हिन्दी साहित्य के छात्र रहे राजीव कुमार फिलवक्त अजीम प्रेमजी फाउंडेशन में एसोसिएट रिसोर्सपर्सन के पद पर कार्यरत हैं। महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय वर्धा से हिन्दी साहित्य में एम.ए. की शिक्षा प्राप्त करते वक्त लघुकथा लेखन शुरू किया था। बीतते वक्त के साथ लघुकथा लेखन में इनका मन रमते चला गया। प्रस्तुत है आप सभी सुधी पाठकों के बीच बिहार के बेगुसराय के रहनिहार राजीव कुमार की लघुकथा पढ़े डॉ. मधुलिका बेन पटेल की विशेष समीक्षात्मक टिप्पणी के साथ।  – संपादक

                                        मौजूदा समय का आईना

राजीव कुमार की लघुकथाएं मौजूदा समय का आईना हैं। उनकी पहली लघुकथा ‘पार्ट टाइम टीचर’ बड़ी बेबाकी से पार्ट टाइम टीचर की स्थिति को उकेरती है। इसमें शिक्षा जगत पर हावी कंपनियों का चित्र भी खींचा गया है। ज्ञान बाँटने वाली जगहों पर कंपनी के महँगे प्रोडक्ट का प्रचार वह भी किसी स्कूल की प्रिंसिपल द्वारा!आज के युग में बदलते मूल्यों की ओर ईशारा करता है। जहाँ सादगी और अधिक से अधिक ज्ञान प्राप्त करने की होड़ होनी चाहिए वहां महंगे लिपस्टिक, परफ्यूम आदि का प्रचार मनको आहत करता है। अध्यापकों की दशा किसी से छुपी नहीं है। उनके ऊपर पढ़ने से अधिक अन्य काम का बोझ होता है। ‘हेलमेट’ लघुकथा में कानून लागू करवाने वाले लोगों की स्थिति को उकेरा गया है। बात-बात मेंचालान काटने को आतुर पुलिसवाले खुद बिना हेलमेट लगाये सरपट पीछा करने लगते हैं। कोई भी कानून जितना जनता पर लागू होता है उतना ही उस कानून के रक्षकों पर भी यह बात इस लघुकथा में बड़े ही अनूठे ढंग से कही गयी है। तीसरी लघुकथा ‘संस्कार’ के माध्यम से रचनाकार यही बताना चाहते हैं कि मनुष्यता किसी धर्म विशेष के स्थलों पर जाने से नहीं होती। संस्कारमें मनुष्य मात्र को समान देखने का भाव होना चाहिए न कि धर्म, जाति, वर्ग आदि खांचों में बंध कर। नन्हें सोनू को पागल और आचार्य दोनों एक समान दिखते हैं. यह लघु कथा संस्कार के मूल रूप की तलाश करते हुए उसके सीमित अर्थ-सन्दर्भ पर व्यंग्य करती है।

‘द्वारिकाधीश’ लघुकथा यह बताती है कि जो मनुष्य दूसरों की तकलीफों को समझे, मुसीबत में उसके काम आये, उसकी सहायता करे वही उसका द्वारिकाधीश है। इस लघुकथा में सुदेश किशन का द्वारिकाधीश है। ‘द्रोण’ लघुकथा गांवों के स्कूल और वहां के गुरु जी की दशा को उकेरती है। यह बात किसी से छुपी नहीं है कि स्कूलों में कितनी पढ़ाई होती है। बात सिर्फ इतनी नहीं है, बहुत से स्कूल का प्रबंधन वहां खुद पढ़ाई नहीं होने देना चाहता ताकि बच्चे उनके कोचिंग में आ सकें। बहुत तो अपने कोचिंग में साइंस और मैथ जैसे विषयों में पास करवाने के अतिरिक्त पैसे लेते हैं। उसके पहले गुरूजी भूमिका बनाते हैं फेल हुए विद्यार्थियों के बारे में बताते हैं फिर अपनी चालें चल देते हैं। ‘पास करवाई पैसे’न देने वाले छात्रों को खिन्न मन से घूरते हैं.छात्र-छात्राओं को आगे पढ़ने और बढ़ने की नसीहत के बजाय गुरुजी उनकी शादी करवाने की जुगत में रहते हैं।  उनकी बातें अगर छोड़ भी दें तो गांवों की सोच में बहुत बदलाव नहीं आया है। यह स्थिति चिंताजनक है। राजीव कुमार ने लघुकथा के माध्यम से कुछ बुनियादी प्रश्न उठाया है. भाषा में व्यंग्य का पुट भी मिलता है। कम शब्दों में बड़ी बात को घटनाओं के सहारे कैसे प्रस्तुत किया जाता है यह रचनाकार को भली प्रकार ज्ञात है।  – डॉ. मधुलिका बेन पटेल , सहायक प्राध्यापक , हिन्दी विभाग, तमिलनाडु केन्द्रीय विश्वविद्यालय, तिरुवारूर

                                    1.पार्ट टाइम टीचर
“अरे क्या यार!
अभी परसों ही तो मीटिंग हुई थी,फिर मीटिंग।बताओ क्या होता है मीटिंग में? खाओ-पीयो, वाशरूम जाओ और बीच-बीच में बगुले की तरह मुंडी हिलाते रहो! होना वही है जो साहब ने पहले से सोच रखा है।”- अवधेश ने झल्लाते हुए कहा। फिर उसने लंबी साँस खींची और पूछा- “बताओ कब पहुँचना है?”
आवाज आई- “शाम 4 बजे!”
“चल ठीक है! मिलते हैं! बाय!!” कहकर अवधेश ने फोन काट दिया।
वह तय समय पर ऑफिस पहुँच गया।सब के मन में एक ही सवाल उमड़-घुमड़ रहा था कि मीटिंग किस बात की है ?
इतने में साहब एक महिला व युवक के साथ  मीटिंग रूम में प्रवेश करते हैं।अवधेश की नजरें महिला से जा मिलती है और वह मुस्कुरा देती है,अवधेश भी मुस्कुरा देता है।साहब वापस अपने केबिन में बंद हो जाते हैं।
महिला सभी लोगों को सरसरी निगाह से देखती है और ‘गुड इवनिंग’ के साथ अपनी बात शुरू करती हुई कहती है-“मैं ‘जय अम्बे’ कंपनी की कुछ प्रोडक्ट लेकर आई हूँ; यह थोड़ा महँगा है पर अच्छा है।”
उसने युवक को इशारा किया। युवक ने हैंडवॉश से लेकर एयर प्यूरीफायर तक की तमाम चीजें पूरी डेस्क पर सजा दी। किसी ने फेसवाश का ट्यूब उठाया तो किसी ने मेकअप किट।
हेमंत अश्वगंधा के फायदे पढ़ने लगा तो शुभम परफ्यूम को अपनी कलाई पर छिड़क-छिड़ककर सूँघने लगा।अवधेश महिला को टुकुर-टुकुर निहारता रहा।
अंजलि ने लिपस्टिक को अपने होठों पर लगाते हुए पूछा- “मैम! इसकी कीमत क्या है?” महिला ने अंजलि की ओर देखते हुए कहा- “मात्र 800 रु. का सेट है; एक बार लगाओ 24 घंटे तक के लिए निश्चिंत हो जाओ।मैं भी यही लगाती हूँ।”
अंजलि मायूस होकर बोली-“मैडम हमें पता नहीं था,इसलिए पैसे लेकर नहीं आई। महिला ने मुस्कुराते हुए कहा- “कोई बात नहीं! मैं तो बस डेमो देने आई थी,यदि आपलोगों को सामान लेना हो तो अवधेश जी के साथ आ जाइएगा,ये तो मुझे जानते ही हैं!” सभी अवधेश की तरफ देखने लगे।लोगों के मन में उठ रहे सवालों को भाँपते हुए अवधेश ने कहा- “अरे !मैंने बताया था न कि मैं राजकीयकृत मध्य विद्यालय,बेगमगंज में को-टीचिंग प्रैक्टिस के लिए जाता हूँ! मैडम वहाँ की प्रिंसिपल हैं।”यह  सुनकर सारे लोग सन्न रह गए। चुप्पी को तोड़ते हुए शुभम ने महिला से पूछा-“मैम!आप से कितने बजे तक मुलाकात हो सकती है?
महिला ने अवधेश की ओर देखते हुए जवाब दिया-“लंच-ब्रेक से पहले आप कभी भी स्कूल आ जाइए!”
सभी लोगों ने एक साथ कहा- “जी जरूर…मिलते हैं।”
अवधेश का चेहरा खुशी से चमकने लगा क्योंकि उसे अब जाकर ज्ञात हुआ कि मैडम स्कूल से लंच के बाद क्यों गायब हो जाती है….!!

                                      2.हेलमेट
अमरेंद्र  घर पहुंचकर हेलमेट उतारकर रख ही रहा  था कि उसकी आठ साल की बेटी जिया सीढ़ियों को लाँघते हुए नीचे आई और बोली- “पापा!मम्मी के सर में बहुत तेज दर्द है,खाना भी नहीं बना पाई।जल्दी मेडिकल चलिए।”अमरेंद्र ने बाइक स्टार्ट की और बेटी को पीछे बैठने का इशारा किया।थोड़ी ही देर में दोनों मेडिकल शॉप के पास पहुंच गए।जिया बाइक से उतरकर दुकान की तरफ बढ़ने लगी और अमरेंद्र बाइक को स्टैंड में लगाने लगा।
इतने में ट्रैफिक पुलिसमैन पीछा करते हुए आ धमके। उन्होनें अमरेंद्र की तरफ स्टिक उठाते हुए कहा-क्यों रे!पुलिस को देखकर भागता है…रुकने का इशारा किया तो रुका क्यों नहीं?अमरेंद्र ने कहा-सॉरी सर!पत्नी के सर में तेज दर्द है इसलिए जल्दबाजी में ध्यान नहीं गया।
पुलिसमैन-“चल-चल ठीक है!गाड़ी के पेपर और लाइसेंस दिखा!” अमरेंद्र ने गाड़ी की डिक्की से पेपर और लाइसेंस निकालकर उन्हें थमा दिया। दोनों ने पेपर पर सरसरी निगाह दौड़ाई और कहा-“तेरा हेलमेट कहाँ है?” अमरेंद्र ने कहा- सर जल्दबाजी में भूल गया। अभी तुरंत उतारकर रखा ही था…उसकी बात पूरी भी नहीं हुई कि पुलिसवाले ने कहा चुपकर बहानेबाजी नहीं चलेगी चालान कटेगा।
तब तक जिया दवाई लेकर गाड़ी के पास पहुँच गई।उसने अमरेंद्र का हाथ पकड़ते हुए पूछा-क्या हुआ पापा? अमरेंद्र- कुछ नहीं बेटा!वो हेलमेट नहीं पहना है न, इसलिए पुलिस अंकल फाइन भरवा रहे हैं। इतना कहकर अमरेंद्र पर्स से पैसे निकालने लगा।
दोनों पुलिस वाले को गौर से देखने के बाद जिया बोली-अंकल एक बात पूछूँ! हाँ-हाँ बेटा बोलो दोनों पुलिसमैन ने कहा। जिया-“अंकल आप दोनों के हेलमेट कहाँ हैं,यदि एक्सीडेंट होगी तो आपके सर में भी चोट लगेगी न?”
जिया के इस सवाल ने उनके चेहरे के रंग उड़ा दिए।दोनों सिवाय फीकी हँसी के कुछ न कह सके।

                                             3.संस्कार
सोनू को संस्कारी बनाने के उद्देश्य से उनके माता-पिता अक्सर उसे मंदिर ले जाया करते।मंदिर की परिक्रमा करना, आचार्य जी का पाद-प्रक्षालन करना, उनके चरणों के धूल को माथे से लगाना आदि क्रियाकलाप करना नन्हा सोनू भी सीख गया था।
आज उसका 7वाँ जन्मदिवस था।मंदिर से पूजा-पाठ कर माँ के साथ ऑटो में बैठकर घर की ओर निकल पड़ा।ऑटो से उतरकर माँ ऑटो ड्राइवर को पैसे गिनकर देने लगी। इतने में सोनू सड़क की दूसरी तरफ तेजी से दौड़ पड़ा।
माँ भी उसके पीछे दौड़ पड़ी और उसे पकड़ लिया।गुस्से में आकर उन्होंने सोनू को एक चमाट जड़ दी और पूछा- “कहाँ भाग रहे थे,धक्का लग जाता तो…चल तुझे घर पर बताती हूँ।”
सोनू ने अपने आँसू पोछते हुए कहा- “वो आचार्यजी जा रहे हैं न, मैं उनसे आशीर्वाद लेने जा रहा था।”
माँ ने उस ओर देखा और अपने माथे पर हाथ रखते हुए कहा-हे भगवान! वो आचार्य जी नहीं हैं…वो तो पागल है पागल!!चल घर चल!
मासूम सोनू आचार्य जी और पागल में कोई भेद तय नहीं कर पा रहा था क्योंकि आचार्यजी की तरह पागल के तन पर भी कोई वस्त्र नहीं था।

                                       4.द्वारिकाधीश
“देख यार! सरकारी नौकरी का चक्कर छोड़, इतना पढ़ा-लिखा है तू; कोई कोचिंग क्यों नहीं खोल लेता”- किशन ने सुदेश को समझाते हुए कहा।
सुदेश चुपचाप उसकी बातें सुनता रहा।फिर उसने चुप्पी तोड़ी  और कहा-दोस्त!बस आखिरी बार मदद कर दे; फिर मैं तुझे दुबारा तकलीफ नहीं दूँगा।प्लीज बस एक बार और!”
“ठीक है!बता कितने रुपए चाहिए” किशन ने घड़ी की तरफ देखते हुए पूछा। “बस पाँच हजार यार” सुदेश ने कहा।
“देख भाई! मैं कब तक तुम्हारी मदद करता रहूँगा। मेरे पास द्वारिकाधीश की तरह सोने का खजाना नहीं, सैलरी वाला आदमी हूँ; कोई ऊपरी कमाई भी नहीं है मेरी। डिग्री का गुरुर छोड़ और कोई ढंग का काम पकड़ ले। तुझे न कहने में भी तकलीफ होती है यार।मैं शाम को तुमसे मिलता हूँ”- कहते हुए उसने स्कूटी का सेल्फ दबाया और ऑफिस की तरफ निकल पड़ा।
सुदेश अपने द्वारिकाधीश को तब तक देखता रहा जब तक वह उसकी आँखों से ओझल न हो गया।

                                        5.द्रोण
मास्टर साहब का पूरे गाँव में नाम था।शायद ही कोई ऐसा होगा जिसके शादी-ब्याह में वे शामिल नहीं हुए होंगे। लड़कियाँ आठवीं में जाती नहीं  कि मास्टर साहब की परेशानी दुगुनी हो जाती। माँ-बाप से ज्यादा इनके माथे पर चिंता की लकीरें दिखाई पड़ने लगती। लड़के दसवीं पास कर  किसी काम-धंधे में लग जाए काफी था। लोग गुणगान करते अघाते नहीं। गाँव में उनके नाम पर एक प्राइवेट स्कूल भी खोला गया है जिसमें मास्टर साहब का बड़ा लड़का प्रिंसिपल है। मँझला हेल्थ इंस्पेक्टर है तथा छोटका बेटा इंजीनियरिंग कर रहा है। बेटी का ब्याह धन-धान्य से सम्पन्न परिवार में हुआ। दामाद इंडियन नेवी में कार्यरत है।
परसो ही तो उन्होंने अपने 76 वें जन्मदिवस पर मोमबत्ती फूँककर बुझाई थी।आज सबेरे उनके जीवन का दीया बुझ गया। उनके आकस्मिक निधन पर सारा गाँव इकट्ठा था, गला फाड़कर रोने वाली महिलाएँ एक ही राग अलाप रही थीं- “गुरुजी हमर बेटी के बियाह केना होतै, छौंरा सब के केय समझैतै।”
उन लोगों के बीच  बिट्टू छाती पिटती महिलाओं को आँखें लाल किए घूरे जा रहा था। वह अपने गुस्से को किसी तरह काबू में करने की कोशिश कर रहा रहा था। बिट्टू गुरुजी की नजर में गाँव का सबसे उदंड व मुँहफट लड़का था क्योंकि वह  गुरुजी के कोचिंग के बजाय गाँव से 5 किलोमीटर दूर दूसरे कोचिंग में पढ़ने जाता था। उसने 10वीं के बाद शहर जाकर ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई पूरी की। आज वह गुरुजी को यह बताने आया था कि उसकी रेलवे में पायलट की नौकरी पक्की हो गई है।उसने मास्टर साहब के कथन को झूठा साबित कर दिया है। वह एकलव्य नहीं है जो अंगूठा काटकर थमा दे,वह चुनौतियों को स्वीकार कर आगे बढ़ने में विश्वास रखता है।
उसे इस बात का ज़रा सा भी दुःख नहीं है कि मास्टर साहब नहीं रहे,उसे पीड़ा इस बात की है कि गाँववाले आज भी उसे आवारा समझते हैं और लोग ऐसे द्रोणाचार्यों को आज भी नहीं पहचान पा रहे हैं।