाहर बैठे लोग विवेक की ओर देख रहे थे लेकिन विवेक सभी के बीच से तेज कदम बढ़ाते हुए अस्पताल के बाहर चला गया। सड़क पर निकला ही था कि रामू साक्षी का एक्स-रे करवा कर आ गया था| रामू विवेक के पास आकर कहने लगा ‘ऐसे अस्पतालों में तो बस पैसा-पैसा करते हैं। पानी की तरह पैसा बहाकर भी इलाज ठीक नहीं हो रहा। यहाँ के डॉक्टर हम जैसे अनपढ़ लोगों के पैसों से बड़ी-बड़ी बिल्डिंग खड़ी करते हैं और मौज-मस्ती करते हैं। इन्हें तो गरीबों की कोई चिंता ही नहीं, इन्हें सिर्फ और सिर्फ पैसा दिखता है। मरीजों की तकलीफों से कोई वास्ता ही नहीं हैं, आये, देखे, बिल थमाये, और चल दिए बस ! अंत में अगर इलाज नहीं हो पाया तो बड़ीआसानी से कह देते है ‘इन्हें कहीं और ले जाओ या अपने घर ले जाओ, अब हमसे नहीं होगा। जितना हमसे हो सका हमने किया’। तब ऐसा लगता है कि इस डॉक्टर की जान ही लेलूँ लेकिन ऐसा नहीं कर सकता क्योंकि मैं मजबूर हूँ।’रामू अपने दुःख, दर्द के साथ-साथ विवेक का भीदिल बहलाना चाहता था । उसके प्रति सहानुभूति प्रकट करना चाहता था।

देखते ही देखते रात हो गयी।आज का दिन भाग-दौड़ में कैसे बीत गया पता ही नहीं चला,लेकिन अब तक मरीजों का आना बंद नहीं हुआ| कोई न कोई किसी न किसी रूप में अस्पताल में दाखिल हो ही रहा था | रामू और विवेक बातचीत कर ही रहे थे कि अचानक अस्पताल के सामने एक रिक्शा तेजी से आकर रुका। रिक्शेसे एक महिला अपने दोनों हाथों में एक नवजात शिशु को लेकर उतरी और अस्पताल की ओर भागी। देखकर कुछ अजीब-सा लगा लेकिन इतना तो समझ में आ ही गया था कि बच्चे की हालत गंभीर है। पास जाकर देखने का तो मन नहीं कर रहा था। दिनभर न जाने ऐसे कितने लोग यहाँ आते-जाते रहते हैं। रोगियों की हालत देखकर विवेक और बेचैन हो उठता। यह सब देख उसे पास जाने से डर लग रहा था, क्योंकि बच्चों को इस हालत में देखने के लिए बहुत बड़ा दिल चाहिए होता है। न जाने ऐसे कितने मरीज दिनभर में आते-जाते रहते थे। अस्पताल में यह सब आम बात है |

आखिर जिसकी आशंका थी वही हुआ। उस बच्चे को डॉक्टर ने मृत घोषित कर दिया ‘इस बच्चे को तो दुनियां से गये दो घंटे हो गये, आपको आने में देर हो गयी। कुछ समय पहले आती तो शायद हम इसे बचा पाते’ | आखिर माँ तो माँ  है। अपने बच्चे को सीने से लगाये रो रही थी। आस लगाये बैठी थी कि डॉक्टर उसके बेटे को बचा लेगा। माँ डॉक्टर के पैरों पर गिर पड़ी गिड़गिड़ा रही थी,‘डॉक्टर साब ! आप कुछ भी करो, चाहे तो आप बदले में मेरी जान ले लो लेकिन इस नन्हीं जान को मरा मत कहो| इसे बचा लो डॉक्टर साब ! इसे बचा लो !’सब तरफ अंधेरा छा चुका था और उस महिला के जीवन में भी अंधेरा हो गया। शिशु केवल पाँच-छह दिन का ही होगा, भगवान ने उसे अपने पास बुला लिया था। लगता है,उस बच्चे की माँ से अधिक भगवान को जरुरत थी। इसीलिए उसे अपने पास बुला लिया होगा। बुलाना ही था तो भेजा ही क्यों ? क्यों उसे इस धरती पर भेजकर सब को दुःख दिया ? आज तो इस भगवान से भी भरोसा उठ गया। पता नहीं इस दुनिया में भगवान है भी या नहीं ?

उस महिलाके साथ आये एक वृद्ध उसे अस्पताल के बाहर लेकर चले गये। वह उस महिला के पिता और बच्चे के नाना लग रहे थे | वृद्ध ने उस शिशु को हाथ में लिया और घर जाने का प्रबंध करने लगा। बाहर खड़ा रिक्शे वाला उन्हें ले जाने से मना कर रहा था। पूछने पर पता चला कि उनका घर शहर से बीस कि.मी. दूर एक छोटे-से गाँव में है। रिक्शावाला इंसान होकर भी इंसानियत भूल चुका था। उस बच्चे के नाना अस्पताल आते समय गाँव के जमींदार से एक हजार रूपये उधार लेकर आये थे। पाँच सौ अस्पताल आने और छोटे-मोटे काम में खर्च हो गये थे। रिक्शावाला मृत शिशु को ले जाने के लिए ज्यादा रकम की मांग कर रहा था। अस्पताल में कोई एम्बुलेंस भी नहीं थी। एक थी जो आपातकाल में कहीं गयी हुई थी। अस्पताल पहुँचने से पहले उस शिशु की मृत्यु हो चुकी थी इसलिए डॉक्टर भी इनकी ओर ध्यान नहीं दे रहे थे।उनका ध्यान तो सिर्फ ‘चाँदी कूटने’ में ही रहता था। उनका काम केवल मरीजों को देखना और पैसे लूटना बन चुका है। आज-कल तो रोगियों को लूटने का काम एक धंधा बन गया है। कुछ अच्छे डॉक्टर्स भी हैं लेकिन उनकी संख्या बहुत कम हैं और लालची डॉक्टरों की संख्या अधिक। डॉक्टर मरीज और परिजनों के हालत को नहीं समझते। उन्हें तो केवल पैसा दिखता है चाहे मरीज की हालत कितनी नाज़ुक ही क्यों न हो।जब तक पैसे जमा नहीं करवाएंगे तब तक डॉक्टर आगे की कार्यवाही नहीं करेंगे। मरीज उसी हालत में पड़े रहेंगे या उसे किसी दूसरे अस्पताल में ले जाने के लिए बोल दिया जायेगा।यही व्यवहार सभ्य समाज के लोग भी करने लगे हैं| उस बच्चे के नाना रिक्शे वाले के आगे हाथ जोड़ते हुए उसे मनाने की कोशिश कर रहे थे, ‘रात का समय है…इस हालात में हम घर कैसे जाये ? इस अंधेरी रात में कहाँ भटकते फिरेंगे ? भय्या ! भगवान के लिए आप हमें घर छोड़ दीजिये। भगवान आपका भला करेगा। मेरे पास पैसे भी कम है, भगवान के लिए मान जाइये।’ ‘अरे दादा, इसमें मैं क्याकर सकता हूँ ? उल्टा मेरा भी तो घाटा है|’

ठीक है तुम्हे जितने भी चाहिए, गाँव जाकर दे दूंगा लेकिन हमें घर तक पहुंचा दो| भगवान तेरा भला करेगा |’

‘पाँच सौ से एक रूपया भी कम नहीं लूँगा दादा। मैं पहले ही बोल दे रहा हूँ |’ बच्चे के नाना ने गर्दन हिलाकर हां भर दी |तब रिक्शेवाला गाँव छोड़ने के लिए राजी हो गया | फिर महिला और वृद्ध नवजात को लेकर घर के लिए रवाना हो गये।

इधर दिनभर से रोने की वजह से साक्षी की आँख लग चुकी थी। वो आई.सी.यू.वार्ड के बेड पर सो रही थी। इंजक्शन की वजह से आराम मिल गया था। साक्षी की रिपोर्ट आ चुकी थी | बाबूराव डॉ. साजिद को रिपोर्ट दे आया। डॉ. साजिद आज नाइट ड्यूटी पर थे। डॉ. साजिद ने कहा ‘साक्षी के पिता को बुलाकर ले आओ।’ बाबूराव रामू को आवाज लगा रहा था और कहा ‘आपकी रिपोर्ट आ गयी है आपको डॉक्टर साहब बुला रहे हैं।’ रामू का ध्यान भंग हुआ और वह डॉक्टर के पास जा पहुँचा। डॉ. साजिद चश्मा लगाये रिपोर्ट को पढ़ते हुए रामू को देखकर बोले ‘आप साक्षी के पिता है ना? बैठिए, साक्षी की रिपोर्ट आ गयी है।’रामू चिंतित स्वर में बोला,‘सब ठीक तो है ना डॉक्टर साब ?’

‘देखो रामू घबराने की कोई बात नहीं है। सब ठीक है लेकिन उसे जल्द-से-जल्द मुंबई के अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ेगा। हमारा शक सही निकला,साक्षी को ब्रेन प्रोब्लम है। यहाँ उसका इलाज नहीं हो सकता।’ मुंबई का नाम सुनते ही रामूके पैरों तले जमीन खिसक गयी, कलेजा मानो गुब्बारे की तरह फट गया,गमछे में सर छुपाये फिर से रोने लगा। डॉ. साजिद दिलासा देने की कोशिश कर रहे थे, ‘मुंबई के अस्पताल में मेरे पहचान के डॉक्टर है, उनसे मेरी बात भी हो चुकी है| आप उनसे एक बार मिल लीजिये, वहां इलाज हो जाएगा।’

‘अब मैं क्या करू डॉक्टर साब ? मेरे पास इतने पैसे भी नहीं है। बम्बई तो बहुत बड़ा शहर है |’ ‘तो करना क्या चाहते हो अब आप है ? बच्ची की जान को ख़तरा है | आपको जाना ही होगा | यह रहा वहां के अस्पताल का पता और यह रहा यहाँ का बिल | सुबह होते ही भर दो और मुंबई के लिए जल्द से जल्द रवाना हो जाओ। ’रामू के पास जितने रूपये थे सब खत्म हो गये थे। वह अजीब सी दुविधा में फँसा चुका था। जितने पैसे उधारी से लाये थे सब ख़त्म हो चुके थे। वह सोच में पड़ गया कि साक्षी को आगे के इलाज के लिए मुंबई ले जाए या आर्थिक परिस्थिति के चलते उसे इसी हालत में घर ले जाए?

विवेक के बेटे की हालत भी कुछ ऐसी ही थी।उसका बेटा भी अस्पताल में पिछले दस दिन से एडमिट था। सारा पैसा खर्च हो चुका था। अगले ही दिन डॉ.साजिद को आते देख विवेक उनके पास चला गया और पूछा कि ‘डॉक्टर साब कुछ तो बताइए ? भर्ती हुए दस दिन हो गये, मेरे बेटे को ठीक होने में और कितना समय लगेगा ?’डॉ. साजिद को पता था कि विवेक का बटुआ भी खत्म हो चुका है। उन्होंने कह दिया ‘अब तो सब भगवान के हाथ में है। भगवान पर विश्वास रखो। जितना हमसे हो सकता था हमने किया। ऑक्सीजन मास्क निकालते ही उसकी तबियत बिगड़ जाती है। यहाँ रखकर सिर्फ पैसा और समय बर्बाद करना है।आप उसे घर ले जाइये। अगर भगवान ने चाहा तो सब ठीक हो जायेगा।’ डॉक्टर की इन कड़वी बातों से विवेक का दिल टूट गया। जब तक पैसा था तब तक दिलासा देते रहे अब खत्म हो गया तो भगवान पर भरोसा रखने को कहते हैं।

डॉक्टरने उसके बेटे को डिस्चार्ज कर दिया। विवेक ने बाकी औपचारिकताएँ पूरी की और रिक्शे से बेटे को लेकर चला गया। घर जाकर देखा तो बच्चा भगवान को प्यारा हो चुका था। बच्चे को साँस लेने में दिक्क़त हुई थी। विवेक इससच्चाई से वाकिफ हो चुका था कि केवल पैसा बोलता है। वह जान गया था कि अस्पताल में उसका बच्चा जीवित था तो सिर्फ पैसे की वजह से ।