उत्तर प्रदेश के देवरिया की अनुराधा पांडेय महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय वर्धा हिन्दी अनुवाद प्रद्यौगिकी विषय से स्नातकोत्तर की पढ़ाई की है। हिन्दी अनुवाद से संबंधित विषय से एम. फिल. के बाद पीएच-डी. कर रही है। एम. फिल. और पीएच-डी. की पढ़ाई इनके लिए सिर्फ डिग्री या उपाधि भर नहीं है, बल्कि कई मायने में अपने पापा के बिखरे सपनों को समेटना भी है। दरअसल इनके पिता पीएच-डी. करना चाहते थे। आर्थिक कारणों से इनके पिता को एम.एस.सी. एग्रीकल्चर की पढ़ाई छोड़ खेती किसानी का कार्य संभालना पड़ा था। खेती-किसानी के कार्य से ही अपनी बेटी को उच्च शिक्षा की तालीम दिलवा कर अपने ख्वाब को पुरा करने में जुटे हैं। किसान पिता की पुत्री अनुराधा की रचनाएं ऑनलाइन पत्रिका ट्रांसफ्रेम, उत्तर वार्ता और देहरी पत्रिका में प्रकाशित हो चुकी है। यहां प्रस्तुत है अनुराधा पांडेय का शोध आलेख – ‘‘हिन्दी कविता और नाटक विधा के विकास में अनुवाद की भूमिका।’’ . . . संपादक

              हिन्दी कविता एवं नाटक विधा के विकास में अनुवाद की भूमिका
                                   अनुराधा पांडेय

भूमिका- ‘हिंदी’ शब्द से हिंदी क्षेत्र की सभी उपभाषाओं अर्थात हिंदी प्रदेश की सभी बोलियों का भी अर्थ सम्मिलित हो जाता है और इन बोलियों के अंतर्गत हिंदी के विभिन्न बोली प्रदेश भी आते हैं। जैसे- “पश्चिमी हिंदी वर्ग (खड़ी बोली, बांगरु, ब्रजभाषा, कन्नौजी तथा बुन्देली) पूर्वी हिंदी वर्ग (अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी), बिहारी वर्ग (भोजपुरी, मैथिली तथा मगही) राजस्थानी वर्ग (मारवाड़ी, जयपुरी, मेवाती तथा मालवी) तथा पहाड़ी वर्ग (पश्चिमी पहाड़ी, मध्य पहाड़ी तथा पूर्वी पहाड़ी) की सभी उप-भाषाएं आ जाती हैं।”[1] इन बोलियों के साहित्य में बहुत से महान समाज-सुधारक हुए हैं और इनका लोक साहित्य भी बहुत समृद्ध रहा है। किसी भी भाषा के विकास में तत्कालीन समाज, संस्कृति व राजनीति का महत्वपूर्ण योगदान होता है और ये परिस्थितियां उसके निर्माण में सकारात्मक व नकारात्मक दोनों रूपों में उपस्थित रहती हैं। हिंदी भाषा को पूरे संयुक्त प्रांत की भाषा व राजभाषा का रूप देने के लिए इस प्रदेश में भी सामाजिक, राजनीतिक व बौद्धिक सभी स्तरों की लड़ाईयां लड़ी गई। जिसके कारण समाज में कई वर्गों का निर्माण हुआ। समाज में कई वर्ग भी बन गए। और इन परिस्थितियों से होते-गुजरते हिंदी की खड़ी बोली को भाषा का रूप मिलता है।

हिंदी कविता और अनुवाद- साहित्य लेखन में काव्य लेखन की परंपरा सबसे प्राचीन रही है। विभिन्न भाषा के विद्वानों का मानना है कि अगर कहा जाए तो मानव अपने विकास की प्रारंभिक अवस्था में जब बोलना शुरू किया तो वह भी काव्य का ही रूप था। काव्य को मानव की सबसे गहरी संवेदनाओं को प्रकट करने का माध्यम माना जाता है और काव्य प्रिय व्यक्ति को सुकुमार हृदय वाला भी कहा जाता है। भारत में सर्वप्रथमतः साहित्य लेखन संस्कृत भाषा में ही होती थी और इसे संपूर्ण भारत देश की भाषा माना जाता था। इस प्रकार हिंदी में भी विधा के रूप में सबसे पहले काव्य लेखन ही शुरू होता है। काव्य लेखन की यह शुरुआत संस्कृत साहित्य की रचनाओं के अनुवाद से शुरू होती है। संस्कृत साहित्य से अनुवाद परंपरा विशेष रूप से लक्षण ग्रंथों के अनुवाद से शुरू होती है। इससे पूर्व हिंदी में दूसरी किसी विधा का कोई अस्तित्व नहीं था, साहित्य के क्षेत्र में प्रथमतः कविता का ही विकास होता है। नाटक विधा का विकास कविता के पश्चात होता है।

खड़ी बोली हिंदी में काव्य विधा की शुरुआत को लेकर हिंदी साहित्य का वृहत इतिहास(भाग- आठ) में लिखा है कि- “किसी काव्य ग्रंथ का अनुवाद करना अत्यंत कठिन कार्य है। तब भी आलोच्य काल में कई भारतीय और पाश्चात्य काव्य रचनाओं का ब्रजभाषा अथवा खड़ी बोली में अनुवाद किया गया। भारतीय काव्य रचनाओं के अनुवाद नवोत्थान की भावना के फलस्वरूप प्राचीन संस्कृति और साहित्य की ओर ध्यान जाने के करण हुए थे। तत्कालीन कवियों ने संस्कृत ग्रंथों रामायण, महाभारत आदि का या तो अनुवाद किया या उसका भावाशय लेकर अपनी स्वतंत्र रचना प्रस्तुत की।”[2] रामायण, महाभारत और गीता आदि से कथानकों और श्लोकों आदि को उठाकर उनकी पुनर्व्यख्या हिंदी में करने के पश्चात उसे लेखक अपनी मौलिक कृति करार देता था और इससे अनुवाद की महत्ता अंधेरे में धकेल दी जाती थी। बावजूद इसके अनुवाद माध्यम से हिंदी में कविता की शुरुआत होती है।

खड़ी बोली हिंदी में काव्य विधा की शुरुआत रूप में संस्कृत से अनुवाद किए गए इसके अतिरिक्त अंग्रेजी भाषा की कृतियों के भी अनुवाद किए गए। सबसे ज्यादे अनुवाद तो संस्कृत से ही हुए। शुरुआत में जिन लेखकों ने अनुवाद किए उनकी सूची देते हुए हिंदी साहित्य का बृहद इतिहास में लिखा गया है। इन अनुवादकों में संस्कृत की कृतियों का हिंदी में अनुवाद करने वालों में सर्वप्रथम शुरुआत राजा लक्ष्मण सिंह (1826-1896) ने की। इन्होंने रघुवंश(1878), मेघदूत(1886), कुमारसंभव(1884) आदि की रचना की। इनके बाद तोताराम वर्मा (1847-1902) ने बाल्मीकी कृत रामायण का राम-रामायण नाम से, बालकांड (1888), अयोध्या कांड (1898) आदि के अनुवाद किए। इन्होंने जो भी अनुवाद किए वे बहुत ही बेहतरीन अनुवाद हैं। इनके पश्चात आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी (1864-1938) जो द्विवेदी युग सन् (1900-1920) के नायक हैं, इन्होंने भी संस्कृत से हिंदी में काव्यानुवाद किए। इन्होंने जयदेव कृत बिहार वाटिका (1860) कालिदास कृत ऋतुतरंगिणी (1891) और पंडितराज जगन्नाथ कृत गंगा लहरी (1891) आदि के अनुवाद किए और इनके बाद ठाकुर जगमोहन सिंह (1857-1899) ने कालिदास की रचना ऋतुसंहार (1886) का अनुवाद किया। इन सभी लेखकों ने हिंदी मिश्रित अवधी और ब्रज में अपनी रचनाओं की रचना की।

राजा लक्ष्मण सिंह ने रघुवंश का अनुवाद खड़ी बोली गद्य में किया है। इसके अतिरिक्त हरिऔध ने 1865 ई॰ में कुसुमदेव की संस्कृत रचना दृष्टांतकलिका का हिंदी में अनुवाद किया।”[3] इस प्रकार हिंदी में शुरू में जो भी अनुवाद हुए वे अवधी और ब्रज मिश्रित हिंदी में अधिकतर हुए। इसका करण हिंदी की अपनी निजी समस्या थी। अनुवाद के समय तक हिंदी भाषा का वही रूप था जो अनुवादकों ने अपने साहित्य में प्रयोग किया है। इस समय हिंदी अपना समेकित रूप से आकार नहीं ग्रहण कर पाई थी बल्कि  रूप ग्रहण की प्रक्रिया में थी। जैसे-जैसे हिंदी का रूप सुधरता गया वैसे-वैसे ही साहित्य में इसका असर भी दिखता है। इस प्रकार हिंदी साहित्य में पद्य विधा की शुरुआत संस्कृत कृतियों के अनुवाद से शुरू होती है। इसके अतिरिक्त अनुवाद के अलावे जो भी मौलिक रचनाएं की जाती थी वे सभी पौराणिक कथानकों, ऐतिहासिक कथानकों और मिथकों आदि पर आधारित कथानक बनाकर ही रचनाएं की जाती थीं। संस्कृत के अलावे पाश्चात्य लेखकों की कृतियों का भी काव्यनुवाद खूब किया गया।

काव्यानुवाद में पाश्चात्य लेखकों जैसे- मिल्टन, जॉनसन, ग्रे, पोप, गोल्डस्मिथ, टॉमसन, कूपर, वोर्ड्सवर्थ आदि की काव्य कृतियों के बहुत ही बेहतरीन अनुवाद हिंदी में किए गए। पाश्चात्य साहित्य के प्रभाव से हिंदी साहित्य में शोक गीत लिखने की परंपरा शुरू हुई। यह शुरुआत ग्रे की कविता एलेजी रिटेन इन ए कंट्री चर्चयार्ड से होती है। इससे पूर्व हिंदी साहित्य में शोकगीत लिखने का प्रचलन नहीं था। यह परंपरा भी अनुवाद के माध्यम से हिंदी में विकसित होती है। “हिंदी साहित्य में पहला शोकगीत ग्रे की एजेली की प्रणाली पर हिंदी में भी शोकपूर्ण कविताएं लिखी जाने लगी।”[4] इस रूप में हिंदी में शोक गीत लेखन की शुरुआत इसी कविता का अनुवाद से होती है।

द्विवेदी युग के दौरान संस्कृत की रचनाओं से भी काव्यानुवाद हिंदी में किए गए। जिनमें महावीरप्रसाद द्विवेदी ने संस्कृत की रचना कुमारसंभव का हिंदी में काव्यानुवाद किया। इनके पश्चात् राय देवीप्रसाद ‘पूर्ण’ ने संस्कृत साहित्य के कवि कालिदास की रचना मेघदूत का हिंदी में काव्यानुवाद सन् 1902 में धाराधरधावन नाम से किया। मैथिलीशरण गुप्त ने भी हिंदी में काव्यानुवाद किया। इनकी अनूदित कृतियों में प्लासी का युद्ध, मेघनाद-वध और वृत-संहार प्रसिद्ध हैं। द्विवेदी युग के दौरान बंगला भाषा के साहित्य से भी हिंदी में काव्यानुवाद पर्याप्त मात्रा में किए गए।

खड़ी बोली हिंदी में कविता की शुरुआत पद्यानुवाद के माध्यम से होती है जिसमें संस्कृत और अंग्रेजी साहित्य की रचनाओं का सर्वाधिक अनुवाद किया जाता है। यद्यपि किसी भी पद्यात्मक कृति का पूर्णतः पद्य रूप में मूल की विशेषताओं के साथ-साथ अनुवाद किया जाना बहुत मुश्किल है। यही कारण है की इस दौर के बाद काव्यानुवाद की परंपरा धीरे-धीरे कम होने लगती है। भारतेन्दु युग के दौर में काव्यानुवाद के क्षेत्र में बहुत सारी कविताओं के अनुवाद हुए। इन अनुवादों का हिंदी भाषा के विकास के साथ-साथ सामाजिक और राजनीतिक कारण भी थे।

हिंदी नाटक और अनुवाद- खड़ी बोली हिंदी में नाटक विधा की शुरुआत भी अनुवाद के माध्यम से होतीहै। काव्यरचना की शुरुआत के पश्चात नाटक विधा की शुरुआत होती है। नाट्यरचना की परंपरा भी भारतीय साहित्य के इतिहास में बहुत पुरानी रही है। आज कई विषम परिस्थितियों के बाद अपना मूल रूप ग्रहण कर चुका है। हिंदी भाषा में नाटक विधा की शुरुआत में संस्कृत साहित्य का सबसे महत्वपूर्ण स्थान रहा है। इसके पश्चात “उन्नीसवीं शताब्दी में अंग्रेजी राज्य की स्थापना के बाद नवजागरण काल में भारतीय जीवन और साहित्य में युगांतर उपस्थित हुआ और भारतेन्दु हरिश्चंद्र (1850-1885) की प्रेरणा के फलस्वरूप हिंदी में नाट्यप्रणयन का सूत्रपात हुआ। उनके नाटक सन् 1883 ई. में नामक प्रबंध से यह स्पष्ट हो जाता है कि उन्होंने न केवल प्राचीन भारतीय नाट्य पद्धति तक अपने को सीमित रखा और न पाश्चात्य पद्धति का अंधानुकरण किया।”[5] इस प्रकार हिंदी साहित्य के इतिहास में नाटक विधा के विकास का सबसे बड़ा प्रणयन भारतेन्दु हरिश्चंद्र द्वारा किया जाता है। इन्होंने नाट्य लेखन की परंपरा को बढ़ावा दिया और अपने नाटकों की रचना तत्कालीन समय की सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों से जुड़े कथानकों को लेते हुए किया। हिंदी में नाटक विधा के विकास के साथ-साथ नाट्य-रूपों और शास्त्र सम्मत नाट्य में निहित गुणों पर चर्चा भी की और संस्कृत साहित्य और पाश्चात्य साहित्य के नाटक नियमों के समन्वय बनाते हुए हिंदी में नाटक लिखें। यही कारण है कि हिंदी के नाटकों में शुरुआती दौर में संस्कृत साहित्य व पाश्चात्य साहित्य के साथ पारसी थियेटर के नाटकों की विशेषताओं का खूब प्रभाव पड़ा। इन्हीं नाट्य विशेषताओं के आसंग में हिंदी नाट्य विधा की नींव पड़ी।

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने हिंदी का पहला नाटक भारतेन्दु द्वारा रचित विद्यांसुंदर को माना है। इस नाटक में जिस प्रकार भी भाषा का प्रयोग किया गया है उसी रूप में भाषा प्रयोग हिंदी काव्य लेखन में भी रहा है। इस प्रकार अगर खड़ी बोली हिंदी में विधा के विकास रूप में देखा जाए तो काव्य लेखन ही सर्व प्रथम शुरू होता है। खड़ी बोली हिंदी में विधा विकास को लेकर आचार्य रामचंद्र शुक्ल लिखते हैं कि- “आधुनिक गद्य साहित्य की परंपरा का प्रवर्तन नाटकों से हुआ।”[6] अर्थात खड़ी बोली हिंदी में नाटक विधा की शुरुआत सबसे पहले होती है। यद्यपि काव्य लेखन की परंपरा हिंदी में नाटक विधा के शुरुआत से पूर्व ही शुरू होती है। हिंदी का पहला नाटक किसे माना जाए इस विषय को भी लेकर हिंदी साहित्य के इतिहास में बड़ी बहस है और अलग-अलग इतिहास लेखकों के अलग-अलग मत हैं।

हिंदी साहित्य के इतिहास लेखक बच्चन सिंह लिखते हैं कि- “खड़ी बोली में जो पहला नाटक लिखा गया वह राजा लक्ष्मण सिंह का शकुंतला (1863ई.) है।”[7] इस रूप में हिंदी का पहला नाटक किसे स्वीकार किया जाए यह बहुत बड़ा विषय है। स्वयं भारतेन्दु ने हिंदी का पहला नाटक अपने पिता द्वारा रचित नहुष को माना है, जबकि इस नाटक की भाषा हिंदी न होकर ब्रज है। डॉ॰ नगेन्द्र ने हिंदी का पहला नाटक भारतेन्दु द्वारा रचित विद्यासुंदर को ही स्वीकार किया है। इस रूप में हिंदी का पहला नाटक प्रसिद्ध हिंदी साहित्य के इतिहास लेखकों की दृष्टि से विद्यासुंदर ही है। भारतेन्दु से पहले कुछ नाटक और भी लिखे गए थे, जिनमें भाषा के स्तर पर कमियां हैं या फिर नाटकत्व की कमी। इस रूप में जो भी नाटक लिखे गए वे अस्वीकृत कर दिए गए। इस नाटक लेखन की परंपरा में सबसे विशेष बात यह कि चाहे जिस किसी नाटक को हिंदी का पहला नाटक स्वीकार किया जाए, सभी नाटक अनुवाद के माध्यम से ही तैयार किए गए थे। चाहे वे संस्कृत से अनुवाद रहे या फिर बंगला और अंग्रेजी से। हिंदी में नाटक विधा की शुरुआत भी अनुवाद के माध्यम से ही होती है।

प्राणचंद चौहान द्वारा सन् 1610 में रचित रामायण महानाटक, लक्षिराम कृत सन् 1657 में करुणाभरण, नेवाज़ कृत शकुंतला (1680), महाराज विश्वनाथ कृत आनंद रघुनंदन (1700), रघुराय नागर कृत सभासार (1700), उदयराम कृत रामकरुणाकर और हनुमान नाटक (1840) आदि महत्त्वपूर्ण अनूदित कृतियाँ हैं। इनके अतिरिक्त भारतेन्दु के पिता गोपालचंद्र गिरिधरदास कृत नहुष (1857), गणेश कवि कृत प्रद्युम्न विजय (1863), शीतलाप्रसाद त्रिपाठी कृत जानकी मंगल (1868) आदि नाटक भारतेन्दु से पूर्व लिखे गए नाटक है। इनमें नाटकीयता की विशेषताओं की कमी के साथ-साथ हिंदी भाषा का स्पष्ट व शुद्ध विकास नहीं मिलता है। इसी कारण ये नाटक हिंदी के नाटकों में विशेष स्थान न पा सकें।

भाषा के स्तर से देखा जाए तो राजा लक्ष्मण सिंह द्वारा रचित नाटक शकुंतला की भाषा बहुत ही साफ-सुथरी व शुद्ध हिंदी है। लेकिन इस नाटक को भारतेन्दु ने नाटकीय तत्वों की कमी कारक कर खारिज कर दिए। अब नाटक रूप में विद्यासुंदर को हिंदी का पहला नाटक माना जाता है। यह नाटक भाषा के स्तर से और नाटकोचित गुणों से संपन्न माना जाता हैं। यह नाटक संस्कृत नाटक विद्यासुंदर का हिंदी अनुवाद है। इसे बंगला से भी अनूदित माना जाता है। इस नाटक को लेकर सिसिर कुमार दास लिखते हैं कि- “इस नाटक का अनुवाद भारतेन्दु ने विद्यासुंदर नाम से सन् 1868 में किया। इस नाटक का यतीन्द्रमोहन टैगोर ने ठीक इसी नाम से बंगाली कवि भारतचंद्र राय द्वारा अठारहवीं शताब्दी में लिखित नाटक का अनुवाद किया था। फिर बाद में सन् 1871 में पाखंडविडंबन नाम से भारतेन्दु द्वारा अनुवाद किया गया। यह नाटक संस्कृत के गीतिनाट्य प्रबोधचंद्रोदय के तीसरे खंड के कथानक से संबंधित है।”[8] इस नाटक के बाद हिंदी में अनूदित नाटकों की परंपरा बनी रही, लेकिन अनूदित नाटकों को मौलिक नाटकों की अपेक्षा कम महत्व दिया जाता है।

भारतेन्दु ने हिंदी साहित्य की समृद्धि के लिए कुल सत्रह नाटकों की रचना की जिनमें अनूदित नाटकों की संख्या सबसे अधिक है। विद्यासुंदर नाटक के बाद भारतेन्दु ने अगला नाटक सत्य हरिश्चंद्र लिखा। इस नाटक को अनूदित नाटक न मानकर उनकी मौलिक रचना माना जाता है। इस नाटक की कथा पौराणिक आख्यान तथा चंद्रकौशिक के आधार पर लिया गया है। पौराणिक आख्यान को नाटक रूप में आख्यायित करने के उपरांत इसको अनुवाद में व्याख्यानुवाद की श्रेणी में रखा जाएगा। इस नाटक के बारे में विजयेन्द्र स्नातक लिखते हैं कि- “उनका प्रसिद्ध मौलिक नाटक सत्य हरिश्चंद्र (1875) पौराणिक आख्यान तथा चंदकौशिक के आधार पर लिखा गया नाटक है।”[9]

भारतेन्दु द्वारा अनूदित संपूर्ण नाटकों को बताते हुए आचार्य रामचन्द्र शुक्ल लिखते हैं कि विद्यासुंदर, मुद्राराक्षस, पाखंडविडंबन, धनंजयविजय, कर्पूरमंजरी, मुद्राराक्षस, सत्यहरिश्चंद्र और भारतजननी आदि इनकी अनूदित नाट्य कृतियां हैं। सत्यहरिश्चंद्र नाटक और भारतजननी नाटक के बारे में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल लिखते हैं कि- “सत्यहरिश्चंद्र मौलिक समझा जाता है, पर हमने एक पुराना बंगला नाटक देखा है जिसका वह अनुवाद कहा जा सकता है। कहते हैं कि ‘भारतवासी उनके एक मित्र का किया हुआ बंग भाषा में लिखित ‘भारतमाता’ का अनुवाद था जिसे उन्होंने सुधारते-सुधारते सारा फिर से लिख डाला।”[10] भारतेन्दु ने बहुत सारे नाटकों का हिंदी में अनुवाद किया जिसमें संस्कृत साहित्य से कई सारे नाटकों के अनुवाद हुए इसके अलावे बंगला और अंग्रेजी से भी नाटकों के अनुवाद इन्हों ने किए हैं।

भारतेन्दु के बाद लाला श्रीनिवास दास (1851-1897) ने रणधीर प्रेममोहिनी 1877 ई॰ का अनुवाद किया जो शेक्सपियर द्वारा लिखित नाटक रोमियो-जूलियट का हिंदी अनुवाद है। इस नाटक को हिंदी का पहला दुखांत नाटक माना जाता है। इससे पूर्व हिंदी में दुखांत नाटकों के लेखन की कोई परंपरा नहीं थी।

इनके बाद लाला सीताराम बी॰ ए॰ उपनाम ‘भूपकवि’ (1859-1937 ई) ने भवभूति कृत महावीरचरित (1897) उत्तररामचरित (1897 ई), मालतीमाधव (1897ई), कालिदास कृत मालविकाग्निमित्र (1898ई), मृच्छकटिक (1899ई), और शूद्रक कृत- नागानंद (1900ई) महत्वपूर्ण हैं।”[11] इन सभी नाटकों का अनुवाद हिंदी में नाटक विधा की समृद्धि से तत्कालीन साहित्य व समाज में नवजागरण की भावना से प्रेरित होकर किया गया। देवदत्त तिवारी ने उत्तररामचरित का हिंदी में अनुवाद सन् 1871ई॰ में किया। नंदलालविश्वनाथ ने भी उत्तररामचरित (1886ई), और शकुंतला (1888ई) नाटक का हिंदी में अनुवाद किया। बालकृष्ण भट्ट ने माइकेल मधुसूदन दत्त के पद्मावती और शर्मिष्ठा नामक दो बंगला नाटकों का हिंदी में अनुवाद किये। ज्वालाप्रसाद मिश्र ने वेणीसंहार नामक संस्कृत के नाटक का हिंदी में अनुवाद सन् (1897ई) में किया। कृष्णबलदेव वर्मा ने भर्तृहरि राजत्याग का हिंदी में अनुवाद सन् (1879) में किया और शीतलाप्रसाद ने प्रबोधचंद्रोदय नाटक का हिंदी में अनुवाद सन् (1879ई) में ही किया। इस रूप में लेखकों ने संस्कृत से महत्वपूर्ण नाटकों के अनुवाद हिंदी में किए।

संस्कृत से भी कई सारे नाटकों का हिंदी में अनुवाद हुआ जिनमें रायबहादुर लाला सीताराम बी॰ ए॰ का नाम सबसे प्रसिद्ध है। इन्हों ने बड़ी संख्या में अनुवाद किए और साथ ही साथ बहुत बेहतरीन भाषा शैली का प्रयोग करते हुए अनुवाद किए। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल इनके अनुवादक रूप के बारे में लिखते हैं कि- “भारतेन्दु की मृत्यु से दो वर्ष पहले ही उन्हों ने संस्कृत काव्यों के अनुवाद में लग्गा लगाया और संवत् 1940 में मेघदूत का अनुवाद घनाक्षरी शब्दों में प्रकाशित किया। इसके उपरांत वे बराबर किसी न किसी काव्य नाटक का अनुवाद करते रहे। संवत् 1944 में उनका नागानन्द का अनुवाद निकला। फिर तो धीरे-धीरे उन्हों ने मृच्छकटिक, महावीरचरित, उत्तररामचरित, मालतीमाधव, मालविकाग्निमित्र का भी अनुवाद कर डाला।”[12] संस्कृत के अनेक पुराण ग्रंथों के अनुवादक रामचरित मानस बिहारी सतसई के टीकाकार, सनातन धर्म के प्रसिद्ध व्याख्याता मुरादाबाद के पंडित ज्वालप्रसाद मिश्र ने वेणीसंहार और अभिज्ञानशाकुंतलम का हिंदी में अनुवाद किया। हरिश्चंद्र ने रत्नावली नाटिका का हिंदी में अनुवाद किया, लेकिन कुछ अंश का ही यह अनुवाद पूरा न हो सका। बालमुकुंद गुप्त ने यह नाटिका पूरी की। इसके बाद संवत् 1970 में पंडित सत्यनारायण कविरत्न ने भवभूति के उत्तररामचरित का और मालतीमाधव का हिंदी में अनुवाद किया। हिंदी में नाटक विधा के विकास के लिए बहुत सारे नाटकों के अनुवाद किए गए। जिनके माध्यम से हिंदी में नाटकों के विकास के साथ-साथ हिंदी का भी विकास हुआ और उनके मंचन से हिंदी भाषा का प्रचार-प्रसार भी। इस समय में जो भी नाटक मौलिक रूप में लिखे गए या फिर अनूदित रूप में ही अनुवाद होकर साहित्य में सामने इन नाटकों का सामाजिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक महत्व रहा।

द्विवेदी युग में भी संस्कृत, बंगला और अंग्रेजी के नाटकों के अनुवाद होते हैं। जिनमें संस्कृत के नाटकों में राधाचरण गोस्वामी ने सुदामा चरित, बनवारीलाल ने कंसवध और कृष्णकथा का हिन्दी में अनुवाद किया, रामनारायण मिश्र ने जनक बाड़ा, गंगा प्रसाद ने रामाभिषेक, रामगुलाम लाल ने धनुषयज्ञ लीला का, गंगाप्रसाद गुप्त ने वीजयमल आदि नाटकों का हिंदी में अनुवाद हुआ। इन नाटकों का कथानक विशेष रूप से संस्कृत साहित्य की मिथकीय काथाओं पर और पौराणिक आख्यानों से लेकर ऐतिहासिक कथानकों पर आधारित हैं। इनके अतिरिक्त संस्कृत की रचना नागानंद का हिंदी में अनुवाद श्री सदानंद अवस्थी ने सन् 1906 में किया। लाला सीताराम ने मृच्छकटिक का सन् 1913 में हिंदी अनुवाद किया। कविरत्न सत्यनारायण ने संस्कृत रचना उत्तररामचरित का हिंदी में अनुवाद किया। मैथिलीशरण गुप्त ने भी संस्कृत से हिंदी में अनुवाद किए जिनमें भास् के नाटक प्रतिमा, अभिषेक और अभिभारकम बहुत प्रसिद्ध अनुवाद हैं।

निष्कर्ष- उपरोक्त विश्लेषण को ध्यान में रखते हुए हिन्दी भाषा में कविता एवं नाटक विधा के विकास का क्रम देखें तो इन विधाओं के शुरुआती दौर में अनुवाद ने बहुत ही महत्त्वपूर्ण माध्यम के रूप में अपना योगदान दिया है। इस दौर में चूंकि हिन्दी भाषा खड़ी बोली हिन्दी से विकसित होकर भाषा रूप में स्वीकृत हुई थी। इसने के तरफ ब्रज भाषा के साथ संघर्ष किया था दूसरा संघर्ष लिपि एवं शैली के रूप में फारसी लिपि एवं उर्दू भाषा के साथ रहा। इन सभी स्थितियों से गुजरते हुए हिन्दी एक भाषा के रूप में स्थापित हुई। चूंकि हिन्दी के विकास का संदर्भ अपभ्रंश, अवहट्ट, पुरानी हिन्दी आदि से रहा है। यही कारण है कि इन भाषाओं के साहित्य को हिन्दी भाषा के आदि साहित्य के रूप में स्वीकार किया जाता है। आधुनिक युग में हिन्दी भाषा को साहित्य लेखन में स्पष्ट एवं स्वीकृत मार्ग मिला और इस समय तक सभी विधाओं में मौलिक लेखन की दिशा बहुत निर्धारित नहीं था। यही कारण है कि दूसरी भारतीय भाषाओं एवं अंग्रेजी भाषा के साहित्य का हिन्दी में अनुवाद किया गया। इन अनुवादों के माध्यम से विधाओं के विकास की दिशा निर्धारित की जाती है। हिन्दी भाषा की कविता एवं नाटक विधाओं के अतिरिक्त बाकी अन्य विधाओं के विकास में भी अनुवाद की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। इसलिए वर्तमान समय में अनुवाद को एक द्वितीयक स्तर का काम न मानते हुए एक महत्त्वपूर्ण विधा के रूप में स्वीकार करने की जरूरत है। इसके बृहत वितान को स्पष्ट करने हेतु इसमें नित नए-नए आयाम विकसित करने की आवश्यकता है।

संदर्भ सामग्री-

1 हिंदी, उर्दू और खड़ी बोली की ज़मीन, रविनंदन सिंह, पृष्ठ संख्या, 13
2 हिंदी साहित्य का वृहत इतिहास, खंड-8, पृष्ठ संख्या-312
3 हिंदी साहित्य का बृहत इतिहास, खंड-8, पृष्ठ संख्या- 313
4 हिंदी साहित्य का बृहत इतिहास- खंड-8, पृष्ठ संख्या- 314
5 हिंदी साहित्य का बृहत इतिहास, खंड-8, पृष्ठ संख्या- 314
6 हिंदी साहित्य का इतिहास, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, पृष्ठ संख्या- 306
7 हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, पृष्ठ संख्या- 298
8 His first play Vidyasundar 1868 is adaption of Bengali play by Yatindramohan Tagore based on the poem of the same title written by the eighteenth century Bengali Poet Bharatchandra Ray. This was followed by Pakhand Vidamban 1871, a Hindi Translation of the third act of the Sanskrit allegorical play Prabodh Chandroday. A History of Indian Literature- 1800-1910, page no. 191
9 हिंदी साहित्य के इतिहास, विजयेन्द्र स्नातक, पृष्ठ संख्या- 214
10 हिंदी साहित्य का इतिहास, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, पृष्ठ संख्या- 311
11 हिंदी साहित्य के बृहत इतिहास, खंड-8, पृष्ठ संख्या- 315
12 हिंदी साहित्य का इतिहास, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, पृष्ठ संख्या- 332