‘अनुराधा चंदेल ओस’ स्वतंत्र लेखिका हैं। युवा कवयित्री के रूप में इनकी खास पहचान है। हिन्दी काव्य संसार को इन्द्रधनुषी रंग में रंगने का प्रयास कर रही कवयित्री का मूल नाम ‘अनुराधा चौधरी’ है। ‘ओ रंगरेज’ नामक पहले काव्य संग्रह में अनुराधा, सौंदर्यबोध, युगबोध और निसर्गबोध को लेकर पाठकों के बीच उपस्थित हुई हैं। हिन्दी साहित्य की छात्रा रही लेखिका ने ‘मुसलमान कृष्ण भक्त कवियों की प्रेम सौन्दर्य दृष्टि’ विषय पर शोध कार्य किया है। छात्र जीवन से लेखन कार्य में जुटी लेखिका कविता, कहानी और समीक्षा लिखती है। वागर्थ, आजकल, अहा ! जिन्दगी सहित दर्जन भर से अधिक पत्र- पत्रिकाओं में इनकी रचनाएं प्रकाशित हो चुकी हैं। विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ भागलपुर ने इन्हें डी. लिट की मानद उपाधि प्रदान की है। कई साहित्यिक सांस्कृतिक संगठनों द्वारा सम्मानित कवयित्री को पिछले दिनों दिल्ली की संस्था परिवर्तन ने खासतौर से ‘ओ रंगरेज’ काव्य संग्रह के लिए सम्मानित किया है। आइये पढ़े इनके द्वारा लिखित लेख- ‘लोकचेतना के निर्माण में लोकगीतों का योगदान l ’…संपादक
                       लोकचेतना के निर्माण में लोकगीतों का योगदान
                                     डॉ. अनुराधा ‘ओस’
मानव जीवन की हार्दिक अनुभूतियों की अभिव्यक्ति हैं – लोकगीत। यह मानवीय संवेदनाओं और संचेतनाओं का जीवंत इतिहास भी है। दरअसल लोकगीत अपने कालखंड के परंपराओं, रीति –रिवाजों से लेकर सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों को अपने आगोश में समेटते हैं। इसलिए लोकगीतों में मानव जीवन के सुख-दुःख ,राग-विराग, प्रेम-घृणा, जीत -हार, संयोग -वियोग आदि के जीते-जागते चित्र देखने को मिलते हैं। लोकगीतों का भावनात्मक जुड़ाव स्थानीय माटी से भी होता है। दूसरे शब्दों में कहें तो माटी की उपज होते हैं लोकगीत। शायद यही वजह है कि लोकगीत एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक मौखिक रूप में यात्रा करते है। इसमें युग के अनुरूप परिवर्तन बहुत धीमी गति से होता है। इसमें हमारी परंपरा जुड़ी होती है, परम्पराएं लोकजीवन का प्राण होती हैं,सामाजिक चेतना के निर्माण में लोक साहित्य का बहुत बड़ा योगदान है, लोकगीतों में आदर,सत्कार,परम्परा, मर्यादा,नियम,और अनुशासन के संस्कार अद्वितीय हैl लोकसाहित्य में लोकजीवन की सरलतम अभिव्यक्ति होती है, इसमें प्रकृति गीत गाती है, जहाँ, हवा,पानी ,पहाड़, वृक्ष, नदी आदि जीवंत हो उठतें हैंl भोजपुरी में बहुतायत कवियों ने ग्रामीण जीवन का यथार्थ का चित्रण किया है।

‘सुखि गइली नेह के नदी’ कविता संग्रह में पं. रामनवल मिश्र द्वारा भोगे गए यथार्थ का अनुभव हैl गांव में होने वाले परिवर्तन से रचनाकार का मन परेशान हो जाता है…
रितिया पिरितिया के गतिया सेराइल
सहरिया में मोरा गउआँ हेराइल
बदलि गइले बोली ,बदलि गइले भाषा
संस्कार जात हउये दिन-दिन झुराइल
सहरिया में मोरा गउआँ हेराइल।।

लोकगीतों की सबसे बड़ी विशेषता है, उनकी संवाद शैलीl हृदय की गहराई से निकले लोकगीत बोली-बानी में भावनाओ की इतनी सहज अभिव्यक्ति हमारे हृदय को छू जाती है।

‘कवन उमिरिया सासु, निबिया लगायेन
कवनि उमिरिया गै बिदेसवा हो राम।
खेलत-कूदत बहुअर निबिया लगायेन
रेखीय भिनत गै बिदेसवा हो रामा।
फरबै निबिया लहसि गै डरिया, तबहू न
आये मोर बिदेसवा हो राम। 

इस गीत में सास-बहू का संवाद है,बहू सास से पूछती है, कि प्रियतम ने नीम का पेड़ कब लगाया था,और किस उम्र में बिदेस गए थे ? इस पर सास बहू को उत्तर देती है कि – “खेलने कूदने की उमर में नीम का पेड़ लगाया था और किशोर होने से पहले बिदेस गए थे, नीम का पेड़ फर कर लद गया लेकिन राम आज तक नही लौटे।”
लोकगीतों की बहुत समृद्ध परंपरा रही है,जिनमें अनेक लोकगीत प्रचलित हैं, कजर, होरी, चैता, रोपनी,सोहनी,जँतसार,और देशभक्ति के गीत आदि ,कजरी गीत में जीवन के विभिन्न पहलुओं का समावेश होता है,सुख,दुख,विरह,समाज की कुरीतियों एवं विसंगतियों से लेकर लोकचेतना पुनरुत्थान और राष्ट्रीय जागरण के स्वर गुंजित होतें हैं। भारतीय राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के समय गाई जाने वाले यह कजरी गीत,बहुत लोकप्रिय है –
कैसे खेलन जाई सावन में कजरिया
बदरिया घेरी आई ननदी
केतन खाइ गइलन गोली
केतन चढ़ल होइहें सूली
कैसे पीसत होइहैं जेल में चकरिया
बदरिया घेरी आई ननदी।।
एक कजरी देखिये—
‘राजघाट बनल पुल अलबेला पिया
लागत बड़ा मेला पिया न
गंगाजी की आर -पार दुनउ ओर बनल
द्वार
ऊपर सड़क नीचे रेल कई वा रेला
पिया न
बना अलबेला पिया न ।।
वाराणसी में राजघाट का पुल बना है, उस पर इस कजरी को लिखा गया है।कजरी में सौतिया डाह भी देखने को मिलता है, एक कजरी में सौत लाने पर पति से पत्नी कहती है –
‘हरि -हरि पटना शहर गुलजारा
अकेले मत जाना ऐ हरि
हरि-हरि टिकवा ले आना है साजन
सौतिन मत लाना ऐ हरि।।
नायिका का पति स्वतन्त्रता आंदोलन में भाग लेने रंगून चला जाता है, तब नायिका की व्यथा को देखिए –
मिर्ज़ापुर कइले गुलजार हो
कचौड़ी गली सून कइल बलमू
एहि मिर्ज़ापुर से उड़ेला जहाजिया
उड़ेला जहाजिया हो रामा -2
पिया चल गइले रंगून हो
कचौड़ी गली सून कइल बलमू
कचौड़ी गली बनारस की बहुत प्रसिद्ध गली है,नायक वहां का रहने वाला था,वहां से मिर्ज़ापुर आ कर रंगून चला गया ,उस व्यथा को नायिका ने बड़े मार्मिक शब्दों में व्यक्त किया है। यहीं नही हमारे हर त्योहार में लोकजीवन को जोड़ने वाले रंग बिखरे हैं, देखिये कुछ अंश –
‘चलो गुंइयां आज खेले होरी कन्हैया संग
कोई गावत कोई मृदंग बजावत, कोई
नाचत गत तोरी

* * * *

चपल मेघ चपल सी चमचम, झिझकत बदन
मरोरी
खेले मसाने में होली दिगम्बर, खेले मसाने
में होरी।
चैत के माथे पर टीका लगाकर फागुन बिदा होता है, फाल्गुन पूर्णिमा यानी होली के दिन रात बारह बजे से चैता गाना प्रारम्भ हो जाता हैl चैत महीने में गाने के कारण इस गीत का नाम चैता पड़ा, बनारसी चैती गाने वालों में,पं. महादेव मिश्र, पं. हरिशंकर मिश्र, श्रीमती गिरिजा देवी का नाम अमर हैl चैत मास में प्रकृति का वर्णन देखिये –
‘कौन मास में फूलेला गुलबवा हो रामा
कौन रे मासे।
बेला फूले चमेली फूले अवरू फूलेला
कचनरवा हो रामा।।
गेंदवा जे फूले रामा माघ रे फगुनवां
चैत मासे फूलेला गुलबवा हो रामा
चैत रे मासे।।
अमवा की डाली पे लागल मोजरिया
कुहू-कुहू बोलले कोयलिया हो रामा
चैत रे मासे।।
कोयल की पीहू-पीहू आम्र मंजरी की बयार नायिका की उलाहना ,पिय मिलन की उत्कंठा भी चैती लोकगीतों में देखने को मिलती है-
‘एहि ठइयाँ मोतिया हेराइ हो रामा
कहाँ लख ढूँढू,
कोठवा पे ढूढू अटरिया पे ढूढू
सइयां से पूछत लजाई गइली रामा
कहाँ लख ढूढू।।

लोकगीतों का प्रचलन प्रायः ग्रामीण समाज मे अधिक होता है, ग्रामीण जीवन मूलतः श्रम पर आधारित होता है, अतः श्रम साध्य कार्य करते समय उसे मनोरंजक रूप देने के लिए गीत गाये जाते हैं, इन गीतों में रोपनी, सोहनी, जँतसार, चरखा, कोल्हू, आदि –
‘कांधे पर कुदरिया लेहले
माथे पर पगड़िया
खेतवा जोतेला हो किसनवा।

भोजपुरी लोकसाहित्य प्राचीन काल से लेकर आज तक राष्ट्रीय धारा से जुड़ा हुआ है। अपनी जन्मभूमि समाज की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने में भी नही हिचकिचाते तभी तो यहाँ कि महिलाएं गाती हैं-
लागी सेँधुरा से मटिया
पियार जननी
एहि माटी में छिपी हुई है
झांसी वाली रानी
वीर शिवाजी और भगत सिंह
मुनि ज्ञानी विज्ञानी ।
वीर कुंवर सिंह की वीरता और राष्ट्रीयता की भावना को अनेक लोक गीतकारों ने मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है, ‘बटोहिया ‘भोजपुरी प्रदेश का प्रसिद्ध लोकगीत है–
रामा करत रहले कुँवर सिंह विचारवा रे ना
रामा ताहि समय आईकर लोगवा रे ना
रामा भइले फिरंगी दुश्मनवा रे ना
रामा नाहके वो जेहलवा रे ना।।
आल्हा, लोरिकायन, वीर कुँवर सिंह भोजपुरी के प्रसिद्ध लोककाव्य हैं, जिनमें सामाजिक चेतना फूट-फूट कर बहती हैl सामाजिक विषयों, आर्थिक, दहेज,समस्या, जातिवाद, राजनैतिक विषयों पर जगाने का कार्य किया है, दहेज की समस्या पर यह गीत देखिये-
‘हुई आत्मा के पावन रिस्ता जोड़त सबहि
रे,
आज दानव दहेजवा के तोड़ा सबहि,
धर्म जानिके कन्या के मति वस्त्राभूषन,
कर्म जानिके वर पक्ष करत बा शोषण।

किसी देश की लोकसंस्कृति उस देश के लोकसाहित्य, वहां के गीतों तथा लोककलाओं में सन्निविष्ट रहती हैl अतः इस संस्कृति को उजागर करने के लिए लोकगीतों की रक्षा करना हमारा परम् धर्म हैl भारत एक विशाल देश है, विभिन्न युगों में विभिन्न जातियाँ उत्तर,पश्चिम, पूर्व से आती रही हैं, साथ ही अपनी संस्कृति का प्रभाव भारतीय संस्कृति पर
डालती रहीं हैं, विभिन्न प्रान्तों में विभिन्न प्रकार के तीज-त्यौहार मनाए जातें हैंl इनमें समस्त मानव की परम्पराएं, भावनाएं, कल्पनायें ध्वनित होतीं हैं, जैसा कि महात्मा गांधी ने भी कहा हैं – ‘लोकगीतों में धरती गाती है, पहाड़ गातें हैं, नदियाँ गातीं हैं, उत्सव व मेले ऋतुयें और परम्पराएं गाती हैं।” विवाह मानव जीवन का सबसे महत्वपूर्ण संस्कार है। सभ्य अथवा असभ्य कही जाने वाली संसार की सभी जातियाँ इस संस्कार की महत्ता स्वीकार करतीं हैंl इसका महत्व सर्वत्र प्रचलित है, एक पिता अपनी पुत्री से कहता है-
‘हेरउ काशी हेरउ बनारस, हेरउ देस
सरुआरि।
तोहई जोग बेटी ,सुघर बर नाही, अब
बेटी रहउँ कुआंरि।।
सिंदूर का मंहगा होना, चुनरी का अनमोल होना दोनों ही गरीब पिता के लिए कष्ट का कारण हैं, जो बेटी के विवाह में बाधक बनतें हैं –
‘हटियन सेनुरा महंगा भये बाबा
चुनरी भइल अनमोल
यही रे सेनुरवा के कारण बाबा
छोड़उ मैं देस तोहार।।
यह समस्या आज भी हमारे समाज मे बरकरार हैl लोक गीत हमारी धरती, हमारे जीवन के गीत हैं, हमारी आशा-निराशा के गीत हैंl लोकगीत, लोकसंस्कृति, लोकविश्वास पर आधारित अभिव्यक्ति हैl डॉ. सत्येंद्र ने लिखा है कि –
“वह गीत जो लोक-मानस की अभिव्यक्ति हो अथवा जिसमें लोकमानसाभास भी हो लोकगीत के अंतर्गत आएगा।”
लोकगीत सर्वसाधारण लोगों की हृदयानुभूति है, विशेषतः ग्रामीण जीवन की जनता ,जन्म से लेकर मृत्यु तक के गीत गाती है, संस्कार सम्बन्धी गीत, ऋतु संबंधित गीत, पूजा, त्यौहार गीत, धर्मिक, सांस्कृतिक , सामाजिक, ऐतिहासिक, राजनीतिक, आर्थिक, आदि विभिन्न विषयों का लेखा-जोखा लोकगीतों में भरा पड़ा हैl लोक संस्कृति को समझने के लिए, लोकसाहित्य का अध्ययन आवश्यक हैl हिंदी भाषी क्षेत्र में भोजपुरी लोकगीतों की प्रसिद्ध एवं सशक्त परम्परा है। शायद ही कोई ऐसा अवसर होगा जिसके लिए उपयुक्त लोकगीत न होl भारतीय संस्कृति का स्वाभाविक चित्रण भोजपुरी लोकगीतों में देखने को मिलता है, लोक जीवन को जोड़ने में इन गीतों का बहुत बड़ा योगदान है।