लेख /कुमार गौरव – बदलते परिवेश में टीवी न्यूज़ का चरित्र

0
679

कुमार गौरव, बिहार के मुज़फ्फरपुर जिला के मुशहरी प्रखंड के अंतर्गत बैकटपुर गाँव, दरधा हाट के रहने वाले हैं| दिल्ली विश्वविद्यालय, भारतीय जनसंचार संस्थान तथा जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय जैसे उच्च शिक्षण संस्थानों से शिक्षा-दीक्षा ग्रहण किया हैं| यूजीसी द्वारा इन्हें जूनियर तथा सीनियर फ़ेलोशिप भी प्राप्त है| बिहार के ग्रामीण परिवेश में पले- बढ़े गौरव ने सामाजिक-आर्थिक विषमता एवं ऊँच-नीच के भेदभाव को काफी करीब से देखा हैं| ग्रेजुएशन, पोस्ट ग्रेजुएशन और बीएड दिल्ली विश्वविद्यालय से करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की ओर कदम बढ़ाया और IIMC से रेडियो एवं टीवी पत्रकारिता में पोस्ट ग्रेजुएशन डिप्लोमा करने के बाद राष्ट्रीय चैनल ‘आज तक’ में बतौर प्रशिक्षु पत्रकार काम किया| इनका उद्देश्य चूँकि उच्च अध्ययन का था इसलिए मुख्यधारा की पत्रकारिता से दूरी बनाते हुए इन्होंने जेएनयू से ‘हिन्दी पत्रकारिता एवं सूचना समाज’ विषय पर एम.फिल. किया| फिलवक्त वे भारतीय भाषा केंद्र, जेएनयू से गाँधीवादी तथा राष्ट्रीय चेतना के कवि ‘रामनरेश त्रिपाठी के समग्र लेखन’ पर पीएच.डी. कर रहे हैं| प्रस्तुत है इनका शोधपूर्ण लेख “बदलते परिवेश में टीवी न्यूज़ का चरित्र |”    

                                      बदलते परिवेश में टीवी न्यूज़ का चरित्र  

                                                      कुमार गौरव

समस्त मीडिया माध्यमों में टीवी न्यूज़-चैनल का स्थान अग्रणीय है| जनमत के निर्माण में टीवी के दर्शक की भूमिका काफी महत्त्व रखती है| आज ख़बरों का हमला चारों तरफ से जारी है| दिन-रात (24*7) खबरें परोसने वाले हिन्दी न्यूज़ चैनल भारत के हिन्दीवासियों अथवा हिन्दी बोलने, समझने, पढ़ने और लिखने वालों के लिए कौन-सी भाषाई संस्कृति का आलंबन करते दिखते हैं? यह सवाल महत्त्वपूर्ण हैं| दूसरी तरफ हिन्दी टीवी पत्रकारिता में ‘भाषा का चमत्कार’ दिखलाई पड़ता है| जैसे-जैसे टीवी न्यूज़-चैनल की संख्या बढ़ी वैसे-वैसे टीवी में चमत्कार भी बढ़ा| इस संबंध में हरीश चन्द्र वर्णवाल लिखते हैं कि –“हर पत्रकार चमत्कार पैदा करने की कोशिश कर रहा है| चाहे वो भाषा के स्तर पर हो, एडिटिंग के स्तर पर, चाहे वो ग्राफ़िक्स के स्तर पर या फिर आवाज़ के स्तर पर हो ….वो चमत्कार, जो आपको न्यूज़ देखने के लिए मजबूर करता है| कई बारगी तसवीरें तो कई बारगी स्क्रिप्ट| चाहे वो पैकेज की स्क्रिप्ट हो, प्रोमो की या फिर टेलीविजन स्क्रीन पर दिखने वाले चंद शब्द भर|”1

            प्रायः हिंदी के न्यूज़ चैनलों की भाषा कथित तौर पर ‘हिन्दुस्तानी’ होती है| हाँ, यह जरुर है कि हिंदी के अलावा अंग्रेजी व अरबी-फ़ारसी के शब्द भी खूब प्रयोग किए जाते हैं| जैसे –टेंशन, एक्शन, रियलिटी, डबल, हिन्दुस्तान, उसूल, ख़त, फरमाइश, ज़िंदगी, रोशन, सुर्ख, वक़्त आदि| इसके अलावे न्यूज़ चैनलों की ख़बरों में मुहावरों का प्रयोग भी बहुतायत में होता है जैसे – अँधेरे में रखना, अक्ल का अँधा, उबल पड़ना, कीचड़ उछालना, आँखें चार होना, कान खड़े होना, चल बसना आदि| चूँकि टीवी में विजुअल, ग्राफ़िक, एनीमेशन, ऑडियो और वीडियो की प्रमुखता है, इसलिए स्क्रिप्ट राइटर किसी स्टोरी की स्क्रिप्ट जिस तरह लिखता है उसमें जरुरी है कि वह सुसंगत, दमदार, कम से कम शब्दों में ज्यादा से ज्यादा बातें कहने वाले उपयुक्त शब्दों का इस्तेमाल करे| परन्तु होता यह है “टेलीविजन अतिरेक में जीता है| ये इसकी सबसे बड़ी बुराई समझें या फिर विशेषता लेकिन इसे झुठला नहीं सकते| घटना को बढ़ा-चढ़ा कर दिखलाना एक बड़ी हकीकत बन चुकी है| चूँकि विजुअल के साथ बहुत ज्यादा छेड़छाड़ नहीं कर सकते, इसलिए भाषा में चमत्कार पैदा करने की ललक जुनून की हद तक पहुँच चुकी है|”2 चमत्कारिक शब्दों का जिस तरह धड़ल्ले से प्रयोग होता है वह हम ‘आज तक’ न्यूज़ चैनल पर प्रसारित होने वाले ‘विशेष’ कार्यक्रम के ‘विषय’ या ‘टाइटल’ में देख सकते हैं| कुछ इसी तरह का उदाहरण निम्नलिखित है3

  • आँखें बंद मत कीजिए, वरना ये ज़िंदगी में दोबारा नहीं देख पाएँगे|
  • आज टेलीविजन से दूर मत जाइएगा|
  • ये तस्वीरें आपको विचलित कर सकती हैं|
  • टीवी पर भगवान लाइव
  • देश की सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री है ये
  • दुनिया का सबसे घिनौना शख्स है ये
  • सिहर जाएँगे आप
  • कृपया कमजोर दिलवाले इसे न देखें
  • क़त्ल/मौत का लाइव वीडियो
  • हँसना मना है
  • सनसनीखेज़ दास्तान
  • न देखा, न सुना
  • सच बोलेगा कैमरा
  • मनोरंजन का बाप
  • महायुद्ध
  • क्रिकेट की महाजंग

           वस्तुतः ये शब्द और वाक्यों की शक्ति ही है, जो किसी भी तरह की ख़बरों पर रूकने को बाध्य करती है| लेकिन एक तरफ यह भी सच है कि ये शब्द अब गंभीर पत्रकारिता का हिस्सा नहीं रह गए हैं और बदलते वक़्त के साथ दर्शकों की रूचि परिमार्जित हो रही है| सवाल उठता है कि न्यूज़ चैनलों के लिए भाषा की संस्कृति के क्या मायने हैं? हिंदी विश्व की सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषाओं में कभी तीसरे स्थान पर बताई जाती है तो कभी नीचे खिसक जाती है? आखिर क्या कारण है कि कुछ विद्वान हिन्दी की बोलियों मसलन भोजपुरी, मगही, मैथिली, ब्रज, पहाड़ी, मारवाड़ी, अवधी आदि को हिंदी के अंतर्गत रखने से हिचकिचाते हैं और इस तरह अपनी ही बोलियों से महरूम हिंदी, सिर्फ खड़ी बोली हिन्दी के रूप में सिमटकर, संख्या में छोटी पड़ जाती है| हिन्दी, चीनी और अंग्रेजी के बाद तीसरे स्थान से फिसलकर और नीचे चली जाती है| इसके पीछे की राजनीति क्या है? क्या ऐसा मीडिया के कारण होता है?

           दरअसल, मीडिया हिंदी की बोलियों को प्रश्रय नहीं देता और राष्ट्रीय ख़बर के लिए उचित नहीं मानता| खासकर के हिन्दी न्यूज़ चैनलों की भाषा ठेठ खड़ी बोली हिंदी ही रहती है| क्षेत्रीय बोलियों में कोई भी राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल समाचार प्रसारित नहीं करता| हाँ, यह जरुर है कि दूरदर्शन के क्षेत्रीय चैनल, क्षेत्रीय भाषाओँ में समाचार देते हैं| सवाल यह है कि मीडिया के इससे कौन-से हित पूरे होते हैं? इन सवालों के जवाब ढूंढा जाना आवश्यक है|

            भारत एक बहु-सांस्कृतिक देश है| हरेक प्रदेश के अपने-अपने रंग-ढ़ंग हैं| भाषा-बोली, आचार-व्यवहार, वेश-भूषा, खान-पान, रहन-सहन, खेल, नृत्य, संगीत, साहित्य, चित्रकला, मूर्तिकला – ये सब एक समाज की सांस्कृतिक पहचान के घोतक हैं| भारतीय संस्कृति ‘अनेकता में एकता’ की पहचान को रेखांकित करती है| क्या न्यूज़-इंडस्ट्री और खासकर हिंदी न्यूज़ चैनल भारतीय सांस्कृतिक एकता का प्रतिनिधित्व करते हैं? क्या ग्रामीण-जन उनकी नज़रों में हैं? क्या एक सिरे से अल्पसंख्यक और हाशिए का समाज और उनकी सांस्कृतिक पहचान न्यूज़ चैनलों से गायब नहीं हैं? क्या ऐसा कोई न्यूज़ चैनल हिंदी टीवी चैनलों के बीच खड़ा है जो समेकित भारतीय संस्कृति को दिखाने और दर्शकों के सामने रखने के लिए प्रतिबद्ध हो? इन सवालों पर तथ्यात्मक ढ़ंग से विचार होना आवश्यक ही नहीं बल्कि प्रासंगिक भी है?

            हिन्दी भाषी प्रदेशों में मुख्य रूप से दस प्रदेश आते हैं| इन राज्यों की कुल जनसंख्या भारत की आधे से अधिक आबादी का प्रतिनिधित्व करती है| बिहार, झारखंड, उत्तर-प्रदेश, उत्तराखंड, मध्यप्रदेश, राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा, छत्तीसगढ़ और हिमाचल प्रदेश इनमें शामिल हैं| दिल्ली देश की राजधानी है और यही सबसे अधिक हिन्दी के बड़े न्यूज़ चैनल स्थापित हैं, जो राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल भी हैं| दिल्ली और एनसीआर की छोटी-से-छोटी घटना राष्ट्रीय ख़बर बन जाती है जबकि सुदूर बिहार-झारखण्ड की बड़ी घटनाएं भी मुख्य ख़बरों में नहीं आती| वहीं हिंदी-अंग्रेजी दोनों न्यूज़-चैनलों के संवादाताओं का दिल्ली के लुटियंस जोन में जमघट लगा रहता है| इसी का परिणाम है कि केन्द्र की राजनीति की ख़बरें मुख्य ख़बरों में तो रोज आती रहती है परन्तु तेलंगाना या मिजोरम की राजनीति की खबरें मुख्यधारा के मीडिया में गौण बनी रहती है| इसी तरह आर्थिक राजधानी कहे जाने वाले महानगर मुंबई में संवादाताओं की फौज खड़ी रहती है, जो वहाँ से खबरें भेजते हैं| इसी कारण लगभग हरेक न्यूज़-चैनलों में इन्हीं दो जगहों की ख़बरों का प्रसारण – प्राथमिकता में सबसे ऊपर रहता है| ऐसे में कई बार काफी महत्त्व की घटनाएँ और सूचनाएँ जो दूर-दराज के क्षेत्रों में होती हैं – वे देश के सामने नहीं आ पातीं| महानगरों एवं बड़े शहरों का विशेष रूप से केन्द्रित, न्यूज़-चैनलों की सामग्री के बारे में बताते हुए मुकेश कुमार लिखते हैं कि –“न्यूज़-चैनल महानगरों, बड़े और मझोले शहरों की ख़बरों को प्रमुखता से दिखाते हैं, जबकि ग्रामीण एवं कस्बाई इलाके में घटने वाली घटनाएँ उनके लिए विशेष महत्त्व नहीं रखतीं| इसकी मुख्य वजह यही है कि टैम द्वारा पीपल्स मीटर बड़े शहरों में ही लगाए गए हैं और जब वहाँ के दर्शक देखेंगे तभी टीआरपी में इजाफा होगा| बड़े शहरों का टैम-महत्त्व (टैम वेटेज) ज्यादा है और महानगर का तो और भी ज्यादा| महानगरों में भी दिल्ली और मुंबई का सबसे अधिक है| इंडस्ट्री के सूत्रों का तो कहना है इन दो महानगरों का टैम-वेटेज लगभग तीस फीसदी है, जिसका मतलब यह है कि न्यूज़-चैनलों की तीस फीसदी टीआरपी का फैसला यही से होता है| यही वजह है कि न्यूज़ चैनल इन दो महानगरों की ख़बरों को सबसे ज्यादा दिखाते हैं और छोटी-मोटी ख़बरों तक को राष्ट्रीय बना डालते हैं|”4

तालिका – खबरें यहाँ से आती हैं (स्रोत– सीएमएस मीडिया लैब) : 2008-2010 (प्रतिशत में)5 

समाचारों का उद्भव सन् 2008 सन् 2009 सन् 2010
दिल्ली 33.1 38.31 43.18
मुम्बई 17.5 15.39 16.70
चेन्नई 1.2 0.57 0.41
कोलकाता 1.0 0.56 1.09
अन्य राज्यों की राजधानियाँ 7.5 6.81 8.13
ग्रामीण क्षेत्र 0.2 0.45 0.80
अंतर्राष्ट्रीय 18.6 20.46 13.60
अन्य शहर कस्बे 20.9 17.45 16.08
अन्य 0.0 0.0 0.0
कुल 100 100 100

  उपरोक्त आंकड़ों में स्पष्ट दिखता है कि दिल्ली और मुम्बई की ख़बरों का प्रतिशत देश के सभी हिस्सों से आई ख़बरों के प्रतिशत के आधे से भी ज्यादा है| परन्तु ग्रामीण इलाके की ख़बरों में हिस्सेदारी 1 प्रतिशत से भी कम है| जाहिर है कि न्यूज़-चैनलों को जहाँ से टीआरपी नहीं मिलती वहाँ की ख़बरों को वे नहीं दिखाते| ऐसे में न्यूज़-चैनल का चरित्र ‘निखरकर’ सामने आता है| वह ग्रामीण-शहरी जगहों और गरीब-अमीर वर्गों की ख़बरों में भेद करता है| इससे यह भी स्पष्ट होता है कि हिन्दी की जिस जनता की खबरें न्यूज़-चैनल नहीं दिखाते; उनकी संस्कृति, उनकी भाषा, उनकी बोली को कैसे महत्त्व दे पाएँगे| हिंदी की बोलियों को वे क्यों और कैसे दिखाएँगे| ठेठ खड़ी बोली हिन्दी में वे तो समाचारों का प्रसारण करेंगे क्योंकि इसका दर्शक व श्रोता वर्ग सबसे अधिक है, लेकिन भोजपुरी, मगही, मारवाड़ी या अवधी जैसी बोलियों में वहाँ की ख़बरों को कम आर्थिक महत्त्व का विषय मानते हुए सिरे से ख़ारिज कर देंगे, क्योंकि इन बोलियों की जनता अपेक्षाकृत कम आय वर्ग में शामिल हैं और ‘दिल्ली से दूर’ हैं|

यह भी सच है कि आखिर न्यूज़ चैनलों की आमदनी का 90 फीसदी हिस्सा विज्ञापन ही दिलाता है| क्षेत्र विशेष के हिसाब से ‘विज्ञापन’ दिखाया जाता है| कामकाजी, दफ़्तर-कॉलेज जाने वाले लोगों के लिए मर्सीडीज, महँगी बाइक, स्मार्ट फोन, लैपटॉप, टेबलेट, मैकबुक, एसी, रेफ्रिजेरेटर, बड़ी स्क्रीन वाली एचडी टीवी आदि का विज्ञापन होता है तो वही कम आमदनी वाले क्षेत्रों के लोगों के लिए रेनोल्ड्स रिफिल, हीरो साइकिल, लक्स अंडरवियर बनियान, पाँच में फेयर लवली, दस में कोलगेट, पारले-जी बिस्कुट, हॉर्लिक्स, कछुआ छाप मोर्टीन, एक रुपये में क्लीनिक प्लस शैम्पू जैसे सस्ते और किफ़ायती प्रोडक्ट का विज्ञापन छाए रहते हैं| बाज़ार के माल को विज्ञापन लोक-लुभावन शैली में ढ़ालकर हर आयवर्ग के लिए प्रस्तुत कर देता है, लेकिन इसमें भी अपना व्यापारी-हित सबसे ऊपर रखता है| इस तरह इन विज्ञापनों का प्रसारण करके आर्थिक विषमता को बनाए रखने और मौन समर्थन देने का काम न्यूज़-चैनल करते हैं| चैनलों और विज्ञापनदाताओं का मुख्य उद्देश्य बाज़ार से पैसा कमाना है न कि ग्रामीण-गरीब, दूर-दराज के क्षेत्रों के लोगों की समस्याओं को प्राथमिक श्रेणी में रखना| इस तरह होता यह है कि दर्शक, न्यूज़ चैनलों के लिए दर्शक नहीं बल्कि उपभोग्ता बन जाते हैं और समाचार चैनल ‘सूचना व ज्ञान’ का माध्यम नहीं बल्कि ‘बाज़ार’ के ‘अंग’ बन जाते हैं| फलतः समाचार चैनल विज्ञापन के घोड़े पर सवार हो बाज़ार में ‘रेस’ लगाते हैं|

मीडिया भी समाज और समय के साथ परिवर्तनशील है इसलिए “पिछले एक दशक में भारतीय पत्रकारिता का पहिया तेज़ी से घूमा है| दूसरा एक सुखद पक्ष यह भी है कि भारतीय मीडिया के सामने प्रतियोगिता और आत्म-विशलेषण का माहौल भी बना है| अब जबकि दर्शक के हाथों का रिमोट उसे दुनियाभर के चैनलों की सैर करवा सकता है, मीडिया के लिए बाज़ार की अपनी संकुचित समझ से बाहर आना अनिर्वाय हो गया है| …भारत दुनिया के उन गिने-चुने देशों में से एक बन गया है जहाँ टीवी न्यूज़ चैनल मुनाफ़ा कमाते हैं|”7 आम जन-जीवन के मसलों मसलन कृषि, सिंचाई, परिवहन, लूट, अपहरण, घरेलू हिंसा, किसान-बेरोजगार की आत्महत्या जैसी खबरें जो ग्रामीण, देहाती, पहाड़ी और दूर-दराज के क्षेत्रों में प्रमुख होती हैं – ऐसी खबरें राष्ट्रीय मीडिया में या मुख्यधारा की मीडिया में जगह नहीं बना पाती| दरअसल सम्पूर्ण भारत का प्रतिनिधित्व कोई चैनल नहीं करता, इस स्थिति की तरफ इशारा करते हुए वर्तिका नन्दा लिखती हैं कि न्यूज़ चैनलों में “ग्रामीण भारत तकरीबन गायब है| पिछले कई साल में ग्रामीण भारत की रिपोर्टिंग का हिस्सा 3 प्रतिशत के आंकड़ों को पार नहीं कर पाया है…इसके लिए टीआरपी एक बड़ी वजह माना जाता है|”8   

हिंसा, बलात्कार, मनोरंजन और राजनीति से संबंधित जो भी खबरें दिल्ली अथवा प्रदेशों की राजधानी से आती हैं उनका प्रसारण प्रायः हरेक चैनल करता है – उन पर बात करना प्रायः हरेक चैनल का धर्म बन जाता है| ऐसे में शहरी मध्यवर्गीय पृष्ठभूमि के ठेठ हिंदी अथवा अंग्रेजी बोलने वाली जमात की खबरें तो हैडलाइन की सुर्खियाँ बनती हैं परन्तु इनसे इतर (क्षेत्रीय-ग्रामीण अथवा हिंदी/अंग्रेजी भाषा-भाषी) की खबरें राष्ट्रीय चैनलों में प्रायः गौण हो जाती हैं| सीधा-सा मतलब निकलकर सामने आता है कि टीवी न्यूज़ में स्थान विशेष, वर्ग विशेष और भाषा विशेष का पूरा ध्यान रखा जाता है, क्योंकि ये विज्ञापन दिलाने और टीआरपी बटोरने में मदद करते हैं| बाज़ार का गणित न्यूज़ चैनलों पर हावी रहता है और कम क्रय शक्ति वाले लोगों व समाज की कोई भूमिका ‘देश-निर्माण’ में न्यूज़ चैनलों को यदा-कदा के अपवादों को छोड़कर नज़र नहीं आती|

भारत एक कृषि प्रधान देश है और आज भी आबादी का 60प्रतिशत हिस्सा खेती-बारी, मजदूरी-किसानी में लगा हुआ है| गाँवों का देश भारत बदल रहा है| गाँवों से शहरों की ओर लोगों का पलायन हो रहा है| भारत और इंडिया के बीच खाई बढ़ रही है| मजदूरों-किसानों की समस्याएँ, उनके हित, संघर्ष एवं दमन को न्यूज़ चैनल कवर करने से बचते हैं| पिछले दिनों (21 अप्रैल, 2015) यह जरुर हुआ कि मोदी सरकार ने दूरदर्शन के एक नए चैनल ‘किसान चैनल’ का शुभारंभ किया| लेकिन दूसरी तरफ हकीक़त यही है कि “अगर कोई आंदोलन बड़ा रूप लेने लगता है तो वे कंपनियों के प्रबंधन और स्वामियों के साथ खड़े हो जाते हैं, उनकी वकालत करने लगते हैं जैसा कि हरियाणा के मानेसर स्थित मारुति कार की फैक्ट्री में मजदूरों द्वारा चलाए गए आंदोलन के दौरान उसने दिखाया|”9  मारुति के उन मजदूरों पर पुलिस का लाठीचार्ज टीआरपी के लिए न्यूज़ चैनलों के लिए बढ़िया ‘आइटम’ था परन्तु उस ‘आइटम’ को दर्शकों को परोसने से दूरी न्यूज़ चैनलों ने इसलिए बनाई क्योंकि ‘मारुति’ उनके लिए एक बड़ी विज्ञापनदाता कंपनी थी| मुकेश कुमार लिखते हैं कि “यहाँ ये नहीं भूलना चाहिए कि बाज़ार का मकसद टीआरपी बढ़ाना नहीं, बल्कि अपने अनुकूल मीडिया-वातावरण निर्मित करना है, इसलिए वह मौका पड़ने पर चैनलों को रोक भी सकता है और विज्ञापन देने की शक्ति का इस तरह सेंसरशिप इस्तेमाल के लिए करता है|”10

 टेलीविजन न्यूज़ चैनल के प्राइम-टाइम पर चलने वाले कार्यकर्मों का वर्गीकरण करके सीएमएस मीडिया लैब ने इस तरह दिखाया –

टेलीविजन न्यूज़ के ट्रेंड -2009-2011 (आँकड़े  प्रतिशत में)11

विषय सन् 2009 सन् 2010 सन् 2011
राजनीति 20.36 12.47 17.68
खेल 16.03 17.93 16.09
अपराध 4.86 5.74 5.16
मनोरंजन 10.13 12.74 9.72
खेती-किसानी 0.18 0.19 0.09
शिक्षा 0.85 0.51 0.60
स्वास्थ्य 1.87 1.19 1.00
पर्यावरण 1.53 1.29 0.84

नोट : आंकड़े छह राष्ट्रीय न्यूज़ चैनलों के प्राइम टाइम (शाम 7 बजे से रात 11 बजे तक) कवरेज पर आधारित हैं| ये छह चैनल आज तक, सीएनएन-आईबीएन, डीडी न्यूज़, एनदीटीवी 24*7, स्टार न्यूज़ और ज़ी न्यूज़ हैं|

इस तरह चुनावी साल, टीवी चैनलों के लिए अत्यधिक मुनाफा कमाने का साल होता है| चुनावी साल में न्यूज़-चैनलों को चुनाव लड़ने वाली पार्टियों की तरफ से खूब सारा विज्ञापन मिलता है इसलिए उनके राजस्व में बढ़ोतरी का चुनावी साल खूब फायदे लेकर आता है| ऐसे ही क्रिकेट अब बारहमासी हो गया है और इसमें दर्शक, टीआरपी, विज्ञापन, ग्लैमर, रोमांच, क्रिकेट खिलाडियों के जीवन से संबंधित गॉसिप भरे पड़े हैं इसलिए क्रिकेट से संबंधित ख़बरों का प्रसारण भी खूब होता है| सिनेमा और मनोरंजन के अन्य साधन जैसे रियल्टी शो वैगरह भी न्यूज़ का हिस्सा अब बनने लगे हैं| इनकी ख़बरें भी खूब प्रसारित होती हैं परन्तु खेती-किसानी के कार्यक्रम गायब रहते हैं| ‘खेत और किसान’ के न्यूज़ चैनल से गायब होना, खेती-किसानी की खराब हालात का अंदाज बयाँ करता है| वैसे भी देश की कुल जीडीपी में खेती का योगदान मात्र 3 प्रतिशत के करीब है| मगर यहाँ उनके संबंध में कार्यक्रम के प्रसारण की हालत और भी नाजुक है क्योंकि वे आधे प्रतिशत के आसपास भी नहीं हैं| ‘शिक्षा’ पर खबरें जहाँ आधी फीसदी के आसपास है वहीं स्वास्थ्य और पर्यावरण की खबरें एक-डेढ़ फीसदी पर अटकी पड़ी है| यानि      ‘शिक्षा’ और ‘स्वास्थ्य’ संबंधी ख़बरों का भी टीवी न्यूज़ में कोई हिस्सा नहीं है| जाहिर है कि खेती-किसानी, शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण जो बहुजन का हिस्सा हैं, जीवन हैं – वो न्यूज़-चैनलों के दायरे से बाहर हैं|

कहा भी गया है कि नेता, अभिनेता और क्रिकेटर सबसे अधिक लोकप्रिय होते हैं और इनके ‘धंधे’ मसलन राजनीति, खेल और मनोरंजन में खूब पैसे, शोहरत, ग्लैमर मौजूद है| निःसंदेह ‘अपराध’ की ख़बरों में दिलचस्पी दर्शकों व पाठकों में बहुत हद तक होती है और सबसे पहले वे अखबार के पन्नों में ‘हत्या’, ‘बलात्कार’, ‘लूट’ आदि नकारात्मक खबरें पढ़ते हैं बाद में अन्य खबरें| इसी तरह टीवी पर ‘सनसनी’, ‘वारदात’, ‘क्राइम रिपोर्टिंग’ को लोग देखना अधिक पसंद करते हैं| इस तरह बदलते समय और समाज के साथ टीवी न्यूज़ चैनलों की भूमिका भी काफी परिवर्तित हुई है| ‘मिशन’ का चोला उतारकर पत्रकारिता अब ‘प्रोफेशन’ और ‘कमीशन’ का ‘धंधा’ बन चूका है| बाज़ार के हाथों में जाकर बाज़ार के हितों को साधना ही इसका ध्येय बन चुका है|

 ‘आज तक’ हिंदी न्यूज़ चैनल पर प्राइम-टाइम में प्रसारित होने वाले कार्यक्रम ‘विशेष’ के अध्ययन से प्राप्त आंकड़ों से स्पष्ट है कि ‘विशेष’ के अंतर्गत थ्री-सी (3 C) का फार्मूला यानि क्रिकेट, क्राइम और सिनेमा को ध्यान में रखकर कार्यक्रम का निर्माण किया गया क्योंकि इन्हीं तीन कार्यक्रमों के दर्शक-वर्ग सबसे अधिक सन् 2009 से 2011 तक रहें| आँकड़ें स्पष्टतः दिखलाते हैं कि इस फ़ॉर्मूले ने टीआरपी अधिक से अधिक बटोरने और इसके जरिए विज्ञापन पाने और राजस्व बढ़ाने में योगदान दिया| संभवतः यही कारण है कि ‘आज तक’ न्यूज़ चैनल समस्त हिंदी के न्यूज़ चैनलों के बीच ‘सबसे तेज़’ होने का तमगा हासिल करते हुए न. 1 की कुर्सी पर पिछले 10 सालों से विराजमान है|             

सन्दर्भ –

  1. टेलीविजन की भाषा, हरीश चन्द्र वर्णवाल, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण- 2012, पृष्ठ – 66
  2. वही, पृष्ठ – 67
  3. वही, पृष्ठ – 67-68
  4. टीआरपी, टीवी न्यूज़ और बाज़ार, डॉ. मुकेश कुमार, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम संस्करण -2015, पृष्ठ – 103
  5. वही, पृष्ठ –103
  6. वही, पृष्ठ –104
  7. टेलीविजन और क्राइम रिपोर्टिंग, वर्तिका नंदा, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण -2010, पृष्ठ- 31
  8. वही, पृष्ठ- 30
  9. टीआरपी, टीवी न्यूज़ और बाज़ार, डॉ. मुकेश कुमार, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम संस्करण -2015, पृष्ठ – 105
  10. वही, पृष्ठ- 106
  11. वही, पृष्ठ- 105