पुस्तक समीक्षा / समय के आईने में रतन राठौड़ की लघुकथा संग्रह

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1978 से साहित्य सृजन में जुटे रतन सिंह राठौड़ का अभिनय और रंगमंच से भी गहरा जुड़ाव है। कविता, कहानी लेखन के साथ-साथ नाट्य लेखन से भी जुड़े रहे रहे हैं। नाट्य निर्देशन और मंचन के साथ टीवी सिरियल, टीवी विज्ञापन एवं क्षेत्रिय फिल्मों में भी काम किया है। हिंदी चिल्ड्रन फिल्म “देख इंडियन सर्कस” के लिए इन्हें 2012 में भारत सरकार द्वारा सम्मानित भी किया जा चुका है। इनकी कई लघु कथाओं एवं कविताओं का प्रसारण आकाशवाणी से हो चुका है। और हिन्दी की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में लघु कथाएं प्रकाशित भी हो चुकी है। साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में कई सम्मान प्राप्त करने वाले रतन सिंह राठौड़ के लघुकथा संग्रह “सहमें से कदम” की समीक्षा पढ़े मुखर कविता के शब्दों में।….संपादक                            

                    “समय के आईने में”

लघुकथा संग्रह ‘सहमे से कदम’ कवि , लेखक व रंगकर्मी रतन राठोड़ की पहली कृति है जिसको उन्होंने अपने माता पिता को समर्पित की है । बोधि प्रकाशन द्वारा अप्रैल 2018 में प्रकाशित यह पेपर बेक लघुकथा संग्रह 116 पन्नों में कुल 59 लघु-कथाएं समेटे हुए है।
किसी लघुकथा की एक खासियत जो सबसे ज्यादा लुभावनी होती है वह यह कि चलते फिरते छोटी छोटी गोलियों-सी मुंह में घुल जाये और दिल-ओ-दिमाग को एक जोरदार पंच दे जाये, तरोताजा कर जाये। अपनी लघुकथाओं की आखिरी किसी पंक्ति में वही चमत्कार करते मिलते हैं रतन जी।
बेहद सरल आम बोलचाल वाली भाषा में बोधगम्य ये कथाएं अपने आसपास के परिवेश से ही प्रेरित हैं। वे घटनाएँ जिनसे लगभग रोजाना ही हम किसी न किसी रूप में दो चार होते हैं और या तो नजरंदाज कर देते हैं या फिर ह्रदय में एक गहरी टीस महसूस करते हैं। उन्हीं वाकयों को लेखक ने खूबसूरती से शब्द दिए हैं , भाषा में पिरोया है और पाठक के सामने वे नज़ारे न मात्र पुनर्निर्मित किये हैं बल्कि उसे झकझोर भी दिया है। पात्रों के निर्माण में लेखक महोदय ने जो मेहनत की है दर्शाता है कि उन्हें चरित्र में डूबना आता है , या यूँ कहिये कि उनका रंगकर्मी होना यहाँ मददगार साबित हुआ है। उदाहरण के लिए ‘अंधी गलियां’ की नायिका , ‘छुटकी , बेटी हिंदुस्तान की’ के दुश्मन सैनिक , हताशा से भरा ‘विरासत की रोटियां’ का नायक. सबसे आकर्षक तो ‘चूहों की शरारतें’ के पात्रों की भाषा ! सहज होते हुए भी चरित्र की मांग अनुसार ढली हुई भाषा लेखक की सबसे प्रमुख विशेषता है। क्योंकि शब्द विन्यास ही वह डोर है जिसके माध्यम से कोई रचना अपना कथ्य पाठक के मन मस्तिष्क पर पूरी संवेदनाओं के साथ पहुंचाती है। 
पति-पत्नी, भाई-बहन, माँ- बच्चे आदि रिश्तों की परस्पर निर्भरता, प्रेम, नोंक-झोंक तो स्वार्थ, संपत्ति के कारन आ गए दुराव को अपनी कथाओं में आपने संजोया है तो देश प्रेम का जज्बा भी कई कई रूपों में सामने आया। पुलिस महकमे , राजनीती तो आम व्यवसाय में आये भ्रष्टाचार भी आपके विषय रहे हैं तो अक्सर आत्मावलोकन करते लेखक को भी हम विभिन्न कथाओं में आईने के माध्यम से देखतें हैं।
अमिर –गरीब, वृद्ध –किशोर, महिला, बच्चे, फूल , भंवरे, मदारी, रिक्शेवाला, नेता, बेरोजगार, कागज, लकीर …जैसे कि ‘सहमे से कदम’ ने संसार का कोई हिस्सा नहीं छोड़ा नापने को ! लेखक को चिंता है कि आज के समय में जब दुराचार अपने कई कई रूपों में समाज को खाए जा रहा है तो ‘बुधिया’ की गाथा वह कैसे लिखेगा ? वह कहानी के पितःमः प्रेमचंद को वापस बुलाना चाहता है मगर मन ही मन जनता है कि उनकी कलम भी कांप जाएगी यह सब देख कर! एक संवेदनशील कलमकार ने अपना ह्रदय उघाड़ कर रख दिया है ! लेखक बदनाम गलियों के ‘कर्मचारी’ की जड़ों को , मजबूरियों और उद्देश्यों को पाठक के सामने बेपर्दा करते हैं। समाज में व्याप्त कुरीतियों पर कुठाराघात करती कहानी भी है और जीवन की नश्वरता भी कहानी में जगह पाती है।
आत्म-संवाद आपकी पसंदीदा शैली है।
‘कम्मो’ कथा में एक नाकारा पुरुष अपनी औलाद को पालने की जिम्मेदारी खुद तो उठाता ही नहीं है बल्कि उसी बहाने से दूसरा ब्याह कर लेता है। हालात की मारी जिस लड़की के सपने चकनाचूर हो गए हों वह अपना जोर बेचारी कमजोर ‘कम्मो’ ही पर तो चलाएगी ! नतीजा..!!
‘बूढ़े पुष्प’ में जो वर्णन है वो क्या पुष्पों का दुरूपयोग है? हाँ, यह बात इंसानों के लिए नहीं लागू होनी चाहिए. अंतिम पंक्ति कहानी में अर्थ भर गई। एक और जहाँ लेखक त्यौहार उत्सव में परम्पराओं का हामी है वहीँ ‘शुभ मुहूर्त’ में वह किसी मुहूर्त का मोहताज नहीं बल्कि बुजुर्गों के आशीर्वाद को तवज्जो देते हैं।
नारी के व्यहार, आचार, कर्तव्यों पर खुल कर कहते हुए भी कहानियां हैं तो वहीँ जरुरत पड़ने पर ‘मिश्रित भाव’ में उसके हक में तलाक के हिमायती भी दिखे हैं। वहीँ जरा सी बात पर रिश्ते से बाहर हो जाने की सुविधा वाले ‘लिव इन’ पर भी कटाक्ष किया है आपने अपनी कथा ‘एक अणि सुबह’ में . ‘निवाला’ कहानी में भूख, क्षुधा और अमीर –गरीब के सूत्र दिए हैं । कहानी ‘आकाश गंगा’ के जरिये सरहदों के औचित्य पर प्रश्न उठाया है ।
इस तरह सकारात्मक नजरिये लिए हुए समाज में सन्देश देते साहित्य साधना में रत हैं जो समाज के साथ साथ खुद को भी आइना दिखने से नहीं चूकते।
आलोचना की दृष्टि से देखूं तो कहीं कहीं वर्तनी की अशुद्धियाँ दिखाई देतीं हैं, संभवतया वे टंकण की गलती हो. कोई कोई कथा कहीं कहीं प्रवचन देती महसूस होतीं हैं। कहीं कहीं अनावश्यक वर्णन भी कथा को कमजोर करते हैं।
कुल मिलाकर ‘सहमे से कदम’ पूरी ताकत से दौड़ लगाने में पुर्णतः सक्षम हैं । रतन न सिर्फ एक भावुक ह्रदय के मालिक हैं बल्कि अपनी संवेदनाओं को सूक्ष्म दृष्टि से अन्वेषित करके एक मारक रचना रूप देने की काबिलियत रखते हैं।

समीक्षक का परिचय – समीक्षक “मुखर कविता “कथाकार हैं 

 लेखक- रतन राठौड़
प्रकाशन – बोधि प्रकाशन
मूल्य – 120/- रुपये (पेपर बैक)
समीक्षक  – मुखर कविता , कथाकार