नाटक समीक्षा / ‘आत्मकथा’ में दिखा सच, झूठ और प्रायश्चित का अंतरद्वंद्व

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           ‘आत्मकथा’ में दिखा सच, झूठ और प्रायश्चित का अंतरद्वंद्व

                            समृद्धि कौशिक

नार्थ ईस्ट इंस्टीच्यूट, रेलवे कॉलोनी में हिंदी पखवाड़ा के समापन समारोह पर आयोजित महेश एलकुंचवार का प्रसिद्ध नाटक आत्मकथा का मंचन कृष्ण सोनी के निर्देशन में किया गया।यह नाटक मानवीय संबंधों के अनकहे परतों की उलझन को दर्शकों के सामने प्रदर्शित करता है। नाटक का हर दृश्य मानव मन के अंतरद्वंद्व को दर्शाता है। निर्देशक कृष्ण सोनी ने उत्तरा-वासंती एवं राजाध्यक्ष और प्रज्ञा के बीच चल रहे द्वंद्व को अत्यंत सधे हुए अंदाज में पेश किया है।नाटक के नायक राजाध्यक्ष का यह कथन –हम क्यों असत्य पर सत्य का रंग चढ़ाकर जीने का स्वांग रचते हैं? मैंने अपनी, उत्तरा और वासंती की कहानी को कितना झूठा बना दिया! खुद के झूठ को ढकने के लिए एक काल्पनिक सत्य को गढ़ना… या दुनिया में कोई सत्य होता ही नहीं? या जब हम सच को नहीं समझते तो क्या यह झूठ हो जाता है?”दर्शकों के मन में एक अवसाद पैदा करता है।प्रेक्षागृह की खामोशी अचानक सन्नाटे में बदल जाती है। शायद हर कोई अपने जीवन के सच और झूठ का नाप तौल करने लगता है। बैकग्राउंड से आरही वायलिन की शोकाकुल ध्वनि इस संवाद के प्रभाव को और भी मारक और मार्मिक बना देती है।नाटक में राजाध्यक्ष, प्रज्ञा, उर्मिला और वासंती के माध्यम से भारतीय उच्च मध्यवर्ग के त्रासदजीवन को दर्शकों के सामने प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।भारत के अधिकांश नटकों में व्यक्ति के सामाजिक पहलुओं के माध्यम से निजी जीवन को समझने का प्रयास किया जाता है पर यह नाटक मनुष्य के निज़ी जीवन की जटिलता के माध्यम से सृजनशील समाज की वास्तविकताओं से दर्शक को रूबरू कराता है। सम्पूर्ण नाटक एक लेखक के अंतर्मन का मंथन है जो राजाध्यक्ष, प्रज्ञा, उत्तर और वासंती के माध्यम से प्रेक्षक के निजत्व को टटोलता है।निर्देशक ने इन पात्रों के निजी संबंधों के सच, झूठ और पश्चाताप की अग्नि में जलते अंतर्मन के माध्यम से मंच परमानवीय जीवन की त्रासदी का महाकाव्य रचने का प्रयास किया है।नाटक कहीं से भी बाह्य आवरण का प्रदर्शन करता नहीं दिखता बल्कि संवादों के अर्थान्वेषणके लिए भावों और भंगिमाओं के माध्यम से दर्शकों को अन्तर्मुखी यात्रा पर ले जाता है।रिश्तों की जटिलता की वास्तविकताको अभिनय की गंभीरता के माध्यम से नाटक की दुरुहता को सहजता एवं अर्थान्विती देता है। प्रत्येक संवाद प्रभावशाली और प्रवाहमयी है। राजाध्यक्ष कि भूमिका नाटक के निर्देशक कृष्ण सोनी ने निभाया। प्रज्ञा की सशक्त भूमिका में सुहाली जैन ने दर्शकों को बंधे रखा। उत्तरा/उर्मिला और वसुधा/बासंती कि दोहरी भूमिका अनु चक्रवर्ती एवं तृप्ति वानी ने निभाई। प्रकाश योजना करण की थी एवं संगीत निर्माण समायोजन किया रजनीकांत एवं समृद्धि ने।शहर के गणमान्य साहित्यकार एवं पत्रकार तथा आवर्तन बिलासपुर के सभी कलाकार उपस्थित थे। शहर के वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार सतीश जायसवाल ने नार्थ ईस्ट इंस्टीच्यूट के सांस्कृतिक विरासत के इतहास में आत्मकथा की प्रस्तुति को मील का पत्थर बताया। उन्होंने कहा कि बिलासपुर में पहली बार एक अदभुत प्रकाश योजना के साथ नाटक कि प्रस्तुति की गई।नाटक में दो तालों पर चल रहे भावनाओं के द्वंद्व को इसकी सबसे बड़ी सफलता बताया।दर्शकों को यह नाटक प्रारंभ से अंत तक विस्मित और चकित करता रहा। कलाकारों ने अपने अभिनय के माध्यम से दर्शकों का दिल जीता।

लेखक परिचय – समृद्धि कौशिक बचपन से ही खेल एवं सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़ी रहीं हैं| ये बासकेटबॉल की राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी रही हैं| कई बार देश के कई राज्यों में छत्तीसगढ़ राज्य का प्रतिनिधित्व कर चुकीं हैं और स्वर्ण पदक प्राप्त की हैं | वर्तमान में गुरु घासीदास विश्वविद्यालय, बिलासपुर से हिंदी भाषा एवं साहित्य में परास्नातक की पढाई कर रही हैं और साथ ही आवर्तन नाट्य समूह बिलासपुर में सक्रिय हैं|