पुस्तक समीक्षा /ग्रामीण परिवेश के अनुभूति की अभिव्यक्ति

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सेवानिवृत प्राध्यापक गोरख प्रसाद मस्ताना हिंदी व भोजपुरी के जाने- माने कवि और गीतकार हैं। भोजपुरी साहित्य को समृद्ध करने में इनकी भी अहम भूमिका है। ‘जिनगी पहाड़ हो गईल’ नामक रचना जहाँ जयप्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा एवं वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, आरा के पाठ्यपुस्तक में शामिल है वहीँ भोजपुरी लघु कथा संग्रह का चयन इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय, दिल्ली में भोजपुरी सर्टिफिकेट कोर्स हेतु चयनित हुआ है। इसके अलावा एकलव्य, अंजुरी में अँजोर (भोजपुरी खंड काव्य), गीत मरते नहीं, बिन्दु से सिन्धु तक (हिंदी गीति काव्य संग्रह) सरीखे रचनाओं का प्रकाशन हो चुका है। भोजपुरी व्यंग्य यात्रा और भोजपुरी कहानियाँ शीघ्र ही प्रकाशित होने वाली है। हिंदी और भोजपुरी साहित्य को समृद्ध करने में जुटे मस्ताना जी को भारत से लेकर नेपाल तक में संचालित सरकारी व गैर सरकारी साहित्यिक संस्थाओ द्वारा कई पुरस्कार और सम्मान से भी नवाजा गया है। आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा आयोजित काव्य गोष्ठी में भी इन्हें बड़े सम्मान के साथ आमंत्रित किया जाता रहा है। इनके चुनिंदा गीतों को भोजपुरी की जानी मानी गायिका कल्पना पटवारी ने आवाज भी दी है। हिंदी भोजपुरी काव्य धारा को नई गति देने वाले वरिष्ठ साहित्यकार मस्ताना का नया काव्य संकलन ‘बिन्दु से सिन्धु तक’ हाल फ़िलहाल में पाठकों के बीच पहुँचा है। प्रस्तुत है पुस्तक समीक्षा अजय कुमार ‘अजेय’ के शब्दों में। …संपादक

          ग्रामीण परिवेश के अनुभूति की अभिव्यक्ति
                     अजय कुमार ‘अजेय’

‘बिन्दु से सिन्धु तक’ डॉ. मस्ताना का समकालीन कविताओं का संग्रह है। इसमें उनकी पचास कविताएं संकलित है। कवि की अधिकांश कविताएं ग्रामीण परिवेश के अनुभवों पर आधारित हैं। उन्होने खुद ही लिखा है कि ‘अपनी समकालीन कविताओं के माध्यम से मैंने जीवन के विभिन्न पक्षों को उकेरने का एक लघु प्रयास किया है।’ (पृष्ठ सं. 9)
कवि आधुनिक शिक्षा प्रणाली पर कटाक्ष करता है। किस तरह अभिभावक अपने बच्चों को पालने-पोसने, प्यार करने के बजाय आजकल भविष्य के लिए तैयार करते हैं। छोटी सी उम्र में ही लाद देते हैं बस्ता और उतार लेते हैं बचपन। कवि लिखता है ‘रसायनों से पके फल की तरह / मौसम से पहले………….तुतली बोली की मिठास में घुला काऊ/डॉगी का संज्ञान………..संभावना और यथार्थ के बीच की दूरी का बोध’ (पृष्ठ सं. 25) और अपनी इस कविता में कवि करता है बच्चों के अधिकारों की रक्षा, उनका व्यवस्थित प्रतिनिधित्व। आगे कवि लिखता है – ‘कलयुग का एकलव्य…………अँगूठे काट कर देता नहीं है / अँगूठे दिखाता है’ (पृष्ठ सं. 39)। वैसे भी हमारे देश में बेरोजगारी का यह हाल है कि चपरासी की नौकरी तक के लिए पीएच-डी. की उपाधि वाले छात्र आवेदन करते हैं। निस्संदेह ये लोग कलयुग के एकलव्य ही हैं और अपने धन और रुतबे के बल पर बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ पाकर घूम रहे हैं। शिक्षा के इस बुरे हाल के जिम्मेदार केवल नीति-निर्माता ही नहीं हो सकते बल्कि उनके साथ-साथ छात्र, शिक्षक और अभिभावक भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। कवि आज के शिक्षकों पर व्यंग्य करता है और लिखता है – ‘फुर्सत कहाँ ? ट्यूशन के टोटके से’ (पृष्ठ सं. 42)। शिक्षा और उसकी प्रणाली पर कवि ने सटीक बाते लिखी हैं, यहाँ कवि का व्यक्तिगत अनुभव बोलता है क्योंकि वे स्वयं अध्यापक रहे हैं।
कविता के माध्यम से अनेक बातें परदे में रखकर कही जाती हैं, लेकिन उनका उद्देश्य तो असलियत को सामने लाना होता है। कवि और लेखक समाज के पक्षधर होते हैं, कहा तो यह भी जाता है कि कवि/लेखक स्थायी विपक्ष होते हैं। इसी बात को डॉ. मस्ताना यह कहकर दोहराते हैं कि ‘मेरे अंतर के सूरज ने / व्रत ले रखा है’ (पृष्ठ सं. 14)। कवि परकाया प्रवेश करता है, अन्य के सुख-दुख को जीकर देखता है तब कहीं जाकर कविता जन्म लेती है। इस प्रक्रिया में कितनी पीड़ा है, उसका अनुभव वही कर सकता है। कवि चूल्हे के माध्यम से कहता है – ‘झुलस रहा हूँ / लेकिन उफ् मेरे शब्दकोश में नहीं है / सूरज भी मेरी बराबरी नहीं कर सकता’ (पृष्ठ सं. 17)।
मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु अहंकार है। जिस व्यक्ति के भीतर अहंकार ने घर कर लिया फिर उसे अपने से अलग कुछ नहीं दिखाई देता। कवि ने अपनी कविताओं के माध्यम से अहंकार की परिपाटियाँ भी बताई हैं। कवि कहता है – ‘यह अहंकार है…….घेरता है न्याय का रास्ता / चबाता है सहिष्णुता को / खाता है शालीनता को’ (पृष्ठ सं. 21)। दरअसल वर्तमान समय में मानव जीवन इतना आत्मकेंद्रित हो गया है कि मानव के पास अपने से अलग सोचने के लिए तनिक भी समय नहीं प्रतीत होता। कवि अहंकार के विषय में आगे लिखता है – ‘यह लबादा / जिसके तार बने हैं शोषण के’ (पृष्ठ सं. 67)।
अंधाधुंध प्रगति के इस दौर में धन / मुद्रा का कोई मूल्य नहीं रह गया है फिर भी मनुष्य इसके लिए मरा जा रहा है। मनुष्य इतना सुविधाजीवी हो गया है कि दूसरे ग्रहों और अंतरिक्ष के विभिन्न आयामों में जीवन तलाशने लगा है। कवि के अनुसार मनुष्य में ‘स्वर्ग में सीढ़ी लगाने की उत्कंठा’ (पृष्ठ सं. 23) ने जन्म ले लिया है। कवि आगे लोभ के बारे में लिखता है कि – ‘यही तो लोभ है / न जीने देता है / न मरने / विवेक ही भोजन है जिसका’ (पृष्ठ सं. 31) मानव प्रवृत्तियों के प्रति ऐसा दृष्टिकोण कोई अनुभवी व्यक्ति ही कलमबद्ध कर सकता है। सुविधाजीवी होते जाने के इस क्रम में एक नया रोग लोगों को लग गया है और वह है कर्ज़ लेकर अपनी ज़रूरतों को पूरा करने का रोग। कर्ज का यह मर्ज आज तो और भी विकराल रूप धारण कर चुका है। कवि लिखता है – ‘लेकिन कर्ज के मर्ज / की दवा है कहाँ / है भी तो दे कौन’ (पृष्ठ सं. 19)। पहले तो कर्ज़ के इस जाल में केवल ज़रूरतमंदों को फांसा जाता था लेकिन अब तो बाजारवाद ने ऐसे पैर फैलाए हैं कि लोगों की उपभोगवादी प्रवृत्ति को बढ़ावा देकर उन्हें नियोजित तरीके से कर्ज़ दिया अथवा दिलवाया जाता है। कवि के शब्दों में इसका बड़ा कारण भूमंडलीकरण है, जिसने सारी दुनिया को एक बड़े बाजार में बदलकर रख दिया है और जो – ‘जो संबंध बनाता है / आदमी का अर्थ से………विदेशी चम्मच से चाटता है / हमारी अस्मिता / हमारी पहचान’ (पृष्ठ सं. 61)। लेखक अपनी कविताओं के माध्यम से भविष्य के प्रति भी सचेत करने का प्रयास करता है, वह जल-युद्ध की चेतावनी देता है। कवि लिखता है कि – ‘युद्ध है, पानी का / जो मनुष्य ने स्वयं गढ़ा है’ (पृष्ठ सं. 52)। ऐसे में जब मानव-मूल्य निरंतर क्षीण हो रहे हैं तब कवि कहता है – ‘पानी पानी हो रही मानवता / किन्तु पानी नहीं है / न आँखों में / न कंठ में / न खेतों में’ (पृष्ठ सं. 52)।
पारिवारिक विभाजन और आपसी रिश्तों के बीच पैदा होते अलगाव, अजनबियत को भी कवि ने अपनी कविताओं में अभिव्यक्त किया है। समय के साथ बड़ी हो रही नई पीढ़ी के पास बहुत सी चीज़ों का अभाव है। केवल अपने लिए, आत्म-मुग्धता और अपनी स्वतंत्रता में जीने वाली नई पीढ़ी जिस दिशा में जा रही है वहाँ केवल अभाव है। कवि लिखता है – ‘केवल नहीं है तो वह है / समय और संवेदना’ (पृष्ठ सं. 41)।
कवि अपनी कविताओं में विभिन्न सामाजिक मुद्दों को भी उठाता है, जिनमें भ्रूण हत्या, पुरुष की स्त्री के प्रति भोगवादी सोच, वृद्धों की देखरेख सी समस्या, झूठी पत्रकारिता आदि शामिल हैं। कवि पुरुष की भोगवादी सोच को धिक्कारता है। वर्तमान समय में स्त्री-देह पुरुष के लिए आकर्षण का विषय हो गयी है। नई पीढ़ी समय से पहले वयस्क हो रही है और हर चीज का स्वाद समय से पहले लेना चाहती है, मिले तो ठीक वरना जबरदस्ती छीन लेगी। बलात्कार इस जबरदस्ती और क्षीण होती मानवीयता का एक वीभत्स उदाहरण है। कवि ने स्त्री के विभिन्न रूपों से हवा की तुलना करके यह दिखाने का प्रयास किया है कि स्त्री जीवन का आधार है। अपने विभिन्न रूपों यथा माँ, बहन, पत्नी, बेटी आदि में वह जीवन का स्रोत है, अतः उसके प्रति ओछी मानसिकता रखना बिल्कुल भी उचित नहीं है।
‘बिन्दु से सिन्धु तक’ की इन कविताओं में प्रेम है, मन की कोमलता है, जीवन का अपार अनुभव है। कहीं हताशा है तो कहीं भरी पूरी उम्मीद है। कवि की कल्पना किसी भी सीमा तक जा सकती है इसी कारण कुछ जगह बिम्ब और कथन उलझ गये हैं, उदाहरणार्थ ‘मेरा गाँव’ शीर्षक से कविता में ‘अपनी ही लाश पर / रो रहा है’ वाला कथन कवि के अपने मन की उपज है क्योंकि अपनी ही लाश पर कोई नहीं रो सकता, यह इस प्रकृति का विधान है। डॉ. मस्ताना कभी बुद्धमय होते हैं, कभी भगवान के नाम पर सारे हिन्दू आस्थावादी मिथक ले आते हैं। ऐसे में लगता है कि वे इनके बीच में उलझे हुए हैं लेकिन ऐसा नहीं है क्योंकि कवि अपनी कविताओं के माध्यम से लोक से संवाद करता है। ऐसे में उसे जनमानस के बीच प्रचलित मिथकों और मान्यताओं का ही सहारा लेना होता है। अपनी कविताओं में डॉ. मस्ताना एक समन्वयवादी के रूप में उभर कर आते हैं। पुस्तक में संकलित पचास कविताएं, उनके साठ वर्षों से ज्यादा के अनुभव का निचोड़ है और अपनी विषय-वस्तु में समकालीनता के साथ विविधता लिए हुए हैं।

 

परिचय – समीक्षक इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय, हिन्दी विभाग, मानविकी संकाय में शोधार्थी हैं।

 

‘बिन्दु से सिन्धु तक’
डॉ. गोरख प्रसाद मस्ताना,
जे. बी. एस. पब्लिकेशंस इंडिया,
मूल्य – 100 रुपये