लेख / कुमार गौरव – ‘सिनेमा के सामाजिक सरोकार’

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कुमार गौरव बिहार के मुजफरपुर जिला के मुशहरी प्रखंड अंतगर्त बैकटपुर दरधा हाट गाँव के निवासी हैं। मुशहरी की धरती को बिहार में नक्सलवाद की प्रथम प्रयोगशाला के रूप में याद किया जाता है। सामाजिक-आर्थिक विषमता और उँच-नीच के भेदभाव को देखते हुये ही कुमार गौरव पले-बढ़े हैं। सामाजिक परिस्थितियों ने ही इन्हें पत्रकारिता से जुड़ने के लिए प्रेरित किया। आई आई एम सी से पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के बाद राष्ट्रीय टी वी चैनल आजतक में बतौर प्रशिक्षु पत्रकार कार्य भी किया। इनका उद्देश्य  उच्च षिक्षा प्राप्त करना था। इसलिए मुख्यधारा की पत्रकारिता से दूरी बनाते हुए पहले स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त किया, फिर ‘हिन्दी टीवी पत्रकारिता और सूचना समाज’ विषय पर जेएनयू विष्वविद्यालय से एम फिल की डिग्री प्राप्त किया। शोध कार्य के दरम्यान इन्होने मीडिया के 3सी फार्मूला (क्राइम, क्रिकेट और सिनेमा) पर विषेष रूप से खोजकार्य किया था। इसी दरम्यान इनका जुड़ाव फिल्म से हुआ। कुमार गौरव फिलवक्त भारतीय भाषा केन्द्र जेएनयू से पीएचडी कर रहे हैं। प्रस्तुत इनका लेख – ‘सिनेमा के सामाजिक सरोकार’।

                                               सिनेमा के सामाजिक सरोकार

                                                           कुमार गौरव

भारत एक बहु-सांस्कृतिक देश है इसलिए यहाँ सिनेमा के कई रूप दृष्टिगोचर होते हैं| गुजराती सिनेमा, मराठी सिनेमा, तमिल सिनेमा, कन्नड़ सिनेमा, मलयालम सिनेमा, भोजपुरी सिनेमा, हिंदी सिनेमा आदि कई रूपों में भारतीय सिनेमा का विस्तृत रूप हमारे सामने उपस्थित है| चूँकि हिंदी भाषा-भाषी बहुसंख्यक हैं इसलिए हिंदी सिनेमा का फलक इन सभी रूपों में सबसे अधिक बड़ा है| सौ वर्षों से अधिक की अपनी यात्रा में हिंदी सिनेमा ने मील के पत्थर गाड़े हैं| यहाँ सिनेमा एक संस्कृति के रूप में विकसित हो चुकी है| जिस सिनेमा को एक समय में देखने से परहेज करने की सीख परिवारों द्वारा मिलती थी, आज वही सिनेमा भिन्न-भिन्न कलेवर में हर पीढ़ी के दिलों में राज करती है| भारत जैसे विशाल देश में सिनेमाई संस्कृति मनोरंजन का एक सर्वसुलभ, सस्ता व लोकप्रिय साधन है| समाज को आईना दिखाने का जो काम सदियों से साहित्य ने किया वहीँ काम सिनेमा ने अपने उद्भव काल से किया| वस्तुतः आज के मनुष्य के जीवन के चारों ओर घटनेवाली घटना का सच्चा प्रतिबिम्ब है सिनेमा| एक सदी की प्रौढ़ उम्रवाली सिनेमा ने अपने कलेवर, तेवर, तकनीक व विषय सभी में आमुलचूल परिवर्तन किया है| आज इसके निर्माण में साहित्य, विज्ञान व कला के तीनों रूपों का महत्त्वपूर्ण योगदान है| सिनेमा इनके संयोजनों के कारण ही नित युवा दिखता है| सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, साहित्यिक, राजनैतिक, वैज्ञानिक, पौराणिक और ऐतिहासिक सभी विषयों व मुद्दों पर सिनेमा अपनी लकीर सफलतापूर्वक खींचता है| वस्तुतः जनसमूह की चेतना से सम्प्रेषण का सशक्त हथियार सिनेमा है| यह जनसमूह में आलोड़न व आन्दोलन पैदा करता है| अतः सिनेमा के सरोकार राजनैतिक, ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक विषयों से तो जुड़ते ही हैं परन्तु सबसे अधिक सामाजिक सन्दर्भों को आत्मसात करते हैं|

    हमारे देश में हिंदी सिनेमा का ‘स्ट्रक्चर’ उदारवादी है| यह हर प्रकार की कट्टरता को नकारते हुए आगे बढ़ता है| कई तरह के विरोधाभाषों व विसंगतियों को जन्म देने के बावजूद समाज में अपनी खास पहचान छोड़ता है| यह मुद्दों को हवा देता है और उसे पालता-पोसता भी है| अतीत के किन्हीं धूल-गर्द से एक नए विमर्श को जन्म देता है| वस्तुतः यह फिर से इतिहास को पढ़ने की चुनौती पेश करता है| बौद्धिक से लेकर जनसामान्य की चेतना को अचानक झकझोड़ता है और प्रश्नों की आँधी से समाज को नवीन बनाता है| ‘बैडिट क्वीन’ से लेकर ‘पद्मावती’ तक कई ऐसी फ़िल्में आईं जिसने समाज में आलोड़न पैदा की|

    हिंदी सिनेमा ने सामंतवादी, पुरुषवादी, जातिवादी मानसिकता से समझौता किए बगैर लोकतांत्रिक, उदारवादी, मानवतावादी सिद्धांत को अपनाया| हाँ, यह अवश्य है कि यदा-कदा कई प्रसंगों में सिनेमा की समीक्षा में परंपरागत मूल्यों से टकराहट के प्रश्न उपस्थित हुए| फिर भी इसने भारतीय समाज को एक नई मूल्य व्यवस्था में ढालने की पुरजोर कोशिश की| राष्ट्र-राज्य की संकल्पना को इसने मजबूती प्रदान की है तथा विश्व भर में भारतीय संस्कृति की पहचान को भी उजागर किया है| यद्यपि यह सत्य है कि पूंजीवाद, भूमंडलीकरण, बाजारवाद, निजीकरण की मिली-जुली संस्कृति ने सिनेमा को पूरी तरह अपनी गिरफ़्त में ले लिया और इससे सिनेमा ने ज्ञान आधारित पूंजीवादी अर्थव्यवस्था वाले सूचना-विस्फोट के युग में अपनी पहचान का नया फ़लसफ़ा गढ़ा| यही कारण है कि सूचना के तमाम नए माध्यमों के बीच सिनेमाई संस्कृति की लोकप्रियता जस की तस बनी हुई है|

    वस्तुतः हिंदी सिनेमा की भारतीय समाज में सर्वाधिक प्रगतिशील भूमिका युवक-युवतियों में रोमांस की जादुई प्रवृत्तियों को उभारने व इसके लिए सामंतवादी जीवन-मूल्यों से संघर्ष करने को प्रेरित करने में है| सर्वाधिक हिंदी फ़िल्में ‘प्रेम’ व ‘रोमांस’ को अपना विषय बनाती है और इसलिए सिनेमा को सर्वाधिक सफल बनाने के टोटके भी निर्माता-निर्देशक के पास ‘प्रेम’ व ‘रोमांस’ के दृश्यांकन में है| इसलिए हम पाते हैं कि ‘आवारा’, ‘बरसात’, ‘बैजूबावरा’, ‘मुगले आजम’, ‘देवदास’, ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे’, ‘कुछ-कुछ होता है’, ‘हम दिल दे चुके सनम’, ‘हम आपके हैं कौन’, ‘दिल तो पागल है’ आदि फ़िल्में ‘प्रेम’ और ‘रोमांस’ की परिधि में सजकर विषय, गीत-संगीत, तकनीक,  बॉक्स ऑफिस की सफलता सभी पायदानों में अप्रतिम है|

    दरअसल भारतीय सिनेमा भारतीय समाज और साहित्य इन दोनों से मसाला ग्रहण करता रहा है| उसके विषय भी समाज व साहित्य से प्रेरित व समन्वित रहे हैं| जहाँ सिनेमा की शैशवावस्था में धार्मिक, पौराणिक व ऐतिहासिक विषयों से सम्बद्ध फिल्मों के निर्माण पर जोड़ था वहीँ इसके युवावस्था में इसके विषय राष्ट्रीय आन्दोलनों व गाँधी के आदर्शों पर समाजवादी समाज बनाने पर अग्रसर रहा जहाँ डकैतों, चोरों आदि का ह्रदय परिवर्तन कराकर तथा हिंसा का मार्ग छुड़वाकर मुख्यधारा के समाज में लौटने की अपील केंद्र में रहा (जिस देश में गंगा बहती है)| वही अपनी प्रौढ़ावस्था में इसने भारतीय समाज की विविध व समृद्ध तस्वीर पेश की| लगान, मुन्नाभाई एम.बी.बी.एस., गजनी, कल हो ना हो, माई नेम इस खान, थ्री इडियट्स, तारे जमीं पर, चक दे इंडिया, स्वदेश, दंगल, – ये सभी फ़िल्में अलग-अलग नए-नए विषयों पर केन्द्रित थे| खेल, शिक्षा, स्वास्थ्य, पहलवानी, आतंकवाद आदि नवीन विषयों पर आधारित ये फ़िल्में समाज के विभिन्न समस्याओं को बड़ी ख़ूबसूरती से पर्दे पर प्रस्तुत करने में सफल रहे| सामाजिक सरोकारों की ऐसी अभिव्यक्ति एक-डेढ़ दशकों में सिनेमा ने पहले कभी न की थी| यानि समाज की भिन्न-भिन्न समस्याओं पर ध्यान देकर समाज व देश की चिंता, फिल्मों में अब, मुख्य चिंता के रूप में दिखने लगे|

    हिंदी सिनेमा ने हिंदी साहित्य से प्रेरणा ग्रहण कर हिंदी की कई कहानियों और उपन्यासों का रूपांतरण कर फ़िल्में बनाई| प्रेमचन्द की कहानियाँ ‘शतरंज के खिलाड़ी’, ‘सद्गति’, ‘दो बैलों की कथा’ पर फ़िल्में बनी| फनीश्वरनाथ रेणु की कहानी ‘तीसरी कसम’, मन्नू भंडारी का उपन्यास ‘आपका बंटी’ और ‘महाभोज’, शैवाल के उपन्यास ‘दामुल’ पर ‘दामुल’, केशवप्रसाद मिश्र की रचना ‘कोहबर की शर्त’ पर ‘नदिया के पार’ और ‘हम आपके हैं कौन’, राजेन्द्र सिंह बेदी की कहानी पर ‘एक चादर मैली सी’, धर्मवीर भारती के उपन्यास पर ‘सूरज का सातवाँ घोड़ा’, विजयदान देथा की ‘दुविधा’ नामक कहानी पर ‘पहेली’, उदयप्रकाश के उपन्यास पर ‘मोहनदास’ जैसी फ़िल्में हिंदी साहित्य की रचनाओं से रूपांतरित कर बनाई गईं|

    हरेक साहित्यिक कृति पर बनी फ़िल्में सफल नहीं होती, कुछेक असफल भी होती हैं; क्योंकि किसी निर्माता-निर्देशक के लिए साहित्यकृति की समझ और फिल्म में गहरी सृजनात्मक क्षमता के साथ रूपांतरण का कार्य जटिल होता है| ऐसे निर्माता बहुत कम हैं जो फिल्म की ‘टेक्नीक’ के साथ-साथ साहित्य के साथ गहरी रूचि रखते हों| साहित्य को सिनेमा में सफलतापूर्वक रूपांतरित करने वाले कुछ ही निर्देशक हैं| इनमें बिमल रॉय, सत्यजीत रे, श्याम बेनेगल, प्रकाश झा, गोविन्द निहलानी जैसे निर्देशक मुख्य हैं| चर्चित व बहुपठित साहित्यिक कृत्तियों में ‘गोदान’, ‘उसने कहा था’, ‘चित्रलेखा’, ‘एक चादर मैली सी’ पर फ़िल्में तो बनी पर साहित्य की ‘टेक्नीक’ को पकड़ नहीं सकी और असफल हुई| इसलिए साहित्यिक रचना से पूर्ण सामंजस्य व एकता बैठाते हुए उसकी गहराई तक उतरकर सफल फिल्म का निर्माण करना एक चुनौती भी है और जटिल क्रिया भी| इस क्रिया में मौलिकता ही साहित्य का पुनःसृजन करता है|

    सामाजिक सरोकारों को लेकर बनाई गईं फिल्मों में सन 1953 में बिमल रॉय के निर्देशन में बनी ‘दो बीघा जमीन’ फिल्म उल्लेखनीय है| यह सलिल चौधरी की कहानी पर आधारित थी| यह उस वर्ष की सर्वश्रेष्ठ फिल्म थी| किसानों व मजदूरों की समस्या पर आधारित यह पहली यथार्थवादी फिल्म थी| देश के किसानी जीवन की समस्याओं का जीवंत दृश्य एवं करुण प्रभाव इस फिल्म ने पैदा किया| इसी तरह सन 1954-55 सामाजिक फिल्मों के निर्माण का दौर रहा| समाज के यथार्थ का नग्न तस्वीर दिखलाने में कई निर्देशक आगे रहे| शरतचंद्र के उपन्यास पर आधारित महत्त्वपूर्ण फिल्म ‘परिणीता’ का निर्माण हुआ| इसका पठकथा लेखन और निर्देशन दोनों बिमल रॉय ने किया था| सामाजिक विसंगतियों पर आधारित सर्वाधिक सफल एवं लोकप्रिय फिल्म ‘मदर इंडिया’ का निर्माण इसी वर्ष महबूब खान ने किया| सिनेमा के इतिहास में यह फिल्म मील का पत्थर साबित हुई| फिर शरतचंद्र के उपन्यास पर ‘देवदास’ नाम की लोकप्रिय फिल्म बनी| सामाजिक भावनाओं को उकेरती राजकपूर की फिल्म ‘जागते रहो’ का निर्माण 1956 में हुई| इसी तरह 1957 में गुरुदत्त की ‘प्यासा’ फिल्म समाज की चेतना को झकझोड़ने वाली सिद्ध हुई| दुनिया और समाज की एक व्यक्ति के लिए सार्थकता और निर्थकता पर बहस को इसने जन्म दिया| 1959 में बिमल रॉय ने छुआछूत और जाती के बन्धनों को तोड़नेवाली ‘सुजाता’ फिल्म का निर्माण किया| प्रेमचंद की कहानी ‘दो बैलों की कथा’ को आधार बनाकर कृष्ण चोपड़ा ने ‘हीरा मोती’ नाम से फिल्म बनाई| इस तरह हिंदी साहित्य और सिनेमा के बीच यह फिल्म एक महत्त्वपूर्ण कड़ी साबित हुई|

    ऐतिहासिक घटनाएं भी किस तरह सामाजिक-राजनैतिक उद्देश्यों को प्रभावित करती है तथा वर्त्तमान में हलचल पैदा करती है, इस बात की मिशाल 1960 में आई ‘मुगले आजम’ फिल्म से समझी जा सकती है| ए. आसिफ़ के निर्देशन में बनी इस फिल्म में दिलीप कुमार और मीना कुमारी की अदाकारी और संवाद के चर्चे लोगों की जुबान पर चढ़कर बोलने लगे| तकनीकी और कलात्मक दृष्टि से यह श्रेष्ठ फिल्म थी| हिन्दू-मुस्लिम एकता पर बल देने वाली फिल्म ‘धर्मपुत्र’ का निर्माण 1962 में बी.आर.चोपड़ा ने किया| यह आचार्य चतुरसेन शास्त्री के प्रसिद्ध उपन्यास ‘धर्मपुत्र’ पर आधारित था| इसी तरह 1963 में बिमल रॉय की नारी-प्रधान सामाजिक फिल्म ‘बंदिनी’ का प्रदर्शन हुआ| भिखारियों की समस्या को लेकर लोकप्रिय फिल्म ‘दोस्ती’ इसी साल बनी| 1965 में आर.के. नारायण के अंग्रेजी उपन्यास ‘गाइड’ पर इसी नाम से फिल्म बनी| इस फिल्म ने काफी लोकप्रियता हासिल की| इसी दौर में बासु भट्टाचार्य ने फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी पर आधारित ‘तीसरी कसम’ फिल्म 1966 में बनाई|

    आगे चलकर हिंदी सिनेमा में एक मोड़ दिखाई देता है जो इटली के नवयथार्थवाद से प्रेरित है| इस दौर में जो फ़िल्में बनी उसे समीक्षकों ने ‘सामानांतर सिनेमा’, ‘कला सिनेमा’ और ‘नया सिनेमा’ कहना शुरू किया क्योंकि अब फिल्मों का स्वरुप अधिक सार्थक, सामाजिक और आम आदमियों की कथा कहने वाला हो चला था| इस दौर में मोहन राकेश की कहानी पर आधारित ‘उसकी रोटी’, राजेन्द्र यादव के उपन्यास पर आधारित ‘सारा आकाश’ और बांग्ला लेखक नारायण सान्याल के उपन्यास पर आधारित ‘सत्यकाम’ नामक फिल्मों का निर्माण हुआ| 1962 में चीन से हार के बाद का भारत बिल्कुल अलग किस्म का भारत था| आजादी से मोहभंग, राजनेताओं के करिश्में से मोहभंग, मध्यवर्ग की समस्याओं का अंबार, वैयक्तिक अजनबीपन से घिरे शहर, ग्रामीण समाज की उपेक्षा – इन सबसे समाज के एक बड़े तबके में एक विचलन पैदा हुआ और इन्हीं समस्याओं का चित्रण हमें उस समय के फिल्मों में दिखाई देता है| ‘जिस देश में गंगा बहती है’ फिल्म का निर्माण राजकपूर ने उस समय के समाज की मूल समस्या ‘डकैती’ की समस्या और उसके निवारण के उपायों पर की|

    इस तरह धार्मिक-पौराणिक कथा-वृत्तों से पचास के दशक में ही पीछा छुड़ाकर हिंदी सिनेमा ने एक नया रूप धारण किया और सामाजिक सौद्देश्यों को पूरा करनेवाली फिल्मों का निर्माण किया| सातवें दशक के बाद की स्थितियों का एक महत्वपूर्ण आयाम है, राजनीति का अपराधीकरण| इस अपराधीकरण के साए में ‘एंग्री यंग मैन’ का जन्म होता है| अमिताभ बच्चन की ‘दीवार’, ‘जंजीर’, ‘शोले’ जैसी फिल्मों ने अपराध और राजनीति के गठजोड़ से पैदा हुई समस्याओं को बखूबी दिखाया| श्याम बेनेगल की फिल्म ‘मंथन’ अपने समय के पूंजीपतियों, राजनीतिज्ञों, भूस्वामियों और नौकरशाहों के गठजोड़ के शोषक, अपराधी और जनविरोधी चरित्र को उजागर करते हैं| इस गठजोड़ की क्रूरता और अपराधिक वृत्ति का दहला देने वाला चित्रण गोविन्द निहलानी की फिल्म ‘आक्रोश’ में भी हुआ है| आदिवासी युवक लहानिया को सबक सिखाने के लिए जंगल का ठेकेदार, पुलिस अधिकारी, राजनेता और डॉक्टर मिलकर उसकी युवा पत्नी के साथ बलात्कार करते हैं और फिर उसकी हत्या भी कर देते हैं| हत्या के आरोप में उसके पति को पकड़ कर अपराध की एक झूठी कहानी अदालत में पेश कर दी जाती है| अभियुक्त के लिए सरकार की ओर से युवा वकील कुलकर्णी को नियुक्त किया जाता है| कुलकर्णी हत्या की तफ़्तीश करता हुआ जैसे-जैसे वास्तविकता के नजदीक पहुँचता है वैसे-वैसे निहित स्वार्थों वाला गठजोड़ का नापाक चेहरा अनावृत्त होता जाता है| ‘आक्रोश’ का प्रदर्शन एक नई शुरुआत थी क्योंकि भारतीय सिनेमा के इतिहास में इससे पूर्व कभी भी शाषक वर्ग और उसकी सहयोगी संस्थाओं की इतनी तीखी आलोचना नहीं की गई थी| ‘आक्रोश’ के बाद यह सिलसिला चल निकलता है  – ‘अर्द्धसत्य’, ‘पार्टी’, ‘दामुल’, ‘पार’, ‘मोहन जोशी हाजिर हो’, ‘सूखा’, ‘मंडी’, ‘अल्बर्ट पिंटू को गुस्सा क्यों आता है’, ‘न्यू देहली टाइम्स’ आदि फिल्मों में राजनीति के साये तले समाज में बढ़ते अपराध की कहानी को बेबाकी से प्रस्तुत किया गया|

    नब्बे का दशक भारतीय इतिहास में आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से उल्लेखनीय है| मुक्त बाज़ार की अवधारणा ने विश्व-ग्राम के सपने को हकीकत में बदलने का कार्यक्रम चलाया और इसी के फलस्वरूप इस दौर में पश्चिमीकरण, आधुनिकीकरण, बाजारीकरण और भूमंडलीकरण को तेज रफ़्तार मिली| भारत से विश्व सुंदरी और ब्रह्मांड सुंदरी एक साथ निकली| समाज के साथ-साथ सिनेमा ने भी करवट ली| यह दशक सिनेमा के दर्शकों के लिए नए-नए स्वाद को चखने का साबित हुआ| ‘हम आपके हैं कौन’, ‘दिलवाले दुल्हनियाँ ले जायेंगे’, ‘कुछ-कुछ होता है’ जैसी सुपरहिट फ़िल्में युवा दिलों में रोमानी भावबोध जगाकर युवक-युवतियों के मन में एक नवीन सपने का संचार किया| हिंदी फिल्मों का कलेवर शील-अश्लील और हास्य-व्यंग्य की अतिरंजना और देह-प्रदर्शन में डूबते गए| सामाजिक विषयों पर फिल्में बनना एकाएक ठहर-सा गया| फलस्वरूप हिंदी सिनेमा से दूर होकर दर्शक भोजपुरी सिनेमा और कालांतर में दक्षिण की हिंदी में डब सिनेमा की शरण में चले गए| इनमें पर्याप्त मिर्च-मशाला और फूहड़ता विद्यमान थीं| पॉपुलैरिटी का चस्का निर्माता एवं अभिनेता को लग चुका था|

    कालांतर में 21वीं सदी की शुरुआत में ‘दिल चाहता है’ जैसी फिल्मों की व्यापक सफलता ने हिंदी फिल्मों के प्रोडक्शन और लुक को हमेशा के लिए बदल दिया| ‘लगान’ फिल्म की व्यापक प्रशंसा और चहुँओर सफलता ने फिल्म निर्माण की तकनीक को व्यवस्थित और अनुशासित करने की सीख निर्माताओं को दी| इतना जरुर है कि अब फिल्म-निर्माण में पैसा बहुत ज्यादा खर्च किया जाने लगा| भव्यता को सफलता की कसौटी माना गया| गीत-संगीत में विविधता दिखलाई पड़ने लगी और रीमेक फिल्मों का भी दौर आया| रोजा, बॉम्बे, गुरु, ये तेरा घर ये मेरा घर, हलचल, वांटेड, डॉन, उमराव जान, आग, बाजीराव मस्तानी जैसी कई फ़िल्में रीमेक के रूप बनकर दर्शकों को आकर्षित करने में कामयाब हुई| फिल्म की निर्माण लागत को निकालने के साथ-साथ सैंकड़ों करोड़ में फिल्मों का बिज़नेस करने के लिए निर्माता येन-केन-प्रकारेण का सहारा लेने लगें| अब फ़िल्में सिनेमाहॉल में आने से पहले सेटेलाइट का अधिकार बेचकर, गीत-संगीत के अधिकार बेचकर करोड़ों का मुनाफ़ा पहले ही कमा लेती है| सिनेमा को अधिक से अधिक लोकप्रिय बनाने के लिए अभिनेताओं की ‘बॉडी’ की नुमाईस की जाती है, अभिनेत्रियों के यौन-सौन्दर्य को निखारा जाता है, हिंसा के उत्तेजक दृश्य पैदा किये जाते हैं, नृत्य और संगीत का उन्माद पैदा किया जाता है और एक्शन और ग्राफ़िक्स का रोमांच पैदा करने वाला ‘सीन’ निर्मित किया जाता है|

    आज की हिंदी सिनेमा में भव्यता पर खासा जोर दिया जाता है| ‘बाहुबली’ की अपार सफलता ने निर्माता को एक नया फलसफा दिया| ‘बाहुबली’ सीरीज की दोनों फिल्मों देश की कई भाषाओँ में चली और पसंद की गई| यह अब तक के सिनेमा के इतिहास की सबसे महँगी एवं सबसे अधिक कमाई करनेवाली फिल्म साबित हुई| लेकिन भव्यता का फार्मूला ‘ठग्स ऑफ़ हिन्दुस्तान’ पर फिट नहीं बैठी और 300 करोड़ की लागत से बनी यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर ओंधें मुँह गिरी|

    इधर ऐतिहासिक चरित्रों पर भव्य सिनेमा निर्माण की परिपाटी बनी है| संजय लीला भंसाली की काफी महँगी फिल्म ‘पद्मावत’ थी| मलिक मोहम्मद जायसी के महाकाव्य पर आधारित यह फिल्म ‘पद्मावती’ के अलौकिक सौन्दर्य का वर्णन करती थी और अल्लाउद्दीन खिलज़ी के आक्रमण पर आधारित थी| इसी तरह कंगना रनोट की ‘मणिकर्णिका’, रानी लक्ष्मीबाई की शौर्यगाथा का वर्णन करनेवाली ऐतिहासिक फिल्म है| अजय देवगन ‘तानाजी’ नामक ऐतिहासिक चरित्र पर फिल्म कर रहे हैं वहीँ अक्षय कुमार ‘पृथ्वीराज चौहान’ की वीरता का वर्णन करनेवाले हैं| करण जौहर ‘तख़्त’ नाम से इतिहास को दुबारा पढ़ने जा रहे हैं| वहीँ कुणाल कोहली ‘रामयुग’ और सलमान खान ‘महाभारत’ बनाने वाले हैं| नीरज पाण्डेय अजय देवगन को लेकर ‘चाणक्य’ पर काम कर रहे हैं तो वहीँ आशुतोष गोवारिकर संजय दत्त और अर्जुन कपूर के साथ ‘पानीपत’ बना रहे हैं|

    कुल मिलाकर ये सभी फिल्में इतिहास की गुफा-गेह से भव्यता का प्रदर्शन करेगी| साथ-ही ऐतिहासिक व मिथकीय चरित्रों के मोह-पाश में बांधकर दर्शकों को एकबार सिनेमाहॉल तक खींचने में कामयाब होने का जतन करेगी| ऐतिहासिक फिल्में ख़ास पीरियड के परिवेश और किरदारों की वजह से स्वाभाविक तौर पर भव्य हो जाती हैं| उनके लिए महँगे और विशाल सेट की जरुरत पड़ती है| लेखकों की कल्पना को मूर्त रूप देने के लिए वीएफएक्स का उपयोग करना पड़ता है| इन खर्चों से फिल्म की लागत काफी बढ़ जाती है| लेकिन ये टोटके कई बार कामयाब नहीं होते और कई बार ऐसी भव्य फ़िल्में पिट भी जाती हैं| ‘अशोका’ और ‘मोहनजोदारों’ भव्य होते हुए भी बुरी तरह फ्लॉप साबित हुई थीं| एक तथ्य यह भी है कि वीरों, राजाओं, योद्धाओं की शौर्यगाथा सुन-सुनकर दर्शक उबने लगते हैं| ऐसे में कम बजट की उम्दा और कसी कहानी के दम पर कई फिल्में काफी पैसा कमाती हैं| महिला प्रधान फिल्मों को देखने का क्रेज भी इधर बढ़ा है| ऐसी फिल्में काफी हद तक सराही गई और हिट भी रही| डर्टी पिक्चर, तनु वेड्स मनु रिटर्न्स, तुम्हारी सुलु, लिपस्टिक अंडर माय बुर्का, सीक्रेट सुपर स्टार, नाम सबाना, कहानी, क्वीन, इंग्लिश विंग्लिश, वीरे दी वेडिंग जैसी महिला प्रधान फिल्में कामयाब हुईं और समीक्षकों एवं दर्शकों की दृष्टि में सराही गई| हिंदी सिनेमा की यह यात्रा साहित्य एवं समाज से विविध विषय ग्रहण कर आगे ही बढ़ता जा रहा है और इससे भी आगे जाएगा|

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