प्रेम के अनुभूतियों के वातायन से निकले भाव बोध की कविता

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Chasing the sun.

हंस में छपी कहानी “मिस लैला झूठ में क्यों जीती हैं?” से चर्चा में आई प्रेमा झा मूलतः बिहार के मिथिलांचल की रहने वाली हैं। सभ्रांत घर में पैदा हुई प्रेमा ने एनआईआईएलएम स्कूल ऑफ बिजनस से एमबीए (एच.आर एंड मीडिया) तथा पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन की पढाई की हैं। फिलवक्त मेडिकल कंटेंट राइटर/मैनेजर के पद पर कार्यरत हैं। साहित्य सृजन से भी इनका गहरा जुड़ाव हैं। देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका यथा – समकालीन भारतीय साहित्य, नया ज्ञानोदय, परिकथा, पाखी, हंस, हमारा भारत, बया, जनपथ, संवदिया, बिंदिया, आरोह-अवरोह, गर्भनाल, लोक प्रसंग, कालजयी, माटी, युद्धरत आम आदमी, मुक्त विचारधारा, दैनिक हिन्दुस्तान, दिल्ली की सेल्फी आदि में कवितायेँ और कहानियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं। फ़िलवक्त अपने एक उपन्यास को लेकर शोधरत हैं। प्रेम के अनुभूतियों के वातायन से निकले भाव बोध की कविता पढे कृष्णा सोनी की विशेष समीक्षात्मक टिप्पणी के साथ।– संपादक

प्रेम के अनुभूतियों के वातायन से निकले भाव बोध की कविता

प्रेमा झा की कविता प्रेम के अनुभूतियों के वातायन से निकले भाव बोध की कविता है। यह कभी एकालाप तो कभी संवाद करती दिखती है। प्रेम इंसानी भावों का सबसे उद्दात प्रतिरूप है। इन प्रतिरूपों की अभिव्यक्ति कभी काम क्रीड़ा तो कभी विरह रोदन के माध्यम से किया गया है। इनकी कविता ‘एक खत पागल प्रेमी के नाम’, ‘मय और बारिश’, ‘मौसम का पिरामिड’, ‘हुश्न और इश्क़’, ‘अधूरी औरत’, ‘उदास शाम’, ‘इत्र में तुम’, ‘उम्दा कलाकार’ आदि कविताएँ प्रेम में डूबी हुई, नहाई हुई कविता है। कवियित्री ने अपनी कविताओं के माध्यम से यह बताने का प्रयास किया है कि प्रेम-परीक्षा हमेशा स्त्रियों को ही देना पड़ता है। पुरुष इनसे मुक्त एक स्वच्छंद जीवन जीने के लिए आजाद है। भावनाओं का बंधन और अनुभूति की विवशता, स्पर्श का कोमल एहसास स्त्रियों के स्मृति में चिरस्थायी होता है जबकि पुरुष का प्रेम कपड़े बदलने की तरह।कवियित्री अपनी कविता अधूरी शाम में लिखती है-
मेरे स्वप्न-पाखी ने/करवट पा ली/और तुम्हारी पीठ को/सहलाने लगी/हरेक सिहरन और चुम्बन का उम्र हिसाब रखेगा/तुम खाए-अघाए थे /मैं प्यासी और सुखी हुई नदी/मुझसे छूटने के बाद/तुम्हारा कपड़े बदलकर/कमरे बदल लेना/कोई मुश्किल न था/मैं बर्फ़ हो गई/नि:शब्द मेरे वस्र / मुझसे अपनी जगह मांगने लगे / तुम्हारे सामने जो औरत नंगी हुई / उसने कपड़े वापस पहन लिए/और तुम्हारी हर/छुअन को अपनी आत्मा से लगा लिया/मैं एक कहानी पानी में / नदी में तैरती दुआ-सी ! / आँसू जिसका वुज़ू बन जाता है |
इस तरह के मर्मस्पर्शी अनुभव के माध्यम से प्रेमा ने प्रेम में शरीर और आत्मा को एकमेक कर दिया है। प्रेम पाने की आशा और उम्मीद में एक लड़की क्या कर सकती है इसके प्रेम बताती है- ‘वो पागल लड़की मरीचिका के पीछे दौड़ती हुई / रेगिस्तानी इलाके में पहुँच जाती है’
अगर इनकी कविताओं का सार रूप में मूल्यांकन करें तो कह सकते हैं कि प्रेमा की कविता प्रेम से प्रेम करने और पाने की कविता है जो कभी ढीठ तो कभी सकुचाई, कभी स्वप्निल तो कभी मुखर हो कर अभिव्यक्त हुई है।– ……कृष्णा सोनी, सहायक प्राध्यापक , हिंदी विभाग, गुरु घासीदास विश्वविद्यालय, बिलासपुर l

1. एक ख़त पागल प्रेमी के नाम
जाने कितनी धूप देखी हो तुमने
मगर खनकती धूप का तुम्हे पता न था
तुम चाहते रहे होगे शायद
दिल का आम भाषा की तरह बहुत रोजाना हो जाना
इश्क़ जमीन-सा हो जहाँ रुका जाए पल भर
और उम्र मुहब्बत की कैसटों पर चलता रहे
तुम उस दौर में आ गए हो
जहाँ से पीछे छूटे इश्कबाज़ियों को
रेलगाड़ी की सफ़र की तरह
गुजरते हुए देखा जाए फिर से!
मगर कभी-कभी तुम इस ट्रेन में बैठना चाहते हो
एक सफ़र फिर पूरा करना चाहते हो
तो, आगे बढ़ो
मैं ज़िन्दगी बेवफ़ा हूँ
मगर मुहब्बत करने वालों के लिए
आसमान आज़ाद रखती हूँ
तुम गज़ भर आसमान से
और
गहराई जरा पाताल से मांग लो
फिर जवानी मैं तुम्हे उधार दे दूँगी
मगर बदले में मुझे तुम्हारा साथ चाहिए होगा
बोलो, दोगे?
तुमने कहा, हाँ
और
मुहब्बत लिखने लगे डायरी में
अब तुम बूढ़े हो चुके हो
मगर मुहब्बत है कि अंगड़ाइयां लिए अभी-अभी जगी हो मानो
तुम चाहने लगे हो अब कि गाड़ी किसी भी स्टेशन के पते न ढूंढ सके
और
चलती रहे अनवरत यात्रा पर
मैंने तुमको आज दूसरा ख़त लिखा
पता में लापता लिखकर
नाम अपना आत्मा रख लिया!

2. मय और बारिश
ऐसे की थी उसने मुहब्बत
जैसे इन्द्रधनुष के सातो रंग
पर तुमने फिरंगी बारिश के डर से
आसमानी बादलों वाली खिड़कियों पर पर्दा डाल दिया
वो तो मौसम थी
बेहिसाब बारिश
तुमको था डूबने का डर
या कि
बारिश के बाद की धूप से तुम थे खौफज़दा
जिसे वो अपनी मौत से भी ज्यादा नापसंद करती
क्योंकि उसका जीना सावन
और
उदासी, खामोशियों का पुच्छल तारा
आसन नहीं था जिसे देखना!
और मुहब्बत तो दिवास्वप्न-सी कोई चीज़ हो गोया
सुना है आजकल वो
मयखाने की दोस्त हो गई है!

• बारहा तुम छूटी
वो अक्सर कहता
तुम किताबें पढ़ती हो और मैं ज़िंदगी
दर-बदर लिफ़ाफ़ा ढूंढता हूँ वह
जिसने तुम्हे कागज़ी बना दिया
और तुम खिलौने कश्ती-सी
खेल-खेल में बहुत दूर निकल गई…..!

3. मौसम का पिरामिड
कलम बारिश लिखने गई है
एक ऐसी बारिश जो पन्नों पर गिरती है
सावन क्रंदन करती हुई
कुछ देर बाद उसकी आह
एक आवाज़ में तब्दील हो गई
और गूंजने लगी प्रतिधून-सी पूरे शहर में
भीड़ वाली इस सड़क पर
वो पागल लड़की मरीचिका के पीछे दौड़ती हुई
रेगिस्तानी इलाके में पहुँच जाती है
फिर लिखा उसने गिले पन्नों पर
बसंत, सावन, शरद और ठीठुरता प्रेम
जिसे मौसम और सूरज चाहिए
बुलेटिन से मिली अभी की ताजा जानकारी
यहाँ शहर का तापमान
बर्फ़ बारिश करने पर आमादा है
आसमानी मेघ सपने में
निशा सुन्दरी को रिझा रहा
सूरज के सातवें घोड़े पर चढ़कर
किसी फ़रिश्ते को आना है शायद
वो गहरी नींद में जाना चाहती है
लाल फंतासी बातें लड़की सच मानने लगी है
क्योंकि मौसमी बूँद
किसी अदृश्य शहर के पिरामिड में विलीन हो गई है

4.हुस्न और इश्क़
घंटों पलक झपकाए बिना तुमको देखा तो जाना
कि मुझको मुहब्बत हुई है एक बार फिर
खुदा कसम!
पहली बार यह दिल दुबारा किसी का मुरीद हुआ है
तुम्हारी आशिक़ी की फ़रमाबरदार हुई यह पागल
देखते-देखते ही मेरा हुस्न सहाबी की सफ़ में आ बैठा
लो इश्क़ की आयतें लिखने बैठ गई रूह
दिल एक बार फिर थोड़ी-सी जगह मांगता है!
5. अधूरी औरत
मैं एक अधूरी औरत थी
तुम एक पूरे मर्द थे
एक दिन तुमने मुझसे मुलाकात की
देह की अपनी प्यास थी
सो हम एक-दूसरे से लिपट गए
ब्रह्माण्ड में कोई घटना घटी हो उस वक़्त
तो उसका आंकड़ा एक-एक कर
उस वक़्त के हिसाब को दर्ज़ करेगा
मेरे स्वप्न-पाखी ने
करवट पा ली
और तुम्हारी पीठ को सहलाने लगी
हरेक सिहरन और चुम्बन का उम्र हिसाब रखेगा
तुम खाए-अघाए थे
मैं प्यासी और सुखी हुई नदी
मुझसे छूटने के बाद
तुम्हारा कपड़े बदलकर
कमरे बदल लेना
कोई मुश्किल न था
मैं बर्फ़ हो गई
नि:शब्द मेरे वस्र
मुझसे अपनी जगह मांगने लगे
तुम्हारे सामने जो औरत नंगी हुई
उसने कपड़े वापस पहन लिए
और तुम्हारी हर छुअन को अपनी आत्मा से लगा लिया
मैं एक कहानी पानी में
नदी में तैरती दुआ-सी!
आँसू जिसका वुज़ू बन जाता है|

6. उदास शाम
एक उदास शाम में
घड़ी की टिक-टिक के लाल आकाश पर
समय चुप हो गया है
पुच्छल तारे इस आकाश के मध्य
संध्या सात बजे गुजरेगा
लोग-बाग़ उसे ही देखेंगे
बेसब्री से इंतज़ार करते हुए सब
जल्दी-जल्दी अपने सब काम निपटा लेंगे
प्याली भर चाय की चुस्कियों के साथ
मैं भी यहीं हूँ
अभी इस आकाश पर
कोहरे छाए हुए हैं
मैं, सिगरेट सुलगाने की अपनी पहली कोशिश में
धुआँ फंसा लेती हूँ
नाक से गले तक
और
जोर की छींक में
मेरी शर्मीली खिड़कियों से
धुआँ गुबार बन निकलने लगता है
ये मैं हूँ,
मेरी चुप्पी है
और
मेरा आकाश जहाँ
अकेली शाम का
एक पूरा हिसाब तय होता है!
पुच्छल तारे का भविष्य
अभी अधर में है
धुएँ का आकाश
ठिठोली कर रहा है|

7.इत्र में तुम
वो जादूगर मेरे आंसू
अंजुरी में भरता और फूल बना देता
सब गुलदस्ता-सा बन मेरे कमरे की फर्श पर सज जाते
मैं जब भी रोती
वो खूब देर तक मुझे अकेला छोड़ देता
और
फूल के लिए सबसे अलौकिक इत्र की खोज में
जंगल-जंगल भटकता रहता/
वो बहुत दिनों बाद जब भी आता
उसके पास कई इत्र की शीशियाँ होती
और
उसे वह आंसू-फूलों पर छिड़क देता
इसी तरह कई रोज़ बित गए
एक दिन उसने मेरे आंसुओं को
अंजुरी में ले ली
और
इत्र वाली शीशी में रख दी

फिर क्या था
आंसू शीशी में कैद हो गया था|
इत्र से मिली-जुली शक्ल पाकर
जार में घूमने लगा
उस दिन वो चला गया था
उस इत्र वाली शीशी के साथ
मेरे आंसू उसके पास शीशी में
इत्र की अवस्था और प्रकृति के मद्देनज़र
यायावर हो चला-
मैं जब भी ढूंढती हुई उसे
दरवाज़े के बहार जाती हूँ
आंसू सुगंध मेरे चारो ओर कैद हो जाते
मैं, इस इत्रयी हवा में उसे महसूसने लगती हूँ
वह, हवा बन बह रहा है
जब भी उसकी याद में रोती हूँ
वो इन खुशबुओं में
मुझे छूता हुआ होता है|

8. उम्दा कलाकार
तुमसे मुहब्बत करना
किसी सुंदर शहर को जानना-सा था
तुमको छूना
हम दोनों के मुल्कों के लिए
तकल्लुफ़ की बात हो गयी
इन दुश्वारियों में
अब आँखों से बोलने लगे हम
अंग्रेजी के शब्दों में
उन ख़ास साइलेंट लेटर की तरह
हर ज़ुबान में
तुम मेरे हो
मुझे दृष्टिदोष नहीं है
अवतल लेंस लेने की उम्र से बाहर हो चुकी हूँ
किसी बहुत पास के गाँव में
उस तालाब में
जलकुम्भियों-सा
तुम्हारा अक्स झाँकने लगता है
मानो पूछ रहा हो
इश्क़ के किस इलाके में
रहने लगी हो आजकल!
किसी बहुत कम परिचित शहर के नाम-सी
मेरी पीड़ा
जिसका जिक्र करूँ तो
तुम और तुम्हारी चर्चा
गर्म ख़बर सरीखी हो जाएगी
शहर का नाम
बहुत कम प्रभावी
मुल्क ज़द में
और तुम
घूमते रहोगे मेरी बातों में
तुम्हारी मुहब्बत
किसी बहुत अजनबी
स्टेशन की तरह
मेरे सफ़र से
छूटती जाने लगी
और
तुम मेरे शहर तक आते-आते
मानचित्र की रेखाओं पर
हाथ रोके खड़े रहे!
एक सीमा-विस्तार चुप्पी
अब इस जटिल नक़्शे को
कोई आसानी से बना दे
फ़िलवक्त कोई चित्रकार इतना उम्दा कलाकार नहीं!
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