पर्यावरण के चित्र को सामने रखती उमेश चरपे की कविताएँ

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कृषक परिवार में जन्मे उमेश चरपे मूलतः मध्यप्रदेश के बैतूल जिला अंतर्गत भरकावाडी गांव के निवासी हैं । साधारण किसान परिवार में पैदा होने के कारण इनका जीवन संघर्षमय रहा है। चरपे अपने परिवार के पहले पुत्र है जिन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की है । फिलवक्त गुरु घासीदास विश्वविद्द्यालय के हिन्दी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं । पठन – पाठन के साथ –साथ काव्य रचना भी करते हैं।  इनकी रचनायें साहित्य गुंजन , युद्धरत आम आदमी , वागर्थ , रचनाकार जैसी कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओ में प्रकाशित हो चुकी है ।  जीवन और जगत के प्रश्नों को उकेरती उमेश चरपे की कविताएँ पढ़े मधुलिका बेन पटेल की विशेष समीक्षात्मक टिप्पणी के साथ । मधुलिका बेन पटेल फणीश्वरनाथ रेणु डॉट कॉम के संपादकीय कार्यकारिणी टीम से जुड़ी हैं। … संपादक

     पर्यावरण के चित्र को सामने रखती कविताएँ

मेश चरपे की कविता ‘ हरी स्याही से’ वर्तमान पर्यावरण के चित्र को सामने रखती है प्रकृति के बगैर कुछ भी संभव नहीं. हरियाली के बिना जीवन में नीरसता फैली है. बसंत अब धरती पर नही, बल्कि कागजों में सिमट कर रह गया है  हमारे पर्यावरण पर घोर संकट मंडरा रहा है ऐसे समय में रचनाकार उसे बचाने की कोशिश करते हैं.‘रोटी’ कविता में रोटी की अहमियत का वास्तविक अंकन है पेट की ज्वाला शांत करने वाली रोटी है इसकी तुलना सोने और हीरे से नहीं की जा सकती ; क्योंकि यह वह वस्तु है जिसका कोई विकल्प नहीं है क्योंकि पूँजीपतियों की झोली का पेट कभी भरता ही नहीं जिस दिन उनकी झोली अघाएगी उस दिन किसी बच्चे को भूखे पेट नहीं सोना पड़ेगा. ‘स्वभाव’ कविता इन्सान की हकीकत को दर्शाती है  सभी वनस्पतियाँ और जीव अपनी सचाई के साथ जीते है केवल इन्सान वह प्राणी है, जोअपने मनुष्य होने का स्वभाव छोड़ देता है. यह कविता ईर्ष्या, लोभ, द्वेषऔर हिंसा से भरे मनुष्यों के स्वभाव पर कुठाराघात है कविता भविष्य के   आगामी संकट को उकेरती है आज जिस स्थिति में हम जी रहे हैं, उसे देख कर वास्तव में भय होता है मनुष्यों की भूख सब कुछ लील लेना चाहती है.  वह दिन दूर नहीं जब वे भी इस धरती से गायब होंगे इन दिनों’ कविता भी आज के भयावह दौर को उकेरती है रचनाकारयह सब देख कर बेहद अकेला महसूस करते हैं लुटते जल, जंगल और जमीन की चिंता उन्हें है । धीरे-धीरे धरती की देह का नीला होना उसकी दारुण स्थिति को दिखाता है कविता की भाषा सुगठितऔर भावों की अभिव्यक्ति में सक्षम है -मधुलिका बेन पटेल, सहायक प्राध्यापक, हिन्दी विभाग, तमिलनाडु केन्द्रीय विश्वविद्यालय, तिरुवारूर

1. हरी स्याही से
चौखटा है
एक खिड़की में
बाहर खुला सा आसमान
जिससे झाँक रहें हैं
एक पेड़ और झाड़ियाँ
उदासीनता की दीवार
पर अन्दर
गश्त देती छिपकलियाँ
भरना चाहती है भूख की दरार
टेबल पर बिखरे कागजों में
जंगल के कुछ कंकाली छायाचित्र
बसन्त के इंतजार में खड़े हैं
और
एक छोटा सा बच्चा
गाढ़े विश्वास की
कूची लिए
चितेर रहा है
पत्तियों के अर्क से
ताकि
फिरलहलहा उठे जंगल
इस सदी में ।

2. रोटी
गोल रोटी , तिकोनी रोटी
चपटी रोटी
आकार कोई भी हो
आग होती है रोटियों में
भूख के ज्वालामुखी को
निगल सकती है
इसकी गर्माहट से
चेहरे फूल की तरह
खिल उठते हैं
जिस रोटी के लिए
खून पानी की तरह बहता रहा
वही रोटी
खून से महँगी रही
हर युग में
सोने चाँदी और हीरे
से भी चमकदार है
इनकी चमक
ईमान धरम तक डगमगा जाते हैं
जिन रोटियों को
सदियों से
सूरज अपनी पीठ पर सेंकता रहा
वह लुढ़क कर
कभी तानाशाह
तो कभी पूंजीपतियों
की झोली में टपकती रही
पर यकीनन
जिस दिन
झोली अघायेगी
दुनिया में कोई बच्चा
भूखा नहीं सोयेगा l

3.स्वभाव
तुम रोज लड़ते हो
झगड़ते हो
फैलाते हो ईर्ष्या-द्वेष
सोचो
और
देखो
रोज उन खिलते फूलों को
जो बिखेरते हैं खुश्बू
भौरें करते हैं गुनगुन
धरती उगाती है
हरी- हरी दूब
आकाश उगाता है
असंख्य तारों को
सूरज देता है ताप
और
चाँद शीतलता
कोई नहीं छोड़ता
अपना स्वभाव
केवल
मनुष्य भूल जाता है
अपना स्वभाव
मनुष्य होने का ।

4. भविष्य
आने वाले वक्त में
कैसे होंगे बादल ?
कैसी होगी बारिश ?
पेड़ो की छाँव होगी
या ठूंठ होंगे
क्या तब भी दिखेंगेआसमान
में तारे ?
आज जिस तरह हवा में घोला जा रहा हैं
धीरे – धीरे जहर
मशीनें
अब कुरेद रही है
धरती के गर्भ को
लगता है निकाल ही लेंगे आत्मा
कुछ व्यापारी सियार
अब भी
हीरों की चाकाचौंध में
सेंध लगाने की फिराक में लगा रहे जुगत
कुछ लोग मिसाइलों
को मुल्क के नाम पर
ताने खड़े हैं
बाजार में अब हथियार बिकते हैं
पेट की चीज नही
सियासी भूख है
मुल्क के नाम पर
कैसी रची जा रही साजिश
सोचता हूँ
कितना बहेगा लहू और
सचमुच यह प्रजातंत्र है ?

5. इन दिनों

इन दिनों
चलते-चलते
अकेला हो जाता हूँ
चोरी चकारी, लूट-खचोट
मारा-मारी, धोका -धड़ी
रोग की तरह
गला रहे हैं देह को
बरसों से चली आ रही
इन बीमारियों के
ईलाज के लिए
ढूँढ रहा हूँ
कोई हकीम /कोई दवाखाना
पेड़ो में सेंध लगाती
दीमकों की टोलियाँ
लीलना चाहती है अब धरती
हर जगह अफरा-तफरी है
वफादार अब वफादार नही
चापलूस
हो चुके हैं
कुत्ते
अपने ही मालिक पर गुर्राने लगे हैं
जल, जंगल, जमीन पर
अब
मौन है सियासत
व्यापारी चूहे अब अनाज की जगह
गोदामों में बारूद जमा कर रहे हैं
और कुछ व्यापारी चूहे
फैक्ट्रियो की देह से निकला
विष, धरती की नब़्जों में
उतारने में लगे हैं
कैसा होगा आने वाला कल ?
धीरे – धीरे
नीली पड़ रही है वक्त की काया
इन दिनों l