प्रीती कर्ण की पांच कविताएँ

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प्रीती कर्ण कहती हैं कि मैं कविताएँ नहीं लिखती, जीवन में रचे-बसे अनुभूतियों के रंग उकेरती हूँ और प्रकृति के मोहपाश की अभिव्यंजना।‘‘ दरअसल प्रीती को कविताई को संस्कार जनित प्रेरणा अपने पिता से मिली थी। कविता लेखन भी लंबे समय से कर रही हैं। अनजानी संकोच ने इन्हें कविता छपने-छपाने से दूर रखा। इक्के-दुक्के कविताओं का प्रकाशन हुआ है। दरभंगा में पली-बढ़ी हैं। फिलवक्त अपने परिवार के साथ झारखंड के धनबाद में रहती हैं। आधा जीवन गुजारने के बाद साहित्य की दुनिया में कदम रखने का प्रयास कर रहीं हैं। बढ़ती उम्र के अनुभवों की बानगी प्रस्तुत करती प्रीती कर्ण की पाँच कविताएँ पढ़ें डॉ. मधुलिका बेन पटेल की विशेष समीक्षात्मक टिप्पणी के साथ। मधुलिका फणीश्वरनाथ रेणु डाॅट काॅम से भी जुड़ी हैं। . . . संपादक
                                 मन की अंतर्वेदना
मन में चलने वाले अनेक भाव शब्दों में ढल कर प्रीती की कविता बन जाते हैं । उनकी पहली कविता ‘पैरहन’ आज के दौर में रिश्तों की वास्तविकता को बखूबी अभिव्यक्त करती है । रिश्ते जैसे समय की माँग हो गये हैं । जैसा समय वैसे रिश्ते । ऐसी स्थिति में प्रीती बनावटी रिश्तों की मुड़ी-तुड़ी सिलवटें देख ही लेतीं हैं । बनावटी रिश्ते एक झटके में टूट जाते हैं, बेदम होकर सांसें तोड़ देते हैं । इससे लहूलुहान होता मन उनकी कविता में आता है । दूसरी कविता ‘माँ’ कम शब्दों में माँ को व्यक्त करती है । माँ का मन अगाध सागर है, जिसमें वह अथाह दुःख समेटे रहती है । धरती का कोई भी हिस्सा उसके मन को पूरा समा नहीं सकता । माँ के अंजुरी भर दुःख के लिए भी धरती छोटी पड़ जाती है । माँ उड़ेलना चाहती है सबकुछ, जो उसके मन के भीतर है मगर उसे व्यक्त करने के लिए कोई जगह भी तो हो । माँ एक होती है । सभीं माँओं का मन एक सा होता है, जिसके समान दूसरा कभी नहीं हो सकता । तीसरी कविता ‘अंतर्वेदना’ आधुनिक दौर में विकास के मॉडल से आहत वृक्ष के विलाप को व्यक्त करती है । वृक्ष जीवनदायी हैं, फिर भी मुनाफे की अंधी दौड़ में इंसान बेजुबान वृक्षों की पीड़ा को न देख पा रहा, न सुन पा रहा । एक ओर वृक्षों की जड़ें गहराई में जा रहे हैं ताकि वे जीवित रह सकें, दूसरी ओर इंसान और मशीनें वृक्षों की लाश पर विकास का अट्टहास कर रहे हैं । कोई तो सुने उनकी चीख जो पहले भी थे और अब भी हैं । ‘तरुकथा’ कविता पतझड़ और बसंत के संधिस्थल की चर्चा करती है । पतझड़ तमाम विष सोखकर बसंत की नई कोपलों को जीवन देता है । अंतिम और पांचवीं कविता ‘तटस्थता’ तटस्थ स्थिति को व्यक्त करती है । यह वह स्थिति है जो सुख में न हर्षित है और न ही दुःख में दहाड़े मार कर रोता है । इसकी नियति क्या है ? यह प्रश्न अनुरित्तर है । प्रीती की कविता की भाषा सहज है । कम शब्दों में भावों को कलात्मक ढंग से उकेरा गया है । – -डॉ. मधुलिका बेन पटेल, सहायक प्राध्यापक हिन्दी विभाग तमिलनाडु केन्द्रीय विश्वविद्यालय, तिरुवारूर
                             प्रीती कर्ण की पांच कविताएँ

1. पैरहन
उधड़ी तुरपाइयां
किनारों से झूलते पैबंद
मुड़ी तुड़ी सी सिलवटें. .
बखूबी छुपाने की कोशिश होती रही
दामन को सलीके से
संवार लेते हैं
लेकिन
आस्तीन की मजबूरियां
हक़ीक़त बयान कर देती हैं
घिसे पिटे सड़े रिश्तों की!
एक झटके से बेदम होकर
सांस तोड़ देते हैं
और लहूलुहान
सियाह जख्म से भरा
चरित्र उजागर कर देता है
अपनी वास्तविक तस्वीर
सहानुभूति. . . संवेदना
दांतों तले उंगलियां. . .
गवाही में रख देते हैं सब
आह के फूल

2. मां

उड़ेलना चाहती थी
भरे मन की भरी गागर
पर नहीं दिखी
गहराई कहीं
नदी सी
जिनमें ठहर सके
अंजुरी भर दुख:!
सुनाना चाहती थी
सहेजी हुई
अंतर्मन की टीस
जिसे सुनकर भी
अविचल
टिका रहे
स्थितप्रज्ञ पर्वत!
बहा देना चाहती थी
सबको खुश रखने के
अथक प्रयास के बावजूद
विफलता और
उससे उपजी
घुटन!
कोई आवेग
लेकर नहीं आया
हवा का एक भी कतरा
एक था मन
कोई दूजा न हुआ!

3. अंतर्वेदना

मरणासन्न स्थिति में
राह पर
औंधे मुंह पड़े
वृक्ष की
आंखों से
ढहती दो अश्रु बूंदें
और टीस भरी चीख
विकास की कहानियों का
अध्याय बन कर
अपनी पीड़ा की
पुनरावृत्ति नहीं चाहतीं।
स्वयं को
स्थापित करने के लिए
पूरे जतन से अपनी जड़ें
गहराईयों में उतार दीं
शाखाओं का पोषण
निर्वहन तन्मयता से करतीं
अपनी बलिष्ठ भुजाओं को देख
आश्वस्त थीं
शायद अब किसी इंसानी
वार का शिकार
नहीं हो सकती
किन्तु आधुनिकीकरण के
इस दौर में
मशीनों के आगे
विशालकाय वृक्ष का
धरासाई होना
सहज है
चीखें तब भी थी
अब भी हैं. . .

4. तरुकथा

बसंत और पतझड़ के सभी
तथ्य भरे
सैद्धांतिक विवेचन का
खंडन किये बगैर
असहज परिस्थितियों से उपजी
विषमताओं को
सोखकर
सर्वग्राह्य उत्पाकदता
प्रेषित करना ही
एकमात्र लक्ष्य. . .
शीत और ताप के निर्मम
कुठाराघात सहकर
पीले हुए पत्तों की जीर्णता को
पतझड़ मान लेना
सहज नहीं. . .
जीवन मूल्यों का आदर्श
स्थापित कर
आज भी चिर प्रतीक्षा में खड़े
उन नन्हीं कोंपलों के. . . .
ताकि अंतस के वातायन से
निसृत हो सके
सुखद प्राणवायु
और
एक बार फिर
विष सोखकर
पीले होकर गिरने तक
की प्रतिबद्धता का
निश्छल प्रयास।।

5. तटस्थता

किसी हादसे से आहत होकर
विलाप नहीं करते
कभी खुशियों की अतिरेकता का
उन्माद भी नहीं दिखाते
शव यात्रा में शामिल
न रोते हैं
न शुभ यात्रा में
अधिक मुस्कुराते हैं
आरंभ से गंतव्य की ओर
सरपट दौड़ती सड़कें
कितने मोड़
मुड़कर
यात्राओं के
सुखद प्रयास में
आजन्म
लगे रहते हैं. . . !
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