मेनिका सिंह की पांच कविताएँ

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किसान परिवार में पैदा हुई मेनिका सिंह ने खेती-किसानी के कार्य संस्कृति को अत्यंत ही करीब से देखा है। किसान पिता की पुत्री मेनिका जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से ‘एस.आर. हरनोट की कहानियों में सामाजिक चेतना’ विषय पर शोध कार्य कर रही हैं। मेनिका वैसे तो उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिला अंतर्गत अरंगी गाँव की रहने वाली हैं। इनके पिता महज आठवीं तक पढ़े-लिखे हैं , लेकिन वैदिक साहित्य के पाठक हैं और कविताएँ भी लिखते हैं। मेनिका को कविता लिखने की प्रेरणा अपने पिता से ही मिली है। इनकी कविताएँ सृजनलोक और सारस में प्रकाशित हो चुकी है। प्रेम की अनेक भंगिमाएं प्रस्तुत करती मेनिका की कविताएँ पढ़ें, डॉ. मधुलिका बेन पटेल की विशेष समीक्षात्मक टिप्पणी के साथ। … संपादक
      मेनिका सिंह की कविताओं में प्रेम का कोलाज
मेनिका की कविताओं में प्रेम की अनेक भंगिमाएं प्राप्त होती हैं। पहली कविता में युवा होता मन पुनः एक बार बचपन को याद करता है। बचपन में मन छोटी सी चोट भी माँ के पास छोड़ आता था। आज मानो यह थम सा गया है। अब टूटे मन को खुद ही संभालना होता है। निश्छल प्रेम की राह आसान नहीं है। बदला हुआ दौर उसे बार-बार चोटिल करता है। कविता में कुंवारी माँ कुंती का याद आना तमाम कुंवारी माओं की पीड़ा का यादआना है। कविता टीस और गहरी अबूझ वेदना की छटपटाहट को व्यक्त करती है। दूसरी कविता में पूर्ण समर्पण के साथ अपने प्रिय को अपने सम्मुख रखने की हुलस है।तीसरी कविता में याद ही शब्द बन जाते हैं। यादें अलगाव के क्षणों में भी निकट होने का अहसास कराती हैं। चौथी कविता में प्रिय के भीतर प्रकृति और प्रकृति के भीतर प्रिय का अंकन है। चिड़ियों के सुर से मिलती-जुलती आवाज की खनक मानो गूंजती है। हरे पत्तों के मानिंद झूमना और अमलतास के फूलों सी हंसी का बिखर जाना सुन्दर दृश्य उपस्थित करता है। पांचवी कविता में अनन्य प्रेम और साथ में प्रिय को खोने का भय भी समाया है। धड़कते हुए ह्रदय, शंका और मीठी वेदना सब कुछ एक साथ यहाँ है। कविता में अलग–अलग रंगों में लिपटे शब्द मोती की तरह गुंथे है। – डॉ. मधुलिका बेन पटेल , सहायक प्राध्यापक , हिन्दी विभाग , तमिलनाडु केन्द्रीय विश्वविद्यालय, तिरुवारूर

1 .
इतना कि –
जितना उससे नहीं हो सकता था
हूलते हुए दर्द को पी जाना सहज न था
तब तो वह जानती ही न थी
दर्द कहते किसे हैं
वह तो खेलते हुए ठोकर लग जाने को
दर्द का नाम देकर
माँ के आँचल के खूंटे से बांध आती थी
तब तो पता ही न था कि
पहली बार किये गये प्यार में भी
खून की धार का दर्द लिपटा होता है
और मिलन की सारी उमंग
सहसा भय की सिसकियों में बदल जाया करती हैं

और तब सहसा भूली हुई
कुंवारी माँ कुंती याद आती है.

2 .
एक तड़प
एक हुलस
एक भींगा चेहरा
और एक
आंसू की झिलमिल
तुम्हारे लिए …
एक शाम
तुम्हारी
तस्वीर बनाउंगी
और
रख लूंगी
अपने पास
हमेशा के लिए …

3.
और कितनी बार लिखूं
बहुत याद आती है मुझे
तुम्हारी
कि इतने दूर क्यों चले जाते हो
तुम्हारी यादों से
कब तक पूछूं …
कि
कब आओगे तुम ..???
4.
चिड़ियों के चहचहाहट से
बहुत मिलती जुलती है
तुम्हारी हंसी …
तुम हंसते हो
और मैं झूमती हूँ
डाल से लटकी
हरी पत्तियों के मानिंद …
सुनो,
हंसते रहा करो
कि – तुम्हारी हंसी से
झरता है
अमलतास का फूल
झर…झर…झर…
5.
एक रोज
दीवारों से कहा था मैंने –
वे कभी नहीं आ सकती
हमारे बीच.
तब धीरे से कोई
हंस पड़ा था …
और डर गयी थी मैं
उस मद्धिम हंसी से
कि भूला नहीं मुझे
उसकी हंसी पर
एक मीठी कविता लिख दिया तुमने
और वो उसकी हंसी
दीवार बन उभर आई
हमारे बीच
एक दिन.
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