कहानी – साधना श्रीवास्तव / संस्कार                                          

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साहित्य सृजन में बालकाल से अभिरूची रखने वाली साधना श्रीवास्तव की अब तक बाइस पुस्तकें प्रकाशितत हो चकी है। उत्तर प्रदेश के बस्ती में पैदा हुई और इलाहाबाद में शिक्षा-दीक्षा प्राप्त किया है, फिलवक्त गुजरात प्रांत का सुरत शहर में इनका डेरा बसेरा है। नवनीत, सरिता, गृहषोभा, मुक्ता, माधुरी, राजस्थान पत्रिका, दैनिक जागरण सरीखे पत्र – पत्रिकाओं में इनकी कहानियां तो चंपक, सुमन सौरभ, नंदन आदि पत्रिकाओं में बाल कहानियां लगातार प्रकाशित हो रही है। साधना श्रीवास्तव कहानी के अलावे कविता और महापुरूषों से संबंधित प्रेरक प्रसंग पर केन्द्रित पुस्तक का लेखन किया है। आकाशवाणी से भी इनकी कहानियां प्रसारित होते रही है। आप सुधी पाठकों के बीच प्रस्तुत है इनकी कहानी  ‘ संस्कार’ मधुलिका बेन पटेल की समीक्षात्मक टिप्पणी के साथ।  मधुलिका, फणीश्वरनाथ रेणु डॉट कॉम के संपादकीय कार्यकारिणी से भी संबद्ध है। – संपादक

                                  वृद्धों की समस्या को उजागर करती कहानी 

‘संस्कार’ कहानी वृद्धों की समस्या को उजागर करती है। संयुक्त परिवार समाप्त लगभग समाप्त हो गये हैं. बदले हुए परिवेश में युवा दम्पति उन्हें बोझ सदृश समझने लगे हैं। लिहाजा, वे निहायत अकेले हो गये हैं। कमजोर होते शरीर के कारण वे बेबस और लाचार होते हैं। शहरों में नौकरी पेशा बेटे-बेटी उन्हें वृद्धाश्रम में छोड़ आते हैं। अपने परिवार से दूर अकेले जिंदगी काटने को मजबूर बूढ़े लोग बस जिंदगी काटते हैं। यह स्थिति बहुत दुःख पहुँचाने वाली है। ऐसी अनेक घटनायें हैं जिनमें, विदेशों में नौकरी कर रहे बेटे-बेटियों के माता–पिरता के अंतिम संस्कार पड़ोसियों द्वारा किये गये। यह कहानी इस बात पर जोर देती है कि चाहे जो स्थिति हो हमें अपने माता – पिता को साथ रखना चाहिए. सोचने वाली बात यह है कि आज हम किस चीज के पीछे भाग रहे हैं जिसकी कीमत हम परिवार के सदस्यों से चुका रहे। इस कहानी में बेहद सरल ढंग से यही बात कही गयी है।  – डॉ. मधुलिका बेन पटेल, सहायक प्राध्यापक, हिन्दी विभाग, तमिलनाडु केन्द्रीय विश्वविद्यालय, तिरुवारूर

                                              संस्कार

                                          साधना श्रीवास्तव

पड़ोस की रजनी के जाने के बाद शारदा उखड़े मूड से जहाँ की तहाँ गुमसुम सी बैठी रही। आज रजनी की बात उसे जरा भी अच्छी नहीं लगी। उसने तो उससे कभी अपने सास-श्वसुर की कोई शिकायत नहीं की फिर वह उनके लिए अनुचित सलाह देकर क्यों गयी? शारदा के कानों में बार बार रजनी की कही बात गूंजती रही–“तुम भी शारदा गज़ब की हो, तुम्हारे सास-श्वसुर दिन रात पड़े-पड़े चारपाई तोड़ते रहते हैं और तुम झेलती रहती हो। अरे, उन्हें किसी वृद्धाश्रम में डाल कर छुट्टी पाओ “। रजनी ने कहा तो शारदा को जरा भी अच्छा नहीं लगा। उसने उसकी बात काटते हुए कहा “ठीक है, तुम अपने लिए जैसा ठीक समझो करो लेकिन प्लीज मुझे इस तरह की कोई सलाह मत दो “। शारदा इन्हीं बातों में खोई हुई थी कि उसकी बेटी रीना ने उसकी तंद्रा तोड़ी- “माँ, आप क्यों चिंतित हैं?” शारदा ने रजनी की कही पूरी बात रीना को बताया। बातें सुन कर रीना ने कहा-“लेकिन माँ, रजनी आन्टी ठीक ही तो कहीं  क्यों न हम लोग सचमुच दादा जी और दादी को किसी वृद्धाश्रम में डाल कर छुट्टी पायें । हम सभी कहीं भी जाने के लिए स्वतंत्र रहेंगे”। इन्टर कर रही रीना ने अपना विचार व्यक्त किया। बेटी की बात सुनकर शारदा भौचक्की रह गयी। आग्नेय नेत्रों से उसकी तरफ देख कर बोली- “कैसी बातें करती है रीना…क्या वह लोग हमारे माता-पिता नहीं हैं? क्या उन्होंने तेरे पापा और बुआ का पालन-पोषण करके अपने पैरों पर खड़ा नहीं किया है? अब उनके लिए ऐसी बातें कभी जुबान पर मत लाना “।

  रीना ने महसूस किया कि उसकी बातों ने माँ के दिल को ठेस पहुंचाया है इसलिए धीमी आवाज में बोली- “माँ ! मैंने तो आप को चिन्तित देख कर कह दिया था ….उसके लिए मैं आपसे माफ़ी मांगती हूँ । अब मैं कभी भी ऐसी अशोभनीय बात जुबान पर नहीं लाऊंगी “।

  शारदा को अच्छा लगा कि रीना ने बहुत जल्दी अपनी गलती को समझ लिया। वह उसे समझाती हुई बोली- “इस वृद्धावस्था में उनकी देखभाल और सेवा करना हमारा कर्तव्य है। तुमसे और राजन बेटे से भी मैं इस बात की पूरी उम्मीद रखती हूँ कि तुम दोनों सदैव अपने दादी-बाबा का सम्मान और सेवा करना । थोड़ा विराम दे कर शारदा ने कहा- “जरा सोच बेटी! कल के दिन राजन हम दोनों को अपने साथ रखना न पसंद करे तो बता क्या होगा?” रीना को माँ की बात अच्छी तरंह समझ में आ गयी। उसने माँ को वचन दिया कि वह और राजन भैया कभी ऐसा कोई काम अथवा बात नही करेंगे जो माँ-पिता और बाबा-दादी को  ठेस पहुंचाए । उसकी बात सुनकर शारदा ने बेटी को गले लगा लिया।

  शारदा के सास-श्वसुर उसके सरल और सुशील व्यवहार से बहुत प्रभावित थे। ऐसी पुत्र-वधू पाकर वे अपने को भाग्यशाली समझते। वे जानते थे कि जीवन में यही अवस्था ऐसी होती है जब किसी के सहारे और साथ के बिना रहा नहीं रहा जा सकता।

   हंसते-मुस्कुराते और सुख-दुख के हल्के धूप छाँव के साथ समय अपनी गति से सरकता रहा। राजन बीएस.सी में गया और रीना ने एम.ए. पूरा कर लिया। शारदा और प्रभाकर को अब उसकी शादी की चिन्ता हुई। उसके दादा – दादी ने उन्हें समझाया कि वे चिंता न करें । समय के साथ रीना बेटी की शादी बहुत अच्छी होगी। उनकी जुबान पर जैसे सरस्वती विराजी थीं। उनके आशीर्वाद से कुछ ही दिनों बाद रीना की शादी बहुत अच्छे परिवार में तय हो गई। दो भाई, माता पिता और एक बहन…यही रीना के ससुराल का परिवार था। बड़े भाई डाक्टर और छोटे भाई आशीष जी आई.ए.एस., रीना के होने वाले पति थे। शारदा और प्रभाकर को तो बस ऐसा लगा कि बेटी को इतना अच्छा घर-वर भगवान की कृपा के बाद उसके सास-श्वसुर के आशीर्वाद का ही सुफल है।

  बड़े उत्साह,ख़ुशी और धूमधाम से विवाह सम्पन्न हो गया। रीना विदा हो कर ससुराल आ गयी। ससुराल में उसका अत्यंत स्नेह,प्यार और हर्षित मन से स्वागत किया गया। माँ से मिली सीख और संस्कार के कारण उसने सबके साथ सरल और स्नेहमय व्यवहार हमेशा ही रखा। जिस कारण उसके सास-श्वसुर नयी और हर तरह से प्रतिभा सम्पन्न पुत्र-वधू पाकर अत्यधिक खुश थे।

  रीना के ससुराल में धीरे-धीरे सभी आये मेहमान चले गये । अब केवल बड़े भाई साहब-भाभी और  नन्द-नंदोई ही थे। अगले दिन भईया-भाभी भी अपने दोनों बच्चों के साथ दिल्ली चले गये। रीना ने ननद से अनुरोध किया-“दीदी! आप कुछ दिन रुक कर जाती तो हमें बहुत अच्छा लगता। खाली होता घर मुझे अच्छा नहीं लग रहा “।

 रीना की बात मानकर रंजना कुछ दिनों के लिए रूक गई पर दिन सरकने में देर न लगी। रंजना ने जाने की तैयारी शुरू कर दी। रीना ने देखा कि उसके सास-श्वसुर भी अपनी अटैची और बैग ठीक कर रहे हैं और ननद रंजना उनकी मदद कर रही हैं। रीना ने साश्चर्य ननद से पूछा, “दीदी! आप माँ-पिता जी का सामान क्यों ठीक कर रही हैं? … मैं ठीक कर दूंगी “।

” उनका सामान बांध रही हूँ रीना …मम्मी-पापा हमारे साथ जायेंगे” रंजना ने सिर नीचे किये हुए ही कहा।

“आपके साथ….मैं समझी नहीं दीदी।

अब तुमसे क्या बताऊँ रीना! रंजना को बताने में कुछ संकोच सा लगा…पर बताना तो था ही ‘दरअसल रीना! भइया-भाभी पिता जी और माँ को अपने साथ रखना नहीं पसंद करते और आशीष अभी पढने-लिखने और कॉम्पिटिशन में व्यस्त था इसलिए तीन वर्षों से मम्मी – पापा को मैं अपने साथ रखती हूँ “…कहते – कहते रंजना की आवाज़ भारी हो गयी और आखें भी सजल हो आयीं। ननद की बात सुनकर रीना को माँ की बातें स्मरण हो आयीं “दादा-दादी ने अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा कर अपने पैरों पर खड़ा किया है अब उनके प्रति भी हमारा कर्तव्य बनता है। आज उसके सास-श्वसुर को भी कुछ ऐसी ही परिस्थिति का सामना करना पड़ रहा है…पर वह ऐसा नहीं होने देगी। माँ ने उसे बहुत कुछ सिखाया है जिसे आज अमल में लाने की जरूरत है…सोचती हुई रीना ने कहा, “दीदी! “हाँ ! बोलो” सामान ठीक करती रंजना के हाथ क्षण भर के लिए रूक गये। “अब मैं आ गयी हूँ दीदी तो माँ-पिता जी को हमारे साथ रहने दीजिये। विश्वास रखिये दीदी जैसे मेरी माँ दादा जी और दादी की देख भाल और सेवा करती हैं वैसे ही मैं भी माँ-पिता जी की देख भाल और सेवा करूँगी “। नयी-नयी आई रीना की बात सुनकर रंजना के चेहरे पर खुशी और संतुष्टि के भाव तैर गये। उसने उठ कर रीना को गले से लगा लिया और अवरूद्ध कंठ से बोली, “रीना! तुम्हारे लिए जैसा हम लोगों ने सोचा था तुम बिलकुल वैसी ही हो। माँ-पिता जी खुशकिस्मत हैं जो तुम्हारी जैसी बहू उनको मिली। अब मैं माँ-पिता जी की तरफ से पूरी तरह से निश्चित मन से जा सकूँगी। रीना को अच्छा लगा कि रंजना ने उस पर विश्वास किया। रीना ने झुक कर सास-श्वसुर का चरण स्पर्श किया और मन ही मन में भगवान से प्रार्थना की” हे  भगवन! इस अग्नि परीक्षा में मुझे सदैव खरी उतारना। “