लेख / डा. रूपेश कुमार – आदिवासी केंद्रित हिंदी उपन्यासों में प्रति औपनिवेशिक चिंतन

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इलाहाबाद के ग्रामीण परिवेश में जन्में और पले-बढ़े डा. रूपेश कुमार फिलवक्त महात्मागांधी अन्तर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय वर्धा के हिन्दी एवं तुलनात्मक साहित्य विभाग में सहायक व्यख्याता के पद पर आसीन है।  विश्वविद्यालय प्रशासनिक और अकादमिक अनुभव रखने वाले लेखक के पास लेखन का भी विपुल अनुभव है। इलाहाबाद  विश्वविद्यालय के शिक्षार्थी रहे रचनाकार की पहली आलोचनात्मक कृति ‘रामविलास शर्मा की साहित्येतिहास दृष्टि’ नामक पुस्तक का प्रकाशन हो चुका है। अनुशीलन, नागरी, अनुसंधान, बहुवचन, पुस्तक वार्ता सरीखे कई अन्य शोध पत्रिकाओं में लेख व पुस्तक समीक्षाएं प्रकाशित हो चुकी हैं।  विश्वविद्यालय एवं प्रकाशकों द्वारा प्रकाशित लगभग आधा दर्जन पुस्तकों में इनके लेख पुस्तक अध्याय के रूप में भी संकलित है। वर्धा में पठन-पाठन कार्य करते हुये इन्होंने पाठ्य सामग्री का भी लेखन किया है। इसके अलावे महात्मागांधी अन्तर्राष्ट्रीय  विश्वविद्यालय द्वारा निर्मित फिल्म ‘मुहावरे’ का पटकथा भी इन्होंने ही लिखी है। आप सभी सुधि पाठकों के बीच प्रस्तुत है देश के ज्वलंत मुद्दे पर केन्द्रित डा. रूपेश  कुमार द्वारा लिखित लेख ‘ आदिवासी केंद्रित हिंदी उपन्यासों में प्रति औपनिवेशिक चिंतन’। लेखक फणीश्वरनाथ रेणु डॉट कॉम  के संपादकीय कार्यकारिणी से भी संबंद्ध हैं। – संपादक 

               आदिवासी केंद्रित हिंदी उपन्यासों में प्रति औपनिवेशिक चिंतन

                                              डा. रूपेश  कुमार

भारत लगभग 200 सालों तक ब्रिटेन का उपनिवेश रहा , इसमें कोई विवाद नहीं है कि इन वर्षों में यहाँ के संसाधनों का दोहन वहाँ के हित में किया गया| इसके लिए जो उपनिवेशवादी नियम और क़ानून बनाए गए वे अत्यंत कठोर और शोषणकारी थे| आदिवासियों का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि वे ऐसे इलाकों में रहते आये हैं जहाँ प्राकृतिक संसाधन का भरपूर भण्डार है| इसे प्राप्त करने के लिए अग्रेजों के समय से ही उनपर इलाके को खाली करने का दबाव बनाया जाता रहा है, किन्तु अपनी निर्भीक प्रवृत्ति और जल,जंगल, ज़मीन से लगाव के कारण सदा वे इसका विरोध करते आये हैं| आजादी के 67 वर्ष बीत जाने के बाद भी स्वतन्त्र भारत की सरकार ने इसका कोई बेहतर हल नहीं खोजा, परिणाम स्वरूप आदिवासी इलाका अशांति का क्षेत्र बन गयाहै| इस संदर्भ में भूतपूर्व आयुक्त अनुसूचित जाति व जनजाति डॉ. बी.डी. शर्मा का वह पत्र अत्यंत महत्वपूर्ण है जो उन्होंने आयुक्त की 29वीं रिपोर्ट में राष्ट्रपति को लिखा था| इसके महत्व का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता कि मानव शास्त्री प्रो. नदीम हसनैन ने अपनी पुस्तक‘जनजातीय भारत’ में इसको शामिल करते हुए लिखा है कि इस पत्र की हैसियत एक ऐतिहासिक दस्तावेज जैसी हो गई है जनजातीय समस्याओं का विश्लेषण उसके सही ऐतिहासिक व समकालीन परिवेश में इससे बेहतर रूप में मिलना कठिन है प्रशासनिक हल्कों में ए.एस. गाँधी जैसे खिताब से जाने-जाने वाले डॉ. शर्मा ने उन सभी कमजोर वर्गों को आवाज दी है जो शायद अब तक बेआवाज थे |1 इस रिपोर्ट में डॉ. शर्मा लिखते हैं कि “इन अधिसंख्य लोगों की जिंदगी तीन बातों से जुड़ी हुई है-संसाधनों पर अधिकार,उत्पादन के साधनों पर अधिकार और मेहनत की हकदारी| बड़े खेद की बात है कि इन सवालों पर या तो बहस ही नही हुई है, और हुई भी है तो बहुत सतही|”2 इसके कारणों की पड़ताल करते हुए वे आगे लिखते हैं कि “हमारी व्यवस्था का कानूनी ताना-बाना मोटे तौर पर अग्रेजी राज के दौरान तैयार किया गया था| इस व्यवस्था की बुनियादी मान्यताएँ पश्चिमी समाज की मान्यताएँ थीं और उसका उद्देश्य साम्राज्य के पाए को मजबूत बनाना था| इसमें लोग प्रजा थे, व्यवस्था राज का प्रतीक थी| आजादी के बाद हमने अपनी परम्परा और मानवीय मूल्यों के आधार पर समाजवादी समाज की संरचना के लिए संविधान बनाया और अंगीकार किया|परन्तु जिस व्यवस्था पर संविधान का यह ताज रखा गया वह उसकी मूल चेतना से बिलकुल अनमेल थी| आगे चलकर भी यह अनमेल हालत बनीं ही नहीं रही, और भी ज्यादा खराब होती गई| एक तो पुरानी व्यवस्था नये शासक वर्ग को रास आ गई| दूसरे विकास की हड़बड़ी में पहले तो बेमेल बातों को अनदेखा कर दिया गया और फिर उन्हें नई व्यवस्था के रख-रखाव और तरक्की के लिए जरूरी मान लिया गया|”3 डॉ. शर्मा ने यह रिपोर्ट 1987-89के मध्य आदिवासियों की स्थिति के बारे में प्रस्तुत की थी किन्तु आज 2019 में इसका मूल्यांकन करते हैं तो हम पाते हैं कि विकास की प्रक्रिया तेज होने के साथ आदिवासी क्षेत्रों में शोषण और बढ़ा है | इतना ही नही पहले जिस समस्या से केवल आदिवासी जूझ रहे थे आज उसको किसान भी झेलने के लिए अभिशप्त हैं| उनकी भूमि अधिग्रहीत कर उद्योगपतियों को दी जा रही है, नदियों का पानी जो हजारों बरस से खेती के लिए किसान प्रयोग में लाता रहा है, उसे ‘मिनरल वाटर’ और ‘कोलड्रिंक’ बनाने वाली कंपनियों को प्राथमिकता के आधार पर दिया जाता है ,भले ही किसान की खेती सूखती रहे| इससे साफ पता चलता है कि वर्तमान में केन्द्र अथवा किसी भी राज्य सरकार के एजेंडे में आदिवासी और किसान नही हैं|इतना ही नही प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मिडिया तथा साहित्य जगत द्वारा इस विषय को लेकर जिस तरह से उठाये जाने की अपेक्षा थी वह भी नही हुआ | अगर कुछ मानव शास्त्रियों और साहित्यकारों ने इसे उठाया भी तो चर्चा बहुत अधिक आगे नही बढ़ सकी|

हिंदी साहित्य में उत्तर आधुनिक विमर्शों में दलित, स्त्री के बाद आदिवासी विमर्श का प्रारम्भ निश्चय ही एक सुखद संकेत है | यद्यपि अभी तक इसकी कोई मुकम्मल वैचारिकी नही बन पाई है| कारण एक तो बहुत से लोग इसे मानवशास्त्र का विषय मानते हैं,दूसरा आदिवासियों के बीच से ऐसे लोग कम निकलकर आ रहें हैं जो इस लेखन को गति प्रदान कर सकें,तीसरा इस लेखन के लिए गैर आदिवासियों के लिए जिस तरह से ‘फील्ड वर्क’ की जरूरत होती है साहित्य में वैसी परम्परा नही रही है| परम्परा के अभाव में साहित्य में इस तरह के लेखन को दोयेम दर्जे का माना जाता रहा है, विशेष रूप से सृजनात्मक लेखन को किन्तु अब ऐसा नही है| रमणिका गुप्ता, वीर भारत तलवार जैसे कुछ महत्वपूर्ण लेखक/लेखिकाएं इस दिशा में सक्रिय हैं | उम्मीद है आने वाले दिनों में कुछ और महत्वपूर्ण नाम जुड़ेंगेतथा इस विमर्श का कोई मुकम्मल वैचारिक आधार बनेगा| इस विमर्श में अब-तक जो कुछ लिखा गया है, वह मुख्य रूप से कविता और कथा साहित्य में समस्या आधारित लेखन है, जिसमें आदिवासी जीवन और संस्कृति के हशियेकरण तथा उनके साथ हो रहे शोषण के विभिन्न रूपों और उसके प्रतिरोध को रचनाकारों ने आधार बनाया है|आज इन रचनाकारों में निर्मला पुतुल, संजीव, राकेश कुमार सिंह, रणेन्द्र, अनुज लुगुन जैसे दर्जनों नाम शामिल हैं | मानवशास्त्री जिस बात को लंबे समय से आकड़ों द्वारा प्रस्तुत करते रहे हैं और जिसकी चर्चा केवल अकादमिक बहसों तक सीमित थी| इन लेखकों का महत्व इसमें है किआदिवासी मुद्दे को संवेदनात्मक ढंग से प्रस्तुत कर इसका विस्तार अकादमिक जगत के बाहर भी किया|साथ ही इन मानवशास्त्रियों की अपनी सीमाएं हैं, जो उपलब्ध तथ्यों के विश्लेष्ण तक इनको सीमित करती हैं जबकि साहित्यकार इनसे परे जाकर संभावित इतिहास की तलाश के साथ नये इतिहास का निर्माण भी करता है | इस संदर्भ में मैनेजर पाण्डेय का कथन अत्यंत महत्वपूर्ण है, वे लिखते हैं कि “ जो लोग समाज में पराधीनता और दमन के शिकार होते हैं उनकी आवाज इतिहास में बहुत कम सुनाई देती है | समाज के अछूत इतिहास के भी अछूत होते हैं | वे समाज से बहिष्कृत होते हैं,इसीलिये इतिहास से भी बहिष्कृत रहते हैं| वे मुख्यधारा की दृष्टि से इतिहासविहीन जन हैं| ऐसे लोगों के समाज और संस्कृति का इतिहास उपन्यास में लिखा जाता है|”4आदिवासी केंद्रित यथार्थवादी उपन्यासों का यह सबसे सटीक विश्लेषण है| कुछ उपन्यासों जैसे- धूणीतपे तीर, हुल पहड़िया आदि में उपन्यासकारों ने लोक प्रचलित आदिवासी जन नायको को लेकर यह काम सीधे किया है तो अधिकतर उपन्यासों में कथा के बीच-बीच में विमर्श के रूप में इतिहास अपनी जगह बनाता चलता है| इसलिए साहित्य में हो रहे इस लेखन का महत्व मानवशास्त्री और ऐतिहासिक दृष्टिकोण से भी है|लेकिन अब तक जो कुछ लिखा गया वह महत्वपूर्ण होते हुए भी अपर्याप्त है, अभी बहुत कुछ लिखा जाना बाकी हैजैसे- आदिवासी समाज में कार्यरत उग्र वामपंथी संगठनों की भूमिका को लेकर हिंदी में कोई मत्वपूर्ण रचना सामने नही आई है| इस पर वैचारिक लेखन के साथ उपन्यास भी लिखा जा सकता है |

आदिवासी जीवन पर केंद्रितरणेन्द्रका उपन्यास ‘ग्लोबल गाँव के देवता’ अत्यंत महत्वपूर्ण है| इस उपन्यास ने आदिवासी विमर्श के लिए मील के पत्थर का काम किया है| अपने बेहतर कथ्य के दम पर 2009 के सबसे चर्चित उपन्यासों की श्रेणी में यह शामिल हुआ|100 पृष्ठों के इस उपन्यास मेंबड़े ही बेहतर ढंग से पूँजीवाद के विस्तार के साथआदिवासी समाज पर पड़ने वाले वैश्वीकरण के दुष्प्रभावों को रेखांकित किया गया है| आदिवासियों को लेकर भारतीय सत्ता का चरित्र किस तरह से आज भी उपनिवेशवादी है यह उपन्यास पढ़कर बड़ी आसानी से से पाठक समझ लेता है| लेखक असुर समुदाय के आदिवासियों के अस्मिता और अस्तित्व के संघर्ष की कथाका चित्रण करते हुए विश्व की महान विलुप्त सभ्यताओं को याद करता है, वह लिखता है कि “ बरबस प्राचीन अमेरिका के इंका,माया,एज्टैक और सैकड़ों रेड इंडियंस याद आये| इसी तरह से खदेड़े जाने वाले, इसी तरह से मार दिए जाने वाले | असुरों की तरह उनकी भी चंद संख्या बची थी | बदहाल जिंदगी गुजारती संस्कृतिविहीन, भाषाविहीन, साहित्यविहीन, धर्मविहीन| शायद मुख्यधारा पूरा निगल जाने में ही विश्वास करती है|”5 यहाँ लेखक सांस्कृतिक, साहित्यिक, भाषाई और धार्मिक वर्चस्व को एक साथ विमर्श के केन्द्र में लाता है और साथ ही आदिवासी सभ्यता तथा संस्कृति के महत्व को रेखांकित करता है|

संदर्भ सूची-
1. नदीम हसनैन, जनजातीय भारत, पृष्ठ-209
2. वही, पृष्ठ-210
3. वही , पृष्ठ-212
4. मैनेजर पाण्डेय,ग्लोबल गाँव के देवता; यथार्थ से मिथक बनते एक समुदाय की कथा व्यथा, नया ज्ञानोदय, मार्च-2010,पृष्ठ-16
5. रणेन्द्र, ग्लोबल गाँव के देवता, पृष्ठ-33