राजीव कुमार की पांच लघुकथाएँ

0
210

हिन्दी साहित्य के छात्र रहे राजीव कुमार फिलवक्त अजीम प्रेमजी फाउंडेशन में एसोसिएट रिसोर्स पर्सन के पद पर कार्यरत हैं। महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय वर्धा से हिन्दी साहित्य में एम.ए. की शिक्षा प्राप्त करते वक्त लघुकथा लेखन शुरू किया था। बीतते वक्त के साथ लघुकथा लेखन में इनका मन रमते चला गया। प्रस्तुत है आप सभी सुधी पाठकों के बीच बिहार के बेगुसराय के रहनिहार राजीव कुमार की लघुकथा पढ़े शोभा बिसेन की विशेष समीक्षात्मक टिप्पणी के साथ।  – संपादक

                                         वर्तमान राजनीति के यथार्थ का चित्रण

वर्तमान राजनीति के यथार्थ को बेहतर तरीके से ‘स्वच्छ भारत’ लघु कथा में चित्रित किया गया है l आज के समय में राजनीति सेवा धर्म न होकर खुद को विकसित करने का जरिया बन गया हैl जो दिखता है वो बिकता है आज के राजनीति का यही मुख्य स्वर हो गया है l तमाम तरह के विकास के दावे के बावजूद आधुनिक समाज अभी भी जातिगत बंधनों से मुक्त नहीं हो पाया है l भारतीय समाज में मनुष्य की जातिगत पहचान की श्रेष्ठता अभी भी बनी हुई है l तमाम ज्ञानार्जन के बावजूद भारतीय समाज  में जाति की कटु सच्चाई को ‘टाइटल’ लघु कथा में दर्शाया गया है l व्यवस्थागत भ्रष्टाचार हमारी सामाजिक एवं आर्थिक स्थितियों को और कमजोर करता है l भ्रष्टाचार योग्यता को निष्क्रिय कर अर्थ को प्रधान भूमिका में ले आता है अर्थ की इस प्रधानता के कारण बहुत सारे योग्य व्यक्ति अपनी योग्यता का सही तरीके से इस्तेमाल नहीं कर पाते हैं l ‘कानूनन अपराध’ लघु कथा इसी यथार्थ को अभिव्यक्त करती है l भारतीय न्याय व्यवस्था का एक अभिन्न अंग पुलिस भी है लेकिन पुलिस के राजनीतिक इस्तेमाल ने इसके मूल उद्देश्य को भटका दिया l जिस पुलिस को सिर्फ और सिर्फ न्याय के लिए काम करना होता है वह राजनीतिक इस्तेमाल के कारण कई बार न्याय से विमुख हो जाती है l ‘कृपया समस्या बताएं’ लघु कथा  में पुलिस के इसी चरित्र को चित्रित किया है l सच्चाई उसके लिए केवल एक शब्द है जबकि पहचान उसके लिए पारिश्रमिक सरीखा लगता है l भारतीय न्याय व्यवस्था में न्यायाधीश ईश्वर के समान माना जाता है किन्तु भारतीय न्याय व्यवस्था के भीतर मनुष्य रूपी ईश्वर (न्यायाधीश) ऊपर के अज्ञात ईश्वर से कम राजनैतिक लोगो के द्वारा ईश्वर के जिस आक्रामक छबि का इस्तेमाल किया जाता है उससे ज्यादा डर जाता है इसलिए कई बार न्याय देने में वह ईश्वर के राजनीतिकरण का शिकार हो जाता है l ‘ वश में है भगवान’ लघु कथा भारतीय न्याय व्यवस्था के खोखलेपन को उभारती हैl…… .डॉ. शोभा बिसेन, सहायक प्राध्यापक (अस्थाई), हिंदी विभाग, गुरु घासीदास विश्वविद्यालय, बिलासपुर l 

                                       1. स्वच्छ भारत

मंत्री दीनानाथ; जिनकी कृपा से जनता दिन-ब-दिन दीन होती  रही, जनता उन्हीं की जय-जयकार में लगी रहती थी।मंत्रीजी खानदानी थे।दादाजी के गुजरने के बाद पिताजी और पिताजी के बाद दीनानाथ जी। स्वभाव से मिलनसार और हँसमुख थे। उनकी रँगी हुई दांते इस बात की गवाह थी कि उसने अनगिनत बनारसी पान पर जुल्म ढाए हैं।जाड़े में कंबल – लकड़ियाँ , गर्मी में पीने के लिए पानी और बरसात में छाता बँटवाना मंत्रीजी कभी नहीं भूलते थे। जनता इसी को विकास समझती थी और आज भी समझ रही है।

      दिल्ली में बनी योजनाओं को मंत्रीजी मिशन की तरह लेते थे।उधर घोषणा हुई नहीं कि इधर कार्य को साकार रूप देने में भीड़ जाते।यह अलग बात है कि उन योजनाओं से मंत्रीजी के संबंधियों का ही ज्यादा कल्याण होता था।एक ऐसी ही योजना की घोषणा हुई जिसका स्लोगन था- स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत।दीनानाथ जी के अनुयायी लगे मंच सजाने, भीड़ जुटाने।तय समय से एक घंटा पहले ही मंत्री जी मंच पर जा डटे।जनता जयजयकार करने लगी कि अब देश बदलेगा।मंच संचालक ने भूमिका बांधते हुए  मंत्रीजी को मंच पर आने का विनम्र निवेदन किया। मंत्रीजी अधचबे पान को थूकदान में थूककर , माइक की तरफ लपक पड़े। उन्होंने माइक को  होठों के करीब लाते हुए हुँकार भरी- “भाइयों- बहनों! हम तभी सुरक्षित रहेंगे… जब हमारा वातावरण स्वच्छ रहेगा… और वातावरण तब स्वच्छ होगा… जब हमारे हाथों में झाड़ू होंगे। तालियों की गड़गड़ाहट से मंत्रीजी का आत्मबल सातवें आसमान तक जा पहुँचा उन्होंने जेब से पर्ची निकाली और फिर दुगुनी शक्ति से आवाज लगाई- “हमने अबकी ठाना है, स्वच्छ देश बनाना है।” अनुयायियों का जत्था चौगुनी शक्ति से  स्लोगन को दोहराने लगे। तभी कान के करीब आकर पी.ए ने फुसफुसाकर कहा- सर! हाई कमान ने अविलंब आपको ऑफिस में उपस्थित होने के लिए कहा है। उन्होंने ‘जय हिंद, जय जनार्दन’  कहकर  अपनी बात समाप्त की और कार की तरफ दौड़ पड़े। पी.ए ने कार में  बैैैठते ही  पान का एक बीड़ा आगे बढ़ाया।उन्होंने इत्मिनान से पान को बाएँ गलफड़े के नीचे दबाया और अगले भाषण की तैयारी में जुट गए।तभी मोबाइल की घंटी बजने लगी।पी.ए ने फोन रिसीव कर मंत्रीजी को थमा दिया। उन्होंने पूछा- कौन है? पी.ए-  जी हाई कमान हैं।मंत्रीजी ने दरवाजे का शीशा खोला और सारी पीड़की सड़क पर उड़ेल, बतियाने में जुट गए। सड़क की काली सूरत पर  पान की पीड़की  चंदन सी चमचमाने लगी।यह वही सड़क थी जिसपर चंद मिनट पहले मंत्रीजी हाथों में झाड़ू लिए तस्वीरें खिंचवा रहे थे।

                                           2. टाइटल

गौरव, संजीव, अंकित और प्रणव सभी दोस्त अभय के बर्थडे पर एकत्र हुए थे। लोग डीजे की धुन पर थिरक रहे थे । अभय अपने दोस्तों के साथ हंसी-ठिठोली में मग्न था। तभी माँ ने आवाज दी- अरे अभय बेटा! आओ खाना तैयार है; अपने दोस्तों को भी बुला लो। डाइनिंग टेबल विभिन्न स्वादिष्ट पकवानों और मिठाइयों से सजी थी। देखते ही सब के मुँह में पानी आ गया। हाथ-मुँह धोने के बाद  सभी सलीके से बैठकर अंकल का इंतजार करने लगे।

 उधर अंकल सभी लोगों को विदा कर चैन की सांस लेते हुए अंदर आए और कहा- सॉरी बच्चों! मेहमानों को विदा करने में देर हो गई । प्रणव ने कहा – कोई बात नहीं अंकल। हम लोग हॉस्टल में रात 9:00 बजे के बाद ही खाना खाते हैं ।अंकल ने कहा- चलो अब हम लोग भी खाना शुरू करते हैं। सभी अपनी- अपनी पसंदीदा व्यंजनों पर टूट पड़े। तभी अंकल की नजर अंकित पर पड़ी ।उन्होंने पूछा -अरे बेटा! मैंने तुम्हें पहले कभी  अभय के साथ नहीं देखा! क्या नाम है ?

 जी! अंकित आनंद-उसने कचौड़ी उठाते हुए कहा। अंकल ने कहा- वाह! बहुत बढ़िया नाम है।

उसने मुस्कुराते हुए कहा- थैंक्यू अंकल! मैंने पिछले महीने ही एडमिशन लिया है।

 गौरव तपाक से बोल पड़ा- अंकल! अंकित मैथ का जादूगर है, पलक झपकते ही गणित का सवाल सॉल्व कर देता है।

अंकल ने कहा- अरे वाह!यह तो और भी अच्छी बात है।मैं तो हमेशा कहता  हूँ- पढ़ने-लिखने वालों से ही दोस्ती करनी चाहिए। लो बेटा अंकित जमकर खाओ।अपना ही घर समझो।

अंकित-जी अंकल।

अच्छा अंकित बेटा तुम्हारा घर कहाँ है?

 अंकित- जी बेगूसराय ! अंकल ने चेहरे पर मुस्कान लाते हुए कहा- अरे!तुम तो हमारे पड़ोसी निकले! हाँ अंकल- अभय ने बताया था- अंकित ने अभय की ओर देखते हुए कहा।

सभी दोस्तों ने लज़ीज़ भोजन के लिए आंटी को थैंक्यू कहा फिर अंकल और आंटी के पैर छूकर लौटने लगे।

तभी अंकल ने पीछे से आवाज़ दी – अरे अंकित!  पापा का नाम तो  बताए ही नहीं! अंकित ने कहा- अंकल! मेरे पापा का नाम- रामानंद पासवान है । ‘पासवान’ शब्द सुनते ही उनके चेहरे के रंग फीके पड़ गए । वे अभय को लाल-लाल आँखों से घूरने लगे।

तभी सभी दोस्तों ने एक सुर में कहा- गुड नाइट अंकल एंड गुड नाईट  अभय !

अंकल बिना प्रत्युत्तर दिए घर के अंदर  चले गए।

                                            3. कानूनन अपराध है

बैंक की लंबी कतार में खुद को पिछले 10 मिनट से एक ही स्थान पर खड़े पाकर राकेश मन-ही-मन कछुए  की गति से काम कर रहे कर्मचारी पर बुदबुदा रहा था।सहसा उसकी नज़र मैनेजर के ऑफिस के बाहर कुर्सी पर बैठे सुधीर पर पड़ी।

राकेश पैसा जमा कर सुधीर के पास वाली कुर्सी पर बैठते हुए पूछा- यार! लोन का क्या हुआ?

सुधीर ने कहा- दस दिन से बैंक का चक्कर काट रहा हूँ। ढंग से कुछ बताते ही नहीं।एडमिशन का समय निकलता जा रहा है।

राकेश ने कहा -ठीक है!घबराओ नहीं; मैं खुद मैनेजर से बात करता हूँ।

ऑफिस की घंटी बजी।चपरासी ने राकेश को भीतर जाने का इशारा किया। दोनों मित्र अंदर गए।एक स्वर में अभिवादन किया और फ़ाइल मैनेजर के आगे सरका दी।

मैनेजर ने फ़ाइल के पन्नों को पलटते हुए घंटी बजाई।चपरासी पुनः भीतर आया। फ़ाइल चपरासी को थमाते हुए कहा-‘जाओ! इन्हें अजीत जी से मिलवा दो।’ दोनों मित्र ने एक बार फिर मैनेजर साहब का धन्यवाद किया।

अजीत जी कान में इयरफोन लगाए, मोबाइल स्क्रीन पर नज़र गड़ाए, भोजपुरी संगीत का आनंद ले रहे थे।तभी चपरासी ने कहा- अजित बाबू!सर भेजे हैं..जरा समझा दीजिए इनको।

अजीत बाबू ने दोनों को ऊपर से नीचे की ओर देखा और बाथरूम की तरफ़ आने का इशारा करते हुए आगे बढ़ गए।

गुटखा बेसिन में थूकने के बाद अजीत बाबू ने  कहा- राकेश जी!आप तो जानते ही हैं; मैनेजर कैसा आदमी है! कुछ खर्च करना पड़ेगा।नहीं तो ऐसे ही दौड़ाता रहेगा।

राकेश ने सुधीर की तरफ देखा और कहा – कितना देना होगा?

अब आपसे क्या छुपाना राकेश जी..एजुकेशन लोन है;  20 से कम में नहीं मानेगा- अजीत बाबू ने कहा।

‘ए महराज! गरीब आदमी है, कुछ कम कीजिए, कुछ बन गया तो नाम लेगा’ – राकेश ने मक्खन लगाते हुए कहा।

ठीक है!  जब आप आ ही गए हैं तो 15 में ओके कीजिए। इससे कम नहीं होगा’  इतना कहकर अजीत बाबू मोबाइल का नोटिफिकेशन देखने लगे।

दोनों मित्र ने आँखों- ही आँखों में बातें की, फिर राकेश ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा-ठीक है अजीत बाबू! कल शाम  मिलते हैं, चाय की दुकान पर।

सुधीर 15000 के बारे में सोचने लगा, तभी राकेश ने कहा-अरे यार! टेंशन मत ले, मैं हूँ न…चल ठंडा पीते हैं।

दोनों मित्र बाहर निकलने लगे कि अचानक उनकी नजरें एक बोर्ड पर पड़ी जिस पर लिखा था- “रिश्वत लेना और देना दोनों ही कानूनन अपराध है।” दोनों  ने एक दूसरे को देखा और  ठहाका मारकर हँसने लगे।

                                     4.कृपया समस्या बताएँ

अभी कॉलेज से आए हुए महज 10 दिन ही हुए थे कि स्थानीय पुलिस स्टेशन  से गोपाल को हाजिर होने की सूचना मिली।घरवालों के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगी।माँ फूट-फूट कर रोने लगी।पिता ने समझा-बुझाकर उन्हें शांत किया।गोपाल ने अपने पड़ोसी के द्वारा अवैध रूप से मुहल्ले में जेनरेटर रूम की स्थापना को लेकर डीएम से शिकायत की थी।

वह नियत समय पर थाना पहुँच गया।थाना परिसर में पड़ी मोटरसाइकिलों की कतारें, घुन लगी कुर्सियाँ, पान-गुटखों से रंगी दीवारें, स्वच्छ भारत अभियान को ठेंगा दिखा रही थी।थानाध्यक्ष अब तक नहीं पहुँचे थे।तभी करीब छः फुट लंबा, कड़क मूँछे, सफेद कुर्ता-पैजामा व घुटने तक लहराता गमछा डाले; एक आदमी और उसके कुछ पिछलग्गू शोर-शराबे के साथ शिकायत केंद्र के भीतर जा घुसे।पता चला कि दीपावली की रात कुछ लोग ताश खेल रहे थे जिसे पुलिस ने पकड़कर बंद कर दिया है।उस आदमी ने फोन मिलाया और इंस्पेक्टर को थमा दिया।इंस्पेक्टर- यस सर…ओके सर…ओके…अभी छोड़ देता हूँ।जेल में बंद सभी लोगों को छोड़ दिया गया।लोग जिंदाबाद-जिंदाबाद के नारे लगाते बाहर चले गए।गोपाल उस भले-मानस के रूतबे को देखकर अचंभित हो गया।उसने दीवार घड़ी की तरफ नजऱ दौड़ाई…उसे आए हुए आधा घंटा हो चुका है; थानाध्यक्ष अब तक नहीं पहुँचे ।समय काटने के लिए उसने फिर इधर-उधर अपनी नजरें दौड़ानी शुरू की।सहसा उसकी नज़र एक दीवार पर जाकर ठिठक गई; जिसपर लाल रंग से मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा था – “कृपया नाम, जाति, ओहदा, पैरवी न बताएँ, सिर्फ अपनी समस्याएँ बताएँ”!

गोपाल पढ़कर मंद-मंद मुस्कुराने लगा।

                                          5. वश में है भगवान

गौतम ने जब से होश संभाला है, उन्हें कोर्ट के चक्कर काटता देख रहा है।उन्हें देखकर ऐसा लगता है मानो  धैर्य की मूरत हों।धैर्य भी इतना धैर्य नहीं रखता होगा जितना उन्होंने धारण कर रखा था।

वर्षों बाद उनके चेहरे पर मुस्कुराहट दिख रही थी क्योंकि आज सब्र का फल मीठा होने वाला था। संतरी से लेकर मंत्री तक सभी उनके साथ थे।समर्थकों के उत्साह ने उनकी 36 इंच की छाती को फुलाकर 56 इंच कर दिया था।अभी नहीं तो कभी नहीं वाली स्थिति थी।बस उनके इस भरोसे पर न्यायपालिका की मोहर लगनी बाकी थी।पटाखे, मिठाइयाँ व लाउडस्पीकर सबका इंतज़ाम हो चुका था। इंतजार था फैसले का।

जज साहब ने समय पर पहुँचकर कार्यवाही आरंभ करने की अनुमति दी।घंटों बहस हुई।जज साहब ने दोनों पक्षों की दलीलों को गौर से सुना और कहा:- “कोर्ट इस मुद्दे पर निर्णय अगले माह लेगी क्योंकि यह संवेदनशील मुद्दा है, जल्दबाजी अप्रिय घटना का कारण बन सकती है।”

इस वाक्य ने उनके ऊपर वज्र की तरह प्रहार किया।मायूस होकर चले जा रहे थे।तभी गौतम की नजर उनपर पड़ी।उसने अपनी स्कूटी रोकी और पूछा:- “प्रभु! क्या हुआ?”

उन्होंने कहा- “अगले माह!”  गौतम को समझते देर न लगी।वही हुआ जिसका उसे अंदेशा था। भक्तों ने अपनी कुर्सी बचाए रखने के लिए ‘प्रभु’ को आज फिर अनिश्चित काल के लिए ‘कोर्टवास’ दे दिया था।

गौतम को उस गाने का अर्थ आज ज्ञात हो गया जिसे उसके पिताजी सबेरे-सबेरे अपनी मोबाइल पर बजाया करते हैं- “भगत के वश में है भगवान….”

Leave a Reply

Be the First to Comment!

  Subscribe  
Notify of