पुस्तक समीक्षा / आचार विचार और आडंबर का सच – तथागत

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सेवानिवृत प्राध्यापक गोरख प्रसाद मस्ताना हिंदी व भोजपुरी के जाने- माने कवि और गीतकार हैं। भोजपुरी साहित्य को समृद्ध करने में इनकी भी अहम भूमिका है। ‘जिनगी पहाड़ हो गईल’ नामक रचना जहाँ जयप्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा एवं वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, आरा के पाठ्यपुस्तक में शामिल है तो भोजपुरी लघु कथा संग्रह का चयन इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय, दिल्ली में भोजपुरी सर्टिफिकेट कोर्स हेतु चयनित हुआ है। इसके अलावा एकलव्य, अंजुरी में अँजोर (भोजपुरी खंड काव्य) , गीत मरते नहीं , विन्दु से सिन्धु तक (हिंदी गीति काव्य संग्रह) सरीखे रचनाओं का प्रकाशन हो चुका है। भोजपुरी व्यंग्य यात्रा और भोजपुरी कहानियाँ शीघ्र ही प्रकाशित होने वाली है। हिंदी और भोजपुरी साहित्य को समृद्ध करने में जुटे मस्ताना जी को भारत से लेकर नेपाल तक में संचालित सरकारी व गैर सरकारी साहित्यिक संस्थाओ द्वारा कई पुरस्कार और सम्मान से भी नवाजा गया है। आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा आयोजित काव्य गोष्ठी में भी इन्हें बड़े सम्मान के साथ आमंत्रित किया जाता रहा है। इनके चुनिंदा गीतों को भोजपुरी की जानी मानी गायिका कल्पना पटवारी ने आवाज भी दी है। हिंदी भोजपुरी काव्य धारा को नई गति देने वाले वरिष्ठ साहित्यकार मस्ताना का नया काव्य संकलन हाल फ़िलहाल में पाठकों के बीच पहुँचा है। प्रस्तुत है पुस्तक समीक्षा डॉ. स्नेह सुधा के शब्दों में।
                              आचार विचार और आडंबर का सच – तथागत
‘तथागत’ शीर्षक से डॉ. गोरख प्रसाद मस्ताना ने प्रबंध काव्य की रचना की है. इस काव्य में गौतम बुद्ध के जीवन और शिक्षाओं को पद्यबद्ध रूप में प्रस्तुत किया गया है. गौतम बुद्ध की शिक्षाएँ शब्द और विचार रूप में सरल हैं तो मंथन और आचरण रूप में गूढ़. इन विचारों को प्रस्तुत करना गद्य में आसान है या पद्य में इसमें उलझना व्यर्थ है. मूल मुद्दा विधागत निर्वाह का है. रचनाकार ने अपनी रुचि के अनुसार विधा का चयन किया है. डॉ. मस्ताना ने अपनी रचना का उद्देश्य गौतम बुद्ध की पहचान, उनके प्रति आस्था और उनकी पैठ को जनता के बीच मज़बूत बनाना है.
प्रबंध काव्य का पहला सर्ग ही ‘उद्देश्य’ शीर्षक से है. इसमें परंपरा का निर्वाह करते हुआ ईश-वंदना की गई है. यह दीग़र बात है कि रचना का विषय और रचनाकार के ईश एक ही हैं. उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि गौतम बुद्ध पर काफ़ी कुछ लिखा जा चुका है. डॉ. मस्ताना ने उनका अध्ययन किया और उस लिखित थाती में नया कुछ जोड़ने के लिए उन्होंने गौतम बुद्ध के आगे सिर नवाया और उनकी प्रेरणा व आशीर्वाद से प्रबंध काव्य रचा.
डॉ. मस्ताना ने पहले ही छंद में लिखा-
“मेरा एक उद्देश्य जगत अमिताभ प्रभु को जाने
पहले से भी अधिक आस्था के संग उनको माने
प्रकृति के इस महापुरुष को अंतर से पहचाने
चलें कृपा से उनकी अपना जीवन और सजालें.”
इसी तरह ने उन्होंने प्रबंध काव्य की परंपरा का निर्वाह करते हुए अपनी लघुता के बारे में भी लिखा है-
“अपना अल्पज्ञान लघु क्षमता,लेकर खड़ा हुआ हूँ
कलम लिए करुणा निधान के पग में पड़ा हुआ हूँ
लोग कहीं मूरख ना समझें,इस हित डरा हुआ हूँ
एक मात्र बल, बुद्ध हेतु, श्रद्धा से भरा हुआ हूँ.”

इसी सर्ग में उन्होंने भाषा के चयन के बारे में लिखा है-
“है, उत्कट अभिलाषा, मातृभाषा में कुछ गाऊँ?
हिंदी के चरणों में, श्रद्धा के दो सुमन चढ़ाऊँ?
समय सहायक होना, मैंने शुरू किया एक गान
मिले शब्द को दिव्य दीप्ति साक्षी हो बुद्ध महान.”

जहाँ तक प्रासंगिकता का प्रश्न है गौतम की शिक्षाओं को जानने समझने और आत्मसात करने की आवश्यकता तब तक रहेगी जबकि समाज में बुराइयाँ व्याप्त हैं. डॉ. मस्ताना ने लिखा-
“आज अंधविश्वास बिछाने लगा अनय-तम गहरा
हीरा तुच्छ, कोयले पर केवल लगा हुआ है पहरा
ढूँढ रहा मन गौतम वाला अपना विगत सुनहरा
अंतहीन अज्ञान कोप से निलय ज्ञान का भहरा.

दिग दिगंत में जातिवाद औ’ वंशवाद का नारा.
अहंकार नभ चूमे, धरती पर धोखे की धारा
ईर्ष्या में रत हृदय हृदय से बरस रहा अंगारा
चिंतातुर मानव है, आखिर, पाए कहाँ सहारा?”

वर्ण-व्यवस्था पर टिप्पणी करते हुए डॉ. मस्ताना ने लिखा-
“वर्ण व्यवस्था के पीछे शोषण की सुलगे आग
ब्राह्मण ही है श्रेष्ठ यही चहुँ दिश में गूँजे राग
शूद्र वर्ण है नीच, यही कहता है द्विज समाज
जाति जाति का शोर मचाते नहीं तनिक है लाज
इसी तरह अंधविश्वासों, दीन-दुखियों की दशा को छंद का विषय बनाते हुए डॉ. मस्ताना ने लिखा कि इन कुरीतियों का विनाश करने के लिए ही समय समय पर महापुरुष अवतार लेते हैं.
“समय समय पर समय धरा को देता कुछ उपहार
ज्ञान सुर विज्ञान कभी देता है पुण्य विचार
उसकी इच्छा हो तो लेते महापुरुष अवतार
कण कण हो जाता प्रदीप्त, पाकर के शुद्ध विचार.”

अवतार की उपयोगिता और गौतम के अवतरण पर प्रबंधकार ने लिखा-
“अभिनंदन-पल में ही नभ से एक सितारा आया.
आकर मात महामाया की कोख में आश्रय पाया
चहुँदिश में जन गण का आकुल व्याकुल मन हर्षाया
आश लगाये बैठी धरती ने अनंत सुख पाया.”

प्रबंध परंपरा का निर्वाह करते हुए मस्ताना जी ने एक ही छंद में बुद्ध के जन्म स्थान, माता-पिता सबका परिचय दे दिया है. उसके बाद के छंद हर्षोल्लास और बुद्ध के गुणों के वर्णन में रची गयी हैं.
“लुम्बनी में एक वनफूल खिला
जगती को गौतम बुद्ध मिला
माता माया ने जना लाल
शुद्धोधन का था हृदय खिला.”
बुद्ध के जन्म के बाद राजा शुद्धोधन ने ज्योतिषियों को बुलाकर उनकी कुंडली बनायी. राजकुमार सिद्धार्थ ज्ञान की खोज में सुख सुविधाओं तैयार कर संन्यासी बन जाएँगे, इस बात ने राजा को बहुत बेचैन किया. उन्होंने यशोधरा से सिद्धार्थ का विवाह करा दिया था कि विवाह उनमें जीवन के सुखों के प्रति आकर्षण भर देगा, पर होनी को कौन टाल सका है. राजकुमार सिद्धार्थ को जीवन की निःसारता का बोध तो होना ही था. उन्हें राजमहल का त्याग करना था और सिद्धार्थ से बुद्ध बनना था. सिद्धार्थ को जन्म देने के कुछ समय बाद ही उनकी माता ‘माया’ की मृत्यु हो गयी. उनका पालन पोषण मौसी प्रजापति ने किया जो उनके पिता की दूसरी पत्नी थीं.
प्रबंध काव्य में नायक के गुणों के साथ उसके शारीरिक सौष्ठव के वर्णन की भी परंपरा है. इसी का निर्वाह करते हुए प्रबंधकार ने लिखा-
“क़द लंबा सशक्त सुंदर था
चिंतन में शांत समुंदर था
स्वभाव मधुर बोली अमृत
बल में भी लगे पुरंदर था.

था दयावान, हृदय कोमल
देखा जो एक पक्षी घायल
दौड़ा औ’ कर में उठा लिया
हो गयी दया उसकी कायल.”

बुद्ध की दयालुता का परिचय बाल्यावस्था में ही लग गया था . बचपन में उन्होंने शिकार (बाण) से घायल हंस की रक्षा की थी. इसी करुणामय सिद्धार्थ का जीवन और सौंदर्य के प्रति मोह भंग हुआ. वे अपनी पत्नी और वैभव को छोड़ कर राजमहल ले निकल गए. इस प्रसंग में थोड़ा सा अंतर या पाठ भेद मिलता है. यह प्रचलित है कि सिद्धार्थ अपनी सोती पत्नी और पुत्र को छोड़ निकल गए थे. डॉ. मस्ताना ने बच्चे को गर्भस्थ शिशु माना है-
“हे गोपा, तू ह्रदय से अपने क्षमा मुझे कर देना
यही भाव गर्भस्थ शिशु से निश्चित ही कह देना
अपना ईष्ट प्राप्त हो जाने पर ही मैं लौटूंगा
कठोर तप से मै अपने निर्णय को पूर्ण करूँगा.”

शुद्धोधन में जीवन की क्रूरताओं और दुःख से राजकुमार को दूर रखने का हर संभव प्रयास किया था. उन्होंने राजकुमार द्वारा नगर भ्रमण करने की इच्छा व्यक्त करने पर नगर को ख़ूबसूरत और नगरवासियों को युवा, स्वस्थ और ख़ुश दिखें. फिर भी नियति को कुछ और ही मंज़ूर था. उन्हें क्रमशः व्याधि, जरा और मरण से साक्षात्कार हुआ. उन्होंने जीवन सत्य को जान लिया. उसके असुंदर पक्ष को पहचान लिया. इसके बाद राजमहल का सुख उन्हें कहाँ रोक सकता था. उन्होंने गृह-त्याग कर दिया. शव यात्रा पर डॉ. मस्ताना ने लिखा-
“काँधे पर अर्थी भारी थी
सब के दृग में लाचारी थी
इस जग में सकल अनिश्चित है
जो जन्मा मृत्यु निश्चित है.”
बुद्ध का जीवन लक्ष्य निम्नलिखित पंक्तियों में व्यक्त हुआ है-
“एक लक्ष्य है वसुंधरा को दुःख से मुक्त कराना
इसी निमित्त की खोज हेतु मुझको है घर से जाना
आज आत्मा मेरी, अज्ञातों के लिए है आकुल
समानता हो प्राणी प्राणी में इस हित हूँ व्याकुल.”

बिम्बिसार ने बुद्ध को आधा राज्य देना चाहा, पर उन्होंने विनम्रता और मधुरता से मना कर दिया. बुद्ध ने पहले गुरु की खोज शुरू की. आलार कलाम उनके गुरु बने. उनसे उन्होंने ध्यान मार्ग की विधि सीखी. 35 वर्ष की उम्र में उन्हें जीवन सत्य का बोध हो गया.
छठा सर्ग मस्ताना जी ने यशोधरा को समर्पित किया है. उन्होंने लिखा-
“एक मलाल रहा मन में जब जाना ही था, तो कहकर जाते.
बाधा नहीं बनती मग में, निज स्वागत में अपने मुझे पाते.”

इन पंक्तियों को पढ़कर मैथिलिशरण गुप्त की ‘यशोधरा’ की निम्नलिखित पंक्तियाँ ध्यान में आ जाती हैं-
“सखि वे मुझसे कहकर जाते
कह तो क्या मुझको वे अपनी पथ- बाधा ही पाते.”

सातवें सर्ग में मस्ताना जी ने अष्टांगिक मार्ग की बात की है. उन्होंने दुःख से मुक्ति के लिए ‘मध्यम मार्ग’ सुझाया है. उन्होंने एक चाँद में पंचशील का उल्लेख करते हुए लिखा-
“घोर अहिंसा, नशामुक्ति, चोरी का भाव विलग हो
व्यभिचार व असत्य से मानव सर्वदा अलग हो.”
उन्होंने बुद्ध के संदेश को खोलते हुए कहा कि “अष्टांगिक मार्ग” से अंतर्दृष्टि मिलती है. निर्वाण के लिए बुद्धि, ज्ञान और शांति के सदमार्ग पर चलना आवश्यक होता है. एक एक करके इस सर्ग में उन्होंने बुद्ध की शिक्षाओं को सरल शब्दों में खोलकर रखा है. इसी मार्ग में मस्ताना जी ने बहुत ही सहजता से आचार विचार और आडंबर का सच उजागर कर दिया है-
“कोई नदी न उनको करती पाप से मुक्त
हत्या, व्यभिचार अधर्मों से जो होते युक्त.”
बुद्ध दे संदेश “आत्मदीपो भव” को दो पंक्तियों में बहुत ही सुंदर तरीक़े से पिरोते हुए डॉ. मस्ताना ने लिखा-
“अपना दीपक स्वयं बनो है, यही बुद्ध संदेश
अपने संग दूजे का भी उज्ज्वल होता परिवेश.”
आठवें सर्ग में बुद्ध का परिनिर्वाण वर्णित है. संत की मृत्यु नहीं होती, मुक्ति होती है. वे चेतन अवस्था में अपने शरीरांत को स्वीकार करते हैं. बुद्ध ने भी इस प्रक्रिया के लिए कुसीनारा की भूमि का चयन किया और शिष्यों को भी अपनी विदाई का समय बतलाया.
“बोले हे आनंद! ये कुसीनारा भू है अतिपावन
यहाँ पे उपजे साल वृक्ष भी लगते बड़े सुहावन.

चलो इन्हीं वृक्षों के तल में मैं विश्राम करूँगा
आज तीसरे पहर रात में, अंतिम साँसें लूँगा.”
बुद्ध ने बौद्धों के लिए चार पावन स्थलों- लुम्बिनी, बोध गया, सारनाथ और कुसीनारा की बात की. गौतम ने दाहिनी तरफ़ करवट लेकर निर्वाण प्राप्त किया. पावन स्मरण शीर्षक से लिखे नवें सर्ग में डॉ. मस्ताना ने अपने साथ कुछ और लोगों के वक्तव्यों को छंदबद्ध रूप दिया है.
इस प्रकार नौ सर्गों में बंटे इस लघु प्रबंध काव्य में बुद्ध का जीवन और उनकी शिक्षाएँ समग्र रूप से उभर कर आई हैं. डॉ. मस्ताना ने प्रबंध काव्य के रूप का निर्वाह भी यथासम्भव किया है.

समीक्षक का परिचय – डॉ. स्नेह सुधा,भारतीय भाषा केंद्र, जे.एन.यू. नई दिल्ली से पोस्ट डॉक्टोरल फेलोशिप कर रही है और फणीश्वरनाथ रेणु डॉट कॉम के संपादकीय संयोजन टीम से भी संबंद्ध हैं।